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सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

कोई आहट, कोई हलचल हमें आवाज़ न दे......

आज जगजीत सिंह चले गये................
कितना अजीब लगता है ये सोचना भी कि अब उनकी कोई नयी ग़ज़ल हमें सुनाई नहीं देगी. वो आवाज़ जो लाखों-करोड़ों दिलों पर राज कर रही थी, अब खामोश हो गयी है.
अचानक ब्रेन हेमरेज़ होने और ऑपरेशन होने के बाद उनसे सम्बन्धित कोई खबर किसी भी न्यूज़ चैनल में नहीं आ रही थी. अखबारों में भी कोई खबर नहीं थी, तो लगा कि शायद अब उनकी हालत बेहतर हो रही होगी. ये तो कल्पना भी नहीं की थी हमने कि वे इस तरह चुपचाप, इतनी जल्दी चले जायेंगे! लगता है जैसे हमने उन्हें अभी ही तो सुनना शुरु किया था! इतनी ताज़गी थी उनकी आवाज़ में कि उन्हें गाते हुए ३४ साल हो गये, लगता ही नहीं था.
मैं बहुत छोटी तो नहीं लेकिन स्कूल में पढती थी तब उन्हें सुनना शुरु किया. मेरी दीदी " पहले तो अपने दिल की रज़ा जान जाइये..." गाती रहती थीं, और मैने तभी जाना कि ये किन्हीं जगजीत सिंह-चित्रा सिंह की गायी ग़ज़ल है. फिर कुछ दिनों बाद उनका रिकॉर्ड "अनफ़ोर्गेटेबल" देखा. उसके बाद तो जगजीत सिंह की ग़ज़लों के साथ ही जैसे बड़ी हुई. उन दिनों " सरकती जाये है रुख से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता...." मेरी पसंदीदा ग़ज़ल होती थी.
कुछ और बड़ी हुई आकाशवाणी के युववाणी विभाग से जुड़ी तो मेरी हर ड्यूटी पर जगजीत जी की एक ग़ज़ल ज़रूर बजती थी. मेरे साथी कम्पेयरों ने कहना शुरु कर दिया था कि " आज जगजीत सिंह की ग़ज़ल बज रही थी तो हम जान गये कि आपकी ड्यूटी होगी, सो मिलने आ गये".
सन २००९ में जगजीत जी सतना के यूनिवर्सल केबिल्स लिमिटेड द्वारा आयोजित- " एक शाम-जगजीत सिंह के नाम" कार्यक्रम में आये थे. तब लगा जैसे बरसों पुरानी साध पूरी हो गयी हो. पूरे दिन शाम होने का इन्तज़ार करते रहे. मंच पर जगजीत जी आये तो आंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था कि हम उन्हें देख रहे हैं...उन्होंने गाना शुरु किया तो कानों पर से विश्वास उठ गया कि वे सामने से उन्हें सुन रहे हैं. कार्यक्रम नौ बजे शुरु हुआ. कब बारह बज गये पता ही नहीं चला. खुद जगजीत जी ने हाथ जोड़ के आज्ञा मांगी तो लगा कि अरे! अभी तो प्रोग्राम शुरु हुआ था!
पता नहीं कितने दिनों तक जगजीत जी की पुरकशिश आवाज़ का खुमार दिल-दिमाग़ पर छाया रहा. उनकी आवाज़ है ही ऐसी, जो बहुत जल्दी लोगों से रिश्ता क़ायम कर लेती है. एक बार सुन लेने के बाद इस आवाज़ को भुला पाना मुश्किल है.
जगजीत सिंह जी अब हमारे बीच नहीं हैं, इस बात पर भरोसा करने को जी नहीं चाहता, लेकिन सुबह से लेकर अभी तक प्रसारित हो रहे समाचार बार-बार इस खबर की पुष्टि कर देते हैं, जैसे कह रहे हों कि अब भरोसा कर लो.
जगजीत जी अब नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ हमेशा ज़िन्दा रहेगी हमारे दिलों में, हमारे सुरों में.
अश्रुपूरित श्रद्धान्जलि.

रविवार, 26 सितंबर 2010

नंदन जी के नहीं होने का अर्थ.....


कन्हैयालाल नन्दन नहीं रहे" नुक्कड पर ये खबर पढते ही लगा जैसे एकदम से रीत गई.... बचपन से लेकर आज तक पढे हुए नन्दन जी, सुने गये नन्दन जी याद आने लगे. याद आने लगी पराग में छपने वाली उनकी चिट्ठी, जिसका समापन- "तुम्हारा चाचा- नन्दन " से होता था. तब मेरी बाल-बुद्धि में केवल इतना ही आता था, कि ये मेरे चाचा हैं, तभी तो लिखते हैं- तुम्हारा चाचा, और ये भी कि ज़रूर इनका सम्बन्ध ’नन्दन(पत्रिका) से होगा, तभी तो सबको बताने के लिये अपने नाम के साथ नन्दन लिखते हैं..... बड़ी हुई, नन्दन जी को पढना जारी रहा, और नन्दन जी तथा सर्वेश्व्रर दयाल सक्सेना मेरे प्रिय कवि हो गये. ब्लॉग-जगत से जुड़ी, पता चला कि नन्दन जी अनूप शुक्ल जी के मामा जी हैं, तो वे मुझे मेरे ही परिवार के लगने लगे, ठीक मेरे मामा जी की तरह....

अजब संयोग है, अभी चार दिन पहले ही नन्दन जी की एक रिकॉर्डंग सुन रही थी, उनकी असरदार, दानेदार आवाज़ अभी भी कानों में गूंज रही है... उसी रिकॉर्डिंग की कुछ कविताएं श्रद्धान्जलि-स्वरूप-

ooo
नदी कि कहानी कभी फिर सुनाना,

मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना,

मुझे वो मिलेगा, ये मुझको यकीं है,


बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना

मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था,

भंवर देखना कूदना, डूब जाना,

अभी मुझसे, फिर आपसे फिर किसी से

मियां ये मुहब्बत है या कारखाना ?


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अंगारे को तुमने छुआ

और हाथ में फफोला नहीं हुआ

इतनी सी बात पर,

अंगारे पर तोहमत मत लगाओ

ज़रा तह तक जाओ,

आग भी कभी कभी

आपत धर्म निभाती है,

और जलने वाले की

क्षमता देख कर जलाती है.


o


लुटने में कुछ नहीं आज लूट ले,

लेकिन उसूल कुछ तो होंगे लूटमार के....


सब पी गए पूजा नमाज़ बोल प्यार के,

और नखरे तो ज़रा देखिये, परवरदिगार के.

o

एक नाम अधरों पर आया,

अंग-अंग चंदन वन हो गया.


बोल है कि वेद की ऋचायें,

सांसों में सूरज उग आयें


आखों में ऋतुपति के छंद तैरने लगे,
मन सारा नील गगन हो गया.

गंध गुंथी बाहों का घेरा,
जैसे मधुमास का सवेरा

फूलों की भाषा में देह बोलने लगी,
पूजा का एक जतन हो गया.

पानी पर खीचकर लकीरें,
काट नहीं सकते जंजीरें

आसपास अजनबी अधेरों के डेरे हैं,
अग्निबिंदु और सघन हो गया.


एक नाम अधरों पर आया,
अंग-अंग चंदन वन हो गया.