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रविवार, 6 मई 2018

ग़ायब हो गये हैं ठहाके.....!


सुबह का समय. मॉर्निंग वॉक से लौटते हुए, रास्ते में ही नया बना जॉगिंग पार्क मिलता है. जब लौटती हूं, तब सामूहिक हंसी सुनायी देती हैं. हा हा हा....हा हा हा....!!! पिछले दिनों इलाहाबाद गयी थी. प्रात: भ्रमण की शौकीन मैं, कम्पनी बाग़ चली गयी. सुबह पांच बजे से यहां लगभग आधा इलाहाबाद, मॉर्निंग वॉक के इरादे से चला आता है. जिससे कई दिनों से मिलना न हुआ हो, वो भी कम्पनी बाग में मिल ही जायेगा. ढाई सौ एकड़ में फ़ैले इस कम्पनी बाग में तो कई जगह लाफ़िंग एक्सरसाइज़ चल रहे थे. अधिकांश बुज़ुर्ग ही थे जो नकली हंसी के बहाने हंस रहे थे.  और मेरा मन पुराने ठहाकों की ओर दौड़ रहा था.
एक समय था, जब लोगों का मिलना-जुलना, बैठना और बैठकों में हंसी-ठट्ठा होना बहुत आम बात थी.शहर की गलियों में, गर्मियों की हर शाम, देखने लायक़ होती थी. घरों के बाहर पानी का झिड़काव और फिर चार-छह कुर्सियों का घेरा. बीच में टेबल. धीरे-धीरे पापाजी के वे मित्र आने शुरु होते जो प्राय: रोज़ ही आते थे. देश-दुनिया की बातें, समाज की बातें, और उससे भी ज़्यादा यहां-वहां की अनर्गल बातें. ज़रा-ज़रा सी बात पर ज़ोरदार ठहाका लगता. ऐसे ठहाके हर पांच मिनट पर सुनाई देते, जिनकी गूंज अगले तीन मिनट तक बनी रहती. ये विशुद्ध हास्य के ठहाके थे. इनमें किसी का मज़ाक नहीं उड़ाया जा रहा था, किसी पर तंज नहीं कसा जा रहा था, इन ठहाकों से किसी तीसरे को दुखी नहीं किया जा रहा था. जी भर के हंसते थे लोग. इतना कि हंसते-हंसते पेट दुख जाये. इतना कि हंसते-हंसते आंसू बहने लगें......!! पूरा माहौल ही जैसे मुस्कुराने लगता था. धरती से आसमान तक, केवल हंसी का साम्राज्य हो जैसे...!
ऐसा नहीं था कि हंसी केवल बड़ों तक ही सीमित थी. बच्चों के पास भी हंसी के ख़ज़ाने थे. तेनालीराम के किस्से, अकबर-बीरबल, मोटू-पतलू, लम्बू-छोटू, ढब्बू जी, और भी पता नहीं कौन-कौन से पात्र केवल बच्चों को नहीं, बड़ों को भी घेरे रहते थे अपनी हंसी के व्यूह में. ’नन्दन’ में तेनालीराम का नियमित स्तम्भ होता था. चम्पक में चीकू का तो पराग में छोटू-लम्बू का. पत्रिकाओं के सबसे पहले खोले जाने वाले स्तम्भ होते थे ये. ये वो पात्र हैं, जिनका नाम भर लेने से आज भी चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है. ये पात्र कैसा ग़ज़ब का हास्य सृजित करते थे! थोड़ा सा और बाद में बिल्लू, पिंकी, चाचा चौधरी जैसे पात्र कॉमिक्स के ज़रिये आये. अब तक तेनाली राम और अकबर-बीरबल भी कॉमिक्स के रूप में आ चुके थे. ये नन्हे-मुन्ने पात्र भी विशुद्ध हास्य ही पेश करते. साथ ही, इसमें तमाम शिक्षाप्रद बातें भी हंसी-हंसी में ही सिखा दी जातीं. तेनालीराम और बीरबल की बुद्धि का लोहा तो उनके राजा/बादशाह भी मानते थे. कमाल की बुद्धिमत्तापूर्ण बातें होती थीं, ज़बरदस्त हास्य के साथ.
पुरानी फ़िल्में यदि आप देखें, तो पायेंगे कि हर फ़िल्म में एक क~ऒमेडियन ज़रूर होता था. बिना हास्य कलाकार के फ़िल्म अधूरी सी लगती थी. इस हास्य कलाकार का काम था, अभिनेता के साथ मिल के किसी भी घटना पर हास्य का सृजन करना. दर्शक भी जी खोल के हंसते थे इन पात्रों के अभिनय पर. महमूद, मुकरी, राजेन्द्रनाथ, टुनटुन, मनोरमा जैसे कुछ बहुत अच्छे हास्य अभिनेता हैं, जिन्हें कोई भूल नहीं सकता. फ़िल्मों में इनकी उपस्थिति का उद्देश्य भी फ़िल्म को बोझिल होने से बचाना होता था. यानी, हास्य ज़िन्दगी का अहम हिस्सा था. लेकिन धीरे-धीरे हास्य का स्थान व्यंग्य ने ले लिया. अब पड़ोसी हो, रिश्तेदार हो, अपरिचित हो, परिचित हो, अधिकारी हो, मातहत हो, सरकार हो, मंत्री हो, नेता हो, सब केवल व्यंग्य के अधिकारी और व्यंग्य के पात्र हो गये हैं. आज हंसी में भी कड़वाहट सी घुल गयी है. ठीक वैसे ही जैसे हवा में कार्बन डाइऑक्साइड...... लोग हंसते कम हैं, हंसी ज़्यादा उड़ाते हैं. अब तो मुस्कुराहट भी कई अर्थ देने लगी है. पता नहीं व्यंग्य भरी मुस्कान है, या उपहास भरी!! हंसी का गुमना, यानी हमारे सबसे महत्वपूर्ण गुण का खत्म होना. हंसी का वरदान सभी जीवों में केवल इंसानों को ही प्रकृति ने दिया है. इसे बचा के रखें. न केवल बचायें, बल्कि बढ़ायें. न केवल बढ़ायें, बल्कि बढ़ाते रहने की चिन्ता भी करें, ठीक उसी तरह जैसे हम बैंक में रखे पैसे की चिन्ता करते हैं. खूब हंसे और दूसरों को हंसायें, बस हंसी न उड़ायें किसी की भी.
(नई दुनिया के लिये लिखे, और प्रकाशित बहुत सारे लेख इकट्ठे हो गये हैं, सो सोचती हूं यहां पोस्ट कर दूं, ताकि ब्लॉग पर आने-जाने का सिलसिला जमा रहे)




शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

कुछ दिन तो गुज़ारिये पर्यटन में....!


मनुष्य स्वभाव से ही घुमक्कड है. आदिमानव भोजन और अपने शिकार की खोज में एक जगह से दूसरी जगह घूमता था. लेकिन इस घूमने ने उसका ऐसा मन मोहा, कि खेती करने की समझ आने के बाद भी उसे एक जगह ठिकाना बना के रहना रास न आया. घूमता ही रहा, इस जंगल से उस जंगल. पुराने राजे-महाराजे देखिये. राज-काज से समय निकाल के महीने-महीने भर को शिकार पर चले जाते थे. ये शिकार क्या था? शुद्ध घुमक्कड़ी ही न? साधु संत निकल जाते थे देशाटन पर. एक गांव से दूसरे गांव, एक पर्वत से दूसरे पर्वत. ये भी घुमक्कड़ी का ही एक रूप है. बुज़ुर्गवार तीर्थाटन पर जाते रहे हैं पुराने समय से. ये तीर्थाटन भी वृद्धावस्था की घुमक्कड़ी ही है. तो समय और देशकाल के अनुसार नाम चाहे जो ले लें हम, है ये विशुद्ध घुमक्कड़ी. घुमक्कड़ी यानी परिष्कृत भाषा में पर्यटन.
पर्यटन के प्रति आकर्षण , मनुष्य का एक ऐसा गुण है जिसे जन्मजात कहा जा सकता है. तमाम अन्य गुणों की तरह ये गुण भी अलग-अलग लोगों में कम या ज़्यादा हो सकता है. लेकिन होता सब में है. पर्यटन असल में केवल घुमक्कड़ी नहीं है. असल में पर्यटन भी भिन्न-भिन्न उद्देश्यों के चलते किया जाता है. कोई पढ़ाई-लिखाई के चक्कर में किसी दूसरे शहर या दूसरे देश जाता है, तो कोई काम के सिलसिले में तो कोई केवल घूमने के उद्देश्य से ही जाता है. लेकिन इन सभी परिस्थियों में नई जगह को जानने, वहां की खास और महत्वपूर्ण जगहों को देखने की इच्छा कोई रोक सकता है क्या? यही इच्छा अपने काम के साथ-साथ उसे पर्यटन का सुख दे जाता है.
जब हम किसी नई जगह पर घूमने जाते हैं, तो ये केवल घूमना नहीं होता, बल्कि उस शहर या देश की संस्कृति को आत्मसात करने का वक्त होता है. वहां की संस्कृति से साक्षात्कार ही हमें रोमांच से भर देता है. किसी दूसरे देश की संस्कृति तो स्वाभाविक तौर पर अलग और नई होती है, लेकिन ये नयापन हमारे देश में भी कम नहीं. जितने प्रांत, उतनी ही भिन्न संस्कृति, आचार-व्यवहार, खान-पान, वेशभूषा, सोने जागने के तरीके, सब भिन्न. हर दो सौ किलोमीटर पर बदली हुई संस्कृति दिखाई देती है. केवल मध्यप्रदेश को ही लें. बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा, चम्बल इन चारों हिस्सों की संस्कृति में भिन्नता है. कुछ त्यौहार जो बुन्देलखंड में मनाये जाते हैं, वे बाकी तीन में नहीं, तो कुछ रिवाज़ जो मालवा में हैं, बाकी जगहों पर नहीं. ये सब हम कैसे जानेंगे? केवल पढ़ के ये सब नहीं जाना जा सकता. इस भिन्नता के दर्शन तब होंगे, जब हम इन जगहों पर घूमने निकलेंगे. किसी जगह को पढ़ के जानने, और घूम के जानने में उतना ही फ़र्क है, जितना खाना बनाने और व्यंजन विधियों को पढ़ने में है.

हिन्दुस्तान तो वैसे भी भिन्न संस्कृतियों, भिन्न भाषाओं का देश है. कभी-कभी अचरज होता है, कि एक ही भूभाग पर कैसे इतनी भिन्नताएं एक साथ हैं? बहुत से लोग हैं, जो देश के ही तमाम प्रांतों को जानने-समझने के लिये छुट्टियों में केवल घूमने का ही प्रोग्राम बनाते हैं, और निकल पड़ते हैं. घूमने के ऐसी प्रेमियों को बहुत ज्ञान होता है. भाषाई ज्ञान के साथ-साथ इन्हें भौगोलिक और सांस्कृतिक ज्ञान भी खूब होता है. तो पर्यटन केवल घूमने का नहीं बल्कि ज्ञानार्जन का भी ज़रिया है.
पर्यटन हमारे लिये घूमने का, तो देश के लिये राजस्व का बेहतरीन ज़रिया है. पुरानी इमारतों, विशेष स्थानों को सुरक्षित रखने, संरक्षित करने, या उसके आस-पास मनोरम स्थल विकसित होने का कारण भी एकमात्र मानव पर्यटन है. लोगों की आवाजाही को देखते हुए, उस स्थान विशेष को विकसित किया जाता है. तो पर्यटन के चलते हमारा इतिहास भी सुरक्षा पा जाता है.
सन 1966 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1967 को अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन वर्ष घोषित किया था. इसी वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पाया गया कि विकासशील देशों में भारत एकमात्र देश है, जहां पर्यटन की बहुत अधिक सम्भावना है. यहां के ऐतिहासिक स्थलों को विकसित किया जाये, तो ये पर्यटन स्थल बन सकते हैं. वैसे भी विदेशी पर्यटकों के लिये भारत में आअकर्षण के लिये बहुत कुछ है. यहां की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतें ही इतनी हैं, कि एक विदेशी पर्यटक, जब साल भर का वीज़ा ले के हिन्दुस्तान आता है, तब यहां के सारे ऐतिहासिक स्थल देख पाता है. त्यौहारों के इस देश में मेलों की भी अद्भुत परम्परा रही है. और विदेशी, हमारे इन हिन्दुस्तानी मेलों के दीवाने हैं,. मौसम और त्यौहार विशेष पर लगने वाले कुछ प्रमुख मेलों में जैसे कुम्भ, माघ, या बिहार का पशु मेले में उनके आयोजित होने के समय पर अतिरिक्त पर्यटक जुटते हैं. भारतीय संस्कृति की भिन्नता ही उन्हें इस देश के पर्यटन के लिये उकसाती है. बनारस की अपनी अलग शान है. यहां के घाट, यहां की परम्पराएं और यहां का मोक्षगान, विदेशियों को यहीं बस जाने के लिये प्रेरित करता है.

भारत सरकार ने भी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये बहुत सी योजनाएं बनाई हैं, सरकार द्वारा हमेशा नई-नई योजनाएं बनाई जाती रहती हैं, क्योंकि हमारा घूमना, देश के राजस्व को बढ़ाता है, जो भविष्य में हमारे ही काम आता है. तो देर किस बात की कुछ दिन तो गुज़ारिये पर्यटन में....!  


( 28 सितम्बर, विश्व पर्यटन दिवस पर नई दुनिया में प्रकाशित आलेख)

गुरुवार, 11 जून 2009

राज कर रही है तीन बेटों की माँ?

कल अपने कुछ मेहमानों को छोड़ने स्टेशन गई थी। तभी वहाँ मैंने देखा की एक जर्जर बुढ़िया किसी प्रकार अपने पैर घसीटती संकोच सहित भीख मांग रही है। हालाँकि इसमें नया कुछ भी नहीं है। सैकड़ों बुजुर्ग महिलायें इस प्रकार भीख मांग रहीं हैं। लेकिन मेरे लिए नई बात ये थी की ये वही बूढी अम्मा थी जिसने कई सालों तक हमें हमारे ऑफिस में चाय पिलाई थी।
जाति से कुलीन ब्राह्मणी इस अम्मा के तीन बेटे हैं। तीनों अच्छा-भला कमा रहे हैं। थोडी बहुत ज़मीन भी है। बूढी अम्मा के पति की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी , सो अम्मा ने ही अपनी चाय की दूकान के ज़रिये अपने पाँच बच्चों का भरण-पोषण किया। उन्हें पढाया-लिखाया भी। बड़ा लड़का सरकारी नौकरी में है, बीच वाला किसी फैक्टरी में है और तीसरा प्रैस में काम करता है। अम्मा तीसरे के पास ही रहती थी, क्योंकि दो बड़े पहले ही उसे निष्कासित कर चुके थे। लेकिन अब इस तीसरे ने भी उसे घर से निकाल दिया था। जबकि अम्मा घर का पूरा काम करती थी । उम्र अधिक हो जाने के कारण दुकान ज़रूर नहीं चला पाती थी। घर का काम भी अब उतनी फुर्ती से नहीं कर पाती थी। लिहाज़ा उसे घर में रखने योग्य नहीं समझा गया.

अम्मा की मैं हमेशा मदद करती रहती हूँ। वे भी मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करती हैं। मैंने हमेशा कहा है, की वे मेरे पास आके रह सकती हैं। यदि नहीं तो कम से कम यहाँ आकर खाना तो खा ही सकती है ,जिसे खिलाने में उनके तीनों लड़के अब असमर्थ हो गए हैं। लेकिन लड़कों का मोह उन्हें आज भी छोड़ता नहीं। तीन बेटों की माँ यदि भीख माँगने पर मजबूर हो तो बेहतर है, की ऐसे बेटे पैदा ही न हों।
सोचने को मजबूर हूँ, की तमाम बेटों के कारनामे पढ़ने-देखने के बाद भी लोग बेटों की पैदाइश ही क्यों चाहते है?

मंगलवार, 9 जून 2009

श्रद्धांजलि......

आज सुबह का अख़बार शोक संदेश बन कर आया जैसे....रंगमंच के पुरोधा हबीब तनवीर का देहांत और साथ में एक सड़क दुर्घटना में तीन दिग्गज कवियों का निधन.......स्तब्ध हूँ ईश्वर की इस इच्छा पर.....याद आरहे हैं हबीब साहब के साथ बिताये वे दिन जब हम भोपाल में आयोजित नाट्य शिविर में थे....कितनी मेहनत करते थे एक-एक पात्र पर....कितनी डांट खाते थे हम ....फिर याद आए वे दिन जब रीवा में नाट्य शिविर आयोजित हुआ। एक बार फिर वही सिलसिला...लेकिन इस बार मैं केवल सूत्रधार के रूप में थी। नाटक था चरणदास चोर। चार सफल प्रस्तुतियां हुई इसकी। कितनी ऊर्जा थी उनमें!!! खैर अब बस यादें ही शेष....मौत से बड़ा सच दूसरा नहीं।
हबीब साहब ने अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जी, और अपनी बीमारी से ये संकेत भी दिया की अब वे ज़्यादा दिन हमारे बीच नहीं रहेंगे। लेकिन बेतवा महोत्सव से लौट रहे कविगण तो अनायास ही चले गए!! रात में जिन्हें हँसाते रहे, सुबह उन्हें ही रुला दिया!!
हबीब साहब, ओमप्रकाश आदित्य,लाड सिंह और नीरज पुरी को मेरी अश्रुसिक्त श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति और उनके परिवार को संबल दे.

गुरुवार, 14 मई 2009

परिवार-दिवस.....!!

तमाम दिवसों को मनाने की परम्परा के तहत आज विश्व परिवार दिवस है। हालांकि भारत में इस प्रकार के दिवसों की उपयोगिता मेरी समझ में नहीं आती क्योंकि हमारे यहाँ परिवार, माँ ,पिता या दोस्तों को भूलने की परम्परा नहीं है। फिर भी जब हम ये दिवस मना ही रहे हैं, तो फिर इन पर चर्चा भी ज़रूरी है।
परिवार दिवस....यानि ये याद दिलाने का दिन हमारा परिवार भी है। परिवार की बात चली तो याद आया की हमारे यहाँ संयुक्त परिवार की कितनी पुरानी परम्परा है, जो अब कई कारणों से छिन्न-भिन्न हो रही है।संयुक्त परिवार यानि दादी -दादा , चाचा-चाची (कई चाचा- चाचियाँ) और ख़ुद के माँ-पिता । घर में बड़े की बात की सुनवाई और किसी को आपत्ति नहीं। धीरे-धीरे समय बदला , लोग बाहर नौकरी पर जाने लगे , जाते पहले भी थे पर अधिकाँश परिवार पीछे ही छोड़ जाते थे, अब अपना-अपना व्यक्तिगत परिवार साथ ले जाने लगे। बाहर रहते परिवार घर के बड़ों की बंदिशों से दूर हो गए। उन्हें आज़ादी अच्छी लगने लगी। सबको अच्छी लगती है। लेकिन इस आज़ादी ने संयुक्त परिवार की गरिमा पर ग्रहण लगाना शुरू किया। अब तो महानगरों में नाम मात्र के संयुक्त परिवार होंगे, जो हैं भी वे मियां - बीबी अपनी नौकरी के स्वार्थ के चलते किसी बड़े को साथ में रखते हैं।
अब एकल परिवार। ये तो माशाल्लाह ही हैं। मियां-बीबी दोनों अपने आप को तुर्रम खां समझते हैं इसी ईगो के चलता रोज़ की बहसें बड़ी लडाइयों का रूप ले लेतीं हैं। पुरूष-प्रधान समाज में महिला घर के लिए आर्थिक , शारीरिक और मानसिक रूप से कितना भी करे, उसे कभी भी ये तारीफ नहीं मिल सकती की उसने घर के लिए कुछ किया। बल्कि उसके हर काम को शक की निगाह से देखने की पुरुषों ने आदत ही बना ली है। हो सकता है, की मेरे कुछ ब्लौगर बंधू मेरी बात से सहमत न हों, लेकिन ये इतना बड़ा सच है, जिसे हर महिला ने झेला है, या झेल रही है। बाहर कितने भी बड़े पद पर रहने के बावजूद घर में उसे निश्चित रूप से अपमानित होना ही पड़ता है। इसके पीछे पुरूष का अपना आहत स्वाभिमान ही है, जो पत्नी की योग्यताओं को स्वीकार नही करना चाहता। लिहाज़ा असर बच्चों पर पड़ता है, और एकल परिवार की अवधारणा यहाँ ध्वस्त होती दिखाई देती है। ऐसे में कहाँ का परिवार और कहाँ का परिवार-दिवस!