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मंगलवार, 2 जनवरी 2018

आसपास की गलियों से गुजरती ‘बातों वाली गली’ - गिरिजा कुलश्रेष्ठ

गिरिजा कुलश्रेष्ठ... यानी फ़ुल-टू मिठास. मीठा स्वभाव, मीठी आवाज़, मीठा लेखन..... कुछ व्यक्तित्व सादगी की ऐसी प्रतिमूर्ति होते हैं, जो सादगी का स्वयमेव पर्याय बन जाते हैं. गिरिजा दीदी ऐसा ही व्यक्तित्व हैं. आइये देखें, क्या लिखती हैं वे.
यह सुखद संयोग है कि जब कभी ब्लाग पर दिख जाने वाली वन्दना अवस्थी दुबे, जिनका प्रथम परिचय सलिल भैया (सलिल वर्मा) की ‘जिज्जी’के रूप में हुआ था लेकिन पिछले साल अर्चना चावजी द्वारा बनाए वाट्सअप ग्रुप (गाओ गुनगुनाओ) के माध्यम से उनसे भेंट हुई तो मैं उनके व्यक्तित्त्व और वाक्कौशल से प्रभावित हुए बिना न रह सकी . गीत और संवादों के माध्यम से वे हर किसी की आत्मीया बन गई हैं . कहने की जरूरत नही कि जब इनका यह पहला कहानी संग्रह बातों वाली गली आया तो पढ़ने की उत्कण्ठा तीव्र हो उठी . पता चला कि पुस्तक आमेजोन से प्राप्त की जा सकती है पर शायद माँग पूर्ति से अधिक होजाने के कारण निराशा ही हाथ लगी . तब ग्रुप पर ही उन बहिनों से भेजने का आग्रह किया जो ‘बातों वाली गली’ की बातें करके जी ललचा रही थीं . तब बहिन ऊषाकिरण (मेरठ) ने मुझे यह पुस्तक भेजी यानी ‘बातों वाली गली’ . यह हुई इस बहुप्रतीक्षित पुस्तक को पाने की दास्तान .
बातों वाली गली में बीस कहानियाँ हैं .आसपास की ही ,रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी बातों को लेकर बुनी गई बड़ी कहानियाँ जैसे हमारे आपके बीच गुजरती चलती हैं . निम्न मध्यम परिवारों में मेहमान के आने पर उनके नाश्ते वगैरह को देख बच्चे किस तरह ललचाते हैं यह मार्मिक और बहुत ही जाना माना प्रसंग है जिसे वन्दना जी ने कहानी (अपने अपने दायरे ) में खूबसूरती से पिरोया है . ‘अनिश्चितता में’ , छोटी किन्तु बेरोजगारी से आई हीनता की अच्छी कहानी है ‘.ज्ञातव्य’ कहानी में पापा की मेहमाननवाजी को कोसने वाले बच्चे अपनी तरह से घर चलाते हैं .इसमें नई पीढ़ी में दूर के या व्यर्थ मेहमानों के प्रति उपेक्षा के भाव को बखूबी दर्शाया है . वास्तव में यह आज का यथार्थ है . ‘आसपास बिखरे लोग’ , लोगों की संवेदनहीनता का निर्मम दस्तावेज है . दूसरों के यहाँ हुई दुर्घटना लोगों के लिये महज एक खबर है . पड़ोस में बहू के जल जाने पर लोग तमाम बातें तो करते है पर सच को सामने लाने वाला कोई कदम नही उठाते . शीर्षक कहानी , जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है घर में रहने वाली महिलाएं अक्सर किस तरह दूसरों के बारे में अनुमान लगाकर तिल का ताड़ बना लेतीं हैं यह बड़ा और कड़वा सच है . जैसा कि भूमिका में अचला जी ने कहा है अधिकांश कहानियाँ स्त्री विमर्श पर केन्द्रित हैं .’हवा उद्दण्ड है’ , ‘नीरा जाग गई है’ ,’अहसास’ ,’सब जानती है शैव्या’ ,’प्रिया की डायरी’ ,ममता जी बड़ी होगई हैं ‘विरुद्ध’ ,’बड़ी बाई साब’ आदि कहानियाँ स्त्री के असन्तोष , अपने अस्तित्व के प्रति जागरूकता ,व व्यवस्था के प्रति असन्तोष की कहानियाँ हैं . हाँ ‘रमणीक भाई नहीं रहे’ , ‘पापा सब तुम्हारे कारण हुआ’ , ‘शिव शिव बोल.’, .कुछ अलग तरह की कहानियाँ हैं .ये लगभग सारी कहानियाँ उनके ब्लाग किस्सा-कहानी पर भी हैं .
कुल मिलाकर सारी कहानियाँ हमारी अपनी हैं . आसपास की है . जहाँ तक कहानियों के कथ्य की बात है ,वे रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी का जीवन्त दस्तावेज हैं .उनके पात्र आप और हममें से ही हैं . पात्रों के मनोभावों का सूक्ष्म चित्रण लेखिका के गहन निरीक्षण व अनुभूति का परिचायक है . संवाद रोचक हैं. भाषा सरल और जन सामान्य की भाषा है . कहीं भी दुरूहता नहीं है . सहज प्रवाह है . खास बात है लेखिका के कहने का तरीका जो किस्सा कहानी सा ही रोचक है . हर कहानी इतनी रोचकता के साथ शुरु होती है कि पाठक का ध्यान सहज ही जिज्ञासा से भर जाता है . वर्णन बेशक गजब का है . चाहे वह देशकाल हो या अन्तर्संघर्ष . बहुत गहन व सूक्ष्म चित्रण है . कुछ भी बनावटी नहीं लगता . हाँ कहीं कहीं कहानी का उद्देश्य स्पष्टता की माँग करता प्रतीत होता है . कहीं कहीं शिल्प में भी कुछ सुधार की गुंजाइश है . मेरे विचार से ‘बड़ी बाई साब’ ऐसी ही कहानी है . 
निष्कर्षतः बातों वाली गली कहानी संग्रह पाठकों के बीच जगह बनाएगा नहीं , बना चुका है . आशा है कि आगे और भी निखार के साथ हमें उनकी कहानियाँ पढ़ने मिलेंगी .

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

ज़मीन से जुड़ी कहानियों का संग्रह है- बातों वाली गली

पिता की नज़र में, पुत्री की पुस्तक-

हिन्दी भाषा साहित्य में अन्यान्य विधाओं का उद्भव कभी भी हुआ हो, किन्तु जहां तक कहानी विधा का सम्बन्ध है, इसका उद्भव तो साहित्य के जन्म से भी पुराना है. कदाचित, मानव-प्रजाति के जन्म के साथ ही कहानी का अवतरण हुआ है. पृथ्वी पर पदार्पण करने वाला शिशु मां की गोद से ही परिपुष्ट होकर जब बचपन की ओर अग्रसर होता है, तो मां ही उसे लोक-प्रचलित छोटी-छोटी कहानियां सुनाकर जीवन-पथ पर चल पड़ने के लिये तैयार करती है. सभ्यता के विकास के इसी क्रम में कहानी भी क्रमश: अपना कलेवर बदलती रही है. इसका यह विकसित स्वरूप आज कहां खड़ा है- सभी को इसका परिज्ञान है. यह कहना असंगत न होगा कि साहित्य की सभी विधाओं में लोकप्रियता की दृष्टि से आज कहानी सर्वोच्च आसन पर आसीन है. कहानी की चर्चा के इसी तारतम्य में वंदना अवस्थी दुबे कृत “बातों वाली गली” की चर्चा भी समीचीन है.
वन्दना का सद्य:प्रकाशित उक्त कहानी संग्रह- ’बातों वाली गली’ इस समय मेरे हाथों में है. पुस्तक के प्रथम अर्ध भाग पर अधुनातन शैली में सजा हुआ आकर्षक रंगीन चित्र है, तो शेष अर्ध भाग पर लेखिका के नाम सहित कहानी संग्रह का नाम-बातों वाली गली. सुधि पाठक भलीभांति जानते हैं कि कृति का नामकरण कितना महत्वपूर्ण काम है. शीर्षक को कृति की आत्मा कहा गया है. वन्दना के कहानी संग्रह के शीर्षक को कुछ यों परिभाषित किया जा सकता है कि वह गली या स्थान जहां मोहल्ले की प्राय: प्रौढ़ महिलाएं निरर्थक या अनर्थक बातें , यथा परनिंदा, चरित्र हनन, मनगढंत, सच्चे-झूठे किस्से और ईर्ष्या-द्वेष से पगी हुई कहानियां बड़े रसीले अन्दाज़ में पेश किया करती हैं. इस प्रकार गली के चरित्र को उजागर करता हुआ पुस्तक का यह शीर्षक वन्दना की परिपक्व दृष्टि और अधुनातन सोच को भी उजागर करता है. इस परिप्रेक्ष्य में पुस्तक का शीर्षक पूर्णत: उपयुक्त है.
साहित्यशास्त्रियों के अनुसार साहित्य की हर विधा के कुछ मूल तत्व होते हैं- सो कहानी के भी हैं- वे हैं :- शीर्षक, कथानक, सम्वाद, पात्र, चरित्र चित्रण, भाषा-शैली और उद्देश्य. एक अच्छे लेखक को अपनी रचना में इन्हें उपयुक्त स्थान देना चाहिये. किन्तु युग के प्रभाव से कोई भी अछूता नहीं. आज का युग बंधनविहीनता को प्राथमिकता देता है., सो कलाकार या साहित्यकार भी अपनी रचनाओं की सृष्टि करते समय प्राय: सम्बद्ध विधा के तत्वों के समावेश का खयाल नहीं- हां रचना में स्वत: उसका समावेश हो जाये , तो उसे ऐसा करने में कोई परहेज भी नहीं. जहां तक वन्दना का प्रश्न है- कहानी की रचना करते वक़्त भले ही उनकी दृष्टि उसके तत्वों की ओर न रही हो, किन्तु कोई भी विज्ञ पाठक उक्त तत्वों के समावेश को कहानियों में भली भांति देख-पढ़ सकता है. मैने वन्दना की सभी कहानियों को पूर्ण मनोयोग से पढ़ा है और पाया है कि प्राय: सभी कहानियों में उक्त तत्वों का सम्यकरूपेण समावेश हुआ है. कहानियों का कथानक लम्बा और उबाऊ न हो, सम्वाद या कथोपकथन लम्बे-लम्बे न हों, पात्रों के चरित्र चित्रण हेतु लेखकदृष्टि सजग हो और उद्देश्य स्पष्ट हो. इस दृष्टि से वन्दना को आप पूर्ण सजग पायेंगे. उन्होंने उक्त परिप्रेक्ष्य में पाठकों को शिक़ायत करने का कोई भी अवसर प्रदान नहीं किया है.
कहानी संग्रह ’बातों वाली गली में कुल बीस कहानियां संग्रहीत हैं. सर्वप्रथम कहानियों के कलेवर की बात की जाये तो आप पायेंगे कि वन्दना की बीस में से सत्रह कहानियों को तो लघुकाय कहानियों की संज्ञा दी जा सकती है. शेष अन्तिम तीन कहानियां ही ऐसी हैं जिन्हें दीर्घ कलेवर प्राप्त है. आज के युग की विशेषता है और आवश्यकता भी कि रचनाओं का कलेवर आकार-प्रकार की दृष्टि से छोटा होना चाहिये ताकि पाठक कम से कम समय में अधिक से अधिक पढ़ सके. वन्दना ने समय की इस नब्ज़ को भली प्रकार पहचाना है; एतदर्थ ही उन्होंने लघु आकार की रचनाएं लिखकर पाठक को कम से कम समय में अधिक से अधिक कहानियां पढ़ने का अवसर प्रदान किया है. पाठक-वर्ग ने इस हेतु लेखिका की सराहना भी की है. वन्दना की कहानियों की लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है.
आइये, थोड़ी सी चर्चा अब कहानियों के कथानकों की :- वैसे तो कहानी संग्रह में बीस कहानियां और हर कहानी का अपना अल्ग अलग कथानक है किन्तु संग्रह के समग्र कथ्य पर विचार करने पर हमें विदित होता है कि वन्दना की समस्त कहानियां मध्यमवर्गीय भारतीय समाज की दशा और दिशा पर आधारित हैं. यद्यपि लेखक की हर कहानी कल्पना प्रसूत होती है जिनमें यथार्थ से परे जाकर लिखने की भी सम्भावना विद्यमान रहती है किन्तु इस संग्रह में लेखिका ने सम्भाव्य को स्वीकार करते हुए प्राय: प्रत्येक कहानी में यथार्थ का चित्रण किया है. परिणामस्वरूप, पाठक को पढ़ते समय संग्रह की कहानी स्वयं अपनी कहानी प्रतीत होती है. इस स्थिति में पाठक कहानी के पात्रों से तादात्म्यावस्था स्थापित करने में सफल होते हैं. काव्य की चरम रसानुभूति यही है और यही रचना की सफलता भी है. वन्दना अपनी कहानियों में यह रसाभास कराने में सफल हैं.     
कहानी संग्रह का एक अन्य मुख्य बिन्दु है कथानक के लिये चयनित सामाजिक क्षेत्र. हमारे देश का समाज जीवन-यापन की दृष्टि से तीन स्तरों में विभाजित है- उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग. देश की अधिकांश जनता मध्यम वर्गीय जीवन जीती है. इस वर्ग के लोगों का रहन-सहन प्राय: ’हां’ और ’न’ के द्वन्द से आवृत्त रहता है. ऐसे लोगों की आर्थिक स्थिति थीक नहीं होते हुए भी उनके दैनन्दिन जीवन की आवश्यकताओं की किसी प्रकार पूर्ति होती रहती है. सुख-दुखमय जीवन-तराजू के ये दोनों पलड़े कभी ऊंचे और कभी नीचे आते-जाते रहते हैं. कहा जाता है-’साहित्य समाज का दर्पण होता है.’ अर्थात कथित समाज की वास्तविक तस्वीर वहां के साहित्य में देखी जा सकती है. जहां तक वन्दना की कहानियों का प्रश्न है – वे मध्यम वर्ग की अपनी ही जैसी कहानियां हैं. चंद म महिलाओं में ’ देख न सकहिं पराई विभूति’ का प्राकृतिक गुण होता है. वन्दना की लगभग आधी कहानियां इसी गुण से सम्पन्न महिलाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करतीं हैं. ऐसी महिलाओं की मानसिकता का उन्होंने जीवन्त चित्रण  बड़ी स्वाभाविक शैली में किया है, उदाहरणार्थ- कहानी ’अलग-अलग दायरे, नीरा जाग गयी है, अहसास, दस्तक के बाद, करत-करत अभ्यास के, बड़ी हो गयी हैं ममता जी, और विरुद्ध आदि कहानियों को रखा जा सकता है.  कुछ कहानियां ऐसी भी हैं जिनमें महिला समाज की जागरूक और साहसी महिलाओं का चित्रण है- “प्रिया की डायरी”, “बातों वाली गली”, “नीरा जाग गयी है”, और सब जानती है शैव्या” इसी प्रकार की कहानियां हैं. इनके अतिरिक्त कुछ कहानियों में समाज के विविध रंग भी चित्रित किये हैं जैसे- “नहीं चाहिये आदि को कुछ” में बाल मनोविज्ञान का चित्रण है तो “अनिश्चितता में” दो भाइयों के जीवन स्तर की गाथा है. “हवा उद्दंड है” में वर्तमान युग की रुग्णता दर्शाई गयी है तो “बड़ी बाई साब” में सामंती प्रवृत्ति का चित्रण. इन सबके विपरीत “शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी” एक ऐसी कहानी है जो आस्था और धर्म के नाम पर ढोंगी बाबाओं के कलुषित चरित्र को न केवल उजागर करती है, बल्कि ऐसे ढोंगी महात्माओं से दूर रहने, सावधान करती है. राम रहीमों के उदाहरण आज भरे समाज, यत्र तत्र अपने आसन जमाये हुए हैं.
जहां तक कहानी संग्रह की भाषा शैली का सवाल है, इसकी भाषा बड़ी सहज और स्वाभाविक है जो पाठक के मन-मस्तिष्क में आसानी से उतरती चली जाती है. शब्दों की दुरूहता से दूर , इसमें यत्र तत्र कुछ विदेशी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया गया है, लेकिन ये केवल इसलिये कि लेखिका की भाषा, जन सामान्य की भाषा बन सके. कहानी की शैली तो चित्ताकर्षक है ही- इसे सुधि पाठक बंधु स्वयं महसूस करेंगे. कहानी के अन्य तत्व यथा सम्वाद और उद्देश्य भी यथानुरूप देखने को मिलते हैं. हर कहानी का जिज्ञासापूर्ण अन्त उसके उद्देश्य-पूर्ति की घोषणा स्वत: कर देती है. कुल मिला के उक्त कहानी संग्रह में प्राय: सभी तत्वों का सम्यक रूपेण समावेश हुआ है. कहा जा सकता है कि “बातों वाली गली” आज के युग की दृष्टि से एक सफल कृति है जिसके लिये वन्दना साधुवाद की पात्र हैं.
                                       प्रकाशन की ड्रुष्टि से यह कहानी संग्रह “बातों वाली गली” वन्दना की यद्यपि पहली कृति है तथापि एक कथाकार और लेखिका के रूप में हिन्दी जगत में उनका स्थान वर्षों पूर्व से सुरक्षित है. उनकी कहानियां और आलेख विगत अनेक वर्षों से देश की प्रसिद्ध हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं. पत्रकार-जगत में भी उनकी अच्छी खासी पैठ है. देशबंधु के कार्यकाल में उन्होंने एक सक्षम पत्रकार के रूप में ख्याति अर्जित की है. समय-समय पर आयोजित होने वाली गोष्ठियों, सेमिनारों , साहित्यिक समारोहों में भी वे प्रतिष्ठित सहभागी के रूप में भाग लेती रही हैं. तमाम हस्तियों के साक्षात्कार भी उनके खाते में हैं.
वन्दना का यह प्रथम कहानी संग्रह”बातों वाली गली” अत्यल्प अवधि में ही बहुत लोकप्रिय सिद्ध हुआ हैसुधी पाठकों की समर्थ प्रतिक्रियाओं से यह भलीभांति स्पष्ट है. मुझे पूरा भरोसा है कि निकट भविष्य में यह संग्रह- “गली-गली की बात” बनने वाला है. ईश्वर करे, ऐसा ही हो. मेरी सद्भावना और आशीर्वाद.
राम रतन अवस्थी

                                   

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

बातों वाली गली- मेरी नज़र से


साधना वैद जी को कौन नहीं जानता! जितनी प्यारी वे खुद हैं, उतना ही प्यारा लिखती भी हैं. आइये उनकी नज़र से जानें "बातों वाली गली" को-

ये लीजिये ! इस ‘बातों वाली गली’ में एक बार जो घुस जाए उसका निकलना क्या आसान होता है ! इसकी उसकी न जाने किस-किस की, यहाँ की वहाँ की न जाने कहाँ-कहाँ की, इधर की उधर की न जाने किधर-किधर की बस बातें ही बातें ! और इतनी सारी बातों में हमारा तो मन ऐसा रमा कि किसी और बात की फिर सुध बुध ही नहीं रही ! आप समझ तो गए ना मैं किस ‘बातों वाली गली’ की बात कर रही हूँ ! जी यह है हमारी हरदिल अजीज़ बहुत प्यारी ब्लॉगर वन्दना अवस्थी दुबे जी की किताब ‘बातों वाली गली’ जिसमें उनकी चुनिन्दा एक से बढ़ कर एक २० कहानियाँ संगृहीत हैं ! सारी कहानियाँ एकदम चुस्त दुरुस्त ! मन पर गहरा प्रभाव छोड़तीं और चेतना को झकझोर कर बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करतीं !

इन कहानियों को पढ़ कर इस बात का बड़ी शिद्दत से एहसास होता है कि नारी मन की गहराइयों को नाप लेने की वन्दना जी में अद्भुत क्षमता है ! यूँ तो सारी ही कहानियाँ बहुत बढ़िया हैं लेकिन कुछ कहानियों में नारी मन की अंतर्वेदना का वन्दना जी ने जिस सूक्ष्मता के साथ चित्रण किया है वह देखते ही बनता है ! इन कहानियों को पढ़ते-पढ़ते कई बार अचंभित हुई कि अरे मेरी तो कभी वन्दना जी से बात ही नहीं हुई फिर इस घटना के बारे में इन्हें कैसे पता चल गया  और इतने सटीक तरीके से इन्होंने इसे कैसे लिख दिया ! क्या यह भी संयोग है कि स्वयं पर बीती हुई अनुभूत बातें ठीक उसी प्रकार औरों के साथ भी बीती हों ? चित्रण इतना सजीव और सशक्त कि जैसे चलचित्र से चल रहे उस घटनाक्रम के हम स्वयं एक प्रत्यक्षदर्शी हों ! लेखिका की यह एक बहुत बड़ी सफलता है कि पाठक कहानियों के चरित्रों के साथ गहन तादात्म्य अनुभव करने लगते हैं ! भाषा और शैली इतनी सहज और प्रांजल जैसे किसी मैदानी नदी का एकदम शांत, निर्द्वन्द्व, निर्बाध प्रवाह !

नारी को कमतर आँकने की रूढ़िवादी पुरुष मानसिकता पर करारा प्रहार करती कहानियाँ ‘सब जानती है शैव्या’ और ‘प्रिया की डायरी’ बहुत सुन्दर बन पडी हैं ! कुछ कहानियाँ जो मन के बहुत करीब लगीं उनके नाम अवश्य लूँगी ! ‘अहसास’, ‘विरुद्ध’ और ‘बड़ी हो गयी हैं ममता जी’ मुझे विशेष रूप से बहुत अच्छी लगीं ! ‘दस्तक के बाद’, ‘नीरा जाग गयी है’, ‘बड़ी बाई साहेब’ और ‘डेरा उखड़ने से पहले’ कहानियों में हम भी स्त्री की हृदय की विषम वीथियों में जैसे वन्दना जी के हमराह बन जाते हैं ! ‘हवा उद्दंड है’, ‘बातों वाली गली’ और ‘आस पास बिखरे लोग’ वास्तव में इतनी यथार्थवादी कहानियाँ हैं कि ज़रा इधर उधर गर्दन घुमा कर देख लेने भर से ही इन कहानियों के पात्र सशरीर हमारे सामने आ खड़े होते हैं !

‘बातों वाली गली’ कहानी संग्रह की हर कहानी हमें एक नए अनुभव से तो परिचित कराती ही है हमारी ज्ञानेन्द्रियों को नए स्वाद का रसास्वादन भी कराती है !

पुस्तक नि:संदेह रूप से संग्रहणीय है ! इतने सुन्दर संकलन के लिए वन्दना जी को बहुत-बहुत बधाई ! वे इसी तरह स्तरीय लेखन में निरत रहें और हमें इसी प्रकार अनमोल अद्वितीय कहानियाँ पढ़ने को मिलती रहें यही हमारी शुभकामना है ! आपकी अगली पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी वन्दना जी ! हार्दिक अभिनन्दन !



शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

अनूठा संग्रह है: बातों वाली गली- GT Eng

वे अपना नाम GT Eng लिखते हैं। मेरी कहानियां ब्लॉग के ज़माने से पढ़ रहे हैं जान के कितनी खुशी हुई, ये बताया नहीं जा सकता। फेसबुक की मेरी मित्र सूची में नहीं हैं, लेकिन दोस्ती का पैमाना केवल ये सूची नहीं है। उन्होंने किताब मंगवाई, और फिर शानदार समीक्षा भी की। दो दिन पहले उन्होंने ये पोस्ट डाली थी, लेकिन उसी दिन मैं दिल्ली के लिए निकल रही थी। विलम्ब के लिए क्षमा GT साब।
"बातो वाली गली " पहला कहानी संग्रह वो भी पापा जी को समर्पित इससे सुंदर समर्पण और क्या हो सकता है । हिंदी साहित्य मे कहानियो का अपना अस्तित्व और अपनी पहचान बिलकुल खो सी गई है बड़े भाई साहब, ठाकुर का कुआँ, पूस की रात जैसी कहानिया पढने के बाद आजकल कहानियो के नाम पर लिखे जा रहे संवाद, संशय , संदेह और
व्यग्रता को कहानी मन मानता ही नही और उन पर समय जाया करने से मै बचता ही रहता हूँ । ऐसा साहित्य एकता कपूर के धारावाहिक की तरह आपका साहित्यिक प्रेम , ज्ञान सरोकार सब छिन्न भिन्न कर देता है ।
परन्तु "बातो वाली गली" की लेखिका सुश्री वंदना अवस्थी दुबे जी की कुछ कहानिया मै उनके ब्लाग पर पढ चुका था । इसलिए उनके इस प्रथम कहानी संग्रह मे मुझे विशेष रूचि थी
बहरहाल विमोचन के बाद 14 सितंबर को पंहुची वंदना जी की पुस्तक "बातो वाली गली से " बात करने का मौका कल ही मिला और 118 पृष्ठ पलटने मे महज दो घंटे लगे । ये कोई जेम्स हेडली चेईज का उपन्यास नही बल्कि समसामयिक विषयो पर रोजमर्रा की जिंदगी मे आम इंसान के जीवन उसके आस पास घटती घटनाओ का बेहद सरल बोलचाल की भाषा और शब्दो का अनूठा संग्रह है । जहाँ असल भारतीय जीवन बेतरतीब बने मकानो की अपनी अपनी साईज की अपनी अपनी हैसियत की खिडकियो से झांकता है । जहाँ भरी दुपहरी मे सूरज चीं चा करते हैंड पम्प से बात करता है । गर्म लू आंगन मे लगे पेड़ की छांव को ठंडा कर मजे लेती है । जहाँ आस्था अभाव के साथ जीवन को, एक स्वभाव बना देती है ऐसे कई रमणीय भारतीय जीवन दर्शन के परिदृश्य है इस "बातो वाली गली में" ।


कहानी कोई भी हो दरअसल वो बस एक कहानी ही होती है ये हर पाठक जानता है जो एक सत्य है । किसी कहानी को पढते हुए अगर इस सार्वभौमिक सत्य से आप कुछ देर के लिए भी विमुख होते है तो समझिए लेखक का लिखना सफल हो गया । बातो वाली गली मे ऐसे कई मौके आऐंगे जब आप को लगेगा अरे अपने यहाँ वहाँ भी तो ऐसा ही हुआ कल परसो या पिछले
साल , ,शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी " शीर्षक ने न केवल कहानी के प्रति जिज्ञासा बढाई बल्कि कहानी के अंत मे सोचने पर मजबूर भी कर दिया की " शुभ " आस्था से नही अवचेतन मन और निरंतर कर्म से होता है । ये इस "बातो वाली गली" मे घुसने पर आप समझ पाऐंगे ।
इस कहानी संग्रह के बारे मे इतना ही यथेष्ठ है कि 'बात निकली है तो अब दूर तलक जाएगी "
इस संग्रह का साहित्यिक मानकों की दृष्टि से विवेचना करने की मुझे कोई आवश्यकता महसूस नही हुई क्योकि जब लेखन आपके आसपास के वातावरण और परिदृश्य का प्रतिरूप हो उसके लिए मानको का कोई भी परीक्षण न्यायसंगत नही कहा जा सकता ।
वंदना जी को बहुत शुभकामनाये

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

बातों वाली गली : चारू शुक्ला की नज़र में




अपनी रचनाओं का किताब के रूप में प्रकाशित होना, लोगों के हाथों में किताब का पहुंचना और फिर सुधि पाठकों की उस पर प्रतिक्रिया आना कितना सुखद है ये वही समझ सकता है, जिसकी पहली किताब प्रकाशित हुई हो. बाद की किताबों के लिये शायद उतना रोमांच न रह जाता हो. " बातों वाली गली" पर प्रतिक्रियाएं मिलनी शुरु हो गयी हैं, जिन्हें मैं क्रमश: यहां पोस्ट करूंगी. तो ये रही पहली प्रतिक्रिया चारु शुक्ला जी की- चारु जी ने इस किताब पर एक गीत भी रच डाला है, उसका वीडियो भी देखें -
'बातों वाली गली' विलम्ब से निकली अपने घर से सो सबका इंतज़ार थोड़ा लम्बा तो हुआ, लेकिन अब खुशी इस बात की है कि अब ये अलग-अलग पतों पर, अलग-अलग शहरों में अपनी पहुंच बना रही है। कल मित्रवर Charu Shukla जी को किताब मिली और उन्होंने एक ही बैठक में उसे न केवल पढ़ डाला बल्कि शानदार टिप्पणी भी लिख के पोस्ट की। बहुत शुक्रिया चारु जी। आपके लिए यहां कॉपी कर लाये हैं चारु जी की पोस्ट। पढ़ें किताब के बारे में आप भी-
इंतज़ार बहुत सालता,तब जब ये लगातार बना रहता कि आज अब न जाने कब पूरा हो, पर सच में जब पूरा होता तो खुशी दोगुनी बढ़ा देता, ऐसा ही कुछ अचानक आज हुआ, जब हमारे इंतज़ार पर लगाम लगा दी, डाक बाबू ने आकर, एकदम से वो गीत याद आ गया, डाकिया डाक लाया, अर्सा गुज़र गया डाक बाबू का इंतज़ार न किया, पर इसको भी फिर जीने का अवसर दिया, वंदना अवस्थी दुबे जी ने अपनी पहली कृति बातों वाली गली लिखकर, तो साहब अपना इंतज़ार आज खत्म पर बातों का सिलसिला तो अभी शुरू ही हुआ है, अब इसे अच्छी कहूं कि बुरी पर आदत तो बस आदत है, कोई अच्छी रचना हाथ लगी नहीं की, जब तक पूरी न पढ़ लें चैन कहाँ, तो कुछ ऐसा ही सफ़र शुरू हुआ बातों वाली गली का, जो अचला नागर जी की शानदार भूमिका और वंदना जी की अपनी कही के साथ, अलग अलग दायरे, अनिश्चितता में,ज्ञातव्य,आस पास बिखरे लोग,बातों वाली गली,नहीँ चाहिए आदी को कुछ,हवा उद्दंड है, नीरा जाग गई है, रमणीक भाई नहीं रहे, सब जानती है शैव्या,अहसास,दस्तक के बाद,प्रिया की डायरी, करत करत अभ्यास के, बड़ी हो गईं हैं ममता जी,विरुद्ध,सब तुम्हारे कारण हुआ पापा,डेरा उखाड़ने से पहले,शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी से होता हुआ बड़ी बाई साब पर जाकर खत्म हुआ, वंदना जी की कहानियां जहां आस पास की जान पड़ती हैं तो वहीँ उनके पात्र तो लगता कि अरे ये कुछ वैसा ही तो है, जैसे भाव जगाते, और हाँ वो जो आपकी कहानी के मेहमानों के सामने ही मिठाई चट कर जाने वाले बच्चे हैं न, वो मेरे ही दोनों शैतान हैं, उसी रंग में रंगे हुए
बाकी सारी कहानियां अपने आप में कहीं गुदगुदाती हैं तो कहीं प्रश्न भी लेकर खड़ी नज़र आती हैं कि,आखिर बदला क्या? बाकी नारी मन की जितनी गहरी पड़ताल आपने की है, वो प्रश्न भी है, सोचने पर मजबूर भी करता,
वंदना जी आप साल दर साल यूं ही लिखती रहें, इतनी बेहतरीन रचना के लिए बहुत बहुत शुक्रिया और उम्मीद है आगामी रचना जल्द पढ़ने मिले