रविवार, 26 सितंबर 2010

नंदन जी के नहीं होने का अर्थ.....


कन्हैयालाल नन्दन नहीं रहे" नुक्कड पर ये खबर पढते ही लगा जैसे एकदम से रीत गई.... बचपन से लेकर आज तक पढे हुए नन्दन जी, सुने गये नन्दन जी याद आने लगे. याद आने लगी पराग में छपने वाली उनकी चिट्ठी, जिसका समापन- "तुम्हारा चाचा- नन्दन " से होता था. तब मेरी बाल-बुद्धि में केवल इतना ही आता था, कि ये मेरे चाचा हैं, तभी तो लिखते हैं- तुम्हारा चाचा, और ये भी कि ज़रूर इनका सम्बन्ध ’नन्दन(पत्रिका) से होगा, तभी तो सबको बताने के लिये अपने नाम के साथ नन्दन लिखते हैं..... बड़ी हुई, नन्दन जी को पढना जारी रहा, और नन्दन जी तथा सर्वेश्व्रर दयाल सक्सेना मेरे प्रिय कवि हो गये. ब्लॉग-जगत से जुड़ी, पता चला कि नन्दन जी अनूप शुक्ल जी के मामा जी हैं, तो वे मुझे मेरे ही परिवार के लगने लगे, ठीक मेरे मामा जी की तरह....

अजब संयोग है, अभी चार दिन पहले ही नन्दन जी की एक रिकॉर्डंग सुन रही थी, उनकी असरदार, दानेदार आवाज़ अभी भी कानों में गूंज रही है... उसी रिकॉर्डिंग की कुछ कविताएं श्रद्धान्जलि-स्वरूप-

ooo
नदी कि कहानी कभी फिर सुनाना,

मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना,

मुझे वो मिलेगा, ये मुझको यकीं है,


बड़ा जानलेवा है ये दरमियाना

मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था,

भंवर देखना कूदना, डूब जाना,

अभी मुझसे, फिर आपसे फिर किसी से

मियां ये मुहब्बत है या कारखाना ?


o


अंगारे को तुमने छुआ

और हाथ में फफोला नहीं हुआ

इतनी सी बात पर,

अंगारे पर तोहमत मत लगाओ

ज़रा तह तक जाओ,

आग भी कभी कभी

आपत धर्म निभाती है,

और जलने वाले की

क्षमता देख कर जलाती है.


o


लुटने में कुछ नहीं आज लूट ले,

लेकिन उसूल कुछ तो होंगे लूटमार के....


सब पी गए पूजा नमाज़ बोल प्यार के,

और नखरे तो ज़रा देखिये, परवरदिगार के.

o

एक नाम अधरों पर आया,

अंग-अंग चंदन वन हो गया.


बोल है कि वेद की ऋचायें,

सांसों में सूरज उग आयें


आखों में ऋतुपति के छंद तैरने लगे,
मन सारा नील गगन हो गया.

गंध गुंथी बाहों का घेरा,
जैसे मधुमास का सवेरा

फूलों की भाषा में देह बोलने लगी,
पूजा का एक जतन हो गया.

पानी पर खीचकर लकीरें,
काट नहीं सकते जंजीरें

आसपास अजनबी अधेरों के डेरे हैं,
अग्निबिंदु और सघन हो गया.


एक नाम अधरों पर आया,
अंग-अंग चंदन वन हो गया.


गुरुवार, 16 सितंबर 2010

राज कर रही है तीन बेटों की मां...

कुछ दिन हुए, अपने मेहमानों को छोड़ने स्टेशन गई थी। तभी वहाँ मैंने देखा कि एक जर्जर बुढ़िया किसी प्रकार अपने पैर घसीटती संकोच सहित भीख मांग रही है। हालाँकि इसमें नया कुछ भी नहीं है। सैकड़ों बुजुर्ग महिलायें इस प्रकार भीख मांग रहीं हैं। लेकिन मेरे लिए नई बात ये थी कि ये वही बूढी अम्मा थी जिसने कई सालों तक हमें हमारे ऑफिस में चाय पिलाई थी।
पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ, कि ये अम्मां है, लेकिन जैसे ही मैने उसे आवाज़ दी, अम्मां मुझसे लिपट के रोने लगी. इस वाकये से पहले मुझे ये नहीं मालूम था कि उसके बेटों ने उसे भिखारी बना दिया है.
जाति से कुलीन ब्राह्मणी इस अम्मा के तीन बेटे हैं। तीनों अच्छा-भला कमा रहे हैं। थोडी बहुत ज़मीन भी है। बूढी अम्मा के पति की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी , सो अम्मा ने ही चाय की दुकान के ज़रिये अपने पाँच बच्चों का भरण-पोषण किया। उन्हें पढाया-लिखाया भी। बड़ा लड़का सरकारी नौकरी में है, बीच वाला किसी फैक्ट्री में है और तीसरा प्रैस में काम करता है। अम्मा तीसरे के पास ही रहती थी, क्योंकि दो बड़े पहले ही उसे निष्कासित कर चुके थे। लेकिन अब इस तीसरे ने भी उसे घर से निकाल दिया था। जबकि अम्मा घर का पूरा काम करती थी । उम्र अधिक हो जाने के कारण दुकान ज़रूर नहीं चला पाती थी। घर का काम भी अब उतनी फुर्ती से नहीं कर पाती थी। लिहाज़ा उसे घर में रखने योग्य नहीं समझा गया.
पिछले एक हफ़्ते से अम्मां मेरे पास रह रही है, और इस बीच उसके एक भी सपूत ने ,उसकी खोज खबर लेने की कोशिश नहीं की. इस बार घर से बाहर करने के पीछे बहू की वो साड़ी थी, जिसे अम्मां ने थोड़ी देर के लिये पहन लिया था.
न मेरी समझ में ऐसी बहुएं आती हैं और न ही बेटे. ये बहुएं क्या अपनी मां के साथ ऐसा ही व्यवहार करती होंगीं? और बेटे???? कैसे ८५ साल की बूढी, जर्जर मां को घसीट के घर से बाहर किया होगा? कैसे अपनी मां को भीख मांगते देख पाते होंगे? देखते तो ज़रूर होंगे, क्योंकि उसी शहर में रहते हैं.
अम्मा मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करती हैं। वे जब भी मुसीबत में होती हैं, तो मेरे पास आ जाती हैं. कुछ दिन रहती हैं, फिर लड़कों का मोह उन्हें सताने लगता है. जो लड़के उन्हें हर घड़ी दुत्कारते रहते हैं, उन्हीं के बच्चों को याद करके रोने लगती है. परिवार का, ऐसे परिवार का जिसमें उनके लिये कोई जगह ही नहीं है, मोह उन्हें आज भी छोड़ता नहीं।
तीन बेटों की माँ यदि भीख माँगने पर मजबूर हो तो बेहतर है, कि ऐसे बेटे पैदा ही न हों।
सोचने पर मजबूर हूँ, कि तमाम बेटों के कारनामे पढ़ने-देखने- भोगने के बाद भी लोग बेटों की पैदाइश ही क्यों चाहते है?

सोमवार, 23 अगस्त 2010

रक्षा सूत्र... कैसे-कैसे....

कई दिनों से सोच रही हूँ, कुछ लिखूं, आज लिखने बैठी तो रक्षा बंधन के लिए!
क्या लिखूं उस त्यौहार पर, जिसे मैंने कभी महसूस ही नहीं किया? बहन का भाई के प्रति या भाई का बहन के प्रति कैसा स्नेह होता होगा, पता ही नहीं..... क्योंकि मेरा कोई भाई ही नहीं है. वैसे तो मेरे खानदान में लड़कों की भरमार है, सो भाइयों की कमी नहीं है, लेकिन न हम बहनों का कोई सगा भाई है, न हमने कभी उसकी कमी महसूस की.
जब छोटी थी, तब ज़रूर सोचती थी कि हमारा कोई भाई क्यों नहीं है? लेकिन ये सोचना भी क्षणांश के लिए होता था. कारण, हमें कभी ये महसूस ही नहीं होने दिया गया कि हमारा भाई नहीं है, या वो होता तो बेहतर होता. हम छह बहनों को जिस लाड-प्यार और एहतियात से पाला गया, वो लिखने का मसला नहीं है.
याद आता है बचपन का रक्षा बंधन, जब हम बहनों के लिए नए कपडे आते, नौगाँव में रक्षा बंधन के पहले मेला लगता, ( बुंदेलखंड में आज भी मेले कि प्रथा है) मैं दीदी के साथ जाती और तमाम खिलौने खरीदती, खूब सारी राखियाँ खरीदीं जातीं. उस दिन मम्मी खूब अच्छा-अच्छा खाना बनाती.... पूरी, कचौड़ी, खीर, दही बड़े और


एक बार मैंने मम्मी से पूछा था- "कि गुड्डो तो अपने भाई को राखी बांधती है, फिर हम पापा जी को क्यों बांधते हैं?" मेरी मम्मी ने बड़े प्यार से समझाया था- "रक्षा बंधन रक्षा सूत्र बाँधने का त्यौहार है, जो रक्षा करे, उसे ही ये रक्षा-सूत्र, यानि राखी बांधनी चाहिए, ज़रूरी नहीं कि वो तुम्हारा भाई ही हो."
मिठाइयाँ बाज़ार से आतीं..... हम नहा-धो के तैयार होते, और अपने पापा को बड़े शौक से राखी बांधते, बदले में हम सबको रुपये मिलते. फिर हम बहने एक दूसरे को राखी बाँध देते, और पूरा कार्यक्रम मेरी मम्मी बड़े स्नेह से करवातीं. एक बार मैंने मम्मी से पूछा था- "कि गुड्डो तो अपने भाई को राखी बांधती है, फिर हम पापा जी को क्यों बांधते हैं?" मेरी मम्मी ने बड़े प्यार से समझाया था- "रक्षा बंधन रक्षा सूत्र बाँधने का त्यौहार है, जो रक्षा करे, उसे ही ये रक्षा-सूत्र, यानि राखी बांधनी चाहिए, ज़रूरी नहीं कि वो तुम्हारा भाई ही हो."
मेरी समझ में बात आ गई थी. फिर कभी नहीं पूछा. बाद में बड़े होने पर तो मम्मी की बात और भी ज्यादा सही लगने लगी. मेरी ननदों की, डाक द्वारा आईं हुई राखियाँ मैं उमेश जी को बांधती हूँ :) आखिर अब रक्षा का भार तो उन्ही पर है न? कभी किसी संकट में पड़ी, तो कौन सा भाई आकर मदद करेगा? सबसे पहले रक्षा करने वाले, मदद करने वाले उमेश जी ही होंगे न? तब रक्षा सूत्र उन्हें ही क्यों न बाँधा जाए?
वैसे ये केवल मेरा विचार है, और मैं इस पर अमल करती हूँ, बल्कि तोहफे भी लेती हूँ, लड़ - झगड़ के, फिर वो चाहे कैडबरीज़ का सेलिब्रेशन पैक ही क्यों न हो.
भाई-बहन के स्नेह का ये त्यौहार अपनी गरिमा बनाए रखे, आप सब को बहुत बहुत शुभकामनाएं.

शनिवार, 14 अगस्त 2010

भारत वर्ष हमारा है......


भारतवर्ष हमारा है, सबका राजदुलारा है,
कोटि-कोटि संतानों की, आखों का उज्ज्वल तारा है !

इसकी माटी मेरा तन, इसका आँगन मेरा मन,
इस धरती का कंकर-पत्थर, है मेरे जीवन का धन !
इसकी शान हमारी शान, इसकी आन हमारी आन,
कोई उठावे आँख देश पर, हम को नहीं गवारा है !
भारतवर्ष...
उत्तर का अधिवासी चीन, मन का काला तन का पीन,
बढ़ा आ रहा है छल-बल से, सीने पर ताने संगीन,
अपने शीश कटा देंगे, दुश्मन को दूर हटा देंगे,
निकल-निकल ओ क्रूर लुटेरे ! यह लद्दाख हमारा है !
भारतवर्ष...
तन दो, मन दो औ' धन दो, अपना सम्पूर्ण समर्पण दो,
एक हाथ से रक्त-दान दो, दूजे से आज़ादी लो,
रुकना नहीं हमारा काम, झुकना नहीं हमारा काम,
'है आराम हराम' यही नेहरु-सुभाष का नारा है !
भारतवर्ष...
वीर शिवा की हम संतान, राणा के रण की हैं आन,
हम झांसी की रानी माँ के, उर-पालित स्वप्निल अरमान,
हमें शपथ माँ-आँचल की, गंगा-यमुना के जल की,
कोई न दुश्मन टिक पायेगा, दृढ संकल्प हमारा है !
भारतवर्ष....
मेरा धर्म--हमारा देश, मेरा कर्म--हमारा देश,
जीवन और जगत-संयोजक, मेरा मर्म--हमारा देश,
मत्त समीरण मेरी सांस, कण-कण में मेरा विश्वास,
मैं प्यारा हूँ भारत माँ को, भारत मुझको प्यारा है !

भारतवर्ष हमारा है, सबका राजदुलारा है.....

( यह गीत मेरे पिताजी श्री रामरतन अवस्थी जी ने मेरे जन्म से भी पहले कभी लिखा था, ऐसा इसलिये कह रही हूं, क्योंकि मैं जब कुछ बड़ी हुई, तभी से इसे गुनगुना रही हूं, मेरी बड़ी दीदी तो इसे बहुत सुन्दर धुन में गाती भी हैं.)
स्वाधीनता दिवस पर अनन्त शुभकामनाएं.

रविवार, 11 जुलाई 2010

चिट्ठी न कोई संदेश.....

पूरी छुट्टियां निकल गईं, और उस अलमारी की सफाई नहीं कर पाई, जो साल भर से मेरा मुंह जोह रही थी, आज बिना किसी प्लान के उसे साफ़ करने बैठ गई. एक बड़ा सा लिफाफा दिखाई दिया, पिछले कई सालों से इस लिफ़ाफ़े को बिना देखे ही पोंछ-पांछ के रख देती थी, आज खोल लिया....... तमाम अंतर्देशीय, पोस्ट कार्ड, और लिफ़ाफ़े सामने बिखर गए..... और इन सारी चिट्ठियों के पीछे हमारे पोस्टमैन चाचा का चेहरा उभर कर दिखाई देने लगा.......
लगा कितने दिन हो गए किसी की चिट्ठी आये हुए.....
कितनी बार रोका है खुद को पुराने किस्से लिखने से, लेकिन क्या करुँ, पिछले बीस सालों में समय
कुछ ऐसे बदला हैं, कुछ आदतें इस क़दर ख़त्म हुईं हैं, कि लिखने कुछ और बैठती हूँ, लिख कुछ और ही जाता है... आज भी नए टीवी शो " बिग-मनी" पर लिखने का मन बनाया था, लेकिन बीच में ये चिट्ठियाँ आ गईं....... मन फिर वही नौगाँव की गलियों में भटकने लगा....
वो समय पोस्ट-ऑफिस के स्वर्ण युग की तरह था. चिट्ठी, तार, टेलीफोन, पार्सल, रजिस्ट्री, मनी ऑर्डर..... सारे काम पोस्ट ऑफिस से, पोस्ट मैन कितने महत्वपूर्ण होते थे तब. घरों में फोन लगवाने का चलन नहीं था . टेलीफोन तब केवल ऑफिसों में, बड़े सरकारी अधिकारियों के घरों में होते थे. सार्वजनिक रूप से टेलीफोन की सुविधा केवल पोस्ट ऑफिस में ही मिलती थी. लोग भी जब बहुत ज़रूरी हो, तभी फोन लगाने जाते थे. बाहर कहीं फोन लगाना है, तो ट्रंक-कॉल बुक होती थी. लाइन मिलने पर खूब चिल्ला-चिल्ला के बात करनी पड़ती थी. शायद इसीलिये पुराने लोग आज भी मोबाइल पर ज़ोर-ज़ोर से बात करते मिल जायेंगे... :)
पोस्ट ऑफिस का अपना अलग ही रुतबा था. और पोस्ट-मास्टर से ज्यादा पोस्ट मैन का. हम घर में पोस्ट मैन का इंतज़ार इस तरह करते थे, जैसे किसी ख़ास मेहमान का. सुबह ग्यारह बजे और दोपहर में एक बजे डाक आती थी. हम सब भाई-बहन इस कोशिश में रहते कि पत्र उसी के हाथ में आये, भले ही वो हमारे काम का हो या न हो. हमारे कान बाहर ही लगे रहते.

तो पोस्ट ऑफिस का अपना अलग ही रुतबा था. और पोस्ट-मास्टर से ज्यादा पोस्ट मैन का. हम घर में पोस्ट मैन का इंतज़ार इस तरह करते थे, जैसे किसी ख़ास मेहमान का. सुबह ग्यारह बजे और दोपहर में एक बजे डाक आती थी. हम सब भाई-बहन इस कोशिश में रहते कि पत्र उसी के हाथ में आये, भले ही वो हमारे काम का हो या न हो. हमारे कान बाहर ही लगे रहते. उधर पोस्ट मैन की आवाज़ आई, इधर हम गिरते-पड़ते भागते... चिट्ठी पा जाने वाला विजेता की मुद्रा में मुस्कुराता, पत्र खोलता, हमारी आँखें उस पर लगी रहतीं- " किसका है?" जिसे पत्र मिलता, उसे ही पत्र पढ़ के सुनने का हक़ होता. घर के सारे पढ़े-लिखे लोग, पत्र सुनने बैठ जाते.
सुनने के बाद , यदि किसी ख़ास का पत्र है, तो बारी-बारी से सब पढ़ते. राय-मशविरा होता. और फिर उसे हमारे पापा अपनी फ़ाइल में सहेज लेते. पत्रों के जवाब देना उनकी दिनचर्या में शामिल था.
हमारे पोस्ट मैन , जिन्हें हम चाचा कहते थे, बड़ी दूर से "अवस्थी जीईईईई ........." की हांक लगाते थे, जिस पर हम दौड़े चले आते थे.
कुछ और बाद में जब मैं छपने लगी तो मेरी फैन-मेल आने लगी, अब पोस्ट मैन चाचा मेरे लिए और भी ख़ास हो गए थे. रचनाएं वापस न आ रहीं हों, इस डर से मेरी कोशिश होती थी कि पोस्ट मैन के आने के वक्त मैं ही बाहर रहूँ :)
धीरे-धीरे टेलीफोन का चलन बढ़ा, तो चिट्ठियों में कुछ कमी आई. लेकिन अब, जब से मोबाइल का चलन बढ़ा है, नेट का चलन आम हो गया है, पत्र आने ही बंद हो गए. कभी कोई सरकारी डाक आ जाती है बस. लोग पत्र लिखना ही भूल गए. अब तो ये भी नहीं मालूम कि लिफाफे या पोस्ट कार्ड की कीमत आज कितनी है?
इन त्वरित सेवाओं ने निश्चित रूप से दूरियां काम की हैं, लेकिन इनसे उस काल-विशेष को सहेजा नहीं जा सकता. यादों में शामिल नहीं किया जा सकता, किसी बात का अब साक्ष्य ही नहीं...... सब मौखिक रह गया...लिखित कुछ भी नहीं....
कभी-कभी सुविधाएं भी कितनी अखरने लगतीं हैं.....

शनिवार, 29 मई 2010

जहां शराब है, नशा नहीं...


दस तारीख को हम नहा-धो के ओल्ड-गोआ की सैर के लिये निकल पड़े. ओल्ड गोआ पुरानी इमारतों से समृड्ध इलाका है. यहां सेंट ज़ेवियर चर्च के नाम से मशहूर
बेसिलिका ऑफ़ बॉम जीसस चर्च गये. यह कैथोलिक चर्च भारत में बारोक-वास्तुकला का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है. बेसिलिका में सेंट फ़्रान्सिस ज़ेवियर के पवित्र अवशेष रखे हैं जो गोवा के संरक्षक संत थे.
मैज़ोर्डा बीच

सेंट ज़ेवियर चर्च, सेंट कैथेड्रल चर्च, और " क्रूस-चौरा"( ये नाम मैने दिया है...:)
इसके बाद हम सेंट कैथेड्रल चर्च गये. यह एशिया का सबसे बड़ा गिरजाघर है, जिसे अलेग्ज़ेन्ड्रिया के सेंट कैथोरिन को समर्पित किया गया है, लिहाजा इसे सेंट कैथेरिन चर्च भी कहते हैं. चर्च में स्थित संग्रहालय तो इतना बड़ा है, कि हम चलते-चलते थक ही गये. इस चर्च के बाहर इतना सुन्दर लॉन और बगीचा है, कि हम थोड़ी देर वहां बैठने का लोभ संवरण नहीं कर सके.

सेंट कैथेड्रल चर्च के पास ही वैक्स म्यूज़ियम है, जिसे लंदन के मैडम तुसाद संग्रहालय की तर्ज़ पर बनाया गया है.
ओल्ड गोआ-दर्शन के बाद उसी दिन हमने पन्जिम-चर्च भी देखा. चर्च घूमने के बाद हमारे ड्राइवर की सलाह् पर हम मंगेशी मंदिर भी उसी दिन घूम आये. सुन्दर और साफ़-सुथरा मंदिर है ये.

अगले दिन हम गोआ के समुद्री तटों पर घूमने गये. सबसे पहले हम मीरामार बीच गये जो घर के पास ही है. उसके बाद मैज़ोर्डा बीच गये. इस बीच की खासियत है कि यहां की बालू सुनहरे-सफ़ेद रंग की है. ऊंची उठती लहरें, यहां-वहां घूमते सैलानी, विदेशी पर्यटक , स्थानीय जन, लेकिन कचरे का एक तिनका भी नहीं. बहुत सुन्दर बीच है ये. बाद में हमने कोल्वा , कालन्गुट, बागाटोर, बागा और अन्जुना बीच भी देखा. ये सभी बीच बेहद सुन्दर हैं. गोआ के समुद्री तटों की खासियत है वहां की सफ़ाई. बीच पर खाने-पीने का कोई स्टॉल नज़र नहीं आयेगा, किसी एक बीच पर रशियन स्टॉल था भी, लेकिन ये केवल "पीने" का स्टॉल था :) .
वैसे पीने की भली चलाई. जिस तरह हमारे यहां पान की दुकानें हैं, उसी प्रकार गोआ में शराब की दुकानें हैं. खुले आम शराब बिकती है, लेकिन मज़े की बात ये , कि कोई भी नशे में झूमता नहीं मिलता.
एक बात और, अपने छोटे-छोटे मन्दिरों की तरह गोआ में हर बीस कदम पर एक छोटा सा चर्च मिल जायेगा, जहां क्रूस स्थापित होता है, या जीसस की छोटी सी प्रतिमा. हमारे घरों में जैसे तुलसी-चौरे होते हैं, ठीक उसी तरह गोआ के हर घर के बाहर ’क्रूस-चौरा’ मिल जायेगा. शाम को इन छोटे-छोटे चर्चों के बाहर लोग जमा होते हैं और मोमबत्तियां जला के प्रेयर करते हैं.
कोल्वा बीच पर विधु , छोटा चित्र मंगेशी-मंदिर का.
हम जब कालन्गुट बीच जा रहे थे तब रास्ते में हमने अगौडा-फ़ोर्ट भी देखा. कोल्वा बीच जाते हुए जब हमें रास्ते में कोल्वा गांव मिला तो उस गांव के घर देख के हम चकित थे. इतने शानदार और आधुनिक डिज़ाइन के घर! हमारे यहां तो इसे बंगला कहते हैं. गोआ में कहीं भी गरीबी दिखाई ही नहीं देती. दिल्ली या मुम्बई की तरह झुग्गियां तो बिल्कुल भी नहीं.
गोआ की एक और खास पहचान है, वहां की मांडवी नदी. इस नदी के चौड़े पाट पर ढेर सारे छोटे-बड़े जहाजनुमा कैसिनो हैं. जो दिन-रात लाखों की कमाई करते रहते हैं. बड़े-बड़े क्रूज़ हैं, जो आपको सैर कराते हैं.
चौदह मई को हमें गोआ से निकलना था, और तेरह मई को उमेश जी के हाथ में फ़्रैक्चर हो गया, अन्जुना बीच पर. लेकिन यात्रा सुखद और यादगार रही. भविष्य में मौका मिला तो एक बार फिर ज़रूर जाना चाहूंगी गोआ के खूबसूरत समुद्री-तटों पर.
गोआ के गांवों के घर, यहां मैं एक ही चित्र लगा रही हूं, गांव का हर घर इतना ही सुन्दर और अलग-अलग रंगों से पुता हुआ था. छोटा चित्र मांडवी नदी पर कैसिनो का है.
तस्वीरें: उमेश दुबे

सोमवार, 24 मई 2010

परीकथा सा सुन्दर, गंगाजल सा निर्मल....

गोवा की अधूरी पोस्ट पर इतनी झिड़कियां (स्नेहसिक्त) मिलीं, कि तुरन्त आगे का वृतांत लिखने बैठ गई.
तो शुरु करूं? :)

पिछले कई सालों से इस्मत( ज़ैदी "शेफ़ा कजगांववी" ) गोवा आने का आग्रह कर रही थीं और हम हर बार आने का आश्वासन दे रहे थे. लेकिन इस बार उन्होंने धमकाते हुए पूछा-
" गोआ पहुंचने की तारीख बताओ"
हम डर गये. कहा-
" कल ही रिज़र्वेशन करवाते हैं और तुम्हें तारीख बताते हैं."
आनन-फानन रिज़र्वेशन हुआ और इस्मत को खबर की गई कि हम आठ मई को सतना से रवाना होंगे और दस मई को गोआ पहुंच जायेंगे.
इस्मत, ज़हूर भाई, आश्ती और मुशीर सब प्रसन्न. यहां हम अपनी खरीदारी में व्यस्त हो गये. तैयारियां अपने शबाव पर थीं कि एक रात इस्मत का फोन आया-
" अत्यंत आवश्यक कार्यवश मुझे बाहर जाना पड़ रहा है, कम से कम एक महीने के लिये."
खबर सुनते ही अपनी गोआ-यात्रा रद्द होने के शोक में हमारे चेहरे लटक गये. लेकिन उधर इस्मत और ज़हूर भाई दोनों का आग्रह था कि किसी प्रकार हमारा कार्यक्रम बना है, लिहाजा इसे रद्द न करें और नियत समय पर गोआ पहुंचे. खैर हमने उनके आग्रह का मान रखा और आठ मई को अपनी यात्रा पटना-वास्कोडिगामा सुपर फ़ास्ट ट्रेन से रात ग्यारह बजे शुरु की.
सतना से लेकर खंडवा तक केवल वीरान, सूखे जंगल और बंजर ज़मीन के दर्शन हुए. लेकिन भुसावल के बाद मन प्रसन्न हो गया. चारों ओर हरियाली का साम्राज्य. ट्रेन जब कोंकण क्षेत्र में पहुंची तब तो हम विस्मित हो गये. लगा इसे ही तो स्वर्ग कहते हैं!
पानी से लबालब भरी नदियां, नारियल, आम और भी कई तरह के वृक्षों से अटे पड़े जंगल.!! केवल हरियाली और पानी. ऊंची-ऊंची पहड़ियां, लेकिन घने पेड़ों से आच्छादित. दूर से हरे-हरे पहाड़ दिखाई दिखाई दे रहे थे, जैसे कोई चित्र देख रहे हों.

अंगूर के खेत और कोंकण की लबालब भरी नदियां.

मध्य-प्रदेश के सूखे से त्रस्त मैं, जब भी कोई हरी-भरी सीनरी देखती थी, तो सोचती थी , कि पक्का कलाकार ने मनगढंत चित्र बनाया होगा, लेकिन यहां प्रकृति की चित्रकारी देख विस्मित थी.
दस मई की सुबह हमारी ट्रेन अपने निर्धारित समय से पहले ही गोआ के "करमली" स्टेशन पहुंच गई. इस स्टेशन पर बने बांस के खूबसूरत यात्री पैदल पुल को देख कर तो हम आश्चर्य में पड़ गये. पुल को पार कर के जब हम एक नम्बर प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंचे तो तय नहीं कर पा रहे थे, कि हम स्टेशन पर हैं या किसी पार्क में? हमें तो कचरे से अटे, पान की पीक से रंगे स्टेशन की आदत है, सो कदम-कदम पर चकित हो रहे थे.
पणजी का मुख्य चौराहा,------ करमली स्टेशन का भीतरी दृश्य.
दस मिनट के अन्दर ही ज़हूर भाई हमें लेने स्टेशन पर आ गये. सामान गाड़ी में लादा और हम भी साथ में लद लिये. गाड़ी ओल्ड-गोआ से होती हुई पणजी में प्रविष्ठ हुई , जहां से हमारा घर दस मिनट की दूरी पर था, तभी हमें याद आया कि हम अपना पर्स, जिसमें पांच हज़ार रुपये, मेरे सारे एटीएम कार्ड्स, पैन-कार्ड, पत्रकार संघ का आई कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र, घर की सारी चाबियां, पूरे लगेज की चाबियां साथ में वापसी के टिकट और मेरे सोने के दो कंगन थे, स्टेशन के बगीचे की फ़ेंस पर ही छोड़ आये हैं :(
ज़हूर भाई ने बिना कुछ कहे, गाड़ी मोड़ी और हम वापस स्टेशन चल दिये.
हमारी गाड़ी ने जैसे ही स्टेशन में प्रवेश किया, हमारे उतरने के पहले ही, वहां टैक्सी स्टैंड पर खड़े टैक्सी ड्राइवर आवाज़ दे के कहने लगे,
" मैम आपका पर्स यहां छूट गया था, हमने अन्दर जमा करवा दिया है."
दो-तीन टैक्सी-ड्राइवर हमारे साथ अन्दर गये, और स्टेशन मास्टर व्यंक्टेश को बताया कि हमारा ही पर्स उन्होंने जमा करवाया है, तब एक एप्लीकेशन लेने के बाद पर्स हमें दे दिया गया, हमने देखा, पूरा सामान ज्यों का त्यों था. विकी नाम के जिस टैक्सी ड्राइवर को पर्स मिला, उसने कहा कि
"मैने पहले पर्स खोल के देखा, कि यदि कोई फोन नम्बर मिल जाये तो हम खबर कर दें, लेकिन जब नम्बर नहीं मिला तो हमने जमा कर दिया"
एक बार फिर हमारे चकित होने की बारी थी. यदि कोई और जगह होती तो क्या पर्स मिलता? छूटा हुआ रूमाल तो मिलता नहीं......
नतमस्तक थी गोआवासियों की ईमानदारी पर. तो ये थी मेरी पहली मुलाकात गोआ से. इस पहली मुलाकात ने ही अभिभूत कर दिया.
करमली स्टेशन का विहंगम दृश्य.

तस्वीरें: उमेश दुबे
(क्रमश:)