कई दिनों से मन बनाए हूँ, कि दीवाली पर कुछ ज़रूर लिखूंगी. कम से कम एक संस्मरण का तो हक़ बनता है, छपने का बाहर काम कर रहे पेंटरों के बीच बेवजह
घूमती रही, और उनके काम में नुक्स निकालती रही. चार बजे के आस-पास लगा कि अब तो कोई काम जैसा काम रहा ही नहीं, अब कैसे व्यस्त दिखाई दें? तभी बिजली के नन्हे-नन्हें बल्बों की झालरें लिए, इलैक्ट्रीशियन महोदय नमूदार हुए, और हमारी बांछें खिल गईं
. व्यस्त होने का कारण मिल गया. हम यूं ही इलेक्ट्रिशियन पुष्पेन्द्र के साथ छत पर आ गए. एक घंटे तक उसे यहाँ-वहां की सलाह देते हुए, उसके काम में व्यवधान डालते रहे.
अम्मा की फोन पर तिवारी आंटी से बात हो रही थी, और वे कह रहीं थीं- " राजू ( उमेश जी) को तो टाइम ही नहीं मिलता, सारा काम तो हमारी वंदना ही करती है,वो चाहे घर का हो या बाहर का...... आज दिन भर से लगी है मजदूरों के साथ, हमारी तो बहू भी वही है और बेटा भी..... दिन भर की थकान कहाँ गायब हो गई, पता ही नहीं."
नीचे आये तो फिर याद आया कि आज तो कुछ लिखने का प्लान था..... लेकिन ये लिखना-लिखाना तो काम में शामिल नहीं है न, सो इरादा स्थगित कर दिया. लगा, शाम से नेट पर बैठ जाएंगे , तो पूरे दिन के किए हुए काम पर भी पानी फिर जाएगा
.
फिर बाहर आ गये. गमलों पर जो पेंट हो रहा था, उसे देखते और बिन मांगी सलाह देते रहे. बगल की गली
में कुछ बच्चे फुटबॉल -फुटबॉल खेल रहे थे, उन्हें घुड़का, क्यों कि उनकी फुटबॉल बार बार हमारी बाउंड्री के अन्दर आ रही थी
.
अब तक छह बज चुके थे, अन्दर से अम्मा कि आवाज़ आई- "वन्दना, चाय तो पी लो, फिर करना जो भी कर रही हो....." हम अन्दर की तरफ चले, भीतर से आवाज़ आ रही थी, अम्मा की फोन पर तिवारी आंटी से बात हो रही थी, और वे कह रहीं थीं-
" राजू ( उमेश जी) को तो टाइम ही नहीं मिलता, सारा काम तो हमारी वंदना ही करती है,
वो चाहे घर का हो या बाहर का...... आज दिन भर से लगी है मजदूरों के साथ, हमारी तो बहू भी वही है और बेटा भी..... "
दिन भर की थकान कहाँ गायब हो गई, पता ही नहीं.




