शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

बातों वाली गली : चारू शुक्ला की नज़र में




अपनी रचनाओं का किताब के रूप में प्रकाशित होना, लोगों के हाथों में किताब का पहुंचना और फिर सुधि पाठकों की उस पर प्रतिक्रिया आना कितना सुखद है ये वही समझ सकता है, जिसकी पहली किताब प्रकाशित हुई हो. बाद की किताबों के लिये शायद उतना रोमांच न रह जाता हो. " बातों वाली गली" पर प्रतिक्रियाएं मिलनी शुरु हो गयी हैं, जिन्हें मैं क्रमश: यहां पोस्ट करूंगी. तो ये रही पहली प्रतिक्रिया चारु शुक्ला जी की- चारु जी ने इस किताब पर एक गीत भी रच डाला है, उसका वीडियो भी देखें -
'बातों वाली गली' विलम्ब से निकली अपने घर से सो सबका इंतज़ार थोड़ा लम्बा तो हुआ, लेकिन अब खुशी इस बात की है कि अब ये अलग-अलग पतों पर, अलग-अलग शहरों में अपनी पहुंच बना रही है। कल मित्रवर Charu Shukla जी को किताब मिली और उन्होंने एक ही बैठक में उसे न केवल पढ़ डाला बल्कि शानदार टिप्पणी भी लिख के पोस्ट की। बहुत शुक्रिया चारु जी। आपके लिए यहां कॉपी कर लाये हैं चारु जी की पोस्ट। पढ़ें किताब के बारे में आप भी-
इंतज़ार बहुत सालता,तब जब ये लगातार बना रहता कि आज अब न जाने कब पूरा हो, पर सच में जब पूरा होता तो खुशी दोगुनी बढ़ा देता, ऐसा ही कुछ अचानक आज हुआ, जब हमारे इंतज़ार पर लगाम लगा दी, डाक बाबू ने आकर, एकदम से वो गीत याद आ गया, डाकिया डाक लाया, अर्सा गुज़र गया डाक बाबू का इंतज़ार न किया, पर इसको भी फिर जीने का अवसर दिया, वंदना अवस्थी दुबे जी ने अपनी पहली कृति बातों वाली गली लिखकर, तो साहब अपना इंतज़ार आज खत्म पर बातों का सिलसिला तो अभी शुरू ही हुआ है, अब इसे अच्छी कहूं कि बुरी पर आदत तो बस आदत है, कोई अच्छी रचना हाथ लगी नहीं की, जब तक पूरी न पढ़ लें चैन कहाँ, तो कुछ ऐसा ही सफ़र शुरू हुआ बातों वाली गली का, जो अचला नागर जी की शानदार भूमिका और वंदना जी की अपनी कही के साथ, अलग अलग दायरे, अनिश्चितता में,ज्ञातव्य,आस पास बिखरे लोग,बातों वाली गली,नहीँ चाहिए आदी को कुछ,हवा उद्दंड है, नीरा जाग गई है, रमणीक भाई नहीं रहे, सब जानती है शैव्या,अहसास,दस्तक के बाद,प्रिया की डायरी, करत करत अभ्यास के, बड़ी हो गईं हैं ममता जी,विरुद्ध,सब तुम्हारे कारण हुआ पापा,डेरा उखाड़ने से पहले,शिव बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी से होता हुआ बड़ी बाई साब पर जाकर खत्म हुआ, वंदना जी की कहानियां जहां आस पास की जान पड़ती हैं तो वहीँ उनके पात्र तो लगता कि अरे ये कुछ वैसा ही तो है, जैसे भाव जगाते, और हाँ वो जो आपकी कहानी के मेहमानों के सामने ही मिठाई चट कर जाने वाले बच्चे हैं न, वो मेरे ही दोनों शैतान हैं, उसी रंग में रंगे हुए
बाकी सारी कहानियां अपने आप में कहीं गुदगुदाती हैं तो कहीं प्रश्न भी लेकर खड़ी नज़र आती हैं कि,आखिर बदला क्या? बाकी नारी मन की जितनी गहरी पड़ताल आपने की है, वो प्रश्न भी है, सोचने पर मजबूर भी करता,
वंदना जी आप साल दर साल यूं ही लिखती रहें, इतनी बेहतरीन रचना के लिए बहुत बहुत शुक्रिया और उम्मीद है आगामी रचना जल्द पढ़ने मिले



रविवार, 6 अगस्त 2017

बातों वाली गली

आप सबकी, ज़िद, दुआओं और रुझान प्रकाशन की असीम अनुकम्पा  से मेरी कहानियां अब पुस्तक रूप में आपके पास पहुंचने को बेताब हैं. लेकिन पहुंचेंगी तभी, जब आप इन्हें मंगवायेंगे 😖 बहुत से साथी ऑर्डर कर चुके हैं, जिन्होंने नहीं किया, उम्मीद है वे भी जल्दी ही प्रति मंगवाने का बंदोबस्त करेंगे.  मैं आज आप लोगों से भी खुल के किताब खरीदने की अपील कर पा रही हूं, क्योंकि मैने  किताबें हमेशा ही खरीद के पढ़ने की आदत डाली है, खासतौर से अपने दोस्तों की किताबें. जब नामचीन लेखकों की किताबें हम खरीद के पढ़ते हैं तो अपने दोस्तों की किताब ही मुफ़्त में क्यों पाना चाहेंगे? है न? तो अब ज़रा जल्दी-जल्दी हाथ चलाइये इस लिंक पर. 

http://rujhaanpublications.com/product/baaton-wali-gali/

बुधवार, 5 जुलाई 2017

गुज़रना ईद का........

मेरा बचपन जिस स्थान पर गुज़रा वह मध्य-प्रदेश का एक छोटा लेकिन सुंदर सा क़स्बा है-नौगाँव। कस्बा, आबादी के लिहाज़ से, लेकिन यह स्थान पूर्व में महत्वपूर्ण छावनी रह चुकी है। आज भी यहाँ पाँच हज़ार के आस-पास आर्मी है और अपने क्लाइमेट के कारण आर्मी अफसरों की आरामगाह है। लम्बी ड्यूटी के बाद अधिकारी यहीं आराम करने आते हैं। यहाँ का मिलिट्री इंजीनियरिंग कॉलेज बहुत माना हुआ कॉलेज है।

मगर मैं ये सब क्यों बता रही हूँ? मैं तो कुछ और कहने आई थी....हाँ तो मैं कह रही थी की हम जब नौगाँव पहुंचे तो हमारे यहाँ काम करने जो बाई आई उसका नाम चिंजी बाई था। बहुत हंसमुख और खूबसूरत। पाँच बच्चे थे उसके। चिंजीबाई की आदत थी की जब भी कोई त्यौहार निकल जाता तब लम्बी आह भर के कहती - " दीवाली-दीवाली-दीवाली, लो दीवाली निकल गई।" इसी तरह -" होली-होली होली लो होली निकल गई।"

पता नहीं क्यों आज जबकि ईद को निकले पाँच दिन हो गए हैं,बाई बहुत याद आ रही है। मन बार-बार ' "ईद -ईद-ईद लो ईद निकल गई" कह रहा है....कुछ उसी तरह आह भर के जैसे चिंजी बाई भरा करती थी। मेरी माँ दिल खोल कर देने वालों में हैं लेकिन हो सकता है की चिंजी बाई की हर त्यौहार पर अपेक्षाएं उससे भी ज़्यादा रहतीं हों, जिनके अधूरेपन का अहसास, उसकी उस लम्बी आह भरती निश्वास में रहता हो। क्योंकि इधर कई सालों से ईद पर ऐसा ही खाली पन मुझे घेरता है। और मन बहुत रोकने के बाद भी पीछे की ओर भाग रहा है.......

याद आ रहीं है वो तमाम ईदें, जिन पर हमने भी नए कपडे पहने थे...ईदी मिलने का इंतज़ार किया था.......मीठी सेंवई खाई थी..... और कभी सोचा भी नहीं था की ये त्यौहार मेरा नहीं है। शाम को हम पापा के साथ दबीर अली चाचा के घर सजे-धजे पूरे उत्साह के साथ जाते, सेंवई पर हाथ साफ़ करते और चाचा से ईदी ऐंठते। शम्मोबाजी से लड़ाई लड़ते और चच्ची से डांट खाते।

मेरी मम्मी जब पन्ना में बीटीआई की ट्रेनिंग कर रहीं थीं, तब वे एक मुस्लिम परिवार के यहां किरायेदार के रूप में रहीं वो परिवार भी ऐसा जिसने मेरी मां को हमेशा घर की बेटी के समान इज़्ज़त दी। इतना प्यार दिया जितना शायद मेरे सगे मामा ने भी न दिया हो। लम्बे समय तक हम जानते ही नहीं थे कि पन्ना वाले मामा जी हमारे सगे मामा नहीं हैं। चूंकि उनका नाम हमने कभी लिया नहीं और पूछने की कभी ज़रूरत समझी नहीं। वैसे भी वे हमारे मूर्ख-मासूमियत के दिन थे। किसी के नाम-काम से हमें कोई मतलब ही नहीं होता था। मां ने बताया ये तुम्हारे मामा-मामी हैं बस हमारे लिये ये सम्बोधन ही काफ़ी था।

रमज़ान के दौरान जब कभी मामी नौगांव आतीं तो मेरी मम्मी उनके लिये सहरी और इफ़्तार का बढिया इन्तज़ाम करतीं। साथ में खुद भी रोज़ा रहतीं। एक दिन मैने मामी को नमाज़ पढते देख पूछा- मामी आप मन्दिर नहीं जायेंगी? कमरे में ही पूजा कर लेंगीं? तो मेरी मामी ने बडे प्यार से समझाया था-’बेटा, भगवान का वास तो हर जगह है, वे तो इस कमरे में भी हैं तब मुझे मन्दिर जाने की क्या ज़रूरत है?" पता नहीं मेरे नन्हे मन पर इन शब्दों का क्या जादू हुआ कि आज भी मन्दिर जा कर या पूजा-घर में बैठ कर ही पूजा करने के प्रति मेरा लगाव हुआ ही नहीं।

हमारे ये दोनों परिवार सुख-दुख में हमेशा साथ रहे और आज भी साथ हैं। मामा के परिवार की एक भी शादी हमने चूकने नही दी और हमारे यहां के हर समारोह में वे सपरिवार शामिल हुए । आज भी दोनों परिवार उतने ही घनिष्ठ रिश्तों में बंधे हैं। आज रिश्तों की अहमियत ही ख़त्म होती जा रही है। हमारे पड़ोसी भी "चाचा-चाची " होते थे , आज सगे चाचा भी "अंकल" हो गए हैं। मुझे बड़ा अटपटा लगता है जब कोई भी बच्चा बताता ही की उसके अंकल की शादी है या उसे लेने अंकल आयेंगे....आदि । कई बच्चों को तो मैं समझाइश भी दे चुकी हूँ कि वे अपने चाचा को अंकल न कहा करें। लेकिन अब अपने आप को रोक लेती हूँ। किसी दिन कोई कह न दे कि 'आप कौन होती हैं हमारे संबोधनों में संशोधन करने वालीं?'

बात ईद से शुरू की थी और रिश्तों पर ख़त्म हो रही है, मन भी कहाँ-कहाँ भटकता है!

तो बात ईद की कर रही थी तो आज ईद हो या दीवाली या कोई और त्यौहार, वो पहले वाली बात रही ही नहीं। त्योहारों को लेकर उत्साह जैसे ख़त्म होता जा रहा है। रस्म अदायगी सी करने लगे हैं लोग। कोई कहे की मंहगाई के कारण ऐसा हुआ हा तो मैं यह बात सिरे से खारिज करूंगी। जितनी मंहगाई है उतनी ही तनख्वाहें भी तो हैं। पहले की कीमतें कम लगतीं हैं तो वेतन कितना होता था? तब भी लोग इतने उत्साह के साथ हर त्यौहार का इंतज़ार क्यों करते थे? आज हमारे अपने मन उत्साहित नहीं हैं। शायद माहौल का असर हम पर भी पड़ने लगा है।

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