पिता की नज़र में, पुत्री की पुस्तक-
हिन्दी भाषा साहित्य में
अन्यान्य विधाओं का उद्भव कभी भी हुआ हो, किन्तु जहां तक कहानी विधा का सम्बन्ध
है, इसका उद्भव तो साहित्य के जन्म से भी पुराना है. कदाचित, मानव-प्रजाति के जन्म
के साथ ही कहानी का अवतरण हुआ है. पृथ्वी पर पदार्पण करने वाला शिशु मां की गोद से
ही परिपुष्ट होकर जब बचपन की ओर अग्रसर होता है, तो मां ही उसे लोक-प्रचलित
छोटी-छोटी कहानियां सुनाकर जीवन-पथ पर चल पड़ने के लिये तैयार करती है. सभ्यता के
विकास के इसी क्रम में कहानी भी क्रमश: अपना कलेवर बदलती रही है. इसका यह विकसित
स्वरूप आज कहां खड़ा है- सभी को इसका परिज्ञान है. यह कहना असंगत न होगा कि साहित्य
की सभी विधाओं में लोकप्रियता की दृष्टि से आज कहानी सर्वोच्च आसन पर आसीन है.
कहानी की चर्चा के इसी तारतम्य में वंदना अवस्थी दुबे कृत “बातों वाली गली” की चर्चा भी समीचीन है.
वन्दना का सद्य:प्रकाशित
उक्त कहानी संग्रह- ’बातों वाली गली’ इस समय मेरे हाथों में है. पुस्तक के प्रथम
अर्ध भाग पर अधुनातन शैली में सजा हुआ आकर्षक रंगीन चित्र है, तो शेष अर्ध भाग पर
लेखिका के नाम सहित कहानी संग्रह का नाम-बातों वाली गली. सुधि पाठक भलीभांति जानते
हैं कि कृति का नामकरण कितना महत्वपूर्ण काम है. शीर्षक को कृति की आत्मा कहा गया
है. वन्दना के कहानी संग्रह के शीर्षक को कुछ यों परिभाषित किया जा सकता है कि वह
गली या स्थान जहां मोहल्ले की प्राय: प्रौढ़ महिलाएं निरर्थक या अनर्थक बातें , यथा
परनिंदा, चरित्र हनन, मनगढंत, सच्चे-झूठे किस्से और ईर्ष्या-द्वेष से पगी हुई
कहानियां बड़े रसीले अन्दाज़ में पेश किया करती हैं. इस प्रकार गली के चरित्र को
उजागर करता हुआ पुस्तक का यह शीर्षक वन्दना की परिपक्व दृष्टि और अधुनातन सोच को
भी उजागर करता है. इस परिप्रेक्ष्य में पुस्तक का शीर्षक पूर्णत: उपयुक्त है.
साहित्यशास्त्रियों के
अनुसार साहित्य की हर विधा के कुछ मूल तत्व होते हैं- सो कहानी के भी हैं- वे हैं
:- शीर्षक, कथानक, सम्वाद, पात्र, चरित्र चित्रण, भाषा-शैली और उद्देश्य. एक अच्छे
लेखक को अपनी रचना में इन्हें उपयुक्त स्थान देना चाहिये. किन्तु युग के प्रभाव से
कोई भी अछूता नहीं. आज का युग बंधनविहीनता को प्राथमिकता देता है., सो कलाकार या
साहित्यकार भी अपनी रचनाओं की सृष्टि करते समय प्राय: सम्बद्ध विधा के तत्वों के
समावेश का खयाल नहीं- हां रचना में स्वत: उसका समावेश हो जाये , तो उसे ऐसा करने
में कोई परहेज भी नहीं. जहां तक वन्दना का प्रश्न है- कहानी की रचना करते वक़्त भले
ही उनकी दृष्टि उसके तत्वों की ओर न रही हो, किन्तु कोई भी विज्ञ पाठक उक्त तत्वों
के समावेश को कहानियों में भली भांति देख-पढ़ सकता है. मैने वन्दना की सभी कहानियों
को पूर्ण मनोयोग से पढ़ा है और पाया है कि प्राय: सभी कहानियों में उक्त तत्वों का
सम्यकरूपेण समावेश हुआ है. कहानियों का कथानक लम्बा और उबाऊ न हो, सम्वाद या
कथोपकथन लम्बे-लम्बे न हों, पात्रों के चरित्र चित्रण हेतु लेखकदृष्टि सजग हो और
उद्देश्य स्पष्ट हो. इस दृष्टि से वन्दना को आप पूर्ण सजग पायेंगे. उन्होंने उक्त
परिप्रेक्ष्य में पाठकों को शिक़ायत करने का कोई भी अवसर प्रदान नहीं किया है.
कहानी संग्रह ’बातों वाली
गली में कुल बीस कहानियां संग्रहीत हैं. सर्वप्रथम कहानियों के कलेवर की बात की
जाये तो आप पायेंगे कि वन्दना की बीस में से सत्रह कहानियों को तो लघुकाय कहानियों
की संज्ञा दी जा सकती है. शेष अन्तिम तीन कहानियां ही ऐसी हैं जिन्हें दीर्घ कलेवर
प्राप्त है. आज के युग की विशेषता है और आवश्यकता भी कि रचनाओं का कलेवर
आकार-प्रकार की दृष्टि से छोटा होना चाहिये ताकि पाठक कम से कम समय में अधिक से
अधिक पढ़ सके. वन्दना ने समय की इस नब्ज़ को भली प्रकार पहचाना है; एतदर्थ ही
उन्होंने लघु आकार की रचनाएं लिखकर पाठक को कम से कम समय में अधिक से अधिक
कहानियां पढ़ने का अवसर प्रदान किया है. पाठक-वर्ग ने इस हेतु लेखिका की सराहना भी
की है. वन्दना की कहानियों की लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है.
आइये, थोड़ी सी चर्चा अब
कहानियों के कथानकों की :- वैसे तो कहानी संग्रह में बीस कहानियां और हर कहानी का
अपना अल्ग अलग कथानक है किन्तु संग्रह के समग्र कथ्य पर विचार करने पर हमें विदित
होता है कि वन्दना की समस्त कहानियां मध्यमवर्गीय भारतीय समाज की दशा और दिशा पर
आधारित हैं. यद्यपि लेखक की हर कहानी कल्पना प्रसूत होती है जिनमें यथार्थ से परे
जाकर लिखने की भी सम्भावना विद्यमान रहती है किन्तु इस संग्रह में लेखिका ने
सम्भाव्य को स्वीकार करते हुए प्राय: प्रत्येक कहानी में यथार्थ का चित्रण किया
है. परिणामस्वरूप, पाठक को पढ़ते समय संग्रह की कहानी स्वयं अपनी कहानी प्रतीत होती
है. इस स्थिति में पाठक कहानी के पात्रों से तादात्म्यावस्था स्थापित करने में सफल
होते हैं. काव्य की चरम रसानुभूति यही है और यही रचना की सफलता भी है. वन्दना अपनी
कहानियों में यह रसाभास कराने में सफल हैं.
कहानी संग्रह का एक अन्य
मुख्य बिन्दु है कथानक के लिये चयनित सामाजिक क्षेत्र. हमारे देश का समाज
जीवन-यापन की दृष्टि से तीन स्तरों में विभाजित है- उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और
निम्न वर्ग. देश की अधिकांश जनता मध्यम वर्गीय जीवन जीती है. इस वर्ग के लोगों का
रहन-सहन प्राय: ’हां’ और ’न’ के द्वन्द से आवृत्त रहता है. ऐसे लोगों की आर्थिक
स्थिति थीक नहीं होते हुए भी उनके दैनन्दिन जीवन की आवश्यकताओं की किसी प्रकार
पूर्ति होती रहती है. सुख-दुखमय जीवन-तराजू के ये दोनों पलड़े कभी ऊंचे और कभी नीचे
आते-जाते रहते हैं. कहा जाता है-’साहित्य समाज का दर्पण होता है.’ अर्थात कथित
समाज की वास्तविक तस्वीर वहां के साहित्य में देखी जा सकती है. जहां तक वन्दना की
कहानियों का प्रश्न है – वे मध्यम वर्ग की अपनी ही जैसी कहानियां हैं. चंद म महिलाओं
में ’ देख न सकहिं पराई विभूति’ का प्राकृतिक गुण होता है. वन्दना की लगभग आधी
कहानियां इसी गुण से सम्पन्न महिलाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करतीं हैं. ऐसी महिलाओं
की मानसिकता का उन्होंने जीवन्त चित्रण
बड़ी स्वाभाविक शैली में किया है, उदाहरणार्थ- कहानी ’अलग-अलग दायरे, नीरा
जाग गयी है, अहसास, दस्तक के बाद, करत-करत अभ्यास के, बड़ी हो गयी हैं ममता जी, और
विरुद्ध आदि कहानियों को रखा जा सकता है. कुछ
कहानियां ऐसी भी हैं जिनमें महिला समाज की जागरूक और साहसी महिलाओं का चित्रण है- “प्रिया की डायरी”, “बातों वाली गली”, “नीरा जाग गयी है”, और सब जानती है शैव्या” इसी प्रकार की कहानियां हैं. इनके अतिरिक्त कुछ कहानियों
में समाज के विविध रंग भी चित्रित किये हैं जैसे- “नहीं चाहिये आदि को कुछ” में बाल मनोविज्ञान का चित्रण है तो “अनिश्चितता में” दो भाइयों के
जीवन स्तर की गाथा है. “हवा उद्दंड है” में वर्तमान युग की रुग्णता दर्शाई गयी
है तो “बड़ी बाई साब” में सामंती प्रवृत्ति का चित्रण. इन सबके विपरीत “शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी” एक ऐसी कहानी है जो आस्था और धर्म के
नाम पर ढोंगी बाबाओं के कलुषित चरित्र को न केवल उजागर करती है, बल्कि ऐसे ढोंगी
महात्माओं से दूर रहने, सावधान करती है. राम रहीमों के उदाहरण आज भरे समाज, यत्र
तत्र अपने आसन जमाये हुए हैं.
जहां तक कहानी
संग्रह की भाषा शैली का सवाल है, इसकी भाषा बड़ी सहज और स्वाभाविक है जो पाठक के
मन-मस्तिष्क में आसानी से उतरती चली जाती है. शब्दों की दुरूहता से दूर , इसमें
यत्र तत्र कुछ विदेशी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया गया है, लेकिन ये केवल इसलिये
कि लेखिका की भाषा, जन सामान्य की भाषा बन सके. कहानी की शैली तो चित्ताकर्षक है
ही- इसे सुधि पाठक बंधु स्वयं महसूस करेंगे. कहानी के अन्य तत्व यथा सम्वाद और
उद्देश्य भी यथानुरूप देखने को मिलते हैं. हर कहानी का जिज्ञासापूर्ण अन्त उसके
उद्देश्य-पूर्ति की घोषणा स्वत: कर देती है. कुल मिला के उक्त कहानी संग्रह में
प्राय: सभी तत्वों का सम्यक रूपेण समावेश हुआ है. कहा जा सकता है कि “बातों वाली गली” आज के युग की दृष्टि से एक सफल कृति है जिसके लिये वन्दना
साधुवाद की पात्र हैं.
प्रकाशन
की ड्रुष्टि से यह कहानी संग्रह “बातों वाली गली” वन्दना की यद्यपि पहली कृति है तथापि एक कथाकार और लेखिका के रूप में हिन्दी जगत में उनका
स्थान वर्षों पूर्व से सुरक्षित है. उनकी कहानियां और आलेख विगत अनेक वर्षों से
देश की प्रसिद्ध हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं.
पत्रकार-जगत में भी उनकी अच्छी खासी पैठ है. देशबंधु के कार्यकाल में उन्होंने एक
सक्षम पत्रकार के रूप में ख्याति अर्जित की है. समय-समय पर आयोजित होने वाली
गोष्ठियों, सेमिनारों , साहित्यिक समारोहों में भी वे प्रतिष्ठित सहभागी के रूप
में भाग लेती रही हैं. तमाम हस्तियों के साक्षात्कार भी उनके खाते में हैं.
वन्दना का यह
प्रथम कहानी संग्रह”बातों वाली गली” अत्यल्प अवधि में ही बहुत लोकप्रिय
सिद्ध हुआ हैसुधी पाठकों की समर्थ प्रतिक्रियाओं से यह भलीभांति स्पष्ट है. मुझे
पूरा भरोसा है कि निकट भविष्य में यह संग्रह- “गली-गली की बात” बनने वाला है.
ईश्वर करे, ऐसा ही हो. मेरी सद्भावना और आशीर्वाद.
राम रतन अवस्थी
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21-12-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2824 में दिया जाएगा
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
बहुत शुक्रिया जी
हटाएंशानदार समीक्षा पिता की नज़र से
जवाब देंहटाएंकभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें
जवाब देंहटाएंमेरी नजर से बातों वाली गली और वंदना अवस्थी दुबे :)
http://sanjaybhaskar.blogspot.in/2017/12/blog-post_26.html
अति उत्तम समीक्षा ,नमन पिताजी को ,स्मरणीय
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