शनिवार, 9 अप्रैल 2016

सोलह दिनों तक चलने वाला एकमात्र त्यौहार है-गणगौर


बचपन में जब गणगौर का त्यौहार आता, तो हम सबमें सबसे ज़्यादा  उत्साह टेसू (पलाश) के फूलों से रंग बनाने के लिये होता. हमारे छोटे से शहर में टेसू के पेड़ बहुतायत हैं, सो फूल मिलने में दिक्कत न होती. हम अपनी फ़्रॉक की झोली बना के उसमें ढेर सारे फूल भर लाते. ताज़े- चटक नारंगी रंग के फूल… मम्मी  एक बड़ी सी थाली में पानी भर के सारे फूल डाल देतीं. जब तक कथा समाप्त होती, फूलों के रंग से पूरा पानी नारंगी-लाल हो उठता. एक बार फिर फूलों को मसल के मम्मी सारा रंग निचोड़ लेतीं, और कथा के अन्त में सब पर ये रंग डाला जाता. तब इस रंग के डाले जाने का पौराणिक महत्व नहीं मालूम था, ये हमारे मौज-मज़े का सामान होता था. हमारा सारा ध्यान तो इस रंग और पूजा के लिये बने पकवानों पर लगा होता था.  लेकिन इतना है, कि मुझे उन दिनों घर में होने वाली सारी पूजाओं में, गणगौर की पूजा बहुत अलग सी, और बहुत अच्छी लगती थी. आज भी लगती है. 
गणगौर….. गण यानि शिवभक्त और गौर यानि पार्वती. पार्वती से बड़ा शिवभक्त भला कौन हुआ है !! लेकिन गौरा के नाम के साथ गण लगने और इस पूरे शब्द  के “गणगौर” बनने की अलग कथा है.  इस शब्द के उत्पत्ति पार्वती द्वारा किये गये एक व्रत के बाद हुई. पार्वती ने शिव को प्राप्त करने के लिये  जो व्रत किये, ये भी उनमें से एक है. वैसे तो गणगौर विभिन्न प्रांतों में मनाया जाता है, लेकिन सबसे ज़्यादा उत्साह और रीति रिवाज़ के साथ इसे राजस्थान में मनाया जाता है. तो आइये जानते हैं इस व्रत की विहि. व्रत को करने का विधान ताकि जो महिला इसे शुरु करना चाहे, वो कर सके, विधान जान सके.
गणगौर पूजन कब और क्यों?
गणगौर का त्यौहार एकमात्र ऐसा त्यौहार है जो चैत्र नवरात्रि के मध्य आता है. नौदुर्गा की तृतीया को आने वाले इस त्यौहार का विशेष महत्व इसलिये भी है क्योंकि चैत्र नवरात्रि का यह दिन  देवी के चंद्रघंटा स्वरूप को समर्पित है. चंद्रघंटा तंत्रमंत्र की स्वामिनी हैं. इनकी अर्चना से अलौकिक वस्तुओं की प्राप्ति होती है. नवरात्रि के तीसरे दिन, यानि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को गणगौर माता की पूजा की जाती है. इस दिन पार्वती के अवतार के रूप में “गणगौर माता” और शिव के अवतार के रूप में “ईशर जी” की पूजा की जाती है.  कहा जाता है कि पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिये तपस्या की. शिव प्रसन्न होके प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा. पार्वती ने वरदान में शिव को ही मांग लिया. और वरदान फलित हुआ, शिव पार्वती के विवाह के रूप में. तबसे कुंआरी कन्याएं इच्छित वर पाने के लिये और सुहागिनें अपने सौभाग्य के लिये इस व्रत को करती चली आ रहीं. गणगौर पूजा की शुरुआत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया से आरम्भ हो जाता है. महिलाएं सोलह दिन तक इस पूजा के विधान का पालन करती हैं. सुबह जल्दी उठ के ऊब चुनने जाती हैं. उस दूब से थाली में रखी मिट्टी की गणगौर माता की मूर्ति को छींटे देती हैं. आठवें इन लड़कियां कुम्हार के यहां जा के मिट्टी लाती हैं, और फिर इस मिट्टी से ईशर जी की प्रतिमा के साथ साथ पार्वती के मायके का परिवार भी बनाती हैं. गणगौर की जहां पूजा की जाती है, उसे पीहर और जहां विसर्जन किया जाता है उसे ससुराल माना जाता है.
गणगौर की मूर्ति को पूजा के दिन सुन्दर वस्त्रों से सजाया जाता है. पकवान बनाये जाते हैं जिनमें मीठे और नमकीन  गुना –फूल होते हैं. कई जगह इन्हें गनगौरे भी कहते हैं. एक थाली में टेसू के फूलों से रंग तैयार किया जाता है. थाली को गणगौर की मूर्ति के ठीक नीचे रखा जाता है ताकि उसमें गौर की छाया दिखाई दे. कथा के बाद यह रंग सब पर उलीचा जाता है. गणगौर की मूर्ति से सिंदूर ले के विवाहिताएं अपनी मांग भरती हैं. और फिर भोजन ग्रहण करती हैं. यह निराहार रहने वाला व्रत नहीं है.
कैसे करें पूजा?
थोड़े बहुत विभेद के साथ इस त्यौहार की पूजन विधि लगभग सभी जगह समान है. गणगौर की मूर्ति स्थापना कर एक थाली में अख्शत, चंदन, हल्दी सिंदूर, अगरबत्ती, धूप, कपूर और फूल-ऊब आदि रखी जाती है. यह थाली होली के दूसरे इन ही तैयार कर ली जाती है. अब इसी में मिट्टी से गणगौर माता की मूर्ति भी बना के रखते हैं. पूजा के कमरे में या जिस स्थान पर पूजा करनी हो, बालू से एक चौकोर बेदी बना के वहीं ये थाल स्थापित किया जाता है. पार्वती को सुहाग का समस्त सामान चढाया जाता है, जैसे कि हम हडतालिका तीज को चढाते हैं. फूल, धूप, दीप नैवेद्य अर्पण करने के बाद कथा कही जाती है और बाद में सभी महिलाएं भोग ग्रहण करती हैं. माता का सिंदूर लेती हैं.
राजस्थान का विशिष्ट त्यौहार
राजस्थान का यह खास उत्सव है. इस दिन भगवान शिव ने पार्वती को. तथा पार्वती ने  समस्त स्त्री समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था. राजस्थान से लगे ब्रज के सीमावर्ती इलाकों में यह त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन यहां गणगौर माता को चूरमें का भोग लगता है.  
उमंग और उत्साह का पर्व है गणगौर
सोलह दिन तक चलने वाला यह एक मात्र त्यौहार है. पहले के ज़माने में जब मनोरंजन के साधन नहीं हुआ करते थे, तब लोग अपने उत्सव का बहाना इन त्यौहारों में खोज लेते थे. सोलह दिन बेहद मस्ती, उत्साह और उमंग में निकलते थे महिलाओं के. राजस्थान में आज भी सोलह दिन तक दूब से दूध का छींटा दिया जाता है गौरा को.
गणगौर की कथा
भगवान शंकर  तथा पार्वती जी नारदजी के साथ भ्रमण को निकले। चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गाँव में पहुँच गए। उनके आगमन का समाचार सुनकर गाँव की श्रेष्ठ कुलीन स्त्रियाँ उनके स्वागत के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं। भोजन बनाते-बनाते उन्हें काफ़ी विलंब हो गया किंतु साधारण कुल की स्त्रियाँ श्रेष्ठ कुल की स्त्रियों से पहले ही थालियों में हल्दी  तथा अक्षत लेकर पूजन हेतु पहुँच गईं। पार्वती जी ने उनके पूजा भाव को स्वीकार करके सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्ति का वरदान पाकर लौटीं। बाद में उच्च कुल की स्त्रियाँ भांति भांति के पकवान लेकर गौरी जी और शंकर जी की पूजा करने पहुँचीं। उन्हें देखकर भगवान शंकर ने पार्वती जी से कहा, 'तुमने सारा सुहाग रस तो साधारण कुल की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी?'
पार्वत जी ने उत्तर दिया, 'प्राणनाथ, आप इसकी चिंता मत कीजिए। उन स्त्रियों को मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है। परंतु मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी उँगली चीरकर अपने रक्त का सुहागरस दूँगी। यह सुहागरस जिसके भाग्य में पड़ेगा, वह तन-मन से मुझ जैसी सौभाग्यशालिनी हो जाएगी।'
जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया, तब पार्वती जी ने अपनी उँगली चीरकर उन पर छिड़क दिया, जिस जिस पर जैसा छींटा पड़ा, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया। अखंड सौभाग्य के लिए प्राचीनकाल से ही स्त्रियाँ इस व्रत को करती आ रही हैं।
तो इस उल्लास-उमंग से भरपूर गणगौर व्रत को आप भी करें, बिना किसी विशेष आडम्बर के. शुभकामनाएं, आप सबको.
                            


गुरुवार, 17 मार्च 2016

कच्चे ख़्वाबों की पक्की ख़्वाहिशें…….


जो अपने होते हैं, उन्हीं का काम सबसे पीछे होता है.  कारण, यहां औपचारिकता नहीं होती. उलाहना होता है, लेकिन नाराज़गी नहीं होती. ऐसा ही कुछ हुआ “निवेदिता-अमित” के साथ. किताब तो जनवरी के पहले हफ़्ते में ही मिल गयी थी, लेकिन…. खैर. 
“कुछ ख्वाब-कुछ ख्वाहिशें” अचानक ही छप के सामने आ गयी, बिना किसी सुन-गुन के. निवेदिता श्रीवास्तव और उनके पतिदेव अमित श्रीवास्तव की मिली जुली पुस्तक है ये. ये दोनों ही ब्लॉग जगत और सोशल मीडिया के चर्चित नाम हैं.  इस संयुक्त प्रयास को देख, एकबारगी राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी का संयुक्त उपन्यास, “एक इंच मुस्कान” याद आ गया. बहुत दिनों के बाद  पति-पत्नी की संयुक्त किताब देखने को मिली, खुशी हुई.
अपनी बात में ’निवेदिता-अमित’ लिखते हैं-
“ बड़ी-बड़ी इमारतों के सामने छोटे-छोटे घरोंदे भी ज़्यादा देर टिक तो नहीं  पाते, परन्तु जब तक आंखों के सामने रहते हैं, लुभाते बहुत हैं. आप सबको यह कविताएं तनिक सा लुभा पाएं, बस इतना सा ख्वाब है और यह पूरा हो जाये, बस यही ख्वाहिश है.”
बड़ी मासूम सी इच्छा है,  बहुत  ही विनम्रता से व्यक्त की गयी. ऐसी विनम्र चाह पर कौन न वारी जाये….
“कुछ ख्वाब-कुछ ख्वाहिशें” को दो हिस्सों में बांटा गया है. पहला हिस्सा निवेदिता के नाम है. इसमें पृष्ठ संख्या 15 से लेकर 62 तक निवेदिता की रचनाएं हैं. हर पृष्ठ पर एक रचना यानि कुल पैंतालीस कविताएं.  निवेदिता की शब्द यात्रा ’अनकहे शब्द’ से होकर, सिरहाना मिल जाये, तुमने कहा था, जैसे पड़ावों से होती हुई आगे बढती है तो निगाहें अचानक ही “सीता की अग्नि परीक्षा” पर ठिठक जाती हैं. शानदार कविता है ये.
“आज मैं तुम्हारा परित्याग करती हूं,
जाओ फिर से मेरी स्वर्ण प्रतिमा बना साथ बिठाओ
मैं जनकपुर की धरती से उपजी
आज फिर धरती में ही समा जाती हूं”
कमाल की पंक्तियां रच डालीं हैं निवेदिता ने. पन्ने फिर पलटने शुरु करती हूं. पृष्ठ दर पृष्ठ आगे बढती हूं आंखें फिर अटकती हैं- “ कल्पवृक्ष” पर .
“सबकी कामनाएं
पूरी करने में
 अपनी कितनी सांसे
कभी न ले पाता होगा  
धड़कन औरों की
सहेजते सहेजते
अपने लिये धड़कना
याद न रख पाता होगा.”
बहुत गहरी बात. ऐसी चिन्ता प्रकृति और  समाज से बराबरी का प्रेम रखने वाला व्यक्ति ही लिख सकता  है.  एक और कविता “ख्वाब” भी बहुत सुन्दर तरीक़े से लिखी गयी है.
ख्वाब
कभी मुंदी
और कभी खुली
पलकों से भी
सांस-सांस जिए जाते हैं.”
सुन्दर कविता है ये. एक और कविता है, “उसने कहा” ये भी बहुत सुन्दर है.

“शुक्रिया तुम्हारा
तुमने तोड़े मेरे सपने
और मैं समझ गयी
टूटे सपने भी जीवंत होते हैं”
बढिया कविता है.  अब पेज़ नम्बर 65 से 112 तक अमित जी का हिस्सा है.
अपनी पहली ही रचना में लिखते हैं-
“मुड़े-तुड़े कागज़ अक्सर होते हैं खत मोहब्बत के
लफ़्ज़ जिसके हरेक जुगनू होते हैं ’उन’ नज़रों के”
प्रेम की बरसात इस कविता से जो शुरु हुई तो, लिखते क्यूं हो?, ईद, कुछ्ख्वाब, और गुनाह हो गया, हाफ़िज़ खुदा, लालटेन सी ज़िन्दगी, पैमाइश लफ़्ज़ों की, कहानी एक जो़ए की, केहि विधि प्यार जतऊं, विद्योत्तमा लौट आओ फिर एक बार, से होती हुई आलिंगन ज़िन्दगी का, गुनगुने आंसू और क्यों लिखूं  कविता पर जाकर ही रुकती है. अमित जी की कई कविताएं बहुत सुन्दर हैं.
“जलाता हूं रोज़
थोड़ा-थोड़ा खुद को
रोशनी तो होती है
पर इर्द-गिर्द
कालिख भी होती है.
बहुत सुन्दर कविता है ये. एक सच्चे कवि जैसी लेखनी के दर्शन होते हैं यहां, जबकि मैं उन्हें बस यूं ही, शौकिया कविताई करने वाला कवि माने बैठी थी.
देखा है मैने अक्सर लब तुम्हारे
कुछ कहने से पहले
हो जाते हैं आड़े-तिरछे
क्या खूब लिख गये अमित जी.
मैं काट रहा हूं
वह शाख
जिस पर बैठा हूं
ये भी बहुत शानदार कविता है. तो कुल मिला के  इस संग्रह में 86 कविताएं हैं, जिनमें से कुछ अच्छी हैं, कुछ बहुत अच्छी हैं, और कुछ ऐसी भी हैं, जिन्हें ओबारा लिखा जाये तो कमाल हो जाये. इस संग्रह को पढते हुए सबसे खास बात ये कि निवेदिता की कविताओं में जहां प्रेम की कविताएं कम, विरह, नाराज़गी, उलाहना जैस भाव भी आये हैं, वहीं अमित जी की  कविताओं का स्थाई भाव प्रेम है. अधिकांश कविताएं प्रेम के ही विभिन्न आयाम प्रस्तुत करती हैं.  एक और बात, वो शायद अधिसंख्य पाठकों ने महसूस की हो, ये पुस्तक एक आत्मीय स्पर्ष सा देती है. रचनाएं बहुत सधी हुईं, मंझी हुई हैं ऐसा मैं नहीं कहूंगी. कुछ कविताओं को छोड़ दें, तो अधिकतर कविताएं अपने कच्चेपन के दौर से गुज़र रही हैं, लेकिन इनका यही कच्चापन आकर्षित करता है.  लेखन में गज़ब की मासूमियत है. उम्मीद है, निवेदिता-अमित अपनी ये मासूमियत बरक़रार रखते हुए अगली पुस्तक में और भी पुष्ट कविताएं ले के आयेंगे. हिन्दयुग्म प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य है सौ रुपये जो  पाठकों को खुश कर देने वाला है. कवर पेज़ अच्छा है. मगर इससे भी अच्छा है पुस्तक का पृष्ठ भाग. छपाई सुन्दर है.  पुस्तक कुल ११२ पृष्ठ की है. एक बार फिर निवेदिता-अमित को हार्दिक बधाई.
पुस्तक: कुछ ख्वाब कुछ ख्वाहिशें
(कविता संग्रह)
लेखक: निवेदिता-अमित
प्रकाशक: हिन्दयुग्म प्रकाशन
१, ज़िया सराय, हौज खास, नई दिल्ली-११००१६
मूल्य: १०० रुपये मात्र
ISBN- 978-93-84419-33-2



बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

किसानों के साथ की गयी तपस्या का नाम है “अकाल में उत्सव”

पिछले दिनों लगातार ऐसी किताबें हाथ आईं, जिनके शीर्षक चमत्कृत करते थे. इन किताबों ने खुद को पढने के लिये न केवल आमंत्रित किया, बल्कि पढने पर मजबूर कर दिया. ऐसा ही शीर्षक है – “अकाल में उत्सव” . कैसा विरोधाभासी शीर्षक है न!! आप पन्ने पलटे बिना रह ही नहीं सकते, और अगर एक बार पन्ना पलट लिया, तो उपन्यास पढे बिना नहीं रह सकेंगे, ये मेरा दावा है.
पंकज सुबीर.. जी हां यही हैं इस उपन्यास के रचयिता. पंकज सुबीर का परिचय देना बेमानी होगा क्योंकि अब यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं. पंकज,  एक ऐसे उपन्यास के रचयिता, जिसे केवल उपन्यास कहना गलती होगी. ये आत्मकथा है सैकड़ों/हज़ारों किसानों की. व्यथा कथा है आत्महत्या को मजबूर होने वाले किसानों की. और कच्चा चिट्ठा है प्रशासनिक तंत्र का. पोल खोलता है व्यवस्था की. पंकज सुबीर पहले भी ऐसे विषयों पर  उपन्यास/कहानियों का सृजन कर चुके हैं, जिन  पर लिखने से आमतौर पर लोग हिचक जाते हैं.  एक साथ दो ,बिल्कुल विपरीत माहौल जीने का नाम है अकाल में उत्सव. एक ज़िन्दगी रामप्रसाद की और दूसरी प्रशासन की. इन दोनों परिवेशों को बखूबी जिया है पंकज ने.
                                                         कहानी शुरु होती है “सूखा पानी” नामक  गांव के परिचय के साथ. गांव का परिचय यानि गांववासियों का परिचय.  उपन्यास की कथा गांव के एक छोटे किसान रामप्रसाद, उसकी पत्नी कमला , और ज़िला प्रशासन के साथ-साथ आगे बढती है. रामप्रसाद छोटा किसान कैसे हो गया, ये विवरण इतने रोचक और सिलसिलेवार  तरीक़े  से लिखा गया है, कि पाठक को न केवल रामप्रसाद  की ज़मीन खत्म होते जाने का कारण समझ में आता जाता है, बल्कि ऐसे ही अन्य किसानों के छोटे किसान होते जाने का कारण भी समझ में आने लगता है. निरक्षरता कितना बड़ा अभिशाप है, ये भी इस उपन्यास के माध्यम से समझा जा सकता है. गांवों में आज भी नयी पीढी से ठीक पहले वाली पीढी पूरी तरह अशिक्षित/निरक्षर है. सेठ महाजन पैसा उधार दे के किस तरह ब्याज वसूल रहे, कितना चुकता हो गया, कितना बाक़ी है, ये वो आज भी महाजन का बताया/समझाया ही जान पाता है. ब्याज वसूली का जो तरीक़ा महाजन से समझा दिया वही उसके लिये अन्तिम सत्य बन जाता है.
कई स्थानों पर पंकज ऐसा लिख गये हैं, कि आंखें बरबस उस पंक्ति पर बार-बार घूमती हैं. एक जगह वे लिखते हैं-
“पिता कहीं नहीं जाता, वह अपने सबसे बड़े बेटे में समा जाता है. उसे अपने स्थान पर पिता कर देता है. तो रामप्रसाद भी जब अपनी बहनों के अरवाज़े पर सुख-दुख  में जाकर खड़ा होता था, तो वह रामप्रसाद नहीं होता था, वह होता था उन बहनों का पिता.”
पिता की सारी ज़िम्मेदारियां निभाने वाले भाई की स्थिति तो देखिये, सब करने के बाद भी श्रेय किस तरह छोटे की तरफ़ चला जाता है-
 “ रामप्रसाद तो आकर बड़े बुज़ुर्गों में बैठ जाता और कारज का सामान भागीरथ को सौंप देता कि जा बाई से पूछ कर जहां जो करना है, कर दे. रामप्रसाद उधर बैठा रहता और इधर बहन भागीरथ के गले लग कर शुकराने के आंसू उसके कंधे पर बहा देती.”
इतना सच्चा चित्रण!! पढते हुए लगता जैसे ये तो हमारा ही भोगा हुआ सच है…
उपन्यास में एक तरफ़ रामप्रसाद की व्यथा है, कर्ज़ है, दुनिया भर के ऐसे खर्चे हैं, कि बीवी के पांव की तोड़ी तक बेच के पूरे न हो पा रहे, तो दूसरी तरफ़ प्रशासन को मिलने वाले ऐसे फ़ंड हैं, जिन्हें किसी न किसी प्रकार ठिकाने लगाना ही है. लाखों की राशि किस प्रकार निचले पायदान से लेकर ऊपर तक ठिकाने लगायी जा रही है, ये पढने योग्य है. जो भी प्रशासनिक कार्यों से जुड़े हैं, या जिनका साबका इन विभागों से पड़ता रहता है वे इस उपन्यास की सच्चाई को बहुत बेहतर तरीक़े से समझ पायेंगे. और मुझे लगता है कि कभी न कभी आमजन का पल्ला इन दफ़्तरों/बाबुओं/नेताओं से पड़ता ही है.
व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए पंकज लिखते हैं-
“ सरकारी व्यवस्था शेर के शिकार करने समान होती है. जब शेर अपने शिकार से पेट भर खा लेता है, तो  बाक़ी का शिकार अपने से छोटे जानवरों , मतलब गीदड़ों आदि के लिये छोड़ देता है. गीदड़ भी जब पेट भर लेते हैं, तो फिर अपने से छोटे लकड़बग्घों, गिद्धों आदि के लिये छोड़ देते हैं. कुल मिलाकर यह कि जब ऊपर वालों का पेट भर जायेगा तब नीचे वालों का रास्ता खुलेगा. सरकारी व्यवस्था मांसाहारी प्राणियों की व्यवस्था से बहुत मिलती जुलती है.”
व्यवस्था पर इतनी बड़ी शाब्दिक चोट!!! बहुत हिम्मत चाहिए ऐसा सच लिखने के लिये. पंकज बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने पूरा उपन्यास ही ऐसे कड़वे सच के आधार पर रचा.
उपन्यास में ज़िन्दगी कभी रामप्रसाद के कच्चे,सुविधाहीन घर से गुज़रती है, तो कभी कलेक्टर के बंगले से. दोनों जगहों का माहौल उभर के सामने आता है. एक तरफ़ जहां अभाव में भी ज़िन्दगी की मिठास दिखाई दे जाती है, वहीं दूसरी तरफ़ सुख-सुविधा सम्पन्न बंगले पर रसहीन, बनावटी जीवन दिखाई देता है. ये फ़र्क़ घर और मकान के फ़र्क़ जैसा ही है. उपन्यास के श्रीराम परिहार, राकेश पांडे, मोहन राठी, रमेश चौरसिया, दिनेश रघुवंशी जैसे पात्र एकदम अपनी अगल-बगल के पात्र लगते हैं. यहां सभी नाम काल्पनिक हैं, लेकिन इन पदों पर आसीन हर व्यक्ति का चरित्र एक खांचे में फिट है, उसी खांचे को पंकज ने बखूबी उभारा है.
उपन्यास के कई हिस्से बहुत मार्मिक हैं. कई जगह आंसुओं का सैलाब उमड़ता है,. कभी आंसू बह जाते हैं, और कभी आंख, नाक और गले को नमकीन करते रहते हैं. खास तौर से कमला का तोड़ी उतार के देना और रामप्रसाद का उसे बेचने ले जाना.
“रामप्रसाद ने गमछे का एक कोना ढिबरी पर रखा और उस पर ताकत लगायी. पेंच घूम गया. पेंच के घूमते ही मानो समय का एक पूरा चक्र घूम गया, चक्र जो कमला के ब्याह  के आने से अब तक चला था. पेंच खोल कर कमला ने तोड़ी को उतारा और दोनों तोड़ियां रामप्रसाद के गमछे में लपेट दीं. गमछे में लिपटी तोड़ियों को उठाकर माथे से लगाया और कुछ देर लगाए रही, तब तक, जब तक भरभरा के रो नहीं पड़ी वो.”
कमला के साथ-साथ मैं भी भरभरा के रो पड़ी थी…
“”रामप्रसाद चुपचाप  उकड़ूं बैठा, घुटनों पर सिर रख कर तोड़ी को पिघलाये जाने की प्रक्रिया को देख रहा था. पिघलने की उस प्रक्रिया को बाहर निकलने से रोकते हुए जो उसके अन्दर घट रही थी. जैसे ही कारीगर ने तोड़ी के किनारे पर लगी चांदी के स्क्रू या ढिवरी को एक प्लास टाइप के काटने वाले औज़ार से ताकत लगा कर काटा, वैसे ही रामप्रसाद के मुंह से निकला- “निरात (आहिस्ता) से…..”
उफ़्फ़…… कोमल भावना का कैसा अद्भुत चित्रण!!! पढते हुए मन करने लगता है कारीगर के हाथ से तोड़ी छुड़ा के रामप्रसाद को दे दूं….
ये जो मैने यहां कोट किये, ये तो चंद उदाहरण हैं. पूरी किताब ऐसे ही ताने-बाने से बुनी गयी है. किसान की मनोदशा और उसकी अपनी स्थिति का अन्दाज़ा बहुत छोटे-छोटे से वाक्यों में ज़ाहिर कर देते हैं पंकज-
“बात की बात में श्रीराम परिहार उनके ठीक सामने आ के खड़े हो गये. दोनों की घिग्घी बंध गयी. जीवन भर पटवारी को  दुनिया का सबसे बड़ा अफ़सर मानने वाले किसान के सामने अगर एकदम से कलेक्टर आ के खड़ा हो जाये, तो उसकी दशा सोची जा सकती है.”
ऐसी ही बहुत छोटी छोटी बातें हैं, जो आम जीवन का अभिन्न अंग हैं , जिन्हें इस खूबी से उकेरा गया है, कि पाठक खुद इस उपन्यास के भीतर प्रविष्ठ हो जाता है, और रामप्रसाद के साथ चलने लगता है तो कभी कलेक्टर के.
 किसी भी तयशुदा  सरकारी कार्यक्रम में किस तरह और कितना बजट सुनिश्चित होता है, और वास्तविकता में यह बजट कैसे दायें-बायें हो, सारा कार्यक्रम बाहरी खर्चे पर ही संचालित कर लिया जाता है, पढ के पाठक, जिसे सरकारी महकमे के काम करने का अन्दाज़ा है, होंठों में ही मुस्कुराता है, क्योंकि उसे तो कलेक्टर के खिलाफ़ अकेले में भी खुल के मुस्कुराने की आदत नहीं है, जबकि पंकज ने सारी प्रक्रिया का कच्चा चिट्ठा खोल के रख दिया है. तमाम राज़ फ़ाश किये हैं पंकज ने. मसलन, फ़र्ज़ी किसान क्रेडिट कार्ड का मामला, मुआवज़े की रक़म का मामला और भी कई मामले जिन्हें आप खुद पढें.
  मुझे लगता है, कि यदि मैने इस पुस्तक चर्चा को समापन की ओर नहीं मोड़ा तो, धीरे-धीरे पुस्तक के सारे अंश यहीं आपको पढवा दूंगी.  उपन्यास का अन्त इतना मार्मिक और चौंकाने वाला है, कि पढ के पाठक अचानक ही यथार्थ की ज़मीन पर गिरता है. उसे समझ में आता है, कि एक किसान की आत्महत्या का कारण, केवल फ़सल का खराब हो जाना नहीं होता. उसकी मौत का ज़िम्मेदार मौसम से अधिक प्रशासन होता है.
अन्त में इतना ही कहूंगी, कि इस उपन्यास को लिखने में जितनी मेहनत पंकज ने की है, वो पूरी की पूरी हमें दिखाई देती है. एक किसान के जीवन को आत्मसात किया है पंकज ने.  जैसे पूरे सरकारी महकमे की नस नस में बहे हैं खून बन के. हर बात का इतना सजीव चित्रण है कि पढते हुए लगता है जैसे सारा कार्यकलाप पंकज देखते रहे हों, अदृश्य हो के.
 जब भी कोई कथाकार/उपन्यासकार रचना प्रक्रिया से गुज़र रहा होता है, तब वो खुद अपने पात्रों में शामिल हो जाता है. उपन्यास के सारे पात्र उसके अगल-बगल घूमते हैं. मैं निश्चित तौर पर कह सकती हूं, कि रामप्रसाद के दुख को जीते समय पंकज खुद कई बार रोये होंगे. और जब उपन्यास पूरा हुआ होगा, तब पता नहीं कितने दिनों तक पंकज खुद को अकेला, और रामप्रसाद की मौत पर ठगा हुआ महसूस करते रहे होंगे. बहुत दिनों बाद उबर पाये होंगे इस उपन्यास से. मैं आज भी “अकाल में उत्सव “ की गिरफ़्त में हूं. इसे पढने के बाद अब कुछ और पढने का मन ही नहीं हो रहा.
किसानों के साथ की गयी  पंकज की  तपस्या सफल हुई है, इस अद्भुत उपन्यास के रूप में. ये उपन्यास एक नहीं, अनेक विशिष्ट पुरस्कारों से नवाज़ा जायेगा, नवाज़ा जाना चाहिये. एक बार फिर बधाई और आशीर्वाद. लिखते रहें इसी प्रकार.
उपन्यास : अकाल में उत्सव
लेखक : पंकज सुबीर
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन,
पी.सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट
बस स्टैंड, सीहोर- 466001 (म.प्र.)
मूल्य : 150 रुपये
ISBN : 978-93-81520-29-1


रविवार, 17 जनवरी 2016

याद-ए-मकर संक्रान्ति

सर्दिया शुरु होते ही मेरे ज़ेहन में जो त्यौहार ज़ोर मारने लगता है वो है मकर संक्रान्ति. सर्दियों में आने वाला एकमात्र ऐसा बड़ा त्योहार
जिस पर हमारे घर में बड़े सबेरे नहा लेने की बाध्यता होती थी. इधर जनवरी शुरु हुई, उधर हमारे घर में सन्क्रान्ति की तैयारियां शुरु . कम से कम पांच प्रकार के लड्डुओं
 की तैयारी करनी होती थी मम्मी को. ज्वार, बाजरा, मक्का और उड़द की दाल की पूड़ियां, मूंग दाल की मंगौड़ियां, और कई तरह के नमकीन. अब सोचिये, इतना सब करने में समय लगेगा न? वो समय पैकेट बन्द तैयार आटा मिलने का नहीं था. अब तो बाज़ार जाओ और ज्वार/बाजरा/मक्का जो चाहिये, उसी का आटा एकदम तैयार, पैकेट में सील-पैक घर ले आओ.  हमारे बचपन में ये सारे आटे अनाज की शक्ल में मिलते थे, जिनसे चक्की पर जा के आटा बनवाना पड़ता था.
हमारे घर लड्डू बनाने की शुरुआत मम्मी संक्रान्ति के दो दिन पहले कर देती थीं. आटे के लड्डू, लाई के लड्डू, तिल के दो तरह के लड्डू, नारियल के लड्डू और मूंगफ़ली के लड्डू. संक्रान्ति की सुबह सारे बच्चों को रोज़ की अपेक्षा जल्दी जगा दिया जाता. सर्दियों में सुबह छह बजे उठना मायने रखता है. उठते ही सबको दूध मिलता और बारी-बारी से नहा लेने का आदेश पारित होता. आंगन में एक कटोरे में पिसी हुई तिल का उबटन रक्खा होता, जिसे पूरे शरीर पर लगा के नहाने की ताक़ीद होती. बहुत सारे लोग तो इस दिन शहर के पास बहने वाली नदी में डुबकी लगाने जाते, और इसीलिये बुन्देलखण्ड में मकर संक्रान्ति का एक और नाम “बुड़की” भी प्रचलित है. तो इतनी सुबह नहाना, वो भी ठंडे पानी से!!! नहाने में आनाकानी करने वाले को कहा जाता कि- “यदि तुमने नहीं नहाया तो तुम लंका की गधी/गधा बनोगी अगले जन्म में. “ तब तो मैं छोटी थी, सो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया कि आखिर लंका की गधी/गधा ही क्यों बनेगा कोई? लेकिन अब जरूर ये सवाल ज़ेहन में आता है तो पता करने की कोशिश भी करती हूं. लेकिन अब तक कोई सटीक जवाब नहीं मिल सका, जबकि मकर संक्रान्ति के दिन न नहाने वाले को यही कह कर डराने का चलन आज भी है.

तो भाई, सारे बच्चे नहा-धो के तैयार हो जाते. जो बच्चा नहा के निकलता, मम्मी उसके हाथ-पैरों में सरसों के तेल की हल्की मालिश करतीं, अच्छे कपड़े पहनातीं और कमरे में जल रही  गोरसी (  सर्दियों में आग जलाने के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला मिट्टी का चौड़ा पात्र,  जिसमें हवन भी किया जाता है) के सामने बिठाती जातीं. जब सबने नहा लिया तो हम सब पूजाघर में इकट्ठे होते. यहां भगवान पर फूल चढाते, पहले से जल रहे छोटे से हवन कुंड में तिल-गुड़ के मिक्स्चर से हवन करते और वहीं बड़े से भगौने में रखी कच्ची खिचड़ी ( दाल-चावल का मिश्रण) पांच-पांच मुट्ठी भर, थाली में निकाल देते. काले तिल के लड्डू भी पांच-पांच की संख्या में ही निकालते. ये अनाज और लड्डू, गरीबों को दिया जाने वाला था.
इसके बाद हम सब फिर गोरसी को घेर के बैठ जाते और फिर शुरु होती पेट-पूजा. मम्मी सुबह हरे पत्तों वाली प्याज़ की मुंगौड़ियां  बनातीं और थाली में भर के बीच में रख देतीं. हम सब बच्चे मिल के उस पर हाथ साफ़ करते जाते. उड़द/ज्वार और मक्के की पूड़ियां भी सुबह ही बनतीं. दोपहर के खाने में केवल खिचड़ी बनती. ये खिचड़ी भी नये चावल से बनाई जाती. खिचड़ी खाने के विधान के चलते ही इस त्यौहार का नाम “खिचड़ी” भी है बुन्देलखंड में.  शाम को फिर मूंग की मुंगौड़ी, पूड़ियां, तरह-तरह के लड्डू और शक्कर के घोड़े/हाथी, जो बाज़ार से खरीदे जाते. गन्ने भी पूरे बाज़ार में बेचने के लिये लाये जाते. तो ये है बुन्देलख्न्ड की मकर संक्रान्ति… कृषि-प्रधान देश का कृषि आधारित साल का पहला त्यौहार.  देश के तमाम हिस्सों में इस दिन पतंगबाज़ी का भी रिवाज़ है. खासतौर से गुजरात और राजस्थान में.
ये एकमात्र ऐसा त्यौहार है जिसे अलग-अलग प्रदेशों में, अलग-अलग  नामों से जाना जाता है. मकर संक्रान्ति, पंजाब और हरियाणा में “लोहिड़ी”  के नाम से मनाई जाती है तो असम में यही “बिहू” हो जाती है. वहीं दक्षिण भारत में इसे “पोंगल” के नाम से मनाते हैं. दक्षिण में यह त्यौहार चार दिन तक मनाया जाता है. तिल-चावल और दाल की खिचड़ी

के अलावा यहां “पायसम” जो कि नये चावल और दूध से बनी विशेष प्रकार की खीर को कहा जाता है, भी बनाते हैं.
मकर संक्रान्ति के दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनिदेव से स्वयं मिलने आते हैं. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिये इस त्यौहार को “मकर संक्रान्ति” के नाम से जाना गया. महाभारत में भीष्म पितामह ने शरीर त्यागने के लिये, मकर संक्रान्ति का दिन ही चुना था. तो तमाम पौराणिक/भौगोलिक/ और पर्यावरणीय महत्व वाले इस त्यौहार को आइये मनाते हैं पूरे रीति-रिवाज़ के साथ, क्योंकि इस की हर रीति में छुपा है आयुर्वेद का कोई न कोई राज़… आप सबको मकर संक्रान्ति की अनन्त शुभकामनाएं.


शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

तमाम औरतों की पीड़ा है –“जानो तो गाथा है”

जानो तो गाथा है…….. पुष्पा दी का ये उपन्यास जब हाथ में आया तो बहुत देर तक मैं इस शीर्षक को ही देखती रह गयी.. कई बार पढा. हर बार इस शीर्षक ने नया अर्थ दिया, नये भाव पैदा किये और नये सिरे से पढने को उद्वेलित किया. बहुत कम ऐसे शीर्षक होते हैं, जो बरबस पाठक को अपनी ओर खींचते हैं.  “जानो तो गाथा है” ऐसा ही करिश्माई शीर्षक है.
 “रुदादे इश्क/बेदादे शादी” की मेरे द्वारा की गयी समीक्षा पढने के बाद पुष्पा दी ने मेल किया. “ वंदना, तुम्हारी समीक्षा पढ के उम्मीद बंधी है, कि तुम निष्पक्ष समीक्षा करोगी.”  मेरे लिये ये बहुत बड़ा कॉम्प्लिमेंट था. किताब मुझे मई के पहले हफ़्ते  में ही मिल गयी थी. लेकिन इस किताब के पहले भी कुछ किताबें पहुंच चुकी थीं, जिन पर मुझे अनिवार्य रूप से लिखना था.  सो, इस किताब पर लिखना पिछड़ता गया.
मौसी….ज्ञानो…यानि ज्ञानवती पांडे. जी हां यही हैं इस उपन्यास की केन्द्रीय पात्र. ’जानो तो गाथा है’ पांडे परिवार की ऐसी गाथा है, जिसमें तीन पीढियों के दर्शन होते हैं, लेकिन मुख्यतया एक ही पीढी की जीवन शैली पाठकों तक अपने समग्र रूप में पहुंचती है. ये वो पीढी है, जिसमें ज्ञानो मौसी बड़ी हुईं, ब्याही गयीं, और फिर मौसी के अपने जीवन के तमाम रंग इस घर की चहारदीवार में बेरंग होते गये. पाठक पूरे समय लेखिका के साथ-साथ इस घर के कोने-कोने का दर्शन करते चलते हैं. घर और उसमें रहने वालों का चित्रण पुष्पा जी ने इतनी बारीक़ी से किया है, कि कई बार लगता है- यदि इनमें से कोई भी सामने आ जाये तो तुरन्त पहचान लिया जाये. बहुत जीवंत चित्रण है, पात्रों का. वैसे भी इस उपन्यास में वर्णित तमाम पात्र केवल पात्र नहीं लगते, बल्कि हमारे परिवार का हिस्सा सा बन जाते हैं.
उपन्यास की ख़ासियत है इसका स्त्री प्रधान होना. एक ही समय में कई स्त्रियों के जीवन और उनके अन्तर्मन की सूक्ष्म निरीक्षण पुष्पा जी ने किया है. ज्ञानो मौसी का व्यक्तित्व चमत्कारी है. वे परम्पावादी हैं, लेकिन रूढिवादी नहीं. तमाम वर्जनाओं का उपहास उड़ाते हुए उनके वाक्य पूरे उपन्यास में जहां-तहां बिखरे पड़े हैं. औरत के लिये बनाये गये थोथे नियमों की वे उस काल विशेष में भी भर्त्सना करती दिखाई देतीं हैं, जिस काल विशेष में औरत परम्पराओं को ले के भीरू हुआ करती थी. विपरीत परिस्थितियों ने मौसी को भीरू नहीं, बल्कि रूढि विरोधी बना दिया. घर में हर तरह की सुख सुविधाप्राप्त मौसी अन्तिम क्षण तक पति प्रेम के लिये तरसती रहीं. एक हूक ले के वे इस संसार से विदा हुईं. यानि प्रेम की कोई उम्र नहीं होती. जिसे प्रेम मिलता है, वो चिर प्रेमी बना रहता है, और जिसे नहीं मिलता, उसकी प्रेम पाने की आकांक्षा चिर युवा रहती है.
उपन्यास में केवल ज्ञानो-कथा नहीं है. ज्ञानो के समानान्तर कई अन्य महिलाओं की व्यथा भी पुष्पा जी ने बहुत खूबी से उकेरी है. एक प्रकार से इस उपन्यास को एक ऐसा उपन्यास माना जाना चाहिये , जिसमें कई पीढियों की महिलाओं की लगभग एक जैसी व्यथाएं सामने आई हैं.  यानि समय बदला है, महिलाओं की व्यथा नहीं बदली…. एक स्थान पर पुष्पा जी लिखती हैं-
खुले मैदान में बैठी ढेर सी दुखी चेहरों वाली औरतें, बिन्दी, सिन्दूर लगाये कहती हुई दिखती हैं- “ कुछ नहीं बदला….कुछ भी नहीं बदला कपड़ों के सिवा, हम वैसी की वैसी हैं.”
उपन्यास में, ज्ञानो मौसी, रामा नानी, अजिया, बत्तो, दिदिया, जैसे अनेक नारी पात्र हैं, जिनकी व्यथा तो उन की अपनी है, लेकिन लगती तमाम औरतों की है. रामा नानी की व्यथा देखें-
’रामा नानी ने एक बार ससुराल छोड़ दी तो वहां झांकने नहीं गईं. थूक गुटक गुटककर वे अपने मन को ही गुटकती रहीं.”
’बप्पा की तीसरी पत्नी थी अजिया. ब्याह होते ही कौमार्य और कोखमयता के बीच खड़ी रति-आतुर नव यौवना यक ब यक सात बच्चों की मां कहलाने लगी. अजिया कहतीं- "औरत की ज़िन्दगी लिये गंगा बहती है. मां बाप की गंगोत्री से निकल कर ससुराल के संगम में पीढियों को समेटे. ये बच्चे जिस मां की कोख के स्नेह से उपजे हैं, मैं उस कोख को अपना चुकी हूं. इन बच्चों की ज़िन्दगी में मेरे स्नेह जल की कभी कमी नहीं होगी.”
उपन्यास की कथा, कानपुर के कर्मकांडी कान्यकुब्ज परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है. कान्यकुब्ज ब्राह्मणों  की तमाम मर्यादाएं/वर्जनाएं खूब विस्तार से लिखी गयी हैं.
“कान्यकुब्ज ब्राह्मण वंश का इतिहास रटाना नाना की दिनचर्या में शामिल था. नाना बड़े गर्व से बताते कि हमारे परनाना रामेश्वर दत्त कठोर कर्मकान्डी ब्राह्मण थे. “
जैसे तमाम वाक्य  उस समय के ब्राह्मणवाद को पुष्ट करते हैं, जिस काल विशेष का खाका कथा में खींचा गया है.
उपन्यास अपनी रोचकता के साथ-साथ कहीं-कहीं व्यक्ति या परिवार विशेष की जानकारी देते हुए जब विस्तार पा जाता है, तो  बोझिल हो जाता है. पात्रों की अधिकता भी पाठकों को संशय में डालती है. इस उपन्यास में इतने पात्र हैं, कि सब आपस में गड्ड-मड्ड होने लगते हैं. पात्रों की अधिकता पाठक को उलझाती है. किसी अन्य पात्र की कथा के बाद मौसी का ज़िक्र आता है तो हर बार पात्रों और उनके रिश्ते को जानने के लिये आगे के पन्ने पलटने पड़ते हैं. जबकि मुझे लगता है कि पुष्पा जी चाहें, तो अपने हर नारी पात्र पर एक अलग उपन्यास लिख सकती हैं.
पुष्पा जी की लेखनी सशक्त है. वे इस उपन्यास के ज़रिये लेखन की जिस ऊंचाई को छूती हैं, उसे आज के कथाकार तमाम कोशिशों के बाद भी नहीं छू पाते.  उपन्यास का अधिकान्श भाग, अवधी/कनपुरिया आंचलिक बोली में लिखा गया है. आंचलिक भाषा हमेशा कथा को न केवल विश्वसनीय बनाती है, बल्कि उपन्यास के माध्यम से बोली को ज़िन्दा भी रखती है. अन्य स्थानों पर बोली का प्रचार-प्रसार भी किसी उपन्यास/कहानी  के माध्यम से बेहतर तरीक़े से होता है. उपन्यास न केवल  रोचक है, बल्कि स्त्रियों की ऐसी तक़्लीफ़ों को उजागर करता है जिस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता. सब भाग्य की बात मान लेने के कारण औरत का दुख कितना निजी हो जाता है, ये इस उपन्यास में बखूबी उभर कर आया है. सन २००१ में , आधार प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास के फ़्लैप पर साहित्यविद नरेश मेहता ने विशेष टिप्पणी की है. ३०० पृष्ठ के इस उपन्यास की कीमत २५० रुपये है. उपन्यास बेहद रोचक है, इसे अवश्य पढा जाना चाहिये.
उपन्यास: जानो तो गाथा है
लेखिका: पुष्पा तिवारी
प्रकाशक: आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, एस.सी.एफ़. 267, सेक्टर-16
पंचकूला- 134113
मूल्य: 250/
ISBN: 81-7675-039-5


शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

औरत से “व्यक्तित्व” में तब्दील होने की कथा है: कांच के शामियाने

कुछ संयोग यादगार होते हैं. रश्मि की किताब को सबसे पहले बुक करने और फिर उस किताब का सबसे पहले मुझे ही मिलने का संयोग भी ऐसे यादगार संयोगों में से एक है. “कांच के शामियाने” मेरे हाथों में सबसे पहले आई, लेकिन पढी सबसे पहले मेरी सास जी ने. उसके बाद  कुछ ऐसा सिलसिला चल निकला कि चाहने के बाद भी  किताब पर अपनी टिप्पणी लिखने का मौका टलता गया. इधर निवेदिता (निवेदिता श्रीवास्तव), रंजू (रंजू भाटिया), वंदना जी(वंदना गुप्ता) और साधना जी(साधना वैद) इस पुस्तक के बारे में लिख चुकी थीं. अब तो गिल्ट के मारे मेरी डूब मरने जैसी स्थिति हो रही थी. लगा, रश्मि क्या सोचती होगी!! पहले तो बड़ा हल्ला मचाये थी,- कब छपवाओगी? क्यों नहीं छपवा रहीं? कब तक आयेगी? और जब आ गयी तो चुप्पी साध गयी. खैर… देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज़ पर मैने अब “कांच के शामियाने” अपने साथ रखनी शुरु की. स्कूल जाती तो किताब हाथ में होती. नतीजा ये हुआ, कि अगले दो दिनों में ही उपन्यास पढ डाला.  दोबारा पढना कहूंगी क्योंकि इस उपन्यास को हम रश्मि के ब्लॉग  पर पहले ही पढ चुके हैं. बल्कि यूं कहूं, कि इस उपन्यास की रचना प्रक्रिया की  कई बार हिस्सेदार भी बनी. तो “कांच के शामियाने” से अलग सा ज्जुड़ाव होना लाज़िमी था.
“कांच के शामियाने” कहानी है एक ऐसी लड़की की, जिसने बेहद लाड़ प्यार के बाद असीमित धिक्कार पाया. यानि दोनों ही अपरिमित. उपन्यास की केन्द्र जया की व्यथा-कथा है ये. एक ऐसी व्यथा-कथा, जिसे पढते हुए कई जयाएं अनायास आंखों के सामने घूम जाती हैं. आये दिन खाना बनाते हुए जल के मरने वाली बहुओं की तस्वीरें सामने नाचने लगती हैं. कुछ ऐसी महिलाएं याद आने लगती हैं, जिनके बच्चे किशोर हो रहे हैं, तब भी पति महोदय जब तब पिटाई का शौक़ पूरा करते हैं, उन पर हाथ आजमा के.
पढते-पढते कई बार जया पर गुस्सा आता है. क्यों की उसने शादी? क्यों नहीं उसके प्रस्ताव को टके सा फेर दिया? क्यों सही उसकी मार? हाथ पकड़ के दो थप्पड़ क्यों न लगा दिये? जानते हैं, ऐसे सवाल मन में कब आते हैं? तब, जब आप पात्र के साथ पूरी तरह जुड़ जाते हैं. हाथ में पकड़े उपन्यास के साथ-साथ चलने लगते हैं और यही किसी भी कहानी या उपन्यास की सबसे बड़ी सफलता है कि पाठक उस के साथ ऐसा जुड़ाव महसूस करे कि पात्र की कमियों पर उन्हें गुस्सा आने लगे तो खूबियों पर प्यार. पढते-पढते मन सोचता है कि- “काश! मैं वहां होती तो जया के साथ कोई दुर्व्यवहार न होने देती” कितना बड़ा जुड़ाव है ये पात्र के साथ!! लेखिका कमरे में जया को बाद में ले जाती है, पाठक पहले ही दहशत में भर जाता है कि पता नहीं अब कौन सा गुल खिलायेगा राजीव…
जया के साथ पाठक का इस क़दर जुड़ाव हो जाता है कि घर में उसकी तरफ़दारी करने वालों के प्रति भी मन में प्यार उपजने लगता है. मैने तो कई बार काकी और संजीव को धन्यवाद दिया. मैं निश्चित तौर पर कह सकती हूं, कि यही भाव तमाम अन्य पाठक/पाठिकाओं के मन में भी आया होगा.
उपन्यास में जया को जिस क़दर रश्मि ने जिया है, उससे लगता ही नहीं कि ये तक़लीफ़ किसी पात्र की है.. लिखते हुए जैसे रश्मि , जया में तब्दील हो गयी… पूरी तरह से रश्मि ने जया को जिया है, ये एक-एक शब्द, हर एक घटना की सजीवता से ज़ाहिर होता है. जया की छोटी-छोटी सी चिंहुक, उसकी दहशत पाठक के भीतर भी उतारने में सफल हुई है रश्मि.
पढते हुए शायद ही किसी के मन में आये कि- हुंह, राजीव जैसे पात्र भी होते हैं कहीं! होते हैं. तमाम राजीव समाज में बिखरे पड़े हैं. ऐसे राजीवों की वजह से ही औरतों की दुर्दशा है. खासतौर से उन औरतों की , जो जया की तरह आत्मनिर्भर नहीं हैं.  जिनमें प्रतिकार का हौसला कम और बर्दाश्त करने की क्षमता ज़्यादा है.
“रोज़ रात में मां की नसीहतें सुन सुन के उसका दिमाग़ भन्ना जाता. स्त्री जाति में जन्म क्या ले लिया, अपने जीवन पर अपना ही कोई अधिकार नहीं. हमेशा उसके फ़ैसले दूसरे ही लेंगे और उसे मन से या बेमन से मानना ही पड़ेगा. अगर मां ही साथ नहीं देगी तो वो क्या करे आखिर?”
इस स्वगत कथन में औरत का कितना बड़ा दर्द छुपा है. कुछ न कर पाने की बेबसी, अपनी ही मां के लिये परायेपन का अहसास..
उपन्यास पढते हुए बार-बार खुद से वादा करती रही- तमाम लड़कियों को नौकरी करने के बाद ही शादी करने की सलाह दूंगी, ताकि किसी को जया जैसी विवशता से दो-चार न होना पड़े.
“जब किसी का घर जलता है, तो जलते हुए घर पर प्रतिक्रिया देना सबको सहज लगता है, पर स्त्री की हिम्मत ग्राह्य नहीं होती. लोग स्त्री को अबला रूप में ही चाहते हैं. रोती-गिड़गिड़ाती औरत ताकि वे सहानुभूति जता सकें. उस पर बेचारी का लेबल लगा सकें.”
सचमुच. समाज का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी औरत को अबला के रूप में ही देखना चाहता है. तमाम कामकाजी महिलाओं को भी उनके पति और परिवार पति से कमतर ही मानना चाहते हैं.
“अब पति की बात तो माननी ही पड़ती है. आखिर उसी का खाते-पहनते हैं. कभी हाथ उठा दिया, घर से निकलने को कह दिया तो क्या. वे लोग गरम खून वाले होते हैं. पति के सामने हमेशा झुक के रहने में ही भलाई है.”
आज भी घर से विदा होती बेटी को मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी यही सीख दे के भेजते हैं कि वो ससुराल में झुक के रहे. यही झुकने का नतीजा भोगा जया ने.
उपन्यास के अन्त में जया का विद्रोह कलेजे को ठंडक दे गया. और ये सही भी है. औरत के सहते जाने का मतलब उसका कमज़ोर होना नहीं है. औरत अपने ऊपर जुल्म सह सकती है लेकिन बच्चों पर अत्याचार उसकी बर्दाश्त से बाहर का काम है और जया का विद्रोह भी बच्चों की खातिर ही सामने आया. जया की सफलता सम्पूर्ण स्त्री जाति की सफलता की द्योतक है. संदेश है औरतज़ात को, कि सीमा से ज़्यादा बर्दाश्त मत करो. बल्कि मैं तो कहूंगी कि गलत बातों को, किसी के ग़लत रवैये को कभी बर्दाश्त ही मत करो. एक शानदार उपन्यास के लिये रश्मि को बधाई. उपन्यास में कथ्य और शिल्प दोनों ही मजबूत हैं. क्षेत्रीय बोली का पुट उपन्यास को ज़्यादा सजीव और विश्वसनीय बनाता है. सम्वाद पात्रों  के अनुकूल है. कहीं –कहीं प्रूफ़ की ग़लतियां हैं, जो उपन्यास के प्रवाह के चलते क्षम्य हैं. उपन्यास पाठक को बांधे रखता है.
 हिन्दयुग्म से प्रकाशित इस उपन्यास “कांच के शामियाने”  की कीमत १४० रुपये है. पुस्तक ऑनलाइन बिक्री के लिये “इन्फ़ीबीम” और “अमेज़न” पर उपलब्ध है.

पुस्तक : कांच के शामियाने
लेखिका: रश्मि रविजा
प्रकाशक: हिन्द-युग्म
1, जिया सराय, हौज खास,
नई दिल्ली-110016
मूल्य: 140/
ISBN:978-93-84419-19-6



सोमवार, 21 सितंबर 2015

मंज़िल की जुस्तज़ू में मेरा कारवां तो है....


लिखना जब किसी अजनबी के बारे में हो, तो ज़्यादा आसान होता है, लेकिन लिखना अगर अपने/अपनी दोस्त पर हो तो इससे मुश्किल काम शायद ही कोई और हो. कारण- हम सारी बातें निष्पक्ष भाव से लिखेंगे, और पाठक समझेंगे कि दोस्ती निभा रहे सो जबरिया तारीफ़ें कर रहे.....  मने दोस्त की तारीफ़ करो तो मुश्किल, न करो तो मुश्किल!! नहीं करने पर भी गालियां पड़ेंगी- कि देखो, बड़ी दोस्त बनी फ़िरती थी, अब निकल गयी सब दोस्ती ... हमारे बारे में सब जानते हैं , कि जब भी हमने दोस्तों के लिखे हुए पर लिखा है- पंच परमेश्वर हमारे सिर पर हमेशा सवार हुए हैं  जहां मामला खिंचाई का बना, जम के खेंचा है और जहां तारीफ़ की बात बनी, वहां बिना ये ध्यान में लाये कि लेखक अपन का मित्र है, जम के तारीफ़  भी कर दी. इत्ता लिखने का सार ये, कि कोई भी हमारी पोस्ट पर पक्षपाती होने का आरोप न लगाये  

हमारी मुलाक़ात ब्लॉग के ज़रिये हुई. दोनों कहानी लिखने वाले सो विचार  जल्दी ही मेल खा गये. एक दूसरे की पोस्ट्स पर कमेंट करते हुए हम जीमेल के चैट बॉक्स में भी बतियाने लगे. फ़िर फोन नम्बर का आदान-प्रदान हुआ और हम  देर-देर तक दुनिया जहान की चिंताएं, लेखन की चिंताएं, सामाजिक चिंताएं सब फोन पर व्यक्त करने लगे. रश्मि कोई नयी कहानी लिखती, तो तुरन्त मेल करती- "यार देख के बताओ न, ठीक है या नहीं?" और हम गुरु गम्भीर टाइप एक्टिंग करते हुए उस कहानी को पास कर देते पूरे नम्बरों से  . 
ब्लॉगिंग के उन सुनहरे दिनों में हमने खूब लिखा. धड़ाधड़ लिखा. रश्मि की भी तमाम कहानियां छा गयीं. रश्मि ने तो बताया भी, कि सालों से बंद पड़ा लेखन अब ब्लॉग के बहाने फ़िर शुरु हो गया है.
रश्मि ने २००९  में अपनी कहानियों का ब्लॉग " मन का पाखी" और २०१० में एक और ब्लॉग " अपनी उनकी सबकी बात" बनाया और दोनों ब्लॉग्स पर नियमित लिखती रही. इधर उसका लेखन थोड़ा बाधित हुआ है, सो लम्बे समय से कोई कहानी "मन का पाखी" को नहीं मिल सकी. उम्मीद है रश्मि जल्दी ही कोई कहानी पोस्ट करेगी   रश्मि के कथा लेखन पर एक नज़र डालें तो ज़रा- सितम्बर २००९ को शुरु किये गये  अपने ब्लॉग " मन का पाखी" में रश्मि ने जिन कहानियों/ लघु उपन्यासों को पोस्ट किया उनका विवरण जान लीजिये- 
  २३ सितम्बर- २००९- कशमकश
  ८ जनवरी -२०१० लघु उपन्यास- और वो चला गया बिना मुड़े ६ भाग
  ११ फ़रवरी- होंठो से आंखों तक का सफ़र - कहानी
  ५ मार्च - से १३ मई आयम स्टिल विथ यू शचि लघु उपन्यास  भाग
   १७ जून से  ८ अगस्त तक - आंखों में छुपी झुर्रियों की दास्तान-  १४ भाग लघु उपन्यास
   ३१ अगस्त- आंखों का अनकहा सच- कहानी
   २१ सितम्बर - पराग तुम भी कहानी 
   २६ अक्टूबर- ३ नवम्बर चुभन टूटते सपनों के किरचों की ३ भाग
   २४ दिसम्बर-  बखिये से रिश्ते  २ भाग
   १० अप्रेल २०११-आखिर कब तक- कहानी
   १० अगस्त २०११- ३० अगस्त २०११ - हाथों की लकीरों सी उलझी जिन्दगी -चार भाग
   १७ जनवरी २०१२ - बंद दरवाज़ों का सच- दो भाग
     १६ अगस्त २०१३ -दुख सबके मश्तरक हैं पर हौसले जुदा कहानी
     ६ अक्टूबर २०१३ - खामोश इल्तिजा
   २२ जुलाई २०१३- अन्जानी राहें- कहानी 
     १८ मई २०१४ -   बदलता वक्त- कहानी


"अब जबकि रश्मि का उपन्यास " कांच के शामियाने" जल्दी ही प्रकाशित हो के हम सबके बीच होगा, तो ऐसे में उसके उपन्यास पर मैं न लिखूं , ऐसा कैसे हो सकता है न? तो भैया/बहनो , हम तो लिखेंगे ही, आप सबने इस उपन्यास की बुकिंग की या नहीं?? नहीं की तो फ़ेसबुक पर रश्मि के पेज़ पर लिंक दिया गया है, फ़टाक देना बुक कर ली जाये, ताकि जब हम इस उपन्यास के बारे में लिखें, तो आप सब भी अपनी-अपनी राय व्यक्त कर सकें :)" 
अभी के लिये इतना ही, मिलते हैं रश्मि के बारे में कुछ और जानकारियां ले के जल्दी ही :)