बुधवार, 2 मार्च 2011

एक दाढ़ का व्रत......


आज शिवरात्रि है. यानि सपरिवार व्रत का दिन. एकमात्र व्रत जिसे हम सब रखते हैं. बाकी के व्रतों का ज़िम्मा तो अम्मां के ऊपर है. सुबह उठते ही अम्मां के आदेश प्रसारित होने लगे- ’ वंदना, चाय पी लेना, उसमें नहा के पीने का कोई चक्कर नहीं है, पानी है वो तो" एकदम मेरे मन की बात. सहमति में गर्दन हिला दी ( चाय बन तो पहले ही गई थी )
छुट्टी का दिन था, सो मेरा धोबी घाट लाइट आते ही खुल गया. अम्मां
नाराज़. "बन्द करो ये कपड़ा धुलाई. जाओ पहले नहा लो और कुछ फल खा के दूध पी लो" कितनी अच्छी लगती है
ऐसी डांट!
अम्मां की डांट मुझे हमेशा मम्मी की याद दिलाती है. बचपन के जबरिया किये जाने वाले व्रत याद आने लगते हैं.
हमारे घर में व्रत और पूजा का पर्याप्त माहौल था. हफ़्ते में तीन दिन तो मम्मी का व्रत ही रहता था, उसके अलावा साल भर आने वाले तमाम व्रत अलग से. कई बार मम्मी के लगातार व्रत पड़ जाते ( एक के साथ एक फ़्री टाइप, बक़लम फ़ुरसतिया जी). मम्मी के अलावा मेरी बड़ी दीदी का भी पूजा-पाठ और व्रत में बड़ा मन लगता था. वे नवरात्रि में दुर्गा-सप्तशती का नियमित पाठ और व्रत करती थीं. जिस दिन उनका व्रत होता, तो क्या मजाल हम बहनें उनसे कुछ काम करवा लें( अपने छोटे होने क हवाला दे के हमने खूब लाभ उठाया है उनका ).
इधर हमने उनसे कुछ कहा, और उधर से मम्मी की
आवाज़ आई- "अरे, उससे कुछ मत कहो, व्रत है बेचारी का." और बेचारी बड़े ठाठ से हम लोगों की तरफ़ तिरछी
मुस्कान फेंकतीं, कि लो,
करवा लो अब. पूरे दिन मम्मी उन्हें कुछ न कुछ खाने की हिदायत देती रहती. हम मन मसोस के रह जाते. उनके लिए फलाहार बनता, या बाज़ार से सामान आता, तो ऐसा नहीं था कि हम लोगों को नहीं मिलता, लेकिन उस पर अधिकार तो उन्हीं का होता था न?
उनके व्रतीय ठाठ देख देख के मेरी व्रत करने की इच्छा ज़ोर मारने लगी. छोटी दीदी की व्रतों में शुरु से ही कोई दिलचस्पी नहीं थी. तो अब मैं किसी ऐसे व्रत का इन्तज़ार करने लगी, जिसे करने की ज़िद की जा सके. जल्दी ही मौका मिल गया जन्माष्टमी के रूप में.
कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मैने ज़िद पकड़ ली व्रत करने की. पहले तो मम्मी ने खूब समझाया कि छोटे बच्चे व्रत नहीं करते, लेकिन बाद में मान गईं और बोलीं कि "ठीक है, तुम एक दाढ़ से व्रत रख लो" मैं चक्कर में पड़ गई. ये एक दाढ़ से व्रत कैसे किया जाता है? क्या दाढ निकलवानी होगी? तब तो बड़ा कठिन व्रत है, शायद इसीलिये मम्मी मना कर रही थीं. लेकिन लगा कि बात साफ़ कर लेनी चाहिये, कि दाढ का मामला क्या है?
जब मम्मी से पूछा तो बोलीं
कि एक दाढ से मतलब तुम एक तरफ़ से कुछ भी खा सकती हो, दूसरी तरफ़ से मत खाना. बच्चे ऐसे ही व्रत करते हैं. हम खुश. खाने को भी सब मिलेगा और व्रती भी कहलायेंगे.
शान से नहाया-धोया, पूजा की और खाने बैठे. पूड़ी पर पूड़ी तोड़ते गये एक दाढ़ से.
थोड़ी देर बाद जब फलाहार का समय हुआ, तो ऐसे फलाहार करने बैठे, जैसे अभी तक कुछ खाया ही न हो.
उसके बाद तो कितने ही व्रत किये सबके साथ, एक दाढ़ से. बहुत बाद में "एक दाढ" का राज समझ में आया, तो शादी के बाद चिन्ता हुई, कि हमें तो एक दाढीय व्रत की आदत है, अब क्या होगा?
शादी के बाद दो व्रत ही ऐसे थे, जिन्हें किये जाने की अनिवार्यता थी- हड़तालिका तीज और
करवा चौथ. दोनों ही निर्जल निराहार व्रत . तीज के व्रत में दिन भर निर्जला रहने वाली तमाम महिलाओं को रात में पूजा के पहले ही उल्टी-चक्कर-सिरदर्द में लोटते-पीटते मैंने देखा था. मेरा मन कभी ऐसे व्रत के लिये तैयार नहीं होता, जिसमें त्यौहार का मज़ा ही खत्म हो जाये. लेकिन अब क्या हो? वो तीज का ही दिन था.
सुबह नहा-धो के प्रैस जाने के लिये तैयार हुई, बाहर आई, तो अम्मां ने फ़रमान जारी किया- " वन्दना, कुछ खा के ही प्रैस जाना, दिन भर काम करना है, ऐसे ही मत चली जाना "
अरे!!!!
ये अम्मां हैं या मम्मी?? ठीक वही अन्दाज़, वही चिन्ता और वही आदेश??
बस भैया, तब से ऐसे ही खाते-पीते व्रत हो रहे हमारे तो, और आपके?
( तस्वीरों का परिचय दे दें- ऊपर बायें हमारी प्यारी अम्मां, दायें हमारी दुलारी मम्मा बीच में मम्मी और मैं, नीचे मेरी सबसे प्यारी बड़ी दीदी जिनके तमाम किस्से मैने आप सबके साथ साझा किये हैं....)

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

तिरंगे लहरा ले रे.....

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी हमारे विद्यालय में गणतंत्र-दिवस पर एक छोटा सा रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किया गया, लीजिये आप भी शामिल हो जाइये, चित्रों के माध्यम से-
बच्चों ने बडे उत्साह के साथ कार्यक्रम की तैयारियां कीं. हालांकि सर्दी के कारण अचानक घोषित छुट्टियों के चलते उन्हें रिहर्सल का पर्याप्त समय नहीं मिल सका.


छोटे-छोटे बच्चे जब गीत सुनाते हैं, तब कितना अच्छा लगता है, भले ही कुछ ग़लतियों के साथ सुनायें, या बीच में भूल ही जायें.







अगले कार्यक्रम के लिये तैयार बच्चियों को चैन कहां....... मेक अप पूरा होते ही झांकने लगीं, दूसरे की प्रस्तुति देखने का आनन्द ही कुछ और होता है.
झांकतीं हुई बच्चियां हैं- कल्याणी पंत और नयनिका त्रिपाठी.





























वन्देमातरम....की प्रस्तुति देती पूर्व छात्रा विधु, उसका साथ दे रही एक अन्य बच्ची कुछ स्टेप्स भूल रही थी, सो मुंह बना लिया है उसने, ये हम तस्वीरों में देख पाये.
नन्हा-मुन्ना राही हूं गाते नन्हे बच्चे प्रांजल और यश .



( सभी तस्वीरें- उमेश दुबे)



मंगलवार, 11 जनवरी 2011

सतना में शिमला का अहसास... :)

लीजिये हम फिर अपना रटा-रटाया जुमला ले
आ गए कि " बहुत दिनों से कुछ लिखना चाह रही थी लेकिन......" .
इस बार तो ठण्ड ने कुछ लिखने ही नहीं दिया ( मतलब दोष मौसम का है, हमारा नहीं .. ).
लेकिन सच्ची , बहुत ठण्ड है. पूरा देश ठंडा रहा है ( रश्मि, इस्मत, अर्कजेश और अन्य तटीय मित्र आपत्ति न जताएं मुझे मालूम है कि वहां पंखा चल रहा है, वैसे भी आपत्ति जताने की बुरी लत है इन्हें लेकिन हम लोगों से पूछो, जो ठण्ड की मार झेल रहे हैं).
पिछले साल भी बहुत ठण्ड हुई थी. लगभग ५-७ साल बाद कडाके की ठण्ड हुई थी, लेकिन इस बार तो पिछले सारे रिकॉर्ड ही धूल चाटने लगे. मध्य प्रदेश जैसे मैदानी इलाके में पर्वतीय ठण्ड!!!!! शिमला का मज़ा मिल रहा है अभी तो. तापमान एकदम तापहीन हो गया है. पारा सिकुड़ के गठरी बना बैठा है. धूप है कि शरमा-शरमा के निकलती है. शाम बाद में आती है, कोहरे की चादर शहर को पहले ही ढकने लगती है.
जिस तरह मोर बारिश को देख के नाचता है, मेरा मन कोहरे को देख के नाचने लगता है . हालाँकि जानती हूँ, प्रबुद्ध जन मेरी इस ख़ुशी को अव्यावहारिक बताते हुए आपति करेंगे, कहेंगे कि केवल अपनी ही ख़ुशी देखतीं हैं? किसानों के आंसू नहीं दिखते, जो ये कोहरा बहा रहा है? . दिखते हैं, वो भी दिखते हैं, अभी मेरे आंसू भी दिखेंगे जब सभी दालें महँगी हो जायेंगीं. सब्जियों के भाव तो अभी ही आसमान पर हैं.
लेकिन तब भी कहूँगी, कि मुझे कोहरा अच्छा लगता है.
मुझे लगता है, कि यदि हम ज़िन्दगी को केवल यथार्थ की शर्तों पर जियेंगे, तो न कभी खुश हो सकेंगे, न दूसरे को खुश कर सकेंगे. हर बात में चिंता ले के नहीं बैठा जा सकता. मौसम की मार से जो नुक्सान होना है, वो तो होना ही है न? हमारी चिंता से अगर वो कम होता हो, तो मैं दोगुनी चिंता करने को तैयार हूँ.
हर व्यक्ति का जीवन परेशानियों, चिंताओं का मुंह बंद थैला सा है. ज़रा सा मुंह खुला नहीं, कि परेशानियां निकल के बिखर जातीं हैं घर भर में. अब समेटते फिरो.
विषयांतर बहुत करती हूँ मैं . एक मुद्दे पर बात ही नहीं कर पाती. अब बात हो रही थी ठण्ड की, पहुँच गई परेशानियों पर, धत्त.
हाँ, तो बहुत ठण्ड है यहाँ. इस मौसम का न्यूनतम तापमान 1.2 रिकॉर्ड किया गया. जबकि रीवा में तापमान माइनस पर पहुँच गया. यहाँ न्यूनतम तापमान -1.2 रिकॉर्ड किया गया .मेरे गृहनगर नौगाँव में तो ये ठण्ड के शुरूआती दिनों में ही 0 पर पहुँच गया था. रीवा में बर्फ भी जमी पाई गई. डिंडौरी(जबलपुर) में तो कई दिनों तक बर्फ जमी रही. अभी भी सबसे कम तापमान वहीं का है.
भीषण ठण्ड को देखते हुए स्कूलों की छुट्टियाँ घोषित कर दी गईं हैं , पंद्रह जनवरी तक. ये छुट्टियां तो यू.पी., बिहार, और दिल्ली में भी की गईं हैं. बच्चे मज़े कर रहे हैं, और टीचर कोर्स पूरा करने की चिंता में घुले जा रहे हैं. क्योंकि फरवरी में वार्षिक परीक्षाएं हो जाने का शासकीय आदेश उनके पास है.
खैर, हमने इस ठण्ड के मज़े, जम के लिए. सुबह देर तक बिस्तर में लेटे रहने, या रजाई में बैठ के चाय पीने का लुत्फ़ तो हम न ले सके, क्योंकि विधु का स्कूल चल रहा है ( शासन की नज़र में ९/१० के बच्चों को ठण्ड नहीं लगती, जबकि इन्ही क्लासों का कोर्स भी पूरा हो चुका है ).सो बहुत सुबह नहीं, लेकिन साढे सात बजे तो बिस्तर छोड़ना ही पड़ता है न! लेकिन विधु को स्कूल भेजने के बाद गुनगुनी धूप में बैठ के चाय पीने और अखबार पढने का आनंद भी कुछ कम नहीं है. फिलहाल हम रोज़ इस आनंद को प्राप्त कर
रहे हैं . सुबह जब उमेश जी ऑफिस जाने लगते हैं, तो बड़ी मायूसी के साथ मुझे, कुर्सी पर आसीन देखते
हैं.
तो भैया, ख़ास कुछ नहीं, कोई गंभीर मसला भी नहीं, ले दे के यही हाल है मौसम का, बस्स.( पोस्ट समाप्त हुई).




शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

शुभकामनाएँ....


नया साल शुरू होने में बस एक घंटा रह गया है. दिन भर से सोच रही हूँ, कुछ लिखने के बारे में, लेकिन मन है कि पिछले न्यू ईयर को याद कर रहा है, जब मैं कानपुर में थी. मैं भी न!! बीती बातें याद करने की आदत सी हो गई है मुझे. आगे का कुछ सोच ही नहीं पाती! कैसे धकेलूँ अपने मन को आगे की तरफ?
आप भी सोचेंगे कि इतने दिनों बाद लिखा, उसमें भी नया कुछ नहीं.
पिछले साल ३१ दिसंबर को कानपुर में मैंने फूलों की शॉप सम्हाली थी. मेरी बहन का ऑपरेशन हुआ था, और सुनील नर्सिंग होम में व्यस्त थे. नए साल पर जितने भी ऑर्डर आ रहे थे, वे कैंसिल करते जा रहे थे. मैंने उन्हें ऑर्डर कैंसिल न करने को कहा और शॉप का काम दो दिनों के लिए खुद संभाल लिया. इतना मज़ा आया फूलों के बीच रहते, और काम करते हुए कि क्या बताऊँ. घने कोहरे के बीच फूलों की बिक्री करना एकदम नया अनुभव था. उस रात मैं एक बजे तक शॉप पर थी.
यात्रा वाले दिन यानि दो जनवरी को अनूप जी और शेफाली से मुलाक़ात हुई, जिसकी उम्मीद मैं तो छोड़ ही चुकी थी. हाँ,अनूप जी को विश्वास था, कि मुलाक़ात होगी. और मुलाक़ात हुई.
इस बार नया साल मनाने की प्लानिंग पिछले चार दिनों से हो रही थी . पहला नाम लिया गया "रामवन" का, जो सतना से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, लेकिन मैंने कहा कि एक तो ये जगह कई बार की घूमी हुई है, उस पर आज हुडदंगाई लड़कों का जमावड़ा भी होगा.
दूसरा नाम आया "पांडव-फ़ॉल" का, जो सतना से तीस किलोमीटर की दूरी पर है. यहाँ उमेश जी ने याद दिलाया कि पिछले साल इसी तारीख पर लड़कों ने शराब पीकर कितना तमाशा किया था , भूल गईं :(
अंततः घर पर ही नया साल मनाने का कार्यक्रम तय पाया गया. तय किया गया कि कल उमेश जी छुट्टी लेंगे, और हम सब पूरे दिन एक साथ रहेंगे. अच्छा है न?
नया साल शुरू होने ही वाला है, तो शुभकामनाएं दे दीं जाएँ न?
नए वर्ष की अनंत-असीम शुभकामनाएं आप सबको.
[ इसी तरह ब्लॉग पर आना-जाना बनाएं रक्खें :) ]

रविवार, 21 नवंबर 2010

नन्हे मेले के मुन्ने दुकानदार..

बाल-दिवस निकले सात दिन हो गये, और मैं आज ज़िक्र ले के बैठी हूं. मैं भी न...मैं जब स्कूल में पढती थी, तब वहां हर साल बाल-दिवस पर " बाल-मेला" आयोजित किया जाता था. हम बच्चे दुकाने सजाते, सामान बेचते और पूरी कमाई शाला-विकास के खाते में जमा करवा देते :(इतने सालों बाद, मेरे इस छोटे से स्कूल में जब बच्चों के रंग भरने लगे, तो मैने यहां मेला लगाने की सोची.
बड़े बच्चों को अपनी योजना की जानकारी दी, बच्चे तो उछल पड़े. बाल दिवस रविवार को था, सो मेला हमने मंगलवार सोलह नवम्बर को लगाया. पन्द्रह तारीख को बच्चों ने दिन भर जुट के अपने स्टॉल लगाये-सजाये.

हमारे नन्हे ग्राहक तो सुबह आठ बजे से ही अपनी मम्मियों या पापाओं की अंगुली पकड़े हाज़िर हो गये :) जबकि मेले का उद्घाटन नौ बजे होना था. मेला सुबह नौ बजे से दोपहर एक बजे तक चला. खूब मज़े किये बच्चों ने, और हम बड़ों ने भी. हां, बच्चों की मेहनत की कमाई हमने शाला विकास के नाम पर जमा नहीं करवाई है:)

अब आप भी मेले का आनन्द लें,तस्वीरों के ज़रिए-
सभी बच्चों ने बढिया स्टॉल लगाये थे। तमाम तरह की चीज़ें उपलब्ध थीं. किसी ने पानी-पूरी कीदुकान लगाई तो किसी ने आलू-टिकिया सजा ली. कोई गुब्बारे बेच रहा था तो कोई बुढिया के बाल :) एक दुकान पर शानदार चाऊमीन बिक रही थी. बच्चे की मम्मी खुद साथ में जुटीं थीं, मदद के लिये. खूब बिक्री हुई उसकी
दो स्टॉल भेलपुरी के थे , यहां भी जम के खाया लोगों ने।चने के चाट वाले स्टॉल पर भी खूब बच्चे दिखे. पर सबसे ज़्यादा भीड़ बटोरने में कामयाबी मिली पानी-पूरी के विक्रेता को. लाइन लगा के लोगों ने स्वाद लिया यहां.

बच्चों के उत्साह से उत्साहित हो, हमारी आर्ट टीचर, जो खुद भी बहुत सुन्दर पर्स,बैग आदि बनाती हैं, ने भी अपना स्टॉल लगाया, और धड़ाधड़ बैग्स बेचे. दोपहर एक बजे तक चलने वाले इस नन्हे मेले में ग्राहकों की भीड़ मेला खत्म होने के बाद भी लगी रही।


बाद में दौर शुरु हुआ बच्चों की आय का विवरण लेने का. एक एक कर के मुन्ने दुकानदार आते, अपनी मेहनत की कमाई टेबल पर रखते, उसे गिना जाता, लाभ-हानि का ब्यौरा दिया जाता, और राशि सौंप दी जाती. सबसे सुन्दर स्टॉल को पुरस्कृत भी किया गया. बच्चों के माध्यम से उस दिन हमने भी खूब अपना बचपन जिया....

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

एक बेमानी सी पोस्ट....

कई दिनों से मन बनाए हूँ, कि दीवाली पर कुछ ज़रूर लिखूंगी. कम से कम एक संस्मरण का तो हक़ बनता है, छपने का , लेकिन........ धरी रह गई पूरी सोच, और लिखने की तैयारी . हमारे पेंटर बाबू ने ३१ अक्टूबर से काम शुरू किया, और तीन दिन में वे केवल बाहरी खिडकियों के पल्ले ही पेंट कर सके . कल यानि तीन नवम्बर से मेरी छुट्टियां शुरू हुईं, और मेरी रफ़्तार ने भी पेंटर बाबू से होड़ लेते हुए, दो दिन में एक कमरा साफ़ करने का रिकॉर्ड बनाया. साफ़ करने के लिए बहुत कुछ नहीं था, लेकिन तब भी मैंने पूरा समय लिया, और घर के अन्य सदस्यों को ये कहने पर मजबूर कर दिया, कि देखो बेचारी कितना काम कर रही है
. तब तक धूल से अटी, अन्दर-बाहर होती रही, जब तक अम्मा और उमेश जी ने ये नहीं कह दिया, कि जाओ अब नहा-धो लो, और आराम करो. थक गई होगी .
बाहर काम कर रहे पेंटरों के बीच बेवजह
घूमती रही, और उनके काम में नुक्स निकालती रही. चार बजे के आस-पास लगा कि अब तो कोई काम जैसा काम रहा ही नहीं, अब कैसे व्यस्त दिखाई दें? तभी बिजली के नन्हे-नन्हें बल्बों की झालरें लिए, इलैक्ट्रीशियन महोदय नमूदार हुए, और हमारी बांछें खिल गईं . व्यस्त होने का कारण मिल गया. हम यूं ही इलेक्ट्रिशियन पुष्पेन्द्र के साथ छत पर आ गए. एक घंटे तक उसे यहाँ-वहां की सलाह देते हुए, उसके काम में व्यवधान डालते रहे.

अम्मा की फोन पर तिवारी आंटी से बात हो रही थी, और वे कह रहीं थीं- " राजू ( उमेश जी) को तो टाइम ही नहीं मिलता, सारा काम तो हमारी वंदना ही करती है,वो चाहे घर का हो या बाहर का...... आज दिन भर से लगी है मजदूरों के साथ, हमारी तो बहू भी वही है और बेटा भी..... दिन भर की थकान कहाँ गायब हो गई, पता ही नहीं."
नीचे आये तो फिर याद आया कि आज तो कुछ लिखने का प्लान था..... लेकिन ये लिखना-लिखाना तो काम में शामिल नहीं है न, सो इरादा स्थगित कर दिया. लगा, शाम से नेट पर बैठ जाएंगे , तो पूरे दिन के किए हुए काम पर भी पानी फिर जाएगा .
फिर बाहर आ गये. गमलों पर जो पेंट हो रहा था, उसे देखते और बिन मांगी सलाह देते रहे. बगल की गली
में कुछ बच्चे फुटबॉल -फुटबॉल खेल रहे थे, उन्हें घुड़का, क्यों कि उनकी फुटबॉल बार बार हमारी बाउंड्री के अन्दर आ रही थी.
अब तक छह बज चुके थे, अन्दर से अम्मा कि आवाज़ आई- "वन्दना, चाय तो पी लो, फिर करना जो भी कर रही हो....." हम अन्दर की तरफ चले, भीतर से आवाज़ आ रही थी, अम्मा की फोन पर तिवारी आंटी से बात हो रही थी, और वे कह रहीं थीं-
" राजू ( उमेश जी) को तो टाइम ही नहीं मिलता, सारा काम तो हमारी वंदना ही करती है,
वो चाहे घर का हो या बाहर का...... आज दिन भर से लगी है मजदूरों के साथ, हमारी तो बहू भी वही है और बेटा भी..... "
दिन भर की थकान कहाँ गायब हो गई, पता ही नहीं.

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

इस्मत से "शेफ़ा" तक का सफ़र....

रोज़ की तरह उस दिन भी मैंने अपने पेज का काम निपटाया और फिर रविवारीय पृष्ठ की सामग्री देखने लगी. दो-तीन आलेख एडिटिंग के लिए निकाले ही थे, कि हमारे मुख्य सम्पादक, श्री श्याम सुन्दर शर्मा
जी आये, उनके साथ एक गौरांग, सुदर्शना, गंभीर सी दिखने वाली लड़की भी भीतर आई. शर्मा जी बोले-
" वंदना, ये इस्मत हैं,
, अच्छा लिखतीं हैं, इनके आलेख देख लो."
इस्मत की तरफ मैंने एक औपचारिक मुस्कान फेंकी, बदले में उसने भी हलकी सी मुस्कराहट बिखेरी. उस दिन ही हम लगभग आधे घंटे साथ रहे, और मुझे लगा, कि ये तो मेरी दोस्त है!

और फिर चल पड़ा सिलसिला हमारी मुलाकातों का, बातों का, सामयिक चिंतन का..
तब इस्मत गद्य-लेखिका थी, और सामयिक, सामजिक आलेख लिखती थी. 'देशबंधु' में उनके प्रकाशन का अधिकार मेरे पास था. बस, जम गई जोड़ी.

जल्दी ही हमारी दोस्ती पारिवारिक दोस्ती में बदल गई. ज़हूर भाई, उमेश जी, इस्मत, मैं, हम सब जब इकट्ठे होते तो देर रात तक गर्मागर्म राजनैतिक बहसें छिड़ी रहतीं. हमारी इस बहस में स्थान के अनुसार कभी अम्मा, तो कभी आपी और अम्मी साथ होतीं.

१९९० में होने वाली ये मुलाक़ात, १९९५ तक दाँत काटी दोस्ती में तब्दील हो चुकी थी. १९९५ में, मेरी बिटिया विधु के जन्म के पूर्व, तबियत खराब हो जाने के कारण मुझे एडमिट कर लिया गया, और तब इस्मत, जो कि शहर से दूर , केबिल फैक्ट्री की कॉलोनी में रहती थी, दोनों वक्त समय से खाना लेकर नर्सिंग होम में हाज़िर हो जाती थी. वो भी बड़े जतन से बनाया गया खाना. मना करने पर मानती नहीं थी, उल्टा ज़ोरदार डांट लगा देती थी. विधु के जन्म के बाद स्थितियां कुछ ऐसी बनी, कि मुझे ४८ बॉटल ब्लड चढ़ाया गया, जिसमें से आधे से ज्यादा का इंतजाम ज़हूर भाई ने किया था! अब इस बारे में और नहीं लिखूंगी, वर्ना हो सकता है कि इस्मत इस पूरे हिस्से को पोस्ट में से हटा देने की जिद पर ही अड़ जाए. मैं चाहती हूँ कि उससे कहूं, कि उसने मेरी जान बचाई है, लेकिन वो कहने ही नहीं देती. खैर छोड़ देती हूँ.

2000-2001 में ज़हूर भाई का स्थानान्तरण गोवा हो गया, खबर सुनने के बाद मुझे कैसा लगा बता नहीं पाउंगी. और इस्मत सतना से गोवा पहुँच गईं. भौगोलिक दूरी बढ़ गई.
तीन साल पहले इस्मत ने मुझे अपनी ग़ज़ल सुनाई( फोन पर) मैं चकित, जो लड़की अभी तक कविता लिखती ही नहीं थी, ग़ज़ल कहने लगी? वो भी इतनी सुन्दर, और संतुलित? साल भर हमारा ग़ज़ल सुनाने और सुनने का सिलसिला चला. फिर मैंने अपना ब्लॉग बनाया, और तभी से इस्मत को उकसाती रही ब्लॉग बनाने के लिए. जब भी उसकी ग़ज़ल सुनती, सोचती, काश ये रचनाएँ अन्य सुधिजन भी पढ़ पाते! जब भी मैं इस्मत से ब्लॉग बनाने के लिए कहती, उसके पास सौ बहाने होते. डेस्कटॉप खराब है, लैपटॉप श्रीमान जी ले जाते हैं. मुझे कम्प्यूटर और नेट
के बारे में बहुत कुछ नहीं आता, वगैरह-वगैरह
खैर लगातार पीछे पड़े रहने का नतीजा ये हुआ, कि झल्ला के उसने अपना ब्लॉग बना डाला :)
और दुनिया, जहान, वतन, समाज के तमाम हालात को लेकर इस्मत की खूबसूरत गौर-ओ-फ़िक्र का पैकर
"शेफ़ा" उपनाम के साथ हम सबके रूबरू आने लगा.

आज नौ अक्टूबर को उनके ब्लॉग ने सफलतापूर्वक एक वर्ष पूरा किया है, मेरी अनंत शुभकामनाएं अपनी इस इकलौती दोस्त के लिए, हमारी दोस्ती, और उसके ब्लॉग का सफ़र इसी तरह नित नई ऊंचाइयों को छुए.
तख़य्युलात की परवाज़ कौन रोक सका
परिंद जब ये उड़ा फिर कहीं रुका ही नहीं