'बातों वाली गली' विलम्ब से निकली अपने घर से सो सबका इंतज़ार थोड़ा लम्बा तो हुआ, लेकिन अब खुशी इस बात की है कि अब ये अलग-अलग पतों पर, अलग-अलग शहरों में अपनी पहुंच बना रही है। कल मित्रवर Charu Shukla जी को किताब मिली और उन्होंने एक ही बैठक में उसे न केवल पढ़ डाला बल्कि शानदार टिप्पणी भी लिख के पोस्ट की। बहुत शुक्रिया चारु जी। आपके लिए यहां कॉपी कर लाये हैं चारु जी की पोस्ट। पढ़ें किताब के बारे में आप भी-
बाकी सारी कहानियां अपने आप में कहीं गुदगुदाती हैं तो कहीं प्रश्न भी लेकर खड़ी नज़र आती हैं कि,आखिर बदला क्या? बाकी नारी मन की जितनी गहरी पड़ताल आपने की है, वो प्रश्न भी है, सोचने पर मजबूर भी करता,
वंदना जी आप साल दर साल यूं ही लिखती रहें, इतनी बेहतरीन रचना के लिए बहुत बहुत शुक्रिया और उम्मीद है आगामी रचना जल्द पढ़ने मिले
से मेरी कहानियां अब पुस्तक रूप में आपके पास पहुंचने को बेताब हैं. लेकिन पहुंचेंगी तभी, जब आप इन्हें मंगवायेंगे 😖 बहुत से साथी ऑर्डर कर चुके हैं, जिन्होंने नहीं किया, उम्मीद है वे भी जल्दी ही प्रति मंगवाने का बंदोबस्त करेंगे. मैं आज आप लोगों से भी खुल के किताब खरीदने की अपील कर पा रही हूं, क्योंकि मैने किताबें हमेशा ही खरीद के पढ़ने की आदत डाली है, खासतौर से अपने दोस्तों की किताबें. जब नामचीन लेखकों की किताबें हम खरीद के पढ़ते हैं तो अपने दोस्तों की किताब ही मुफ़्त में क्यों पाना चाहेंगे? है न? तो अब ज़रा जल्दी-जल्दी हाथ चलाइये इस लिंक पर. 
