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गुरुवार, 1 मार्च 2018

श्वेता का प्यारा सा गिफ़्ट..... :)



जिन चीज़ों का इंतज़ार , हम छोड़ देते हैं, अगर अचानक ही वे मिल जाएं तो हमारे लिए सरप्राइज़ गिफ्ट की तरह होती हैं। Sweta Soni की ये पुस्तक समीक्षा भी मेरे लिए गिफ़्ट ही है। खूब स्नेह श्वेता 
बातों वाली गली------------------
हाँ-हाँ,जानती हूँ बहुत देर से आई हूँ!पर करती भी क्या? गुम जो हो गई थी गलियों में।बहुत हीं रोचक और मजेदार रही अवस्थी दीदी(वंदना अवस्थी दुबे)के मन की गली यानि-"बातों वाली गली"।एक दो नहीं पूरे बीसियों विषय की दिलचस्प और अनोखी कहानी है इसमें-चलिए रूब रू करवाती हूँ कहानियों की---
पहली गली से नाम है-"अलग-अलग दायरे"----यह कहानी सुनील,उसकी पत्नी नीरू और उसकी सखी राजी के इर्द-गिर्द घूमती है।इस कहानी में दो सखियों के बीच अमीरी-गरीबी में जी जा रही जिंदगी की कुछ झलकियां है जो पूरी तरह वास्तविकता से जुड़ी है के-कैसा महसूस करती है एक गरीब सखी जब उसके घर उसकी अमीर सखी कुछ पल बिताने आती है,हर चीज में कमी महसूस कर अंदर-अंदर शर्म और हीन भाव में जब खुद को आंकती है।परन्तु उसके पति ने उसे बहुत बढ़िया बात बताई और उसे ये कह कर सम्भाला के-"मित्रता उनके बीच हीं कायम रह सकती है जिसमें बनावटीपन या दिखावा न हो,साथ ही एक दूजे को समझने की क्षमता हो।.....👨‍👩‍👧‍👦
दूसरी गली-"अनिश्चितता में"...इस कहानी की शुरुआत लेखिका ने रेल यात्रा से की है और करे भी क्यूँ न!एक दुःखी चिंतित व्यक्ति को कुछ सोचने के लिए इससे अच्छी जगह कहाँ मिलेगी।इस कहानी का नायक अपने बेरोजगारी से हताश था जो एम.एस.सी में 65% लाने के बावजूद बेकार बैठा था।अब तो उसके छोटे भाई को भी नौकरी लग गई थी सो उसके सामने आने से भी शर्म महसूस होने लगी थी उसे और तो और पिताजी ने भी तो कोई कसर नहीं छोड़ी ऐसा महसूस कराने के लिए आखिर टोक लगा हीं दी उन्होंने--"आखिर कब तक खिलाता रहूँ तुमलोगों को"--और उस तुमलोगों में मेरे सिवा और बचा ही कौन था। 🤦‍♂️
तीसरी गली-"ज्ञातव्य"---ये गली बहुत कुछ बोध करा गई घर के बच्चों को जब घर की बागडोर सम्भालने का जिम्मा उनके पिता ने उनके हाथों में थमा दी के आखिर कैसे नहीं चलता आपसे घर इतने पैसों में --जब खुद पड़ पड़ी तब समझ आई आखिर होती कहाँ थी फिजूल खर्ची,क्यूँ लेने पड़ जाते थें घर के मुखिया को महीने के अंत में कर्ज!खैर इस फैसले से बच्चों में समझ तो आई,फिजूल खर्ची पर काबू पाने की। 👌
चौथी गली-"आस पास बिखरे लोग"--इस गली में आस-पड़ोस के बेतरतीब लोगों का काबिलानापन उजागर किया है लेखिका ने। जो किसी घटना के विषयों को तोड़-मरोड़ कर एक दूजे से बतिया तो सकते हैं पर वक्त आने पर किसी को इन्साफ दिलाने के लिए पुलिस का साथ नहीं दे सकते आखिर कौन पड़े इस झमेले में सोच भाग खड़े होते हैं 🏃‍♂️-----
पाँचवी गली----"बातों वाली गली"--जो अपने शीर्षक पर खड़ी उतरी है।बातें निकलती हीं है महिलाओं के बीच से सो यहाँ रू ब रू करवाई इस गली के महिलाओं के एक ऐसे झुंड से,जो किसी खास के विषय में झट से कोई राय बनाने से बाज नहीं आतीं-उनके मन को भाई तो बड़ी भली अगर अपनी चलाई तो उससे बुरी संसार में कोई नहीं 😄😄😄शायद! ये कभी नहीं बदल सकता कभी नहीं। 
छठी गली-"नहीं चाहिए आदि को कुछ"---इस गली एक ऐसा बच्चा है जो अक्सर हर गली में पाया जाता है।हाँ बगल के घर का छोटू सा प्यारा बच्चा-जीसे आपका घर,घर की सभी वस्तुएं इतनी भाती है कि वो अपने घर जाना नहीं चाहता।यहीं रह सब पाना चाहता है,मगर वहीं किसी एक रोज जब वो अपनी माँ से किसी कारण वश लम्बे समय तक दूर रहता है तो अपने घर लौटने के लिए ये बोल हीं पड़ता है-नहीं चाहिए मुझे कुछ मुझे तो बस मेरी माँ चाहिए।👩‍👦
सातवीं गली---"हवा उद्दंड है"--इस गली में उन मनचलों का जिक्र हैं जिनकी न तो कोई उम्र होती है न ईमान ये कब किधर हल्लर उठा देंगे किसी को क्या पता! शक होता है क्या ये अपनी माँ-बहन के होते भी होंगे या??👹
आठवीं गली---"नीरा जाग गई है"---इस गली में हर उस गली की वो बेटी है जो किसी न किसी वजह से शादी के लिए ठुकराई गई हो।पर ये बेटी निराश हो रोने धोने में नहीं बल्कि अपनी खुशी तलाश जीवन जीने में विश्वास रखती है।👧
नौवीं गली---" रमणीक भाई नहीं रहें"--इसमें एक बेटी अपने पिता के जाने के बाद उस सोच का लेखा जोखा लेकर बैठती है के पिताजी ने जो किया भाईयों के हक के लिए क्या वो सही है! जो अपनी मर्जी का काम नहीं आजतक उनके साथ दुकान पर हीं रहे बेमन बेसमझ काम से क्या अब जिंदगी भर उन्हें मुनीम चाचा पर हीं निर्भर नहीं रहना पडेगा ये सब शुरू से समझने करने को🤰
दसवीं गली----"सब जानती है शैव्या"---ये उस लड़की की कहानी है जिसे समाज के कुछ लोग आज भी पचा नहीं पाते के लड़की उनके बराबर में आ कैसे कदम मिला चल रही-इसे क्या समझ पत्रकारिता की या अन्य किसी विषय की।पर सयानी शैव्या भली भांति जानती है करना क्या है?👩‍🎓
ग्यारहवीं गली---"अहसास"---इसमें छोटे से घर से आई उन सभी बहुओं की व्यथा है,जीसे अपनी खुशी या अपनी पसंद तक पाने का कोई हक नहीं।🤦‍♀️ 
बारहवीं गली---"दस्तक के बाद"---इसका संबंध उम्र के दस्तक से है जो आप से पहले दूसरे आंक लेते हैं।और अंततः आप भी स्वीकार लेते हैं के सच यही है।👵
तेरहवीं गली---"प्रिया की डायरी"---यह कहानी एक गृहणी के जीवन शैली को प्रदर्शित करती है। 👰
चौदहवीं गली---"करत करत अभ्यास के"---ये कहानी उनकी है जो खुद तो आधुनिक हो गए परन्तु सोच पुरानी है इस में उन जैसों को सुधारने का एक अथक प्रयास किया जा रहा है।👼
पन्द्रहवीं गली---"बड़ी हो गई ममता जी"---इस कहानी में जो बहु है वो भले उम्र के आधे पड़ाव पर है पर अपनी सास के आगे अभी भी उसे बहुत छोटा बना रहना पड़ता है। पहले तो ये बात उसे बहुत खलती है पर जब एक दिन उसकी सास चल बसती हैं तो बार-बार उन्हें याद कर दुखी हो जाती है के अपने बड़े होने की खुशी मनाऊँ या उनके न रहने का गम😢
सोलहवीं गली---"विरूध"---इस कहानी से बहुत अच्छी सीख मिली के अगर रिश्तों में विश्वास या सामंजस्य बैठाने जैसा कुछ बचा न हो तो उसे अलविदा कह अलग हो जाने में हीं फायदा है। 🙅‍♀️
सत्रहवीं गली---"ये कहानी ऐसे पिता पुत्र की है जो परीक्षा और उसमें उपयोग होने वाली अलग-अलग प्रकाशन की किताब पर है।जब एक बार पिता किताब लाने में लेट हो जातें हैं तो बेटा ये सोच कर चिंतित होता है के-कितना समय तो निकल गया अब कैसे होगा----और वहीं पिता ये सोच निश्चिंत होते हैं चलो ले हीं आए हम वरना अंक कम मिलने पर तो ये यही कहता ....सब आपके वजह से हुआ 👴
अठारहवीं गली---"डेरा उखड़ने से पहले" बहुत हीं अलग है आभा की जिंदगी भाई बहन सभी है भाभी भतीजे से भरा घर है फिर भी आजतक अकेले हीं ढ़ोते आई अपने बीमार पिता को करती भी क्या भाई रखने को तैयार जो नहीं थें। वो तो शुक्र है कि उसे नौकरी है वरना क्या होता इन बाप बेटी का।पिता के रहते भाईयों से न के बराबर संबंध रखे थें आभा ने।पर अब अकेले रहने पर कभी कभार हो जाती है बात उनमें।फिर भी एक बड़े उलझन में है वो और हो भी क्यूँ न !पचपन की होने को आई है और सामने से शादी का एक रिश्ता आया है समझ नहीं पा रही आखिर करे क्या---🤔
उन्नीसवीं गली---"शिव बोले मेरी रचना घड़ी-घड़ी"-ढोंगी बाबा पर आधारित ये कहानी बहुत हीं बढ़िया है।आखिर हमने ही तो उपजाने में मदद की है समाज में इस जहरीले पौधे को। तो झेलते भी हम हैं,पर सुधरते नहीं है।...☠
बीसवीं गली---"ये कहानी ऐसे तथ्य को उजागर करती है के किसी की जिंदगी का फैसला हर बार सिर्फ घर का मुखिया करे ये हीं सही नहीं होता,हर फैसले को हर बार किसी पर थोपने से पहले उसके हित को ध्यान में रख लेना चाहिए। खुशहाल जीवन तभी मिलता है। हालांकि-बड़ी बाई साहब भी अंत में इस तथ्य से सहमत दिखाई पड़ रही थी। 👩‍⚖
हमने तो बहुत छोटा सारांश लिखा,लिखना तो बहुत चाहती हूँ पर दुविधा में हूँ क्या लिखूं और कितना---कैसे खत्म करू इन गलियों की कहानी। बातें भी कभी खत्म होती हैं???फिर कैसे खत्म हो बातों वाली गली की कहानी।तो फिर इंतजार कीजिए आने तक अगले गली की कहनी,जो हमारे बीच लेकर आएंगी हमसब की जिज्जी!एक ब्लॉगर,फेसबुक सखी वंदना अवस्थी दुबे। 
ढेरों शुभकामनाएँ दीदी 😍
------श्वेता सोनी-----

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

आसपास की गलियों से गुजरती ‘बातों वाली गली’ - गिरिजा कुलश्रेष्ठ

गिरिजा कुलश्रेष्ठ... यानी फ़ुल-टू मिठास. मीठा स्वभाव, मीठी आवाज़, मीठा लेखन..... कुछ व्यक्तित्व सादगी की ऐसी प्रतिमूर्ति होते हैं, जो सादगी का स्वयमेव पर्याय बन जाते हैं. गिरिजा दीदी ऐसा ही व्यक्तित्व हैं. आइये देखें, क्या लिखती हैं वे.
यह सुखद संयोग है कि जब कभी ब्लाग पर दिख जाने वाली वन्दना अवस्थी दुबे, जिनका प्रथम परिचय सलिल भैया (सलिल वर्मा) की ‘जिज्जी’के रूप में हुआ था लेकिन पिछले साल अर्चना चावजी द्वारा बनाए वाट्सअप ग्रुप (गाओ गुनगुनाओ) के माध्यम से उनसे भेंट हुई तो मैं उनके व्यक्तित्त्व और वाक्कौशल से प्रभावित हुए बिना न रह सकी . गीत और संवादों के माध्यम से वे हर किसी की आत्मीया बन गई हैं . कहने की जरूरत नही कि जब इनका यह पहला कहानी संग्रह बातों वाली गली आया तो पढ़ने की उत्कण्ठा तीव्र हो उठी . पता चला कि पुस्तक आमेजोन से प्राप्त की जा सकती है पर शायद माँग पूर्ति से अधिक होजाने के कारण निराशा ही हाथ लगी . तब ग्रुप पर ही उन बहिनों से भेजने का आग्रह किया जो ‘बातों वाली गली’ की बातें करके जी ललचा रही थीं . तब बहिन ऊषाकिरण (मेरठ) ने मुझे यह पुस्तक भेजी यानी ‘बातों वाली गली’ . यह हुई इस बहुप्रतीक्षित पुस्तक को पाने की दास्तान .
बातों वाली गली में बीस कहानियाँ हैं .आसपास की ही ,रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी बातों को लेकर बुनी गई बड़ी कहानियाँ जैसे हमारे आपके बीच गुजरती चलती हैं . निम्न मध्यम परिवारों में मेहमान के आने पर उनके नाश्ते वगैरह को देख बच्चे किस तरह ललचाते हैं यह मार्मिक और बहुत ही जाना माना प्रसंग है जिसे वन्दना जी ने कहानी (अपने अपने दायरे ) में खूबसूरती से पिरोया है . ‘अनिश्चितता में’ , छोटी किन्तु बेरोजगारी से आई हीनता की अच्छी कहानी है ‘.ज्ञातव्य’ कहानी में पापा की मेहमाननवाजी को कोसने वाले बच्चे अपनी तरह से घर चलाते हैं .इसमें नई पीढ़ी में दूर के या व्यर्थ मेहमानों के प्रति उपेक्षा के भाव को बखूबी दर्शाया है . वास्तव में यह आज का यथार्थ है . ‘आसपास बिखरे लोग’ , लोगों की संवेदनहीनता का निर्मम दस्तावेज है . दूसरों के यहाँ हुई दुर्घटना लोगों के लिये महज एक खबर है . पड़ोस में बहू के जल जाने पर लोग तमाम बातें तो करते है पर सच को सामने लाने वाला कोई कदम नही उठाते . शीर्षक कहानी , जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है घर में रहने वाली महिलाएं अक्सर किस तरह दूसरों के बारे में अनुमान लगाकर तिल का ताड़ बना लेतीं हैं यह बड़ा और कड़वा सच है . जैसा कि भूमिका में अचला जी ने कहा है अधिकांश कहानियाँ स्त्री विमर्श पर केन्द्रित हैं .’हवा उद्दण्ड है’ , ‘नीरा जाग गई है’ ,’अहसास’ ,’सब जानती है शैव्या’ ,’प्रिया की डायरी’ ,ममता जी बड़ी होगई हैं ‘विरुद्ध’ ,’बड़ी बाई साब’ आदि कहानियाँ स्त्री के असन्तोष , अपने अस्तित्व के प्रति जागरूकता ,व व्यवस्था के प्रति असन्तोष की कहानियाँ हैं . हाँ ‘रमणीक भाई नहीं रहे’ , ‘पापा सब तुम्हारे कारण हुआ’ , ‘शिव शिव बोल.’, .कुछ अलग तरह की कहानियाँ हैं .ये लगभग सारी कहानियाँ उनके ब्लाग किस्सा-कहानी पर भी हैं .
कुल मिलाकर सारी कहानियाँ हमारी अपनी हैं . आसपास की है . जहाँ तक कहानियों के कथ्य की बात है ,वे रोजमर्रा की सामान्य जिन्दगी का जीवन्त दस्तावेज हैं .उनके पात्र आप और हममें से ही हैं . पात्रों के मनोभावों का सूक्ष्म चित्रण लेखिका के गहन निरीक्षण व अनुभूति का परिचायक है . संवाद रोचक हैं. भाषा सरल और जन सामान्य की भाषा है . कहीं भी दुरूहता नहीं है . सहज प्रवाह है . खास बात है लेखिका के कहने का तरीका जो किस्सा कहानी सा ही रोचक है . हर कहानी इतनी रोचकता के साथ शुरु होती है कि पाठक का ध्यान सहज ही जिज्ञासा से भर जाता है . वर्णन बेशक गजब का है . चाहे वह देशकाल हो या अन्तर्संघर्ष . बहुत गहन व सूक्ष्म चित्रण है . कुछ भी बनावटी नहीं लगता . हाँ कहीं कहीं कहानी का उद्देश्य स्पष्टता की माँग करता प्रतीत होता है . कहीं कहीं शिल्प में भी कुछ सुधार की गुंजाइश है . मेरे विचार से ‘बड़ी बाई साब’ ऐसी ही कहानी है . 
निष्कर्षतः बातों वाली गली कहानी संग्रह पाठकों के बीच जगह बनाएगा नहीं , बना चुका है . आशा है कि आगे और भी निखार के साथ हमें उनकी कहानियाँ पढ़ने मिलेंगी .

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

ज़मीन से जुड़ी कहानियों का संग्रह है- बातों वाली गली

पिता की नज़र में, पुत्री की पुस्तक-

हिन्दी भाषा साहित्य में अन्यान्य विधाओं का उद्भव कभी भी हुआ हो, किन्तु जहां तक कहानी विधा का सम्बन्ध है, इसका उद्भव तो साहित्य के जन्म से भी पुराना है. कदाचित, मानव-प्रजाति के जन्म के साथ ही कहानी का अवतरण हुआ है. पृथ्वी पर पदार्पण करने वाला शिशु मां की गोद से ही परिपुष्ट होकर जब बचपन की ओर अग्रसर होता है, तो मां ही उसे लोक-प्रचलित छोटी-छोटी कहानियां सुनाकर जीवन-पथ पर चल पड़ने के लिये तैयार करती है. सभ्यता के विकास के इसी क्रम में कहानी भी क्रमश: अपना कलेवर बदलती रही है. इसका यह विकसित स्वरूप आज कहां खड़ा है- सभी को इसका परिज्ञान है. यह कहना असंगत न होगा कि साहित्य की सभी विधाओं में लोकप्रियता की दृष्टि से आज कहानी सर्वोच्च आसन पर आसीन है. कहानी की चर्चा के इसी तारतम्य में वंदना अवस्थी दुबे कृत “बातों वाली गली” की चर्चा भी समीचीन है.
वन्दना का सद्य:प्रकाशित उक्त कहानी संग्रह- ’बातों वाली गली’ इस समय मेरे हाथों में है. पुस्तक के प्रथम अर्ध भाग पर अधुनातन शैली में सजा हुआ आकर्षक रंगीन चित्र है, तो शेष अर्ध भाग पर लेखिका के नाम सहित कहानी संग्रह का नाम-बातों वाली गली. सुधि पाठक भलीभांति जानते हैं कि कृति का नामकरण कितना महत्वपूर्ण काम है. शीर्षक को कृति की आत्मा कहा गया है. वन्दना के कहानी संग्रह के शीर्षक को कुछ यों परिभाषित किया जा सकता है कि वह गली या स्थान जहां मोहल्ले की प्राय: प्रौढ़ महिलाएं निरर्थक या अनर्थक बातें , यथा परनिंदा, चरित्र हनन, मनगढंत, सच्चे-झूठे किस्से और ईर्ष्या-द्वेष से पगी हुई कहानियां बड़े रसीले अन्दाज़ में पेश किया करती हैं. इस प्रकार गली के चरित्र को उजागर करता हुआ पुस्तक का यह शीर्षक वन्दना की परिपक्व दृष्टि और अधुनातन सोच को भी उजागर करता है. इस परिप्रेक्ष्य में पुस्तक का शीर्षक पूर्णत: उपयुक्त है.
साहित्यशास्त्रियों के अनुसार साहित्य की हर विधा के कुछ मूल तत्व होते हैं- सो कहानी के भी हैं- वे हैं :- शीर्षक, कथानक, सम्वाद, पात्र, चरित्र चित्रण, भाषा-शैली और उद्देश्य. एक अच्छे लेखक को अपनी रचना में इन्हें उपयुक्त स्थान देना चाहिये. किन्तु युग के प्रभाव से कोई भी अछूता नहीं. आज का युग बंधनविहीनता को प्राथमिकता देता है., सो कलाकार या साहित्यकार भी अपनी रचनाओं की सृष्टि करते समय प्राय: सम्बद्ध विधा के तत्वों के समावेश का खयाल नहीं- हां रचना में स्वत: उसका समावेश हो जाये , तो उसे ऐसा करने में कोई परहेज भी नहीं. जहां तक वन्दना का प्रश्न है- कहानी की रचना करते वक़्त भले ही उनकी दृष्टि उसके तत्वों की ओर न रही हो, किन्तु कोई भी विज्ञ पाठक उक्त तत्वों के समावेश को कहानियों में भली भांति देख-पढ़ सकता है. मैने वन्दना की सभी कहानियों को पूर्ण मनोयोग से पढ़ा है और पाया है कि प्राय: सभी कहानियों में उक्त तत्वों का सम्यकरूपेण समावेश हुआ है. कहानियों का कथानक लम्बा और उबाऊ न हो, सम्वाद या कथोपकथन लम्बे-लम्बे न हों, पात्रों के चरित्र चित्रण हेतु लेखकदृष्टि सजग हो और उद्देश्य स्पष्ट हो. इस दृष्टि से वन्दना को आप पूर्ण सजग पायेंगे. उन्होंने उक्त परिप्रेक्ष्य में पाठकों को शिक़ायत करने का कोई भी अवसर प्रदान नहीं किया है.
कहानी संग्रह ’बातों वाली गली में कुल बीस कहानियां संग्रहीत हैं. सर्वप्रथम कहानियों के कलेवर की बात की जाये तो आप पायेंगे कि वन्दना की बीस में से सत्रह कहानियों को तो लघुकाय कहानियों की संज्ञा दी जा सकती है. शेष अन्तिम तीन कहानियां ही ऐसी हैं जिन्हें दीर्घ कलेवर प्राप्त है. आज के युग की विशेषता है और आवश्यकता भी कि रचनाओं का कलेवर आकार-प्रकार की दृष्टि से छोटा होना चाहिये ताकि पाठक कम से कम समय में अधिक से अधिक पढ़ सके. वन्दना ने समय की इस नब्ज़ को भली प्रकार पहचाना है; एतदर्थ ही उन्होंने लघु आकार की रचनाएं लिखकर पाठक को कम से कम समय में अधिक से अधिक कहानियां पढ़ने का अवसर प्रदान किया है. पाठक-वर्ग ने इस हेतु लेखिका की सराहना भी की है. वन्दना की कहानियों की लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है.
आइये, थोड़ी सी चर्चा अब कहानियों के कथानकों की :- वैसे तो कहानी संग्रह में बीस कहानियां और हर कहानी का अपना अल्ग अलग कथानक है किन्तु संग्रह के समग्र कथ्य पर विचार करने पर हमें विदित होता है कि वन्दना की समस्त कहानियां मध्यमवर्गीय भारतीय समाज की दशा और दिशा पर आधारित हैं. यद्यपि लेखक की हर कहानी कल्पना प्रसूत होती है जिनमें यथार्थ से परे जाकर लिखने की भी सम्भावना विद्यमान रहती है किन्तु इस संग्रह में लेखिका ने सम्भाव्य को स्वीकार करते हुए प्राय: प्रत्येक कहानी में यथार्थ का चित्रण किया है. परिणामस्वरूप, पाठक को पढ़ते समय संग्रह की कहानी स्वयं अपनी कहानी प्रतीत होती है. इस स्थिति में पाठक कहानी के पात्रों से तादात्म्यावस्था स्थापित करने में सफल होते हैं. काव्य की चरम रसानुभूति यही है और यही रचना की सफलता भी है. वन्दना अपनी कहानियों में यह रसाभास कराने में सफल हैं.     
कहानी संग्रह का एक अन्य मुख्य बिन्दु है कथानक के लिये चयनित सामाजिक क्षेत्र. हमारे देश का समाज जीवन-यापन की दृष्टि से तीन स्तरों में विभाजित है- उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग. देश की अधिकांश जनता मध्यम वर्गीय जीवन जीती है. इस वर्ग के लोगों का रहन-सहन प्राय: ’हां’ और ’न’ के द्वन्द से आवृत्त रहता है. ऐसे लोगों की आर्थिक स्थिति थीक नहीं होते हुए भी उनके दैनन्दिन जीवन की आवश्यकताओं की किसी प्रकार पूर्ति होती रहती है. सुख-दुखमय जीवन-तराजू के ये दोनों पलड़े कभी ऊंचे और कभी नीचे आते-जाते रहते हैं. कहा जाता है-’साहित्य समाज का दर्पण होता है.’ अर्थात कथित समाज की वास्तविक तस्वीर वहां के साहित्य में देखी जा सकती है. जहां तक वन्दना की कहानियों का प्रश्न है – वे मध्यम वर्ग की अपनी ही जैसी कहानियां हैं. चंद म महिलाओं में ’ देख न सकहिं पराई विभूति’ का प्राकृतिक गुण होता है. वन्दना की लगभग आधी कहानियां इसी गुण से सम्पन्न महिलाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करतीं हैं. ऐसी महिलाओं की मानसिकता का उन्होंने जीवन्त चित्रण  बड़ी स्वाभाविक शैली में किया है, उदाहरणार्थ- कहानी ’अलग-अलग दायरे, नीरा जाग गयी है, अहसास, दस्तक के बाद, करत-करत अभ्यास के, बड़ी हो गयी हैं ममता जी, और विरुद्ध आदि कहानियों को रखा जा सकता है.  कुछ कहानियां ऐसी भी हैं जिनमें महिला समाज की जागरूक और साहसी महिलाओं का चित्रण है- “प्रिया की डायरी”, “बातों वाली गली”, “नीरा जाग गयी है”, और सब जानती है शैव्या” इसी प्रकार की कहानियां हैं. इनके अतिरिक्त कुछ कहानियों में समाज के विविध रंग भी चित्रित किये हैं जैसे- “नहीं चाहिये आदि को कुछ” में बाल मनोविज्ञान का चित्रण है तो “अनिश्चितता में” दो भाइयों के जीवन स्तर की गाथा है. “हवा उद्दंड है” में वर्तमान युग की रुग्णता दर्शाई गयी है तो “बड़ी बाई साब” में सामंती प्रवृत्ति का चित्रण. इन सबके विपरीत “शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी” एक ऐसी कहानी है जो आस्था और धर्म के नाम पर ढोंगी बाबाओं के कलुषित चरित्र को न केवल उजागर करती है, बल्कि ऐसे ढोंगी महात्माओं से दूर रहने, सावधान करती है. राम रहीमों के उदाहरण आज भरे समाज, यत्र तत्र अपने आसन जमाये हुए हैं.
जहां तक कहानी संग्रह की भाषा शैली का सवाल है, इसकी भाषा बड़ी सहज और स्वाभाविक है जो पाठक के मन-मस्तिष्क में आसानी से उतरती चली जाती है. शब्दों की दुरूहता से दूर , इसमें यत्र तत्र कुछ विदेशी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया गया है, लेकिन ये केवल इसलिये कि लेखिका की भाषा, जन सामान्य की भाषा बन सके. कहानी की शैली तो चित्ताकर्षक है ही- इसे सुधि पाठक बंधु स्वयं महसूस करेंगे. कहानी के अन्य तत्व यथा सम्वाद और उद्देश्य भी यथानुरूप देखने को मिलते हैं. हर कहानी का जिज्ञासापूर्ण अन्त उसके उद्देश्य-पूर्ति की घोषणा स्वत: कर देती है. कुल मिला के उक्त कहानी संग्रह में प्राय: सभी तत्वों का सम्यक रूपेण समावेश हुआ है. कहा जा सकता है कि “बातों वाली गली” आज के युग की दृष्टि से एक सफल कृति है जिसके लिये वन्दना साधुवाद की पात्र हैं.
                                       प्रकाशन की ड्रुष्टि से यह कहानी संग्रह “बातों वाली गली” वन्दना की यद्यपि पहली कृति है तथापि एक कथाकार और लेखिका के रूप में हिन्दी जगत में उनका स्थान वर्षों पूर्व से सुरक्षित है. उनकी कहानियां और आलेख विगत अनेक वर्षों से देश की प्रसिद्ध हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं. पत्रकार-जगत में भी उनकी अच्छी खासी पैठ है. देशबंधु के कार्यकाल में उन्होंने एक सक्षम पत्रकार के रूप में ख्याति अर्जित की है. समय-समय पर आयोजित होने वाली गोष्ठियों, सेमिनारों , साहित्यिक समारोहों में भी वे प्रतिष्ठित सहभागी के रूप में भाग लेती रही हैं. तमाम हस्तियों के साक्षात्कार भी उनके खाते में हैं.
वन्दना का यह प्रथम कहानी संग्रह”बातों वाली गली” अत्यल्प अवधि में ही बहुत लोकप्रिय सिद्ध हुआ हैसुधी पाठकों की समर्थ प्रतिक्रियाओं से यह भलीभांति स्पष्ट है. मुझे पूरा भरोसा है कि निकट भविष्य में यह संग्रह- “गली-गली की बात” बनने वाला है. ईश्वर करे, ऐसा ही हो. मेरी सद्भावना और आशीर्वाद.
राम रतन अवस्थी

                                   

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

बातों वाली गली- मेरी नज़र से


साधना वैद जी को कौन नहीं जानता! जितनी प्यारी वे खुद हैं, उतना ही प्यारा लिखती भी हैं. आइये उनकी नज़र से जानें "बातों वाली गली" को-

ये लीजिये ! इस ‘बातों वाली गली’ में एक बार जो घुस जाए उसका निकलना क्या आसान होता है ! इसकी उसकी न जाने किस-किस की, यहाँ की वहाँ की न जाने कहाँ-कहाँ की, इधर की उधर की न जाने किधर-किधर की बस बातें ही बातें ! और इतनी सारी बातों में हमारा तो मन ऐसा रमा कि किसी और बात की फिर सुध बुध ही नहीं रही ! आप समझ तो गए ना मैं किस ‘बातों वाली गली’ की बात कर रही हूँ ! जी यह है हमारी हरदिल अजीज़ बहुत प्यारी ब्लॉगर वन्दना अवस्थी दुबे जी की किताब ‘बातों वाली गली’ जिसमें उनकी चुनिन्दा एक से बढ़ कर एक २० कहानियाँ संगृहीत हैं ! सारी कहानियाँ एकदम चुस्त दुरुस्त ! मन पर गहरा प्रभाव छोड़तीं और चेतना को झकझोर कर बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करतीं !

इन कहानियों को पढ़ कर इस बात का बड़ी शिद्दत से एहसास होता है कि नारी मन की गहराइयों को नाप लेने की वन्दना जी में अद्भुत क्षमता है ! यूँ तो सारी ही कहानियाँ बहुत बढ़िया हैं लेकिन कुछ कहानियों में नारी मन की अंतर्वेदना का वन्दना जी ने जिस सूक्ष्मता के साथ चित्रण किया है वह देखते ही बनता है ! इन कहानियों को पढ़ते-पढ़ते कई बार अचंभित हुई कि अरे मेरी तो कभी वन्दना जी से बात ही नहीं हुई फिर इस घटना के बारे में इन्हें कैसे पता चल गया  और इतने सटीक तरीके से इन्होंने इसे कैसे लिख दिया ! क्या यह भी संयोग है कि स्वयं पर बीती हुई अनुभूत बातें ठीक उसी प्रकार औरों के साथ भी बीती हों ? चित्रण इतना सजीव और सशक्त कि जैसे चलचित्र से चल रहे उस घटनाक्रम के हम स्वयं एक प्रत्यक्षदर्शी हों ! लेखिका की यह एक बहुत बड़ी सफलता है कि पाठक कहानियों के चरित्रों के साथ गहन तादात्म्य अनुभव करने लगते हैं ! भाषा और शैली इतनी सहज और प्रांजल जैसे किसी मैदानी नदी का एकदम शांत, निर्द्वन्द्व, निर्बाध प्रवाह !

नारी को कमतर आँकने की रूढ़िवादी पुरुष मानसिकता पर करारा प्रहार करती कहानियाँ ‘सब जानती है शैव्या’ और ‘प्रिया की डायरी’ बहुत सुन्दर बन पडी हैं ! कुछ कहानियाँ जो मन के बहुत करीब लगीं उनके नाम अवश्य लूँगी ! ‘अहसास’, ‘विरुद्ध’ और ‘बड़ी हो गयी हैं ममता जी’ मुझे विशेष रूप से बहुत अच्छी लगीं ! ‘दस्तक के बाद’, ‘नीरा जाग गयी है’, ‘बड़ी बाई साहेब’ और ‘डेरा उखड़ने से पहले’ कहानियों में हम भी स्त्री की हृदय की विषम वीथियों में जैसे वन्दना जी के हमराह बन जाते हैं ! ‘हवा उद्दंड है’, ‘बातों वाली गली’ और ‘आस पास बिखरे लोग’ वास्तव में इतनी यथार्थवादी कहानियाँ हैं कि ज़रा इधर उधर गर्दन घुमा कर देख लेने भर से ही इन कहानियों के पात्र सशरीर हमारे सामने आ खड़े होते हैं !

‘बातों वाली गली’ कहानी संग्रह की हर कहानी हमें एक नए अनुभव से तो परिचित कराती ही है हमारी ज्ञानेन्द्रियों को नए स्वाद का रसास्वादन भी कराती है !

पुस्तक नि:संदेह रूप से संग्रहणीय है ! इतने सुन्दर संकलन के लिए वन्दना जी को बहुत-बहुत बधाई ! वे इसी तरह स्तरीय लेखन में निरत रहें और हमें इसी प्रकार अनमोल अद्वितीय कहानियाँ पढ़ने को मिलती रहें यही हमारी शुभकामना है ! आपकी अगली पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी वन्दना जी ! हार्दिक अभिनन्दन !



गुरुवार, 30 नवंबर 2017

च्यूइंग गम सा चबा रही हूं कहानियों को : उषाकिरण

महीने भर इंतज़ार करवाया उषाकिरण  ने, लेकिन आज जब उनकी पोस्ट देखी, तो मन बल्लियों उछलने लगा। आप भी देखें क्या लिखा उन्होंने।
बातों वाली गली
लम्बे इंतजार के बाद आज कासिद ने “बातों वाली गली” लाकर दी..बेसब्री से पैकिंग फाड़फूड़ कर फेंकी..उलटी-पलटी..सुंदर कवर ,हाथ में लेते ही गुनगुनाती ,फुसफुसाती,ठहाके लगाती आवाजें कानों में खुसपुस करने लगीं...पढ़ रही हूं जैसे च्यूंइंगम सी चबा रही हूं ..वन्दना बिना ताम-झाम ,बिना भारी भरकम कथानक और बिना बोझिल संवादों के जितनी सहजता ,सरलता से रोचक कहानियां लिखी हैं पढ़ते लगता है कि अरे ऐसा 
तो रोज होता है हमारे साथ या हमारे आस-पास ..तो हम क्यों नहीं लिख सकते भई ,हम भी लिख सकते हैं ऐसी कहानियां ..बस क्लिक नहीं हुईं..पर लिखी तो नहीं न उषा किरण ..इसी लिए तो तुम ,तुम हो वन्दना अवस्थी दुबे नहीं न ...वैसे हो बहुत खतरनाक आपसे मिलते बहुत सावधान रहना होगा ..गज़ब की ऑब्जर्वर हैं आप..जैसे आंखों में एक्सरे मशीन फिट हो..और फिर इतनी खूबसूरती से वो सारा मसाला कहानी में मिलाया आपने..आपकी सभी कहानियां कितनी अपनी सी लगती हैं..छोटे-छोटे सादे से वाक्यों के साथ आपका अपना मन्तव्य भी चलता रहता है..जैसे किसी कोने में बैठ देख रही हैं सब और बड़बड़ा रही हैं ।अचानक आगंतुक के आ जाने पर हुई हड़बड़ाहट ,बेरोजगारी की बेचारगी,गली मोहल्ले के लोगों की ताक -झांक वाली मानसिकता,बस में बत्तमीजी झेलती महिलाओं की मन:स्थिति जैसे विषयों को बहुत खूबसूरती से उठाया है..सारी कहानियां बहुत ही रोचक हैं कहानी के शीर्षक और अंत भी बहुत रोचक लगे वन्दना..कहानी की आखिरी लाइन एकदम मामूली होने पर भी आशा का बीज बो जाती हैं ,राहत देती हैं ..पाठक को खुद ही आगे का कथानक गढ़ने पर मजबूर करती हैं..लगता है चलते -चलते जिंदगी एक लम्बी सांस लेती है और फिर आगे बढ़ती है खरामा-खरामा नए जोश,नए कथानक के साथ..आखिरी कहानी शिव बोल मेरी रसना ..बहुत रोचक लगी बाबा राम रहीम की याद दिला गई..अलग-अलग दायरे , ज्ञातव्य ,बातों वाली गली,हवा उद्दंड है , रमणीक भाई नहीं रहे ,सब जानती है शैव्या ,प्रिया की डायरी, बड़ी हो गई हैं ममता जी आदि सभी कहानियां बेहद रोचक हैं..इतनी सुंदर पुस्तक लिखने के लिए बहुत बधाई और शुभकामनाएं वन्दना जी ..उम्मीद है भविष्य में भी हमको आपकी ऐसी बहुत सी किताबें पढ़ने को मिलेंगी ...किताब पढ़ कर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया लिखी थी पर फिर कहीं लिखा हुआ रख कर भूल गई..आज मिली तो प्रस्तुत है

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

बहुत कुछ देने में सक्षम है- “बातों वाली गली”

बातों वाली नाम से वन्दना अवस्थी दुबे की कहानियों का संकलन पंक्ति-पंक्ति, अक्षर-अक्षर आद्योपांत पढ़ा. कहानियां यदि स्वयं में इक्कीस नहीं, तो उन्नीस भी नहीं. पक्की बीस बैठती हैं. निश्चय ही यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि लेखिका भाषा की एक कुशल जादूगर है. हमारे जीवन की रोज़मर्रा की साधारण सी बातें/घटनाएं भाषायी जादू के प्रभाव में किस निपुणता से विस्तार पा के कहानी का रूप लेती हैं, इसकी प्रशंसा करनी ही पड़ेगी.
कहानी की भी तो अपनी लम्बी कहानी है. जो कभी सिर्फ़ कही और सुनी जाने वाली स्वयं में एक विधा थी और लोकरंजन करती थी ; कालान्तर में यह विधा कथ्य से पठ्य तक चल कर आई है जिसे उसकी उंगली पकड़ कर चलना सिखाया प्रेमचंद, मंटो, कृष्नचन्दर ने. इतना ही नहीं, सिर्फ़ मनोरंजन करने वाले एक सीमित दायरे से भी उसे बाहर निकाल कर जन हितार्थ संदेशवाहिनी भीबना दिया. हां, तब में और अब में एक साम्य मैं आज भी देखता हूं, और वह है भाषायी कशीदाकारी से ठीक वैसा ही विस्तार देना जैसे रबर को कितना भी खींचो वह अटूट बढ़ती चली जाती है. किस्सागोई भी रबर की तरह खींचकर पूरी रात सुनने वालों को एकाग्र बांध कर रखती थी, तो आज भाषा की जादुई कशीदाकारी भी पाठक का टाइमपास वगैर किसी बोरियत के करा ही देती है. यही कला है और वन्दना को कुशल कथाकार कहना अनुचित नहीं है. क्यों अनुचित नहीं है? इसे जानने के लिये इन कहानियों की भाषा पर दृष्ट डालें-
“बातों वाली गली की कहानियां न तो संस्कृतनिष्ठ भाषा की दुरूहता से पाठक को प्रभावित करती हैं, और न ही उसमें भाषा का किंचित कोई दारिद्र्य ही दिखाई देता है. वह तो साधारण बोलचाल की ऐसी हिन्दी है जिसमें लोक कहावतें और मुहावरे सहज ही उसका सौंदर्य बढ़ा देते हैं. मुहावरे भी बलात ठूंसे नहीं गये , सहज ही भाषा में ऐसे घुल गये जैसे दूध में पानी. जैसे- पहली कहानी –’ अलग अलग दायरे’ में देखें-“ ...उफ़! सारी इज़्ज़त धुलवा कर ही दम लेंगे...” इज़्ज़त धुल जाना, दम लेना जैसे मुहावरे कितनी स्वाभाविकता से समरस हुए हैं जो भाषा में चार चांद लगा रहे हैं. यह कौशल प्रत्येक कहानी में यथास्थान देखा जा सकता है. भाषा में  आंचलिक प्रभाव से जो सोंधी सुगन्ध आती है, वह स्वयं में विशिष्ट है. कहानी “अहसास” में घर की बड़ी बहू को ’बड़की’ सम्बोधन रस घोलता है- “.....बड़की, परछन का थाल तैयार किया या नहीं? दरवाज़े पर दुल्हन आ जायेगी तब करोगी?....” परछन जैसे ठेठ शब्द देखते ही लगता है कि हमारी सभी आंचलिक बोलियां हिन्दी को समृद्ध बनाती हैं. इसी प्रकार से ’करत-करत अभ्यास के..’  में पात्र के यथानुसार भाषा का प्रयोग उल्लेखनीय है. सद्पात्र की हिन्दी जितनी शुद्ध तो असद्पात्र की हिन्दी आंचलिकता से नगरीय बनाने का विफ़ल प्रयास भी देखते ही बनता है- “..... फुल्ली के पापा काल बिहान भये गिर गये रहे अम्माजी. एतना मना करते हैं उनें, सुन्तई नईं हैं.....” बघेली और बुन्देली की मिली जुली मिठास कितनी सहजता से हिन्दी को यह रूप दे रहा है. हिन्दी में आंचलिकता का रस घोलना आज नई बात नहीं है, फणीश्वरनाथ रेणु से भी पहले हिन्दी को उंगली पकड़कर चलना सिखाने वाले मैथिलीशरण गुप्त की यह विरासत है-
“.......अंचल पट कटि में खोंस कछोटा मारे,
    सीता माता आज नई धज धारे.......”
आंचलिक बोलियों ने अपने शब्द रूपी दूध पिलाकर हिन्दी का पोषण किया है. वे हिब्न्दी की मातहत नहीं, निश्चय ही धाय माताएं हैं जो आज भी हिन्दी को पोषित कर रहीं हैं. वन्दना की सद्य:कहानियां उसका प्रमाण है.
संकलन की कहानियों की कथावस्तु में बाल मनोविज्ञान है, सहजता व एकदम स्वाभाविकता है जो संकलन की छोटी से छोटी कहानी से लेकर बड़ी से बड़ी कहानी को एक से बढ़कर एक बना देती है. कहानी “नहीं चाहिये आदि को कुछ” में जो बाल मनोविज्ञान है, वह स्वयं में अद्भुत है. एक विपन्न परिवार का बालक जिसका नाम आदि है, वह एक सम्पन्न परिवार में आता-जाता रहता है. सम्पन्नता के वैभव की चकाचौंध उसके विपन्नता के तिमिर में बालपन में जो प्रभाव डालती है वह इस कहानी के एक-एक सम्वाद को जीवंत बना देता है. – “ मौली दी के बगीचे में पैसों का पेड़ लगा है क्या? ज़रूर लगा होगा. उसी से तोड़ तोड़ के सामान खरीदते होंगे....” , “..... आदि को लगता है काश! मौली की मम्मी उसकी मम्मी होतीं!.....” इसी प्रकार बड़ी-बड़ी कहानियां भी रोचक हैं. नारी विमर्श से भरपूर हैं. इतनी मार्मिक कि हृदय को छू जाती हैं.-
बड़ी बाईसाब हो या शिव बोल मेरी रसना घड़ी-घड़ी या फिर डेरा उखड़ने से पहले, देशकाल की वर्तमान परिस्थियों में ये कहानियां राहत के साथ पथ प्रदर्शन करने में सक्षम हैं. मुझे “बड़ी बाईसाब” ने अधिक प्रभावित करके झकझोर दिया है. लाड़-प्यार में पाल-पोसकर जिस हृदय के टुकड़े को आज का आदमी विवाह करके विदा करता है तो बेटी के भावी जीवन में सुख की अपेक्षा करता है. उसके लिये वह अपनी हैसियत से भी बढ़कर दान दहेज देता है. तो क्या पैसे से सुख शान्ति खरीदी जा सकती है? इस कहानी ने हमारी आंखें खोल दी हैं. कि पैसे से सुख शान्ति खरीदी नहीं जा सकती. ऐसी मार्मिक कहानियां हृदय को छू जाने वाली हैं. ऐसी कहानियां लिखकर वन्दना ने इस धरती का, हम सबका मान बढ़ाया है. वन्दना को असीम आशीर्वाद,
गुणसागर सत्यार्थी

कुण्डेश्वर, टीकमगढ़-म.प्र.