रविवार, 24 मार्च 2013

चमक रही है परों में उड़ान की खुश्बू....


" चमक रही है परों में उड़ान की खुश्बू,
बुला रही है बहुत आसमान की खुश्बू."

दंग रह गयी!!!!!!!

" नेह की नज़रों से मुझको
ऐसे देखा आपने,
मन पखेरू उड़ चला फिर,
आसमाँ को नापने."

फिर उड़ान!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
" जो पास होते हैं, वही जब दूर जाते हैं,
तन्हाई में
हमें अक्सर वही तो याद आते हैं."
हां, सही तो है.

पिछले दिनों रंजू की किताब " कुछ मेरी कलम से" पढी, तो लगा, एकदम यही तो मैं कहना चाह रही थी! अब सुनीता की किताब " मन पखेरू उड़ चला फिर" हाथ में है, तो लग रहा है, सुनीता को कैसे मालूम मेरे दिल की बात????
ये कविताई भी न, जो न करवाए . भावों के सागर में सुनीता ऐसे गोते लगाती हैं कि पता ही नहीं चलता कब भावान्तर हो गया!!! कभी खूब खुश नज़र आती हैं तो कभी लगता है उफ़्फ़्फ़!!!! इतना दर्द???
पुस्तक में अपनी बात कहते हुए सुनीता लिखती हैं-
ख्वाब कब याद रहते हैं! मगर कुछ ख्वाब जागती आंखों से देखे जाते हैं. जिन्हें मैं हर रोज़ देखती थी और जानबूझ कर क्रमश: लगा देती थी कि कल फिर से बुनूंगी यही ख्वाब "
पढ के लगा, सम्वेदनाएं कितनी एक जैसी होती हैं, और इच्छाएं भी  
"पंछी तुम कैसे गाते हो" कविता में सुनीता पूछती हैं-
"पंछी तुम कैसे गाते हो?
अपने सारे संघर्षों में तुम
कैसे गीत सुनाते हो"
कौन जाने सुनीता!! वे हमेशा गाते भी हैं, या उनका रुदन भी हमें गीत लगता है??
सुनीता की अधिकांश कवितायें प्रेमाकुल, प्रेम विह्वल या फिर परिपूर्ण प्रेम की हैं. कुछ कविताओं में उन्होंने संदेश भी दिये हैं. मसलन जनगीत में उन्होंने कई इतिहास पुरुषों/स्त्रियों को याद किया है. वर्तमान सामाजिक विसंगतियों पर चिन्ता भी ज़ाहिर की है. देखें-
"इक नारी फिर से छली गयी
पत्थर बनने को मजबूर हुई.
एक पुरुष के साहस से
आकुलता मन की दूर हुई."
तमाम युगस्त्रियों का यशोगान इस कविता में है. जिसमें तारामती, अहिल्या, कुंती, सीता, द्रौपदी, आदि का ज़िक्र करते हुए आज की औरत के लिये वे कहती हैं-
" जिस देश में नारी की इज़्ज़त 
"मां" कह के संवारी जाती है.
उस देश में पैदा होने के
पहले वो मारी जाती है."
बेटी का दर्द एक और कविता में देखें-
" कहा था एक दिन तुमने
पराई अमानत है
ये बच्ची
तभी से आजतक माँ
मैं अपना घर ढूंढती हूं."
इस पुस्तक की भूमिका लिखते हुए आनंद कृष्ण लिखते हैं-
 "सुनीता का रचना संसार बहुत व्यापक है. उनकी कविताएं उनके जैसी ही मुखर हैं और अपने पाठकों व श्रोताओं से सक्रिय व सीधा सम्वाद करती हैं. कविताओं की यह बहिर्मुखी प्रवृत्ति एक ओर उन्हें एकान्तिक अवसाद से बचाती है और दूसरी ओर अपनी कहन को बिना किसी लाग-लपेट के अपने पाठकों को सीधा संप्रेषित कर देती है."
मन आनन्द कृष्ण की बात से सहमत हो जाने का है मेरा तो .....
तमाम कविताएं पढ के एक बात जो खुल के सामने आ रही थी वो था कविताओं का सीधापन. कोई बनावट नहीं. नई कविता जैसी उलझन नहीं. जो बात मन में आई, सो कह दी सीधे-सीधे.
कई कविताओं में विषय की पुनरावृत्ति हुई है, भाव भी लगभग वही थे, सो असमंजस हुआ कि यही कविता दोबारा पढ रही हूं क्या?
" एक अजनबी अपना सा  क्यूं लगने लगा,
क्यूं कोई दिल में आज मेरे धड़कने लगा"

" ये कौन है जो चुपके से मुस्कुराया है,
तेरा चेहरा है या चांद निकल आया है"

मेरा फोटो
जैसे गीत लिखते समय कवियित्री के मनोभाव निश्चित रूप से एक जैसे रहे होंगे
सुनीता की भाषा में अनेक स्थान पर पारम्परिक कविता की भाषा के दर्शन होते हैं, जो आज के कवियों की भाषा से नदारद हैं.

 कविताओं की भाषा अत्यंत सरल और सहज है. नई कविता को पढने के बाद सुनीता की कविताएं सुकून सा देती हैं.
सुनीता बहुत अच्छी कवियित्री हैं. उनका अपना एक मकाम है काव्य-जगत में. निश्चित रूप से उन्हें जीवन के अन्य रंगों और अन्यान्य भावों पर भी सृजन करना होगा, तभी उनका रचना संसार व्यापक और बहिर्मुखी हो सकेगा
सुनीता की इस पुस्तक में कुल 127 कविताएं संगृहीत हैं. 150 पृष्ठ की इस पुस्तक का मूल्य 195 रुपये मात्र है. ये पुस्तक मैने खरीदनी चाही, लेकिन सुनीता ने साग्रह भेंट कर दी. अब उनकी अगली  पुस्तक निश्चित रूप से खरीद के पढूंगी 
  हिंद-युग्म से प्रकाशित इस पुस्तक का कवर पेज़ विजेन्द्र एस बिज़ ने तैयार किया है. पुस्तक के भीतर चंद कविताओं पर भी उन्होंने रेखाचित्र उकेरे हैं, जो सुन्दर है. पुस्तक की प्रिंटिंग साफ़-सुथरी है. शैलेश भारतवासी निश्चित रूप से बहुत जल्द प्रकाशकों की भीड़ में अपना मकाम सुनिश्चित कर लेंगे.

शानदार कविताओं से सजी इस पुस्तक के प्रकाशन पर सुनीता जी को अनेकानेक शुभकामनाएं...वे लगातार लिखें, लिखें, खूब यश कमाएं. आभार
पुस्तक: "मन पखेरू उड़ चला फिर"
लेखिका: सुनीता शानू
प्रकाशक: हिंद-युग्म१, जियासराय, हौजखास, नई दिल्ली-110016
मूल्य: 195 रुपये मात्र

रविवार, 10 मार्च 2013

कुछ मेरी कलम से और रंजू......


रंजू की किताब मुझे लगभग बीस दिन पहले मिल गयी थी.....
सपरिवार पाठ भी हो गया. लेकिन "कुछ मेरी कलम से’ के बारे में लिखने आज बैठी हूं. उम्मीद है रंजू माफ़ कर देगी ...बल्कि कर ही दिया होगा 
अपने किसी की किताब मिलने पर मैं उसे बहुत देर तक हाथ में लेकर बैठी रह जाती हूं... बहुत अपना सा अहसास होता है. रंजू की किताब के साथ भी ऐसा ही हुआ  कितनी देर तक तो बस कवर ही देखती रही.
जब भी कवितायें पढती हूं तो चमत्कृत होती हूं. समझ में ही नहीं आता कि कवि/कवियित्री कैसे इतने गहरे भाव चंद शब्दों में भर देते हैं?
रंजू की कवितायें भी चमत्कृत करती हैं. कई कविताएं तो बार-बार पढने का मन करता है, पढी भी हैं.  कुल इक्यासी (81) कविताओं से सजी इस पुस्तक की पहली कविता है- कहा-सुना. चार मुक्तक हैं. अद्भुत हैं. आप भी देखें-
कहा मैने
वर्षा की पहली बूंदें
सिहरन भर देती हैं
रोम-रोम में
सुना उसने
इस टपकती छत को
तेज़ बारिश से पहले ही
जोड़ना होगा.
कैसा गम्भीर जीवन-दर्शन!! एक ही मुक्तक कितनी खूबसूरती से दो अलग-अलग भावों को व्यक्त कर रहा है...
आगे बढती हूं. "सजे हुए रिश्ते" पर निगाह अटक जाती है. 
अजीब है यह मन
गुलदस्ते में सजे
इन नकली फूलों को यूँ
रोज़ दुलारता है
और उस पर जमी धूल को
इस गहराई से पोंछता है
कि शायद कभी यूं
छूने भर से जी उठे
ठीक वैसे ही जैसे
मेरे तुम्हारे बीच के मुरझाए हुए
लेकिन सजे हुए रिश्ते.
चांद कवियों का हमेशा से दुलारा रहा है. चांद का  शायद सबसे ज़्यादा इस्तेमाल कवियों ने ही किया है. कभी-कभी तो लगता है कि कहीं चांद अपना अन्धाधुंध इस्तेमाल देख कर गुस्साया धरती पर ही न उतर आये कवियों से रॉयल्टी वसूलने  
रंजू ने भी चांद के कई रूप उकेरे हैं. चांद कुछ कहता है, तन्हा चांद, भीगा चांद, अमावस का चांद, पूर्णिमा का चांद, गोल चांद, यहां तक कि  आवारा चांद भी 
चांद की बतकही देखिये तो-
कहा था उसने
चांदनी रात के साये में
तनिक रुको
अभी मुड़् कर आता हूं मैं
तब से 
भोर के तारे को 
मैने उसके इन्तज़ार में
रोक कर रखा है.
कमाल है न?  पता नहीं कैसे तमाम बातों को इतना खूबसूरत रूप दे देते हैं कवि??
रंजू की कविताओं में जीवन के तमाम रंग बिखरे पड़े हैं. कहीं उदासी है तो पलक झपकते ही खुशियों से सराबोर कर देंगी. कहीं विरह है तो कहीं मिलन का खूबसूरत गीत.. कहीं जीवन दर्शन तो कहीं भोले शिशु सी जिज्ञासा. कहीं आशा है तो कहीं घोर निराशा भी. 

देखिये-
आसान है देह से
देह की भाषा समझना
पर कभी नहीं छुआ
तुमने मेरी
आत्मा के उस अन्तर्मन को
क्योंकि तुम्हारी पाषाण देह में
वह अन्तर्मन
कहीं मौजूद था ही नहीं.
कविता लिखने की प्रक्रिया को रंजू कुछ इस तरह व्यक्त करती हैं-
कविता में उतरे
ये अहसास
ज़िन्दगी की टूटी हुई कांच की किरचें हैं
जिन्हें महसूस करके
मैं लफ़्ज़ों में ढाल देती हूं.
कविता के ज़रिये अपने भावों को इतनी खूबसूरती से व्यक्त करना आसान नहीं होता निश्चित रूप से ये ईश्वर प्रदत्त वो गुण है जो सबके पास नहीं होता और ये गुण रंजू की शख्सियत में रचा-बसा है. कविताओं को पढते हुए तमाम सम्वेदनाओं से पाठक गुज़रता है जिनके गलियारे कवियत्री की थाती हैं. हम जो कहना चाह रहे हैं, वो ठीक उसी रूप में पाठक ग्रहण करे ये कवि/कवियित्री की सम्प्रेषण क्षमता का द्योतक है और " कुछ मेरी कलम से" इस परीक्षा में खरा उतरा है. 
हिन्द-युग्म द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक की छपाई और कवर पृष्ठ शानदार है.कवर पेज़ की पृष्ठभूमि में रंजू की तस्वीर छाया रूप में अपनी सम्पूर्ण उपस्थिति का अहसास करा रही है, ऐसे में यदि हिन्दयुग्म समापदक चाहते तो उसी तस्वीर का थम्बनेल न लगाते तो कवर पृष्ठ और भी खूबसूरत लगता. ऐसा मुझे लगता है, प्रकाशक और लेखिका मेरी राय से सहमत हों, ज़रूरी नहीं. प्रकाशक बधाई के पात्र हैं. पुस्तक की कीमत 150 रुपये है और यह अन्तर्जाल पर क्रय हेतु उपलब्ध है. 
पुस्तक- कुछ मेरी कलम से
लेखिका- रंजू भाटिया
प्रकाशक- हिन्द-युग्म
जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली-16
कीमत- 150 रुपये मात्र

शनिवार, 24 नवंबर 2012

चौबीस साला सफ़र........

ये तस्वीर रिसेप्शन के दिन की है ;) जैसा तैयार कर के बिठा दिया, बैठ गये :)

आइने में पीछे मेरी भांजी दीपम दिख रही है.

रिसेप्शन हॉल में ले जाती मेरी बड़ी ननद कल्पना पांडे.

कैसी दहशत होती है, जब सबकी निगाहें आप पर हों....बहुत असहज दिन होता है रिसेप्शन का...

यही हाल उमेश जी का भी रहा होगा :)

जा रही हूं वरने...उमेश जी को :) बायीं तरफ़ मेरी छोटी बहन कनुप्रिया, और दायीं तरफ़ मेरी बड़ी दीदी.

लो, वर लिया ;)

बैठे हैं दोनों चुपचाप :) आज की जोड़ी होती, तो बतिया रही होती :)

दूल्हा-वेश उमेश जी का :)

सिदूर-दान

सात-फेरे :)

:)

शनिवार, 8 सितंबर 2012

हम सब शोकाकुल हैं पाबला जी...



शाम की क्लास ख़त्म होने के बाद रात का खाना खा ही रहे थे कि कुछ मेहमान आ गए. इसी बीच इस्मत का फोन आया, मैं रिसीव नहीं कर पाई. साढे दस बजे मोबाइल पर इस्मत का मैसेज मिला- " पाबला जी के बेटे का इंतक़ाल हो गया...सो सैड..२६ साल का था.."
पढ़ के स्तब्ध रह गयी...उस वक्त मेहमानों को विदा करने गेट पर खड़ी थी, उलटे पैरों अन्दर आई, फेसबुक खोला...तमाम स्टेटस इस्मत की खबर की पुष्टि कर रहे थे.... ललित शर्मा जी ने लिखा था-
"बहुत ही दुखद समाचार है कि बी एस पाबला जी (भिलाई छत्तीसगढ) के पुत्र गुरुप्रीत सिंग पाबला का अक्समात निधन हो गया है। अंतिम यात्रा 9 सितम्बर 2012 को भिलाई रुवां बांधा स्थित उनके निवास स्थान से लगभग 12 बजे प्रारंभ होगी। ईश्वर से मृतात्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। "
वज्रपात सा हुआ...अभी लखनऊ में ही तो मिले थे हम..कैसे मुस्कुराते-हंसते हंसाते रहे थे पाबला जी..ऐसे इंसान पर इतना बड़ा दुःख??? भगवान् को भी बच्चों को उठाने में कुछ ज्यादा ही आनंद आने लगा है शायद :( :( अभी तक नि:शब्दता की स्थिति में ही हूँ.....ऐसी स्थिति में जबकि एक पिता का जवान बेटा चला गया हो, मैं कैसे कहूं कि धैर्य रखिए पाबला जी?? न, ऐसी औपचारिक सांत्वना नहीं दे सकती मैं...
ईश्वर पाबला जी को दुःख की इस घडी में संबल प्रदान करे. हम सब उनके इस दुःख से व्यथित हैं, उनके साथ हैं....

रविवार, 2 सितंबर 2012

सम्मान समारोह- एक नज़र इधर भी......

२७ अगस्त २०१२ को लखनऊ में तस्लीम-परिकल्पना समूह द्वारा आयोजित सम्मान समारोह संपन्न हुआ. सौ से अधिक ब्लॉगरों ने इस समारोह में भाग लिया. सभी सम्मानित ब्लॉगरों को मेरी ओर से हार्दिक बधाई. ब्लोगिंग से जुड़े तमाम लोगों को एक दूसरे से मिलने का मौका मिला, जो अविस्मरणीय है.
राय उमानाथ बलि प्रेक्षागृह में संपन्न यह कार्यक्रम तीन सत्रों में आयोजित होना था, लेकिन पहला सत्र लम्बा खिंच जाने के कारण, दूसरा सत्र अतिसंक्षिप्त हो गया , इसका सीधा असर उन वक्ताओं पर पड़ा, जो दूसरे सत्र में न्यू मीडिया के सामजिक सरोकार विषय पर बोलने वाले थे. सभी वक्ता मौजूद थे, और अपनी तैयारी से ही आये थे, लेकिन उन्हें अपनी बात कहने का मौका नहीं मिल सका. तीसरा सत्र आरम्भ हुआ, और दूसरे सत्र के वक्ता, मुख्य अतिथि, विशेष अतिथि सब श्रोताओं में शामिल दिखाई दिए.
किसी भी आयोजन में खूबियाँ और खामियां होती ही हैं, लेकिन देख रही हूँ, कि इस आयोजन के बाद जितनी भी पोस्टें आयोजन से सम्बंधित आईं, वे कार्यक्रम से जुडी नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति विशेष को इंगित करके लिखी जा रही हैं, जो गलत है. किसी पोस्ट में शास्त्री जी के अपमान की बात है, तो किसी में रश्मिप्रभा की अनुपस्थिति के कारणों के कयास लगाए जा रहे हैं. किसी में कार्यक्रम को अंतर्राष्ट्रीय कहने पर आपत्ति है, तो किसी में सीधे शिखा को दोषी बताया जा रहा है. शास्त्री जी का अपमान निश्चित रूप से सम्मान समारोह के आखिर में सम्मानित किये जाने पर हुआ है, लेकिन उन्होंने अपना बड़प्पन क़ायम रखते हुए, इस सम्मान को ग्रहण किया. रश्मिप्रभा जी क्यों नहीं आ सकीं, इस कारण को खुद रश्मि जी से जानने का किसी ने प्रयास किया? नहीं. बस खुद ही उलटे-सीधे कारण गिनाने शुरू कर दिए. पहले सत्र का विशिष्ट अतिथि शिखा को बनाने का फैसला आयोजकों का था, इसमें शास्त्री जी का अपमान कैसे हुआ, मैं समझ नहीं पाई. इस आयोजन की खूबियाँ और खामियां मुझे कुछ इस तरह नज़र आईं-
१- किसी भी क्षेत्र में नए-पुराने लेखकों को सम्मानित किये जाने की परंपरा बहुत पुरानी है, इसका निर्वाह परिकल्पना द्वारा किया जाना सराहनीय है.
२- इस तरह के आयोजन एक-दूसरे से मुलाक़ात का जरिया होते हैं, जो किसी भी क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए ज़रूरी हैं. लखनऊ में भी बहुत से नए/पुराने ब्लॉगर एक दूसरे से मिले.
३-भोजन आदि की अच्छी व्यवस्था की गयी थी. कार्यक्रम स्थल भी सुविधायुक्त था.
४- एक दिवसीय कार्यक्रम में पहला सत्र हमेशा लम्बा खिंच जाता है, लिहाजा आयोजकों को कार्यक्रम दो सत्रों में ही करना चाहिए था, तीसरा सत्र केवल सम्मान-समारोह का होता, तो प्रेक्षागृह आयोजन के समापन तक भरा ही रहता.
५- पहले सत्र के अध्यक्ष और मुख्य अतिथि दोनों ही ब्लोगिंग से पूर्णतया अपरिचित थे, लिहाजा वे इस विषय पर साधिकार कुछ बोल ही नहीं सके. सम्बंधित विषय पर कोई नयी जानकारी मिलना तो दूर की बात है.
६- सम्मान के लिए चयनित लोगों का चुनाव यदि वोटिंग प्रक्रिया से किया गया था, तो आयोजकों का दायित्व था, कि वे प्रत्येक श्रेणी के लिए नामांकित लोगों का विवरण और उन्हें मिलने वाले वोटों की जानकारी क्रमबद्ध तरीके से देते, ताकि पारदर्शिता क़ायम रहती. ऐसा नहीं किये जाने का खामियाजा वे लोग भोग रहे हैं, जिन्होंने सम्मान-प्राप्ति के लिए किसी से कोई अपील की ही नहीं है. बल्कि अपनी योग्यता की दम पर उन्हें सम्मान मिला.
७- दूर-दराज़ से आने वाले ब्लोगरों के रुकने का कोई इंतजाम किया जाना चाहिए था, अगर नहीं भी किया गया था तो इसकी सूचना भी ब्लॉग या फेसबुक पर दी जानी चाहिए थी.
८- किसी भी कार्यक्रम को प्रभावी बनाने का महत्वपूर्ण दायित्व कार्यक्रम के संचालक पर होता है, जो हरीश अरोड़ा जी ने बखूबी निभाया, लेकिन दूसरे सत्र के संचालक महोदय न तो किसी का नाम जानते थे, न ठीक से पढ़ ही पा रहे थे. उच्चारण दोष इस कदर था, कि अर्थ का अनर्थ हुआ जा रहा था.
९- आयोजन को अंतर्राष्ट्रीय की जगह अंतर्राज्यीय नाम दिया जाना चाहिए था, क्योंकि सभी तो हिंदी ब्लोगिंग से जुड़े लोग थे.
ये सब तो हुईं आयोजन की बातें, अब उन पोस्टों की चर्चा जिन पर लोग केवल व्यक्तिगत भड़ास निकाल रहे हैं, वो भी ऐसी भाषा में , कि पढ़ कर खुद के ब्लॉग-जगत से जुड़े होने पर शर्म आ जाए. मुझे उन सभी लिंक्स को यहाँ देने की ज़रुरत नहीं लग रही, क्योंकि आप सब उन्हें पहले ही पढ़ चुके हैं, मैं तो बस ये जानना चाहती हूँ, कि उन पोस्टों में जिस तरह की भाषा का प्रयोग हुआ है, क्या वो शर्मनाक नहीं है? ये सारे लिंक शिवम् मिश्र ने यहाँ
मुझे तो लगता है कि ऐसे किसी सम्मान समारोह से परे, हम सब एक ब्लॉगर मिलन समारोह आयोजित करें, जो परिचय सम्मलेन जैसा हो, सब एक दूसरे से मिलें, एक दूसरे को जाने. व्यर्थ की छीछालेदर हम क्यों नहीं छोड़ पाते??
पुनश्च:-
शुक्ल जी से क्षमाप्रार्थना सहित-
----------------------------------
अपनी पोस्ट में फ़ुरसतिया जी ने लिखा है, कि इस तरह के आयोजन में भोले-भाले ब्लॉगर्स का इस्तेमाल जमावड़े की तरह किया गया, तो मुझे नहीं लगता कि कोई भी ब्लॉगर इतना भोला-भाला है कि अपना इस्तेमाल होने देगा. किसी को भी जबरन पकड़ कर नहीं लाया जाता, सब स्वेच्छा से जाते हैं, जाने के पीछे सब से मुलाक़ात की ललक ही होती है. मैं भी जमावड़े के लिए नहीं गयी थी, बल्कि उन तमाम साथियों से मिलने की इच्छा मुझे वहां ले गयी, जो लम्बे समय से थी.
तस्वीर में आयोजक रवीन्द्र प्रभात जी सपत्नीक सम्मान प्राप्त करते हुए.

रविवार, 19 अगस्त 2012

दर्द की महक और हरकीरत...


पुस्तक : दर्द की महक
लेखिका : हरकीरत 'हीर'
प्रकाशक : हिन्दीयुग्म
१,जियासराय , हौजखास,
नयी दिल्ली.
मूल्य : २२५ रुपये
फ्लिपकार्ट पर पुस्तक खरीदने के लिए यहाँ जाएँ-

सबसे पहले हरकीरत जी से क्षमायाचना सहित............पुस्तक मिले लगभग एक महीना हो रहा है, और मैं इतने विलम्ब से समीक्षा लिख रही हूँ :( बहाना वही घिसा-पिटा व्यस्तता का ,कोई नया बहाना मिला ही नहीं )
उम्मीद है हरकीरत जी क्षमा करेंगीं...
न कभी हीर ने
न कभी रांझे ने
अपने वक्त के कागज़ पर
अपना नाम लिखा था
फिर भी लोग आज तक
न हीर का नाम भूले
न रांझे का
बस दर्द महकने लगता है...इमरोज़ की इस नज़्म के साथ, गोया अमृता-इमरोज़ की दास्ताँ लिखी जा रही हो...गोया इमरोज़ का दर्द परवान चढ़ा हो... हरकीरत जी उन सौभाग्यशालियों में हैं, जिन्हें इमरोज़ साहब का स्नेह मिला है, उनकी नज्मों को तो यूं महकना ही था.
इमरोज़ साहब की इस नज़्म के तले हरकीरत जी ने पूरा दर्द का संसार ही रच डाला है. स्त्रियों का दर्द, प्रेयसी का दर्द, पत्नी का दर्द..... ख़ुशी का दर्द और आंसुओं का दर्द.... कभी मीठा, तो कभी कसैला.. लगा सचमुच कितने दर्द झेलती है औरत??? हर दर्द की टीस महसूस होने लगी..
"एक ख़त इमरोज़ जी के नाम" से शुरू होने वाली नज्मों का काफिला पृष्ठ दर पृष्ठ आगे बढ़ने लगा...
मौत की मुस्कराहट, फासलों की रातें से होते हुए निगाहें "टांक लेने दे उसे मोहब्बत के पैरहन पर इश्क का बटन "
पर अटक गयीं...कितनी खूबसूरती से हरकीरत जी ने सच बयां कर दिया-
रब्ब!
ये औरत को ब्याहने वाले लोग
क्यों देते चिन हैं उसे दीवारों में?
पढ़ते हुए धक् से रह गयी!! हाँ सही तो है!!! कितनी ही औरतों का सच है ये...
शब्द-यात्रा फिर शुरू होती है..लाशें, इससे पहले कि शब्द धुल जाएँ, सुन अमृता......., तलाक, शीरीं-फरहाद, से होती हुई निगाह फिर अटकती है "अस्पताल से" पर-
अल्लाह!
रात कफ़न लिए खड़ी है
और ऐसे में नव वर्ष
द्वार पर दस्तक दे रहा है...
चकित हूँ. नज्मों को आत्मसात करता दिल-दिमाग हरकीरत की लेखनी के आगे झुका जा रहा है.....
नज़्म "तुम भी जलाना इक शमा...." के परिचय में लिखती हैं-
"आज इमरोज़ जी का एक प्यारा सा ख़त नज़्म के रूप में मिला....हर बार एक ही आग्रह- कवि या लेखक कभी हकीर नहीं नहीं हुआ करते...और रख देते एक तड़पती रूह का नाम "हीर"....सोचती हूँ, उम्र भर की तलाश में एक यही नाम तो कम पाई हूँ..तो क्यों न हीर हो जाऊं! "
हीर हो जाऊं ??? तुम हीर ही हो हरकीरत....इतना दर्द तो बस हीर के अंतस में ही समाहित हो सकता है...बहुत खूबसूरती से इमरोज़ के दर्द को उकेरती हुई हरकीरत लिखती हैं-
इमरोज़
तेरे हाथों की छुअन
तेरी नज्मों की सतरों में
सांस ले रही है
और इन्हें छूकर मैंने
जी लिए हैं वे तमाम अहसास
जो बरसों तूने गुज़ारे थे
अपनी पीठ पर.
( आपको याद दिला दूँ, कि इमरोज़ के पीछे बैठ कर, उनकी पीठ पर भी अमृता, साहिर का ही नाम लिखा करतीं थीं)
पुस्तक में एक से बढ़कर एक नज्में हैं. और कशिश ऐसी, कि एक बार पढना शुरू करके, उसे बीच में नहीं छोड़ सकते आप. मैंने एक बैठक में ही पूरी किताब पढी!! किताब के अंत में इमरोज़ की इक नज़्म हीर के लिए है.-
मुहब्बत के रंग में डूबा
हर दिल, हीर भी है
और रांझा भी.
इस पुस्तक की जो खासियत है, वो ये कि सभी नज्मों के पहले उनके सृजन का दर्द बहुत खूबसूरती से बयान किया गया है. नज़्म के अंत में ब्लॉग पर आईं चुनिन्दा टिप्पणियों को भी स्थान मिला है, जिसकी वजह से पुस्तक की खूबसूरती तो बढी है, नया प्रयोग भी लोगों के सामने आया. पुस्तक का मूल्य २२५ रुपये है, जो ठीक ही है. सजिल्द पुस्तकों की कीमत पेपरबैक से अधिक होती ही है. कवर-पृष्ठ सुन्दर है, लेकिन एक कमी जो मुझे खटकी, वो ये कि लेखिका का नाम ऊपर है और पुस्तक का नीचे. मेरे ख़याल से पुस्तक का नाम ऊपर होना चाहिए था. पुस्तक की प्रिंटिंग बहुत अच्छी है. प्रूफ की गलतियाँ भी नहीं हैं, लिहाजा हिन्दीयुग्म और हरकीरत जी दोनों ही बधाई के पात्र हैं.
मेरी ओर से ईद का ये तोहफा कैसा लगा? बताएँगे न?

रविवार, 22 जुलाई 2012

काका भी चले गये............... :(

काका भी चले गये................ :(
अगर याद करूं, तो ऐसा एकदम नहीं है कि राजेश खन्ना के जीवित रहते हुए मैने उन्हें बहुत याद किया हो, लेकिन जब वो गये, तो पिछले दो-तीन दिन बस उन्हीं को याद किया. उनके बहाने एक बार फिर बचपन के गलियारे में झांक आई :)
फ़िल्मों या फिल्मी कलाकारों में मेरी बचपन में कोई दिलचस्पी नहीं थी, शायद अधिकतर बच्चों की नहीं होती है :) लेकिन मुझे तो फ़िल्म देखने जाना भी बोझ सा लगता था, और जबरिया थोपी गयी मैं, दीदी को बोझ लगती थी :) चार-पांच साल की बच्ची को फ़िल्मों से लगाव होना भी नहीं चाहिये :) खैर हम दोनों के इस संकट को दीदी बड़ी आसानी से दूर कर देती थीं. उधर दीदी की सहेलियों के साथ मैटिनी शो देखने की तैयारी हो, इधर मुझे साथ ले जाने का मम्मी का फ़रमान जारी हो जाता :( मुझसे पूछने की ज़रूरत ही किसे थी कि मुझे जाना है या नहीं ? :( तैयार होने के बाद दीदी मुझसे कहतीं- "अगर तुम पिक्चर न जाओ, तो हम तुम्हें पांच पैसे देंगे " मुझे जैसे मुंहमांगी मुराद मिल जाती :) जाने का मन तो वैसे भी नहीं था, रिश्वत फ़्री में मिल गयी :)
फ़िल्में देखने से ज़्यादा रस मुझे दीदी के द्वारा फिल्म की स्टोरी सुनाने में आता था. मोहल्ले के तमाम बच्चों, और उनकी वे सहेलियां जो फ़िल्म देखने नहीं जा पायीं थीं, बाद में दीदी से स्टोरी सुनतीं ( पहले "स्टोरी" का मतलब केवल फ़िल्म की कहानी ही माना जाता था :) दीदी भी एक-एक सीन एक्टिंग सहित सुनातीं. जहां गाने होते, वहां बाक़ायदा गीत गाया जाता.
फ़िल्मी कलाकारों के नाम भी मैने दीदी के मुंह से ही सुने थे, और लगभग रट से गये थे. दीदी का पिक्चर जाना मेरे लिये आम बात थी. लेकिन एक दिन उन्हें अपनी सहेली से गम्भीर चर्चा करते सुना- चर्चा का मजमून ये था, कि उस वक्त जो फ़िल्म मोहन टॉकीज़ में लगी थी, उसका टिकट बढा के डेढ रुपया कर दिया गया था. पिक्चर थी- "आराधना" अब फ़िल्म देखना तो और भी जरूरी हो गया था. आखिर क्या है इसमें ऐसा, जो टिकट बढा दी गयी?? ऐसा कर रहे हैं जैसे अठन्नी की कोई कीमत ही न हो?? खैर दीदी लोग फ़िल्म देखने गयीं, और लौटी तो जैसे अपने आप में नहीं थीं. केवल और केवल फ़िल्म के हीरो की चर्चा.... हां मुझे बीच में बता दिया गया कि फ़िल्म में हीरोइन का नाम वंदना था. हांलांकि ये बताने की ज़रूरत नहीं थी, लेकिन शायद फ़िल्म में हमारे परिवार के सदस्य का नाम था, ये गौरव की बात थी, सो बताया गया :p . उसी समय मैने जाना कि फ़िल्म के जिस हीरो की चर्चा खत्म ही नहीं हो रही उसका नाम ’राजेश खन्ना’ है.
बाद में मैने देखा कि राजेश खन्ना की कोई भी फ़िल्म दीदी लोगों से नहीं छूट रही. अखबारों और माधुरी या धर्मयुग के फ़िल्मी पन्ने से राजेश खन्ना की तस्वीरें काटी जा रही हैं. ’चिंगारी कोई भड़के... तो सावन उसे बुझाये..’ गीत गाते हुए राजेश खन्ना कितने सुन्दर लग रहे थे बताया जा रहा है..... ’चल-चल-चल मेरे हाथी...." बिनाका गीतमाला की आखिरी पायदान पर....बिनाका सरताज़ गीत कितनी दूर तक सुनाई दे रहा है, ये जानने के लिये मुझे दौड़ाया जा रहा है....मैं दौड़ रही हूं, आखिर दीदी ने कोई काम बताया है, कितना गर्वित महसूस कर रही हूं :)
दीदी ने कहा सबसे अच्छा हीरो- राजेश खन्ना
मैने मान लिया कि इससे अच्छा कोई और हो ही नहीं सकता. अगली बार अपनी किसी दोस्त से कहती पायी गयी- सबसे अच्छा हीरो-राजेश खन्ना :) वो समय बड़ों को कॉपी करने का समय था ताकि हम भी बड़े दिख सकें :) जो दीदी ने कह दिया, ब्रह्म-वाक्य हो गया :)
तो वो राजेश खन्ना, जिन्हें देखे बिना मैं कहती थी- सबसे अच्छा हीरो- ’राजेश खन्ना’ अब चले गये हैं.... अपने तमाम चाहने वालों को उदास करके... विनम्र श्रद्धान्जलि.
बचपन में और भाई-बहनों को घर में छोड़, बाज़ार या पिक्चर ले जाया जाना कितना वीआईपी अहसास देता है न? मेरे एक कंजूस चाचा हमें कहीं नहीं ले जाते थे. फ़िल्म लगी थी ’ जय संतोषी मां’ चाचा देखने जा रहे थे, मुझसे पूछा बस ऐसे ही और मैं तैयार. टॉकीज़ में चाचा ने टिकट ली, हमने फ़िल्म देखी...बहुत खुश हो मैं घर लौटी . सबको चहकते हुए बताया-
" घनश्याम चाचा सबसे अच्छे हैं, एकदम आगे बिठा के पिक्चर दिखाई........... :) :) :)