बुधवार, 16 मार्च 2011

"बेवकूफ़ी जो यादगार बन गयी......"

बेवकूफ़ी इंसान का स्थायी भाव होता है, जबकि समझदार उसे, कोशिश करके बनना पड़ता है :( सब अपनी बुद्धिमानी की चर्चा तो खूब करते हैं, लेकिन बेवकूफ़ियां छुपा लेते हैं , ठीक उसी तरह, जैसे सड़क पर गिरने के बाद गिरने वाला चारों ओर देखता है कि उसे किसी ने गिरते हुए देखा तो नहीं? दर्द तो घर जा के ही महसूस होता है, ऐसे ही बेवकूफ़ी करने के बाद पहली कोशिश उसे छुपाने की होती है :) लेकिन होली के बहाने हमने ब्लॉग जगत के धुरंधरों से कुछ छूट लेने की कोशिश की, अब होली है तो बुरा मानने की गुंजाइश भी नहीं है. तो बस " बुरा न मानो होली है" के नारे को बुलन्द करते हुए हमने इन धुरंधरों की उन यादों को साझा कर रहे हैं, जिन्हें ये अभी तक छुपाये बैठे थे. जिस क्रम में हमें अनुभव मिले हैं, हम उन्हें बिना किसी काट-छांट के यहां पेश कर रहे हैं. स्थानाभाव के कारण इस परिचर्चा को दो भागों में पोस्ट करना पड़ेगा, ऐसा करने का मन नहीं था लेकिन क्या करूं?

मैं मूर्ख हूं- अविनाश वाचस्‍पति

वैसे तो सभी कहीं न कहीं जिंदगी में कभी न कभी वेबकूफी कर बैठते हैं। कुछ मान लेते हैं पर अधिकांश इसे स्‍वीकार नहीं करते हैं। पर जब से वेब का वर्चस्‍व बढ़ा है। स्‍वीकार करने के भी अपने लाभ हैं। अप्रैल फूल के दिन अक्‍सर वेबकूफ बनाया जाता है, लोग बनते भी हैं, मानते भी हैं और हिचकिचाते भी हैं। पर अप्रैल की एक तारीख तो छोडि़ए,अप्रैल का महीना भी नहीं रहा है। पिछले बरस दिसम्‍बर 9 को मैं अपने बैंक खाते से एटीएम के जरिए पांच हजार रुपये निकालने गया। आईडीबीआई बैंक का एटीम था, मैंने आईसीआईसीआई बैंक के कार्ड से रुपये निकालने के लिए कार्ड इन्‍सर्ट किया। पिन डाला और 5000 दर्ज करके, कंटीन्‍यू का बटन दबाया और रिसीप्‍ट के लिए भी यस पर क्लिक कर दिया।मैं एकदम चौकस, कि मशीन अपना मुंह खोलकर रुपये दिखलाये और मैं तुरंत लपक लूं। मैंने कोई कोताही नहीं की और रुपये लपक लिए और जब तक रिसीप्‍ट मिलती, तब तक रुपये गिन भी लिए, पूरे थे। जेब के हवाले किए। फिर मैंने स्‍टेटमेंट पाने के लिए बटन दबाया लेकिन मशीन ने चैट करते हुए बतलाया कि आप इसके लिए अधिकृत नहीं हैं। मैं हैरान कि मेरा ही खाता है और मैं ही अधिकृत नहीं हूं। मेरा माथा ठनक गया। न होली का मौसम है, न अप्रैल का महीना आसपास है। फिर एटीएम कार्ड बाहर निकाला तो देखते ही मुझे अहसास हो गया कि मैं वेबकूफ हूं। वेब से जुड़कर मैंने वेबकूफी की है। मैंने अपने आईसीआईसीआई क्रेडिट कार्ड से कैश निकाल लिया था। फिर कस्‍टमर केयर पर संपर्क किया, उन्‍होंने कहा कि कैश निकासी चार्ज, ट्रांजेक्‍शन चार्ज और इंटरेस्‍ट (जब तक आप कैश वापिस जमा नहीं करवायेंगे, लगेगा)। मैंने तुरंत कैश जमा करवाने के लिए कोशिश शुरू कर दीं परंतु मेरा दुर्भाग्‍य जिस शाखा पर रुपये वापिस जमा करवाने गया, वो पांच बजे शाम तक कैश लेती है। खैर ... दस दिसम्‍बर की सुबह वापिस जमा करवा दिए। अब सोच लिया है कि सतर्क रहूंगा। प्रत्‍येक कार्ड का पिन नंबर अलग रखूंगा। चाहे भूल जाऊं और फिर दोबारा से वेबकूफ बन जाऊं। वेब का जमाना है, कूफ नहीं कुल्‍फी माना है। लगभग 500 रुपये का खून हो गया। मैं तो खून ही कहूंगा, मेरी मेहनत की कमाई, मेरे सामने ही लुट गई। पर इस बार उम्‍मीद है कि वंदना जी संभवत: कृपा करके इस वेबकूफी की भरपाई इस तुरंता वेबकूफियाना पोस्‍ट पर 500 रुपये पारिश्रमिक भेज देंगी। नहीं भेजेंगी तो फिर से एक बार वेबकूफ बनने के लिए तैयार हूं जबकि पारिश्रमिक न मिलना तय है और मैं उसमें संभावनाएं तलाश रहा हूं तो यह हुई दूसरी वेबकूफी और अभी तो होली आने में 5 दिन शेष हैं। हो सकता है एक दो बार और यह अवसर मिल जाए। बहरहाल ....जल्‍दियाना पोस्‍ट में इतना ही। बाकी टिप्‍पणी में लिख मारेंगे, रंग भरे गुब्‍बारे की तरह, जब पोस्‍ट प्रकाशित हो जाएगी। होली खैर ....लेकिन यह भी सच है कि जितनी भी सावधानी बरत लूं, जितना भी सतर्क हो लूं, जिस दिन दोबारा वेबकूफ बनना तय होगा, बच नहीं सकूंगा।

"वो गुब्बारे की तकिया.." यशवंत माथुर
बातज्यादा पुरानी नहीं है यही लगभग दो साल पुरानी है जब मैं मेरठ में था.रिटेल सेक्टर की नौकरी ही ऐसी होती है कि त्योहारों पर छुट्टी मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा होता है आखिर त्योहारों पर कस्टमर्स की जेब काटने के लिए कोई तो कसाई चाहिए ही न .तो भई होली के रंग से पहले वाले दिन रात को १०-११ बजे स्टोर बंद करवाकर जब रूम पर पहुंचे तो बाकी के तीन मित्र पहले ही आ चुके थे और हम यह देख कर आश्चर्यचकित रह गए कि हमारा जान से प्यारा बिस्तरा कमरे सहित साफ़ सुथरा करके हमारे मित्रों ने चमका रखा था और जिस तकिये को लेकर हम चारों आपस में लड़ते थे वो तकिया शान से मेरे सिरहाने चद्दर के नीचे था.मैं मन ही मन खुश भी था और चकित भी ....शायद होली पर दुष्ट मित्रों का ह्रदय परिवर्तन हो गया हो ....तकिये के बगैर मुझे नींद नहीं आती और स्टोर से आने के बाद सीधे लेटने को जी करता था सो दो चार
बातें करके मैं लेट गया और कब नींद लग गयी पता ही नहीं चला ........सोते सोते अचानक मेरा सर तख़्त से टकराया और मुझे लगा मेरा सर फट गया क्योंकि एक तेज धार ने मेरे चेहरे को भिगो दिया था.......घडी में भोर के चार बजे थे ...और मेरे बाकी मित्र जोर जोर से हंस रहे थे.मैं अभी भी कुछ समझ नहीं पा रहा था कि क्या हुआ ......पर तभी यह अहसास हुआ कि जिसे मैं तकिया समझ कर सर से लगा कर सो रहा था वो दरअसल नयी तरह का गुब्बारा था .....जिसने मुझे मेरे बिस्तर सहित भिगो दिया था.....मेरे दुष्ट मित्रों का यह तरीका था होली खेलने का ......उसके बाद तो सुबह उस वक़्त से दोपहर १ बजे तक हम लोग नौन स्टॉप होली खेलते रहे .४ बजे फिर स्टोर में रिपोर्ट भी करना था.
यह मेरी बेवकूफी ही थी कि थके होने के कारण मैं उस असामान्य से तकिये को पहचान न सका.
आप सभी को होली
की शुभ कामनाएं!

"मंहगा पड़ा जासूस बनने का शौक"- देवेन्द्र पांडे

जिंगी की बसे बड़ी बेवकूफी ! कठिन प्रश्न है। एक हो तो बताऊँ ! पूरी जिंदगी बेवकूफियों के अंबार पर ही तो है। आनंद की य़ादें में मैने इसका उल्लेख किया है। वे बचपन के दिन थे जब हमें जासूसी किताबें पढ़कर जासूस बनने का शौक चर्राया था। लिंक दे रहा हूँ खुद ही
पढ़ लीजिए कि कैसे मरते-मरते बचा था ! http://aanand-ki-yadein.blogspot.com/2010/11/23.html अभी इतना ही। कल
और याद आया तो जरूर लिखूंगा। वैसे आपका यह प्रयास काबिले तारीफ है। पढ़ने की उत्सुकुता बनी रहेगी। होली की ढेर सारी शुभकामनाएँ..
"होली का हो हल्ला"....टी. एस. दराल
गुलाब , मोतिया , चन्दन , केसर
रंग टेसू पलाश फूलों से लेकर ,


हम पहुँच गए सपत्नीक मोहल्ले में
फिर रंग जमाया भांग के हो हल्ले में


गुप्ता , शर्मा, वर्मा जी को रंगों में नहलाए
रसगुल्ले , गुलाबजामुन , गुज्जियाँ खूब उडाए

रंग बिरंगी भीड़ में फिर , पत्नी को टटोला
वो पत्नी सी लगी तो , हाथ पकड़कर बोला

अज़ी अब चलिए भी , बहुत हो गई होली
वो भी मारे ख़ुशी ख़ुशी , संग हमारे होली

घर जाकर प्रेमपूर्वक , जब उनका रंग छुड़ाया
बिन भांग चढ़ाये फिर, सर अपना चकराया

हम ये कैसा गड़बड़ घोटाला कर आए थे
पत्नी की बदले पड़ोसन को पकड़ लाए थे

अपनी तो मद-मस्त थी , मर्दों की टोली
पर समझ आया , वो क्यों संग होली

मांफी मांग हमने फिर , भाभी जी की चाय बनाई
तभी द्वार पर धर्मपत्नी की , कड़क आवाज़ दी सुनाई

हमने कहा भाग्यवान , एक अनहोनी हो गई है
वो बोली पता है जी , शर्मा जी की पत्नी खो गई है

पत्नी वियोग में शर्मा जी, बहुत घबराए हैं
१०० नंबर पर रिपोर्ट लिखाने , यहीं आए हैं

यह सुनकर अपने हाथ पैर, पत्थर से जकड़े गए
रंग उतारकर भी हम तो , रंगे हाथ पकडे गए
अब बाहर पडोसी संग खड़ी, पत्नी भड़क रही है
अन्दर पड़ोसन मज़े से बैठी , चाय सुड़क रही है
अब आप ही बतायें, हम क्या करें?
"जब पतिदेव को बन्द कर दिया..... "शमा -
हम उन दिनों मुंबई में थे . मार्च का महीना था. होली अब के शुक्रवार को थी,इस कारण लम्बा वीक एंड मिल गया था. मेरी चार सहेलियाँ नाशिक से बृहस्पतवार की शाम को ही आ पहुँचीं थीं. खूब गपशप का माहौल बना हुआ था. मैंने काफी सारे व्यंजन,होली के मद्देनज़र बना के रखे थे. शुक्रवार की सुबह मालपुए बनाने का इरादा था. सोचा सबको नाश्तेमे यही परोसा जाये. उसी की तैय्यारी में मै रसोई में लगी हुई थी.रसोई को लग के बैठक थी,सो साथ,साथ गप भी जारी थी. होली पे फिल्माए गए गीत सभी चल रहा था.इतने में दरवाज़े पे घंटी बजी. मै पहुँची तब तक अर्दली ने दरवाज़ा खोल दिया था. बता दूँ की मेरे पती तब ऊंचे ओह्देपे (CID )में सरकारी मुलाजिम थे. दरवाज़े पे आयी हुई टोली हमारी सोसायटी के लोगों की ही थी.उस में अधिकतर भारतीय प्रशासनिक सेवामे कार्य रत थे."कहाँ हैं तुम्हारे साहब ?" किसीने अर्दली को सवाल किया. "जी, वो तो बाथरूम में हैं!" अर्दली ने बताया!मै झट इनके छुटकारे के लिए आगे बड़ी और कहा," आप सब को होली मुबारक हो! दरअसल,ये अर्दली अभी,अभी पहुँचा है....इसे नहीं पता की,ये तो सुबह साढ़े छ: बजे ही अपनी गोल्फ किट लिए गोल्फ कोर्स पे गायब हो चुके हैं!" "अरे, ये जनाब कहीं बाथरूम में छुप के तो नहीं बैठे?"किसी ने अपनी शंका व्यक्त की! "नहीं,नहीं...ये तो वाकई सुबह गोल्फ खेलने चले जाते हैं...मै रोज़ ही देखता हूँ....चलो,चलो...इन्हें फिर कभी धर लेंगे...",हमारे एकदम सामने रहनेवाले और बेहद करीबी पड़ोसी,रमेश जी ने कहा. सब ने मान लिया ! "लेकिन,आपके हाथ के व्यंजन खाने तो हम ज़रूर आयेंगे!" उनमे से एक ने कहा! "जी...जी...ज़रूर!!"मैंने कहा...मेरी जान छूटी. पतिदेव को होली खेलना क़तई भाता नहीं! ये तो सचमे बाथरूम में थे! दरवाज़ा बंद होते ही मै बाथरूम के दरवाज़ेपे पहुची,तथा खट खटा के कहा," मै जब तक कहूँ ना,आप बाहर मत आना!" कहके मैंने बाहर से कूंडी लगा दी! अब हम सहेलियों का गपशप का दौर दोबारा जोर पकड़ गया! मै गरमागरम मालपुए बना बना के मेज़ पे भेजती जा रही थी....हंसी मजाक चल रहा था...फ्लैट सड़क के काफी करीब था,सो सड़क परकी सारी पी,पी,पों,पों सुनायी देती जा रही थी! कुछ डेढ़ घंटा या शायद उससे अधिक बीत गया. जमादारनी आयी. सीधे मेरे कमरे में गयी और फिर घबराई-सी बाहर आके मुझ से मुखातिब हुई," बाई साहब...! आपने कहना तो था,की साहब अन्दर हैं...मै तो कूंडी खोल सीधे अन्दर पहुँच गयी!" इतने में पसीने में तरबतर हुए,ये भी सामने आये! मैंने चकराके सवाल किया," अरे! आप गोल्फ खेलने नहीं गए?" "हद करती हो! गोल्फ खेलने नहीं गया! मुझे बाथरूम में बंद कर के तुम निकल आयीं....ये तक नहीं बताया की,किसलिए बाहर आने से रोक रही हो...pot पे बैठे, बैठे दोनों अखबार तीन,तीन बार पढ़ लिए...मुम्बई की गर्मी अलग! बताओ,गोल्फ खेलने कैसे जाता? तुम्हें इतने भी होश नहीं? दरवाज़ा भी खडकाने से डर रहा था,की,पता नहीं तुमने क्यों टोक दिया है!" पतिदेव उबल पड़े! और मेरे कुछ देर के लिए होश उड़ गए! मै अपनी रसोई और अपनी गपशप में इन्हें बंद कर के भूलही गयी थी! मेरी शक्ल पे हवाईयाँ उडती देख,मेरी सहेलियाँ ज़ोर ज़ोरसे हँसने लगीं! एक इनसे मुखातिब होके बोली," चलये ये होली भी खूब याद रहेगी! लोग रंगों से भीगते हैं,आप पसीने से भीग रहे थे!" ना जाने कितने साल बीत गए,पर ये बेवकूफी भुलाये नहीं भूलती! बल्कि हर होली पे याद आही जाती है!

"वो शरमा के भागना मेरा......" रेखा श्रीवास्तव

अरे वंदना ये क्या पूछ डाला ? वैसे होली का मौका भी ऐसा ही है कि कुछ न कुछ घटित
होता ही रहता है. चलो ये बात आज तक किसी से शेयर की ही नहीं है तुम्हें बताते हैं और ये बात उनको पता है जो उस समय वहाँ मौजूद थे. मेरी शादी का मौका था और मेरे भाई साहब के फास्ट फ्रेंड मुंबई में रहते थे और उसी समय उनकी बहन की भी शादी थी. सब लोग इकट्ठे
थे और ढोलक बज रही थी कि मेरी चाची बोली - आज आदित्य का फ़ोन आया था कि वह शादी में नहीं आ पाएंगे.मैंने कहा - हाँ निशि की शादी है न इस लिए कोई बात नहीं. चाची - कोई बात कैसे नहीं ? शादी फिर कैसे होगी? मैंने कहा - अरे उनके न आने से शादी होने के क्या सम्बन्ध है? अब अपनी बहन की शादी छोड़ कर तो आ नहीं सकते .चाची - फिर तुम्हारी शादी कैसे होगी?
मैंने ने बगैर सोचे समझे कह दिया - क्यों मेरी शादी और आदित्य के न आने से क्या मतलब है?
चाची बोली - सोच लो, तुम्हारी शादी भी नहीं हो सकती है आदित्य के बगैर. मैंने कहा - अच्छा देखते हैं कैसे नहीं होगी? ये तो कोई बात नहीं हुई.
सब लोग हँसे जा रहे थे और मैं थी कि अपनी धुन में बहस किये जा रही थी. मेरी सहेली बोली - अरे जरा गौर तो करो चाची कह क्या रही हैं? आदित्य नहीं आयेंगे तो तुम्हारी शादी कैसे होगी?
तब मेरे समझ में आया कि मेरे पतिदेव का नाम भी आदित्य ही है. उसके बाद तो मुझको वहाँ से भागते ही बना.

मेरी यादगार हसीन बेवकूफ़ी .........हा हा हा हा होली है जी होली है- अजय झा

आपने पूछा था कि होली पर की गई कोई ऐसी गलती बताऊं जो फ़ागुन के हसीन गुनाहों में से एक की तरह याद हो मुझे । होली यूं तो शहरों में भी रहते और मनाते हुए ही आए थे और हर जगह की खासियत के साथ एक देसी भदेसपन और अपनी हुडदंगई तो साथ रहता ही था । इस होली के दौर में एक और जबरद्स्त दौर तब आया जब हम अपने लडकपने से युवापन की ओर बढ रहे थे और खुशकिस्मती ये कि कुदरत ने उस वक्त में हमारे लिए ग्राम्य जीवन को मुकर्रर कर दिया था । यकीन जानिए आज भी मुझे लगता है कि गांवों में रहे वो दिन मेरे जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिनों में से एक थे जबकि वो दौर कठिनाईयों और चुनौतियों भरा था फ़िर भी । गांव में होली का दिन तो बस कहने भर को ही तय होता था ..वर्ना शुरू तो हम शायद बसंत पंचमी से ही हो जाते थे ।
गांव की होली में जो चीज़ें मुझे अनमोल मिलीं वो थी जोगीरा और मंडली होली ..ओह क्या दिन थे वो भी । गांव में आम की बौरों की खुशबू हवाओं में घुलने लगती थी और हर तरफ़ उत्सव का माहौल होता था । और हां उन दिनों में शादियां खूब हुआ करती थीं मिथिलांचल में सो उस समय जिंदगी के सावन का फ़ागुन से जो मिलन होता था वो तो बस उन दिनों को यादगार बना देता था जैसे हर आंगन में या जीजा नया आया होता था या फ़िर नई नवेली भौजी ही शो स्टॉप्पर होती थीं । हम तो जाने कितने दिनों पहले से ही शुरू हो जाते थे । अरे नही नहीं जी होली खेलने के लिए नहीं बल्कि भौजी को इस बात के लिए कि ..ए भौजी तनिक नुतुनिया को भी बुलाईए न अबके होली में ...तब बताते हैं दुनो कोई को । भाभी भी जैसे चैलेंज स्वीकार करने को ही तैयार बैठी थीं ....हां हां बौआ जी हम सब समझते हैं ....आईए रही है ऊ ..ई गुंडा मंडली बच के रहिएगा होली में धुलिया देगी आप लोग का भडकुस्स उडा देगी ......देखेंगे देखेंगे ...हमने भी टनक के कह दिया था ।

बस पूरी मंडली को तो जैसे होली में एक अतिरिक्त तोहफ़ा मिलने जा रहा था ..आखिर भौजी की बहिनिया आ रही है होली खेलने ई कोई आम बात थोडी था । हमारे सर्किल से अलग लडकों को जब ये पता चला होगा तो वे बेचारे जरूर जले भुने होंगे ..अरे हम भी अईसी खबरों पर खूब भुन जाते थे । होली से एक दिन पहले का दिन था । भौजी से पिछली शाम को ही बता दिया था कि कि पहले भईया नुतुनिया को ले के आएंगे बाईक पे ..फ़िर उसके बाद बुआ जी को लेने जाएंगे उनके ससुराल से । हमने भी बस कर ली तैयारी । दालान से आंगन तक जाने के बीच की जगह को चुना गया ऑपरेशन नुतुनिया रंगाई के लिए । भईया के मोटर सायकिल की आवाज़ सुनते ही सब पोजीसन में बैठ गए । हमें पता था कि भईया नुतुनिया जी को दालान पे उतार के फ़िर वापस निकल लेंगे बुआ जी को लेने के लिए । ..बस जैसे ही खंबे की ओट से एक परछाई आती दिखी ...जय हो ...एक जोर का शोर और कम से कम तीन बाल्टी लोटा पानी ...फ़चाक से ...। जब तक देखें देखें ...ओह ये तो लक्ष्मी बुआ थीं ..." कौन है रे मुंहझौंसा सब ..ई कौन होली से पहले ही बौराया हुआ है कौन घर का है रे ...सब ये जा वो जा ..। सत्यानाश ...भईया नुतुनिया के जगह पर पहले लक्षमी बुआ को ही लाद लाए थे । वो शाम तो बस कैसे कटी पूछिए मत । लेकिन नुतुनिया आज भी हमें खूब चिढाती है ...हाय रे बौराहा मंडली .......अपनी ही बुआ जी को ..हर हर गंगे कर दिया

बहुत बहुत शुक्रिया वंदना बहन आपका और ढेर शुभकामनाएं आपको

(अरेरेरेरेरेरे........ बात यहीं खत्म नहीं हुए भाई. तकनीकी खराबी के कारण बेवकूफ़ी की श्रृंखला का दूसरा भाग
आपके ब्लॉग-रोल पर दिखाई नहीं दे रहा. शाम को रश्मि ने मुझे बताया और फिर रात में ज्योति ने. जब दो लोगों ने एक सी शिकायत की, तो मेरा माथा ठनका. अब दिक्कत नहीं होगी, सीधे इस लिंक पर जाइये न, हां भाई, इसे पढने के बाद ही तो :)



बुधवार, 2 मार्च 2011

एक दाढ़ का व्रत......


आज शिवरात्रि है. यानि सपरिवार व्रत का दिन. एकमात्र व्रत जिसे हम सब रखते हैं. बाकी के व्रतों का ज़िम्मा तो अम्मां के ऊपर है. सुबह उठते ही अम्मां के आदेश प्रसारित होने लगे- ’ वंदना, चाय पी लेना, उसमें नहा के पीने का कोई चक्कर नहीं है, पानी है वो तो" एकदम मेरे मन की बात. सहमति में गर्दन हिला दी ( चाय बन तो पहले ही गई थी )
छुट्टी का दिन था, सो मेरा धोबी घाट लाइट आते ही खुल गया. अम्मां
नाराज़. "बन्द करो ये कपड़ा धुलाई. जाओ पहले नहा लो और कुछ फल खा के दूध पी लो" कितनी अच्छी लगती है
ऐसी डांट!
अम्मां की डांट मुझे हमेशा मम्मी की याद दिलाती है. बचपन के जबरिया किये जाने वाले व्रत याद आने लगते हैं.
हमारे घर में व्रत और पूजा का पर्याप्त माहौल था. हफ़्ते में तीन दिन तो मम्मी का व्रत ही रहता था, उसके अलावा साल भर आने वाले तमाम व्रत अलग से. कई बार मम्मी के लगातार व्रत पड़ जाते ( एक के साथ एक फ़्री टाइप, बक़लम फ़ुरसतिया जी). मम्मी के अलावा मेरी बड़ी दीदी का भी पूजा-पाठ और व्रत में बड़ा मन लगता था. वे नवरात्रि में दुर्गा-सप्तशती का नियमित पाठ और व्रत करती थीं. जिस दिन उनका व्रत होता, तो क्या मजाल हम बहनें उनसे कुछ काम करवा लें( अपने छोटे होने क हवाला दे के हमने खूब लाभ उठाया है उनका ).
इधर हमने उनसे कुछ कहा, और उधर से मम्मी की
आवाज़ आई- "अरे, उससे कुछ मत कहो, व्रत है बेचारी का." और बेचारी बड़े ठाठ से हम लोगों की तरफ़ तिरछी
मुस्कान फेंकतीं, कि लो,
करवा लो अब. पूरे दिन मम्मी उन्हें कुछ न कुछ खाने की हिदायत देती रहती. हम मन मसोस के रह जाते. उनके लिए फलाहार बनता, या बाज़ार से सामान आता, तो ऐसा नहीं था कि हम लोगों को नहीं मिलता, लेकिन उस पर अधिकार तो उन्हीं का होता था न?
उनके व्रतीय ठाठ देख देख के मेरी व्रत करने की इच्छा ज़ोर मारने लगी. छोटी दीदी की व्रतों में शुरु से ही कोई दिलचस्पी नहीं थी. तो अब मैं किसी ऐसे व्रत का इन्तज़ार करने लगी, जिसे करने की ज़िद की जा सके. जल्दी ही मौका मिल गया जन्माष्टमी के रूप में.
कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मैने ज़िद पकड़ ली व्रत करने की. पहले तो मम्मी ने खूब समझाया कि छोटे बच्चे व्रत नहीं करते, लेकिन बाद में मान गईं और बोलीं कि "ठीक है, तुम एक दाढ़ से व्रत रख लो" मैं चक्कर में पड़ गई. ये एक दाढ़ से व्रत कैसे किया जाता है? क्या दाढ निकलवानी होगी? तब तो बड़ा कठिन व्रत है, शायद इसीलिये मम्मी मना कर रही थीं. लेकिन लगा कि बात साफ़ कर लेनी चाहिये, कि दाढ का मामला क्या है?
जब मम्मी से पूछा तो बोलीं
कि एक दाढ से मतलब तुम एक तरफ़ से कुछ भी खा सकती हो, दूसरी तरफ़ से मत खाना. बच्चे ऐसे ही व्रत करते हैं. हम खुश. खाने को भी सब मिलेगा और व्रती भी कहलायेंगे.
शान से नहाया-धोया, पूजा की और खाने बैठे. पूड़ी पर पूड़ी तोड़ते गये एक दाढ़ से.
थोड़ी देर बाद जब फलाहार का समय हुआ, तो ऐसे फलाहार करने बैठे, जैसे अभी तक कुछ खाया ही न हो.
उसके बाद तो कितने ही व्रत किये सबके साथ, एक दाढ़ से. बहुत बाद में "एक दाढ" का राज समझ में आया, तो शादी के बाद चिन्ता हुई, कि हमें तो एक दाढीय व्रत की आदत है, अब क्या होगा?
शादी के बाद दो व्रत ही ऐसे थे, जिन्हें किये जाने की अनिवार्यता थी- हड़तालिका तीज और
करवा चौथ. दोनों ही निर्जल निराहार व्रत . तीज के व्रत में दिन भर निर्जला रहने वाली तमाम महिलाओं को रात में पूजा के पहले ही उल्टी-चक्कर-सिरदर्द में लोटते-पीटते मैंने देखा था. मेरा मन कभी ऐसे व्रत के लिये तैयार नहीं होता, जिसमें त्यौहार का मज़ा ही खत्म हो जाये. लेकिन अब क्या हो? वो तीज का ही दिन था.
सुबह नहा-धो के प्रैस जाने के लिये तैयार हुई, बाहर आई, तो अम्मां ने फ़रमान जारी किया- " वन्दना, कुछ खा के ही प्रैस जाना, दिन भर काम करना है, ऐसे ही मत चली जाना "
अरे!!!!
ये अम्मां हैं या मम्मी?? ठीक वही अन्दाज़, वही चिन्ता और वही आदेश??
बस भैया, तब से ऐसे ही खाते-पीते व्रत हो रहे हमारे तो, और आपके?
( तस्वीरों का परिचय दे दें- ऊपर बायें हमारी प्यारी अम्मां, दायें हमारी दुलारी मम्मा बीच में मम्मी और मैं, नीचे मेरी सबसे प्यारी बड़ी दीदी जिनके तमाम किस्से मैने आप सबके साथ साझा किये हैं....)

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

तिरंगे लहरा ले रे.....

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी हमारे विद्यालय में गणतंत्र-दिवस पर एक छोटा सा रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किया गया, लीजिये आप भी शामिल हो जाइये, चित्रों के माध्यम से-
बच्चों ने बडे उत्साह के साथ कार्यक्रम की तैयारियां कीं. हालांकि सर्दी के कारण अचानक घोषित छुट्टियों के चलते उन्हें रिहर्सल का पर्याप्त समय नहीं मिल सका.


छोटे-छोटे बच्चे जब गीत सुनाते हैं, तब कितना अच्छा लगता है, भले ही कुछ ग़लतियों के साथ सुनायें, या बीच में भूल ही जायें.







अगले कार्यक्रम के लिये तैयार बच्चियों को चैन कहां....... मेक अप पूरा होते ही झांकने लगीं, दूसरे की प्रस्तुति देखने का आनन्द ही कुछ और होता है.
झांकतीं हुई बच्चियां हैं- कल्याणी पंत और नयनिका त्रिपाठी.





























वन्देमातरम....की प्रस्तुति देती पूर्व छात्रा विधु, उसका साथ दे रही एक अन्य बच्ची कुछ स्टेप्स भूल रही थी, सो मुंह बना लिया है उसने, ये हम तस्वीरों में देख पाये.
नन्हा-मुन्ना राही हूं गाते नन्हे बच्चे प्रांजल और यश .



( सभी तस्वीरें- उमेश दुबे)



मंगलवार, 11 जनवरी 2011

सतना में शिमला का अहसास... :)

लीजिये हम फिर अपना रटा-रटाया जुमला ले
आ गए कि " बहुत दिनों से कुछ लिखना चाह रही थी लेकिन......" .
इस बार तो ठण्ड ने कुछ लिखने ही नहीं दिया ( मतलब दोष मौसम का है, हमारा नहीं .. ).
लेकिन सच्ची , बहुत ठण्ड है. पूरा देश ठंडा रहा है ( रश्मि, इस्मत, अर्कजेश और अन्य तटीय मित्र आपत्ति न जताएं मुझे मालूम है कि वहां पंखा चल रहा है, वैसे भी आपत्ति जताने की बुरी लत है इन्हें लेकिन हम लोगों से पूछो, जो ठण्ड की मार झेल रहे हैं).
पिछले साल भी बहुत ठण्ड हुई थी. लगभग ५-७ साल बाद कडाके की ठण्ड हुई थी, लेकिन इस बार तो पिछले सारे रिकॉर्ड ही धूल चाटने लगे. मध्य प्रदेश जैसे मैदानी इलाके में पर्वतीय ठण्ड!!!!! शिमला का मज़ा मिल रहा है अभी तो. तापमान एकदम तापहीन हो गया है. पारा सिकुड़ के गठरी बना बैठा है. धूप है कि शरमा-शरमा के निकलती है. शाम बाद में आती है, कोहरे की चादर शहर को पहले ही ढकने लगती है.
जिस तरह मोर बारिश को देख के नाचता है, मेरा मन कोहरे को देख के नाचने लगता है . हालाँकि जानती हूँ, प्रबुद्ध जन मेरी इस ख़ुशी को अव्यावहारिक बताते हुए आपति करेंगे, कहेंगे कि केवल अपनी ही ख़ुशी देखतीं हैं? किसानों के आंसू नहीं दिखते, जो ये कोहरा बहा रहा है? . दिखते हैं, वो भी दिखते हैं, अभी मेरे आंसू भी दिखेंगे जब सभी दालें महँगी हो जायेंगीं. सब्जियों के भाव तो अभी ही आसमान पर हैं.
लेकिन तब भी कहूँगी, कि मुझे कोहरा अच्छा लगता है.
मुझे लगता है, कि यदि हम ज़िन्दगी को केवल यथार्थ की शर्तों पर जियेंगे, तो न कभी खुश हो सकेंगे, न दूसरे को खुश कर सकेंगे. हर बात में चिंता ले के नहीं बैठा जा सकता. मौसम की मार से जो नुक्सान होना है, वो तो होना ही है न? हमारी चिंता से अगर वो कम होता हो, तो मैं दोगुनी चिंता करने को तैयार हूँ.
हर व्यक्ति का जीवन परेशानियों, चिंताओं का मुंह बंद थैला सा है. ज़रा सा मुंह खुला नहीं, कि परेशानियां निकल के बिखर जातीं हैं घर भर में. अब समेटते फिरो.
विषयांतर बहुत करती हूँ मैं . एक मुद्दे पर बात ही नहीं कर पाती. अब बात हो रही थी ठण्ड की, पहुँच गई परेशानियों पर, धत्त.
हाँ, तो बहुत ठण्ड है यहाँ. इस मौसम का न्यूनतम तापमान 1.2 रिकॉर्ड किया गया. जबकि रीवा में तापमान माइनस पर पहुँच गया. यहाँ न्यूनतम तापमान -1.2 रिकॉर्ड किया गया .मेरे गृहनगर नौगाँव में तो ये ठण्ड के शुरूआती दिनों में ही 0 पर पहुँच गया था. रीवा में बर्फ भी जमी पाई गई. डिंडौरी(जबलपुर) में तो कई दिनों तक बर्फ जमी रही. अभी भी सबसे कम तापमान वहीं का है.
भीषण ठण्ड को देखते हुए स्कूलों की छुट्टियाँ घोषित कर दी गईं हैं , पंद्रह जनवरी तक. ये छुट्टियां तो यू.पी., बिहार, और दिल्ली में भी की गईं हैं. बच्चे मज़े कर रहे हैं, और टीचर कोर्स पूरा करने की चिंता में घुले जा रहे हैं. क्योंकि फरवरी में वार्षिक परीक्षाएं हो जाने का शासकीय आदेश उनके पास है.
खैर, हमने इस ठण्ड के मज़े, जम के लिए. सुबह देर तक बिस्तर में लेटे रहने, या रजाई में बैठ के चाय पीने का लुत्फ़ तो हम न ले सके, क्योंकि विधु का स्कूल चल रहा है ( शासन की नज़र में ९/१० के बच्चों को ठण्ड नहीं लगती, जबकि इन्ही क्लासों का कोर्स भी पूरा हो चुका है ).सो बहुत सुबह नहीं, लेकिन साढे सात बजे तो बिस्तर छोड़ना ही पड़ता है न! लेकिन विधु को स्कूल भेजने के बाद गुनगुनी धूप में बैठ के चाय पीने और अखबार पढने का आनंद भी कुछ कम नहीं है. फिलहाल हम रोज़ इस आनंद को प्राप्त कर
रहे हैं . सुबह जब उमेश जी ऑफिस जाने लगते हैं, तो बड़ी मायूसी के साथ मुझे, कुर्सी पर आसीन देखते
हैं.
तो भैया, ख़ास कुछ नहीं, कोई गंभीर मसला भी नहीं, ले दे के यही हाल है मौसम का, बस्स.( पोस्ट समाप्त हुई).




शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

शुभकामनाएँ....


नया साल शुरू होने में बस एक घंटा रह गया है. दिन भर से सोच रही हूँ, कुछ लिखने के बारे में, लेकिन मन है कि पिछले न्यू ईयर को याद कर रहा है, जब मैं कानपुर में थी. मैं भी न!! बीती बातें याद करने की आदत सी हो गई है मुझे. आगे का कुछ सोच ही नहीं पाती! कैसे धकेलूँ अपने मन को आगे की तरफ?
आप भी सोचेंगे कि इतने दिनों बाद लिखा, उसमें भी नया कुछ नहीं.
पिछले साल ३१ दिसंबर को कानपुर में मैंने फूलों की शॉप सम्हाली थी. मेरी बहन का ऑपरेशन हुआ था, और सुनील नर्सिंग होम में व्यस्त थे. नए साल पर जितने भी ऑर्डर आ रहे थे, वे कैंसिल करते जा रहे थे. मैंने उन्हें ऑर्डर कैंसिल न करने को कहा और शॉप का काम दो दिनों के लिए खुद संभाल लिया. इतना मज़ा आया फूलों के बीच रहते, और काम करते हुए कि क्या बताऊँ. घने कोहरे के बीच फूलों की बिक्री करना एकदम नया अनुभव था. उस रात मैं एक बजे तक शॉप पर थी.
यात्रा वाले दिन यानि दो जनवरी को अनूप जी और शेफाली से मुलाक़ात हुई, जिसकी उम्मीद मैं तो छोड़ ही चुकी थी. हाँ,अनूप जी को विश्वास था, कि मुलाक़ात होगी. और मुलाक़ात हुई.
इस बार नया साल मनाने की प्लानिंग पिछले चार दिनों से हो रही थी . पहला नाम लिया गया "रामवन" का, जो सतना से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, लेकिन मैंने कहा कि एक तो ये जगह कई बार की घूमी हुई है, उस पर आज हुडदंगाई लड़कों का जमावड़ा भी होगा.
दूसरा नाम आया "पांडव-फ़ॉल" का, जो सतना से तीस किलोमीटर की दूरी पर है. यहाँ उमेश जी ने याद दिलाया कि पिछले साल इसी तारीख पर लड़कों ने शराब पीकर कितना तमाशा किया था , भूल गईं :(
अंततः घर पर ही नया साल मनाने का कार्यक्रम तय पाया गया. तय किया गया कि कल उमेश जी छुट्टी लेंगे, और हम सब पूरे दिन एक साथ रहेंगे. अच्छा है न?
नया साल शुरू होने ही वाला है, तो शुभकामनाएं दे दीं जाएँ न?
नए वर्ष की अनंत-असीम शुभकामनाएं आप सबको.
[ इसी तरह ब्लॉग पर आना-जाना बनाएं रक्खें :) ]

रविवार, 21 नवंबर 2010

नन्हे मेले के मुन्ने दुकानदार..

बाल-दिवस निकले सात दिन हो गये, और मैं आज ज़िक्र ले के बैठी हूं. मैं भी न...मैं जब स्कूल में पढती थी, तब वहां हर साल बाल-दिवस पर " बाल-मेला" आयोजित किया जाता था. हम बच्चे दुकाने सजाते, सामान बेचते और पूरी कमाई शाला-विकास के खाते में जमा करवा देते :(इतने सालों बाद, मेरे इस छोटे से स्कूल में जब बच्चों के रंग भरने लगे, तो मैने यहां मेला लगाने की सोची.
बड़े बच्चों को अपनी योजना की जानकारी दी, बच्चे तो उछल पड़े. बाल दिवस रविवार को था, सो मेला हमने मंगलवार सोलह नवम्बर को लगाया. पन्द्रह तारीख को बच्चों ने दिन भर जुट के अपने स्टॉल लगाये-सजाये.

हमारे नन्हे ग्राहक तो सुबह आठ बजे से ही अपनी मम्मियों या पापाओं की अंगुली पकड़े हाज़िर हो गये :) जबकि मेले का उद्घाटन नौ बजे होना था. मेला सुबह नौ बजे से दोपहर एक बजे तक चला. खूब मज़े किये बच्चों ने, और हम बड़ों ने भी. हां, बच्चों की मेहनत की कमाई हमने शाला विकास के नाम पर जमा नहीं करवाई है:)

अब आप भी मेले का आनन्द लें,तस्वीरों के ज़रिए-
सभी बच्चों ने बढिया स्टॉल लगाये थे। तमाम तरह की चीज़ें उपलब्ध थीं. किसी ने पानी-पूरी कीदुकान लगाई तो किसी ने आलू-टिकिया सजा ली. कोई गुब्बारे बेच रहा था तो कोई बुढिया के बाल :) एक दुकान पर शानदार चाऊमीन बिक रही थी. बच्चे की मम्मी खुद साथ में जुटीं थीं, मदद के लिये. खूब बिक्री हुई उसकी
दो स्टॉल भेलपुरी के थे , यहां भी जम के खाया लोगों ने।चने के चाट वाले स्टॉल पर भी खूब बच्चे दिखे. पर सबसे ज़्यादा भीड़ बटोरने में कामयाबी मिली पानी-पूरी के विक्रेता को. लाइन लगा के लोगों ने स्वाद लिया यहां.

बच्चों के उत्साह से उत्साहित हो, हमारी आर्ट टीचर, जो खुद भी बहुत सुन्दर पर्स,बैग आदि बनाती हैं, ने भी अपना स्टॉल लगाया, और धड़ाधड़ बैग्स बेचे. दोपहर एक बजे तक चलने वाले इस नन्हे मेले में ग्राहकों की भीड़ मेला खत्म होने के बाद भी लगी रही।


बाद में दौर शुरु हुआ बच्चों की आय का विवरण लेने का. एक एक कर के मुन्ने दुकानदार आते, अपनी मेहनत की कमाई टेबल पर रखते, उसे गिना जाता, लाभ-हानि का ब्यौरा दिया जाता, और राशि सौंप दी जाती. सबसे सुन्दर स्टॉल को पुरस्कृत भी किया गया. बच्चों के माध्यम से उस दिन हमने भी खूब अपना बचपन जिया....

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

एक बेमानी सी पोस्ट....

कई दिनों से मन बनाए हूँ, कि दीवाली पर कुछ ज़रूर लिखूंगी. कम से कम एक संस्मरण का तो हक़ बनता है, छपने का , लेकिन........ धरी रह गई पूरी सोच, और लिखने की तैयारी . हमारे पेंटर बाबू ने ३१ अक्टूबर से काम शुरू किया, और तीन दिन में वे केवल बाहरी खिडकियों के पल्ले ही पेंट कर सके . कल यानि तीन नवम्बर से मेरी छुट्टियां शुरू हुईं, और मेरी रफ़्तार ने भी पेंटर बाबू से होड़ लेते हुए, दो दिन में एक कमरा साफ़ करने का रिकॉर्ड बनाया. साफ़ करने के लिए बहुत कुछ नहीं था, लेकिन तब भी मैंने पूरा समय लिया, और घर के अन्य सदस्यों को ये कहने पर मजबूर कर दिया, कि देखो बेचारी कितना काम कर रही है
. तब तक धूल से अटी, अन्दर-बाहर होती रही, जब तक अम्मा और उमेश जी ने ये नहीं कह दिया, कि जाओ अब नहा-धो लो, और आराम करो. थक गई होगी .
बाहर काम कर रहे पेंटरों के बीच बेवजह
घूमती रही, और उनके काम में नुक्स निकालती रही. चार बजे के आस-पास लगा कि अब तो कोई काम जैसा काम रहा ही नहीं, अब कैसे व्यस्त दिखाई दें? तभी बिजली के नन्हे-नन्हें बल्बों की झालरें लिए, इलैक्ट्रीशियन महोदय नमूदार हुए, और हमारी बांछें खिल गईं . व्यस्त होने का कारण मिल गया. हम यूं ही इलेक्ट्रिशियन पुष्पेन्द्र के साथ छत पर आ गए. एक घंटे तक उसे यहाँ-वहां की सलाह देते हुए, उसके काम में व्यवधान डालते रहे.

अम्मा की फोन पर तिवारी आंटी से बात हो रही थी, और वे कह रहीं थीं- " राजू ( उमेश जी) को तो टाइम ही नहीं मिलता, सारा काम तो हमारी वंदना ही करती है,वो चाहे घर का हो या बाहर का...... आज दिन भर से लगी है मजदूरों के साथ, हमारी तो बहू भी वही है और बेटा भी..... दिन भर की थकान कहाँ गायब हो गई, पता ही नहीं."
नीचे आये तो फिर याद आया कि आज तो कुछ लिखने का प्लान था..... लेकिन ये लिखना-लिखाना तो काम में शामिल नहीं है न, सो इरादा स्थगित कर दिया. लगा, शाम से नेट पर बैठ जाएंगे , तो पूरे दिन के किए हुए काम पर भी पानी फिर जाएगा .
फिर बाहर आ गये. गमलों पर जो पेंट हो रहा था, उसे देखते और बिन मांगी सलाह देते रहे. बगल की गली
में कुछ बच्चे फुटबॉल -फुटबॉल खेल रहे थे, उन्हें घुड़का, क्यों कि उनकी फुटबॉल बार बार हमारी बाउंड्री के अन्दर आ रही थी.
अब तक छह बज चुके थे, अन्दर से अम्मा कि आवाज़ आई- "वन्दना, चाय तो पी लो, फिर करना जो भी कर रही हो....." हम अन्दर की तरफ चले, भीतर से आवाज़ आ रही थी, अम्मा की फोन पर तिवारी आंटी से बात हो रही थी, और वे कह रहीं थीं-
" राजू ( उमेश जी) को तो टाइम ही नहीं मिलता, सारा काम तो हमारी वंदना ही करती है,
वो चाहे घर का हो या बाहर का...... आज दिन भर से लगी है मजदूरों के साथ, हमारी तो बहू भी वही है और बेटा भी..... "
दिन भर की थकान कहाँ गायब हो गई, पता ही नहीं.