शुक्रवार, 19 जून 2015

तमाम रंग समेटे है- कसाब.गांधी@यरवदा.in

 कसाब.गांधी॒@यरवदा.in.... जी हां. ये किताब का नाम है. वो भी कहानी संग्रह का. इधर इस तरह के शीर्षक वाली किताबों का चलन बढा है. आज हर वक्त अन्तर्जाल से जुड़े मानव जगत को शायद ऐसे शीर्षकों की जरूरत भी हैयुवा पीढी भी ऐसे शीर्षक पर कुछ पल को ठिठकती है, रुक के देखती है. ये किताब है ख्यात लेखक/कथाकार/शायर पंकज सुबीर की. तमाम राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित, देश-विदेश से प्रकाशित हैं पंकज सुबीर ,सो इस लब्ध-प्रतिष्ठ लेखक का नये सिरे से परिचय देने की आवश्यकता मुझे महसूस नहीं हो रही. पिछले दिनों  शिवना प्रकाशन द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में सीहोर जाना हुआ. उसके पहले न मैं पंकज से मिली थी, न कभी फोन पर बात हुई थी. सो वे किस मिजाज़ के होंगे, नहीं जानती थी. कार्यक्रम में गौतम राजरिशी आ रहे थे, और उनसे मिलने की अदम्य इच्छा थी मेरी. पंकज, जिनके स्वभाव के बारे में मैं बिल्कुल नहीं जानती थी, ऐसे मिले जैसे हम तो बरसों बरस मिलते रहे हैं. इतना मान,स्नेह  तो सगे भाइयों से न मिले जितना पंकज ने कुछ घंटों में दिया. लगा ही नहीं कि मैं इस दौर के एक चर्चित लेखक से मिल रही हूं, जिसके खाते में न केवल भारतीय ज्ञान पीठ का नवलेखन पुरस्कार है बल्कि वागीश्वरी और कथा यू के जैसे प्रतिष्ठित सम्मान भी हैं. इनके अलावा शब्द साधक सम्मान, वनमाली कथा सम्मान, नवोन्मेष साहित्य सम्मान जैसे तमाम सम्मानों से वे नवाजे जा चुके हैं. अविस्मरणीय यात्रा बना दिया उसे पंकज के आत्मीय व्यवहार ने. और गौतम तो फ़िर गौतम हैं.... उनके बारे में फ़िर कभी.  पहले इस कहानी संग्रह के बारे में.
संग्रह में कुल ग्यारह कहानियां संग्रहीत हैं. पहली कहानी है कसाब.गांधी॒@यरवदा.in. इस कहानी की अलग ही गढन है. कहानी में कसाब और गांधी, जो कि दोनों ही समान कैदी हैं, किस तरह अपने-अपने काल विशेष की घटनाओं और उनके तमाम पहलुओं पर चर्चा करते हैं, पढना कौतुक से भर देता है. कहानी ने तमाम ऐसे सवाल उठाये हैं, जो न केवल आतंकवाद और आतंकवादियों की दशा पर विमर्श हैं, बल्कि गांधी जी के यरवदा जेल जाने और आज़ादी के समय हुई तमाम घटनाओं का भी खुल के विवेचन करते हैं. ये संग्रह की सबसे सशक्त कहानी कही जा सकती है.
मुख्यमंत्री नाराज़ थे…” कहानी  प्रशासन और प्रशासनिक अधिकारियों के  राज़ खोलती अच्छी और सच्ची कहानी है. कहानीलव जिहाद उर्फ़ उदास आंखों वाला लड़का..” हर उस व्यक्ति को पढनी चाहिये जो मानते हैं कि प्रेम के नाम पर लड़्कियों को बरगलाया जा रहा है.
पेज़ नम्बर ५० से लेकर ८३ तक चलने वाली 34 पेज़ की कहानी- “चिरई-चुनमुन और चीनू दीदी”  इस संग्रह की सबसे लम्बी कहानी है और  बहुत शानदार विषय को लेकर गढी गयी है. इस कहानी में पंकज जी ने जिस सहज हास्य और घटनाओं का सृजन किया है वो अद्भुत है. बाल्यावस्था से लेकर किशोरावस्था तक बच्चों में होने वाले परिवर्तन और घर वालों द्वारा तमाम उन बातों पर दिया जाने वाला दंड, जो बच्चे ने सहजता से पूछा है, सबको अपने बचपन की याद दिलायेगा. हिन्दुस्तान के अति मर्यादित परिवारों में ऐसा ही व्यवहार होता है बच्चों के साथ और कई बार बच्चे अज्ञानता के चलते, न केवल ग़लत संगत में फ़ंसते हैं, बल्कि ग़लत काम भी कर बैठते हैं. कहानी पृष्ठ संख्या 50 से लेकर 63 तक बहुत रोचक और कसी हुई है लेकिन इसके बाद लगा जैसे कहानी को जबरन आगे बढा दिया गया. चीनू दीदी के प्रवेश के बाद भी यदि घटनाओं को थोड़ा और संक्षिप्त कर पाते पंकज जी, तो ये कहानी न केवल इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी होती, वरन इस विषय पर लिखी गयी तमाम कहानियों में मैं इसे सर्वश्रेष्ठ कहती. लेकिन जैसा कि हम सब जानते हैं, कि जब भी किसी रचना की लम्बाई बढती है, तो उसकी कसावट में कमी आ जाती है, वही इस कहानी के साथ हुआ.
आषाढ का फ़िर वही एक दिनएक ऐसी कहानी है जिसे मैने दो बार पढा. इतना सजीव माहौल उकेरा गया है इस कहानी में, कि किसी भी पाठक को ये उसके अगल-बगल की कहानी लग सकती है. “ हर एक फ़्रेंड कमीना होता है…” कॉलेज के लड़के लड़्कियों और उस वक्त में होने वाली आसक्ति पर आधारित है. अच्छी कहानी है. “कितने घायल हैं, कितने बिस्मिल हैं…” आज के दौर की कहानी है. महानगरीय संस्कृति की कहानी है. लिव इन रिलेशनशिप मध्यमवर्गीय शहरों के लिये आज भी अजूबा ही हैं, सो मैने इसे आज के दौर की कहा, वरना इस तरह के सम्बंधों को भी अब अरसा हुआ. इस कहानी ने मुझे बहुत प्रभावित नहीं किया. लिव इन में रहने वाले लड़के-लड़कियों की सोच निश्चित रूप से आम लड़के लड़कियों की सोच से अलग होती है. वे ज़्यादा आज़ाद खयाल और बंधनमुक्त जीवन जीना चाहते हैं. कहानी का अंत भी कुछ ज़्यादा ही सांकेतिक हो गया जिसे प्रबुद्ध पाठक कुछ समझेगा, कुछ नहीं..
इस संग्रह की एक औउर शानदार कहानी है “ नक्कारखाने में पुरुष विमर्श”. बहुत सशक्त कहानी है. पंकज जी इस कहानी में एक सम्पूर्ण कहानीकार के रूप में उभरे हैं. एक ऐसी कहानी, जिसमें पुरुष की मनोदशा बहुत सच्चे तरीक़े से व्यक्त की गयी. पुरुष भी कितना विवश हो सकता है, इस कहानी को पढ के  जाना जा सकता है. इस संग्रह की, मुझे ये सबसे अच्छी कहानी लगी.    इसके अलावा कहानी ’चुकारा” , “खिड़की”, और “सुनो मांडव” हैं, जो रहस्य रोमांच से भरपूर हैं और भरपूर मनोरंजन करती हैं. कहानियां अपना रहस्य तब तक बनाये रखने में सक्षम हैं, जब तक लेखक ने चाहा. कहानियों की सबसे खास बात है, उनका शिल्प, कथ्य और भाषा शैली. सभी कहानियों की भाषा इतनी कसी हुई है कि पाठक, शुरु की गयी कहानी को एक ही बैठक में पढ जाता है. लेखक द्वारा अपनी बात कहने और पात्रों के मुंह से अपनी बात कहलवाने का हुनर हर कहानी में दिखाई देता है.
कुल मिला के संग्रह कसाब.गांधी@यरवदा.in  एक ऐसा संग्रह है, जिसे कथा-प्रेमियों को पढना ही चाहिये. पुस्तक का कवर पृष्ठ , शीर्षक की गरिमा के अनुसार है. प्रिंटिंग बहुत शानदार है. किताब का मूल्य भी चकित करने वाला है जबकि  १८४ पृष्ठों की यह पुस्तक हार्ड बाउंड में है. ज़िल्द सहित इस पुस्तक की कीमत लुभाती है पाठक को. मेरा तो मानना है, कि तमाम प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़े गये पंकज सुबीर की ये पुस्तक भी भविष्य के किसी न किसी पुरस्कार की दावेदार बनेगी. बधाई. शुभकामनाएं.
लेखक- पंकज सुबीर
प्रकाशक-शिवना प्रकाशन
पी.सी.लैब,सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट
बस स्टैण्ड, सीहोर-466001 (म.प्र.)
मूल्य: 150.00 रुपये मात्र/
फोन-07562405545, 07562695918
E-mail- shivna.prakashan@gmail.com







  

मंगलवार, 12 मई 2015

बेदाद ए इश्क़/रुदाद ए शादी- इसी स्याह समंदर से नूर निकलेगा....

बेदाद-ए-इश्क़/रुदाद--शादी……….. ऐसा शीर्षक है कि किताब खरीदने का मन केवल शीर्षक पढ के ही हो जाये, उस पर अगर ये पता चले कि किताब आपकी /आपके उस दोस्त की है, जिसके लिये आपके मन में पता नहीं कितना अजाना स्नेह है तब कहना ही क्या… ये किताब भी मेरी ऐसी ही स्नेही मित्र की है. नीलिमा चौहान. जी हां. नीलिमा चौहान और अशोक कुमार पांडे के संयुक्त सम्पादकत्व में इस पुस्तक का प्रकाशन सम्भव हो पाया है. ’सम्भव’ शब्द का इस्तेमाल  इसलिये, क्योंकि पुस्तक का विषय बड़ा क्रांतिकारी है. ’प्रेम’. जी हां. तमाम वर्जनाओं से घिरा विषय. मज़े की बात, कि ये विषय कवियों और लेखकों का प्रिय विषय रहा है, लेकिन जब भी किसी युगल ने इसे अपने जीवन में उतारने की कोशिश की है, उसे न केवल अपराधी क़रार दिया गया बल्कि तमाम प्रताड़नाओं का अधिकारी भी माना गया.
तमाम आध्यात्म गुरु ’प्रेम’ करने की बात करते हैं, लेकिन जब यही प्रेम सजीव होने लगता है, तो समाज सिखाने की कोशिश करता है कि बेटा ये सब किताबों में ही रहने दो. इसे कविता और फ़िल्मों का विषय ही मानो. ’प्रेम’ करके दो परिवारों में नफ़रत न बढाओ. ग़़ज़ब का विलोम है भाई………
अपने पुस्तकीय उदबोधन में नीलिमा चौहान लिखती हैं- “ व्यक्ति और संस्थाओं की अस्मिताओं के बीच  आमने सामने की जंग ने प्रेम और प्रेम विवाह को एक चुनौती में तब्दील कर दिया है. ऐसे वक्त में प्रेम और उसकी चुनौतियों  पर बात करना , समाज को उस दलदल से बाहर निकालने की पहल की कोशिश है.”
निश्चित रूप से इस किताब में ईमानदार कोशिश की गयी है. तमाम ऐसे नाम शामिल किये गये हैं, जिन्होंने प्रेम की इस जंग में आमने सामने की लड़ाई लड़ी, और अपने प्रेम को विवाह के अंजाम तक पहुंचाया. इन नामों में से तमाम नाम ऐसे हैं जिन्हें कहीं न कहीं आप सबने पढा होगा. उनके लेखकीय व्यक्तित्व से परिचय हुआ होगा लेकिन उनके इस  ’निज’ के बारे में कल्पना भी न की होगी. इस लिहाज से नीलिमा जी और अशोक कुमार जी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने नितान्त वर्जित क्षेत्र में सेंध लगाने की कोशिश की है.
पुस्तक में कुल सोलह प्रेम जेहादियों की आपबीती शामिल की गयी है. उपसंहार सम्पादकद्वय ने किया है. अनुक्रम के अनुसार शामिल किये गये नामों में- सुमन केशरी, अमित कुमार श्रीवास्तव, देवयानी भारद्वाज, विभावरी, नवीन रमण, पूनम, प्रज्ञा, विजेन्द्र चौहान(मसिजीवी), वर्षा सिंह, रूपा सिंह, किशोर दिवसे, मोहित खान, प्रीति मोंगा, ममता, राजुल तिवारी, शकील अहमद खान, और अन्त में सुजाता तथा अशोक कुमार पांडे.
सभी लेखकों ने अपनी अपनी आपबीती बहुत प्रभावी तरीके से लिखी है. कुछ संस्मरण सचमुच झकझोर गये. आज ये क़लमबद्ध हैं, तो हम उनकी दुरूहता का अन्दाज़ा नहीं लगा पा रहे क्योंकि संघर्ष के कई वर्ष चंद पन्नों में सिमट गये, और हमने भी कुछ घंटों में ही उनका जीवन संक्षेप पढ लिया. उस संकटकाल को कमतर इसलिये भी आंक पाये, क्योंकि उनके संघर्ष, सुखद अन्त ( happy ending) के साथ मौजूद थे.
सुमन केशरी लिखती हैं- “ प्रेम विवाह समूह मानसिकता का नकार है इसीलिये वह अमान्य ही नहीं, अक्षम्य भी है. वह डर को अंगूठा दिखाने का तो साहस रखता ही है, सामने वाले के मन में बस कर उसे भी समूह से उखाड़ डालने की कोशिश करता है.”
बहुत सही लिखा है सुमन जी ने. असल में प्रेम का विरोध भी समूह सामाजिकता का ही नतीजा है. समूचा समाज प्रेम और प्रेमियों का विरोध करने कमर कस के बैठा है, और मां-बाप इसी समाज के हिस्से हैं. सो उन्हें समाज में मुंह दिखाने का डर सताता रहता है. कई बार इस डर में बेटे/बेटी को यथास्थितिवादियों द्वारा शारीरिक खतरे की सम्भावना भी उनके  विरोध के स्वर ऊंचे करती है.
अमित कुमार श्रीवास्तव ने बहुत मज़े ले-ले के लिखा है अपना वृतान्त. जिस मन:स्थिति में उन्होंने लिखा, वो पाठको तक पहुंच रही है, आनन्दित कर रही है.
तीसरे क्रम पर देवयानी भारद्वाज का संस्मरण है और मेरी बदकिस्मती देखिये, कि मेरे हाथ में इस पुस्तक की वो प्रति आई, जिसके तमाम पृष्ठ ( केवल देवयानी जी के आत्मकथ्य वाले) मिस प्रिंट हैं. सबसे लम्बा कथ्य देवयानी जी का है, और बहुत सधा हुआ भी, लेकिन इसी कथ्य के आठ पृष्ठ, मेरे पठन की तारतम्यता को खत्म करते रहे. प्रकाशक को  ऐसी प्रतियां जो मिस प्रिंट हैं, देख के अलग निकालनी चाहिये थीं. मिस प्रिंट होना बड़ी बात नहीं है, लेकिन पाठक के हाथ में ऐसी प्रति पहुंचना अच्छा नहीं है.
देवयानी जी का कथ्य जितना पढ पाई उससे ज़ाहिर हुआ कि प्रेम जब अपने अंजाम पर पहुंचता है तो बहुत कुछ तयशुदा रिश्तों जैसा व्यवहार करने लगता है. जिस व्यक्ति को कभी बेहिस प्यार किया हो, उसी के प्रति नफ़रत पैदा होना… ठीक उन अजनबी रिश्तों की तरह लगा, जो शादी के बंधन में बंधते हैं और कई बार जीवन भर नफ़रत के साथ ज़िन्दा रहते हैं, या अलग हो जाते हैं.
विभावरी का संस्मरण एक ऐसी कथा है, जिसे पढ के तमाम प्रेमी युगलों को राहत मिलेगी. प्रेम पर उनकी आस्था और मजबूत होगी. एक जगह विभावरी लिखती हैं- “ मुझे आश्चर्य होता है यह सोच कर कि जिस जातिवाद का शिकार कभी मेरे घरवाले रहे होंगे, जिस जातिवाद ने उन्हें हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया था उसी जातिवाद को तोड़ने का एक मौका जब उन्हें मिल रहा था तो उन्होंने बहुत उत्साह के साथ इसे स्वीकार नहीं किया.”
यही विडम्बना है हमारे समाज की. जब मौका मिलता है तो पता नहीं कितनी बाधाएं, कितने संस्कार, कितनी परम्पराएं घरवालों को नया कदम उठाने, बेडियां तोड़ने से रोक देती हैं.
नवीन रमण और पूनम ने भी अपनी आख्यायिकाएं पूरी ईमानदारी से लिखी हैं. शुरु में खिलंदड़े स्वभाव के नवीन ने प्रेम में जिस स्थायित्व का परिचय दिया है, काबिलेतारीफ़ है.  पूनम ने भी बेबाक लिखा है.
प्रज्ञा जी जानी मानी कथाकार हैं. बहुत सधा हुआ आख्यान है उनका. वे लिखती हैं- “ हमारी शिक्षा और  शिक्षण संस्थाएं भी रूढिवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद का खुल कर विरोध करती नहीं दिखाई देतीं. जब खाप पंचायतें प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों को सरेआम मौत की सज़ा देती हैं तो हमारे विचार के केन्द्र कहे जाने वाले शिक्षण संस्थान मौन रहते हैं.”
बहुत पते की बात कही है उन्होंने. मज़े की बात, इन्हीं शिक्षण संस्थानों में सबसे ज़्यादा जातिभेद और लिंग भेद किया जाता है. जातिगत आरक्षण प्राप्त बच्चों की अलग लिस्ट होती है वहीं सहशिक्षा वाले स्कूल में लडकों और लड़कियों को अलग-अलग पंक्तियों में बिठाया जाता है.
जिनका आख्यान पढने की जितनी ज़्यादा उत्सुकता थी मुझे, उन्होंने उतना ही ज़्यादा निराश किया. जी हां. मैं विजेन्द्र चौहान उर्फ़ मसिजीवी की बात कर रही हूं. आप सब जानते हैं उन्हें. चमत्कारिक भाषा के धनी मसिजीवी जी अपनी भाषा का चमत्कार यहां भी दिखा गये. बहुत सफ़ाई से अपनी प्रेम कहानी को चंद शब्दों में निपटा दिया उन्होंने. ठीक उसी तरह जैसे किसी बच्चे को कहानी सुनाने से बचने के लिये- “ एक था राजा एक थी रानी, दोनों मर गये खतम कहानी.” सुना दी जाये.
मसिजीवी एक जगह लिखते हैं- “ अब सोचने पर लगता है कि विवाह भले ही प्रेम विवाह हो, है ये बहुत पेचीदी शै . प्रेम बहुत समर्पण मांगता है. और इस धारा में कूदने वाले यह सब जान समझ कर ही इस धारा में कूदते हैं. किन्तु इस अगाध समर्पण के बाद, सबकुछ सौंप देने के बाद भी कुछ हमारे पास बचा रह जाता है और फिर यही जो बचा रह जाता है बार-बार बीच में आता है.”
मसिजीवी जी, आपको बहुत विस्तार से लिखना चाहिये था. आपके शब्द लुभाते हैं, भाषा पैठ बनाती है लेकिन यहां आप पाठक को उलझा के चले गये. जब तक पाठक आपका मंतव्य समझे, तब तक आख्यान समाप्त.
वर्षा सिंह और रूपा सिंह के विद्रोह अल्ग ही तरह के थे. वर्षा जी जहां निपट अकेले अपना ब्याह रचा पाईं, वहीं रूपा सिंह ने न केवल अकेले ब्याह रचाया वो भी अलग धर्म में प्रवेश किया और पूरी हिम्मत के साथ अपनी जड़ों को जमाया. आज ये दोनों ही बहुत प्रसन्न हैं अपने अपने घरों में. अपने चुने हुए रिश्ते में. किशोर दिवसे जी ने उस समय प्रेम विवाह किया जब प्रेम विवाह का न इतना चलन था न ही विरोध करने की अनुमति. लेकिन उन्होंने ये साहस दिखाया और आज उनके विवाह को तीस बरस गुज़र चुके हैं. वे लिखते हैं-
“ बेशक जरा आदमी की शान ही नहीं,
जिसको न होवे इश्क़ वो इंसान ही नहीं.”
मोहित खान की कहानी एकदम आज की कहानी है. अन्तर्जालीय प्रेम, और फिर उसका पराकाष्ठा पर पहुंचना. अपनी चुनौतियों को उन्होंने बहुत रोचक तरीक़े से लिखा है. ममता जी राजुल तिवारी  और शकील अहमद खान इन दोनों ने बहुत खुले दिल से अपनी आपबीती पाठकों तक पहुंचायी है.
एक आख्यान, जिसे पढ के मेरा रोम-रोम सिहर गया, वो है- प्रीति मोंगा जी का आख्यान. ये आख्यान शायद अंग्रेज़ी में लिखा गया होगा या पंजाबी में, जिसका हिन्दी अनुवाद प्रभात रंजन जी ने किया है. मूल आख्यान किस भाषा में था, इसका ज़िक्र किया जाना चाहिये था. खैर. प्रीति जी की आपबीती पढ कर लगा कि एक नेत्रहीन महिला को प्यार के नाम पर क्या क्या बर्दाश्त करना पड़ा…. लेकिन सलाम है उनकी जिजीविषा को, जिसने आज तक न केवल उन्हें ज़िन्दा रखा, बल्कि जीने की ताक़त दी.
सम्पादक द्वय के वक्तव्य अच्छे हैं, सम्पादक के लायक हैं. बहुत बेबाक शब्दों में सुजाता जी लिखती हैं-
“ एक प्यार के लिये जरूरी है समाज द्वारा दबे-छिपे तरीक़ों से दी जाने वाली प्रेम की गुप्त और विवाह की स्वीकृत ट्रेनिंग को परत दर परत उघाड़ते हुए अपने व्यक्तित्व को फिर से गढ सकने की हिम्मत और इच्छा का होना. वरना तो क्या फ़र्क़ पड़ता है किसने प्रेम किया!”
अपनी बात कहते हुए अशोक कुमार पांडे जी ने अमीर क़ज़लबाश का शानदार शे’र पेश किया है-
“ मेरे जुनूं का नतीजा जरूर निकलेगा
इसी स्याह समन्दर से नूर निकलेगा.”
निश्चित रूप से कोशिशें अगर ऐसी जुनूनी हों तो, नूर निकलना ही है.
कुल मिला के पुस्तक न केवल पठनीय है, बल्कि खोज के पढने लायक है. शायद पहली बार लोगों ने अपने निजी अनुभवों को इस तरह सार्वजनिक किया होगा, सो ये एक साहसिक पुस्तक तो है ही. कुछ बातें जो मुझे कमियों की तरह नज़र आईं, उनमें सबसे पहली कमी- लेखकों की तस्वीरों का ना होना है. यहां केवल लेखक की नहीं, बल्कि उनके सहयात्री की तस्वीर भी जरूरी थी. तस्वीर पाठक और लेखक के बीच अजब कड़ी का काम करती है, तादात्म्य बिठाने में. दूसरी बात, आख्यान एक ही पक्ष के हैं. कोशिश की जानी चाहिये थी कि जिस लड़ाई को दोनों ने लड़ा है, तो आपबीती भी दोनों की हो. क्योंकि संघर्ष दोनों ने अपने-अपने मोर्चे पर अलग अलग तरह के किये होंगे. ये संघर्ष लड़कियों के ज्यादा कठिन होते हैं. तीसरी बात- लगभग सभी आख्यानों में प्रूफ़ की तमाम गलतियां हैं. ऐसा लगता है जैसे कम्पोज़ होने के बाद न तो प्रूफ़ रीडर ने इसे देखा और न ही सम्पादक द्वय ने. जबकि ये बहुत जरूरी काम था. अशुद्धियों के चलते अच्छी भली भाषा भी कमज़ोर पड़ने लगती है.  मिस प्रिंट वाला ज़िक्र मैं कर ही चुकी हूं. ऐसी प्रति जब मेरे पास आई है तो औरों के पास भी पहुंची होगी. इस ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिये था.
किताब का आवरण-पृष्ठ बहुत शानदार है. पुस्तक का मूल्य भी पाठकों की पहुंच में है.  किताब इंटरनेट पर खरीद हेतु उपलब्ध है ही, प्रकाशक से भी सीधे प्राप्त कर सकते हैं. पता है-

पुस्तक: बेदाद ए इश्क़ / रुदाद ए शादी
( बाग़ी प्रेम विवाहों के आख्यान)

सम्पादक:   नीलिमा चौहान/ अशोक कुमार पांडे

प्रकाशक: दखल प्रकाशन

107,कोणार्क सोसायटी,
प्लॉट नम्बर-22, आई.पी. एक्स्टेंशन,
पटपड़्गंज, दिल्ली- 110092

मूल्य: 175/ मात्र     


रविवार, 22 फ़रवरी 2015

क्या पता फिर मिलें, न मिलें....

हर साल फरवरी शुरु होती है और मैं तय कर लेती हूं कि इस बार तो भवानी दादा पर लिखना ही है. लेकिन फरवरी बीतती जाती है. बीस फरवरी आ जाती है और मेरे लिखने का कार्यक्रम अगले साल पर टल जाता है. ऐसा होते-होते तीस बरस गुज़र गये….  इस बार भी एक फरवरी से ही मन बनाये थी. कि इस बार नहीं चूकना है, और लो बीस फरवरी निकल गयी…. L फिर भी हमने ठान लिया था कि अब तो लिखना ही है.
बात १९८३ की है. हम बी.एस.सी. प्रथम वर्ष में थे उस वक्त. मेरी छोटी दीदी का रिश्ता भवानीप्रसाद मिश्र जी के छोटे भाई केशवानन्द मिश्र के सुपुत्र अमित मिश्र के साथ तय हुआ. कोई रस्म नहीं हुई थी लेकिन दोनों परिवार एक दूसरे से मिलकर प्रसन्न थे. मुझे तो ज़्यादा प्रसन्नता भवानी दादा का रिश्तेदार कहलाने में थी J रिश्ता लगभग तय था बस सगाई की रस्म होनी थी. उसके पहले ही केशवानन्द जी की बेटी का रिश्ता तय हो गया सो उन्होंने कहा कि अब बेटी का ब्याह हो जाये फिर उसके बाद सगाई और शादी सब एक साथ कर लेंगे. मेरा परिवार तो पहले ही सोचने के लिये वक्त चाह रहा था. केशवानन्द जी ने अपनी बिटिया की शादी में मेरे पापा से खूब आग्रह किया कि वे पहुंचें ही. लेकिन चूंकि उनके यहां शादी ग्यारह फ़रवरी को थी और ये वक्त पापाजी के विद्यालय छोड़ने का नहीं था. सो उन्होंने मुझे मेरे भाई के साथ भेजने की बात कही.
मुझे पूरा भरोसा था कि इस शादी में भवानी जी जरूर आयेंगे तो मैने भी एक बार में ही हां कह दी. जबकि अजनबी परिवारों में मैं उस वक्त तक बहुत कम घुल-मिल पाती थी.
शादी नरसिंह पुर ( म.प्र.) से होनी थी जो भवानी जी का पैतृक गृह है. मेरा मन तो केवल इसी बात से झूमा जा रहा था कि मैं भवानी जी के पैतृक गृह को देख पाउंगी. दस फरवरी की सुबह हम नरसिंहपुर के लिये बस से निकले तो शाम को चार बजे ठिकाने पर पहुंचे. घर पहुंचने में दिक्कत नहीं हुई. दरवाजे पर पहुंचे ही थे कि किसी ने जोर से अन्दर की तरफ़ मुंह करके आवाज़ लगायी- : अरे देखो तो अमित की ससुराल से मेहमान आये हैं…. ( अभी कोई रस्म न हुई थी फिर भी इतनी आत्मीयता!) अन्दर से दौड़ती हुई दो-तीन लड़कियां आईं जो अमित जी की बहनें थीं. और हमें बड़े प्रेम और आत्मीयता से भीतर ले गयीं. तुरन्त पानी, चाय, नाश्ते का इन्तज़ाम होने लगा.
मेरा मन हो रहा था कि किसी से पूछूं- भवानी दादा आये क्या? लेकिन संकोचवश पूछ नहीं पाई. उम्र भी बहुत कम थी सो संकोच उम्रगत भी था. सब मुझसे बड़े थे वहां. और बहनों के नाम तो भूल गयी मैं केवल शैला दीदी का नाम याद है जिनकी शादी थी. उन्हें कोई बहन मेंहदी लगा रही थी. उस वक्त मेंहदी लगाने वालियां/वाले पार्लर से नहीं आते थे बल्कि घर का ही कोई मेंहदी लगा देते थे.
चाय के साथ शरमाते हुए बिस्किट खा रही थी मैं, जबकि मन रसगुल्ला उठाने का था J  इस खाने-पीने के संकोच ने हमेशा मुझे घाटे में रखा है J तभी देखा अन्दर की तरफ़ से एक बेहद सौम्य 28-30  बरस के आस-पास की महिला बाहर निकलीं..मेरे पास आकर बैठ गयीं. प्यार से मेरी पीठ पर हाथ रखा और बोलीं- मैं नन्दिता हूं, भवानी प्रसाद मिश्र की बेटी” मैं बस उन्हें देखती रह गयी…… कितनी सुन्दर. कितना सौम्य चेहरा! लगा भवानी जी से मिल ली जैसे. मुझे तो जैसे मन चाहा साथ मिल गया. उस घड़ी  से लेकर जितने दिन मैं वहां रही नन्दी जीजी का साथ नहीं छोड़ा.
 नन्दी जीजी ने बताया कि भवानी दादा को अभी पेसमेकर लगा है. उनकी तबियत ठीक नहीं है सो शायद न आ पायें. मेरा मन उदास हो गया L फिर सांत्वना दी कि चलो कोई बात नहीं, नन्दी जीजी तो मिल गयीं.
दूसरे दिन सबेरे मैं शैला दीदी के साथ रसोई में बड़े से चूल्हे पर चाय बनवा रही थी. तभी बाहर से शोर उठा-“ अरे दद्दा आ गये….” मैने पूछा- कौन दद्दा? शैला दी बाहर की तरफ़ लपकते हुए बोलीं भवानी दद्दा… मैंने चाय वहीं पटकी और दौड़ पड़ी…
दो लोगों का सहारा ले के भवानी जी चले आ रहे थे. एकदम वैसे ही जैसे तस्वीरों में मैने देखे थे… पीछे को काढे गये बाल, सफ़ेद कुर्ता और पाजामा.  उन्हें आराम से पीछे के कमरे में ले जाया गया. घर बहुत बड़ा था ये वाला. मुझे बार-बार लग रहा था कि पता नहीं उनकी ऐसी तबियत में मैं मुलाकात कर पाउंगी या नहीं L दिन के बारह बज गये थे. भवानी जी का स्नान ध्यान हो गया था. हम सब रसोई में ही बैठे थे गप्पें करते हुए. नन्दी जीजी भवानी जी को दवाई देने गयीं थीं. भवानी जी के कमरे और रसोई के बीच बड़ा सा आंगन था.  तभी देखा, आंगन के दरवाजे पर खड़े भवानी जी पूछ रहे थे- “ भाई वो जो नौगांव से लड़की आई है, कहां है? मुझे मिलवाया क्यों नहीं? भेजो तो जरा उसे .”
मैं मुंह बाये देख रही थी. अकेले जाने की हिम्मत ही नहीं हुई सो शैला दी के साथ गयी उनके कमरे तक.
“अच्छा, तो ये गुड़िया है? आओ बच्चा, बैठो यहां. देखो तो क्या मैच चल रहा है. क्रिकेट पसन्द है न? “
भवानी जी कंधे पर ट्रान्जिस्टर रखे कमेंट्री सुन रहे थे. शायद विश्व कप का ही समय था. क्रिकेट के बेहद शौकीन भवानी जी से कैसे कहती कि मुझे तो ये खेल एकदम पसन्द न  है L
फिर तो मेरे बारे में, परिवार के बारे में, मेरे शौक सबके बारे में इतनी बातें की उन्होंने कि मुझे लगा ही नहीं ये भवानी जी हैं. ये सुन के कि मुझे लिखने पढने का शौक है, प्रसन्न हो गये अपनी जाने कितनी कवितायें सुना डालीं. बीच बीच में मैं टोकती- दद्दा ज्यादा मत बोलिये आपको मना किया है डॉक्टर ने” हंसते हुए कहते- “ अरे बोल लेने दे. क्या जाने फिर मिलें न मिलें”
मेरा अधिकतर समय अब उन्हीं के साथ बीतता. थोड़ी देर को कुछ काम करवाने आई तो आवाज़ देने लगे- अरे वो नौगांव वाली गुड़िया को भेजो न. कहां काम में फंसा लिया बच्ची को” उन्हें मेरा नाम याद नहीं हो पाया था.
अगले दिन हमें वापस आना था. वो इतने संकोच का समय था मेरा कि उनसे उनकी कलम मांगना तो दूर, ऑटोग्राफ़ तक न लिया… L आज का समय होता तो उनका पैन ज़रूर मांग लेती..
हम तेरह फ़रवरी को वापस आये और बीस को खबर मिली भवानी जी नहीं रहे….. मुझे याद आ रही थी उनकी ठहाकेदार हंसी  के साथ कही गयी बात- अरे बोल लेने दे, क्या पता फिर मिलें न मिलें……



रविवार, 1 फ़रवरी 2015

जीवन और मृत्यु के उत्सव का शहर- बनारस..

पिछले दिनों बनारस जाना हुआ. कई दिनों से बनारस के अनुभव लिखना चाह रही थी, लेकिन आज बैठ पाई लिखने. 

अपने गृह नगर के नाम के अलावा इलाहाबाद और बनारस ये दो ऐसे शहर हैं जो मुझे हमेशा  बहुत अपील करते हैं. इन नामों में पता  नहीं क्या है जो मुझे हमेशा  अपनी ओर खींचता है. इलाहाबाद  तो मेरा आना-जाना लगा रहता है, लेकिन बनारस पहले कभी जाना नहीं हुआ था. सो इस बार पुराने साल को विदा करने हम बनारस पहुंच गये.

कड़ाके की ठंड में यात्रा का मज़ा कुछ अलग ही होता है. ये अलग बात है कि हमारी यात्रा रात की ट्रेन से शुरु हो रही थी सो अपनी बर्थ पर पहुंच के हमने चुपचाप बिस्तर बिछाया , और लेट गये. नींद भले ही न आये पर संभ्रांतों की नींद में खलल डालना अभद्रता है, सो कानों में इयर प्लग ठूंसे गाने सुनते रहे.

हमारी ट्रेन एक घंटा चालीस मिनट लेट थी सो सुबह 5:30 की जगह  7:10 पर पहुंचने वाली थी लेकिन आधी रात को ट्रेन ने जो रफ़्तार पकड़ी कि हमें ठीक छह बजे बनारस  स्टेशन पर ला पटका. जबकि हम मना रहे थे कि ट्रेन दो-तीन घंटा लेट हो के पहुंचे. खैर. स्टेशन से बाहर निकले तो घने कोहरे की गिरफ़्त में आ गये. एक हाथ आगे का नहीं दिखाई दे रहा था. और भीड़ इतनी जैसे शाम के छह बजे हों.  

हमने जो होटल बुक किया था उसका चैक इन दिन में दो बजे से था. अतिरिक्त आठ सौ रुपये दे के हम सुबह सात बजे ही अपने रूम में स्थापित हो गये. चाय पी के थोड़ा आराम करके हम दस बजे नहा-धो के तैयार हो गये और सारनाथ के लिये रवाना होने नीचे उतरे. टैक्सी आने में टाइम लग रहा था. तो होटल के ही एक कर्मचारी अजय  ने कहा कि जब तक टैक्सी आ रही है तब तक आप लोग मुगल-टाउन देख आइये. मुझे लगा कोई मुग़ल गार्डन जैसा स्थान होगा. आगे-आगे अजय, और पीछे-पीछे हम दोनों. संकरी गलियों की भूल भुलैया से गुज़रते हुए हम बस चले जा रहे थे.
मैने पूछा-“ अजय मुगल टाउन कब आयेगा?”

 “अरे! यही तो है मुग़ल टाउन…”  मेरी दुविधा को अजय समझ रहे थे. उन्होंने तत्काल अपनी गलती मानी और बोले-
“ इस पूरे स्थान पर बनारसी साड़ियों के कारखाने हैं. अधिकतर पावर लूम पर बनायी जाने वाली साड़ियों के कारखाने हैं. कुछ हैंड लूम वाले भी हैं.”
सुबह का वक्त था, वो भी भीषण सर्द, सो कारीगर पावर लूम पर धागे चढा के चले गये थे. हमने दरवाज़ों की सुराखों और खिड़कियों के अधखुले पल्लों में से झांक के देखा, कैसे खटाखट साड़ियां बन रही हैं… एक साथ कई पावर लूम चल रहे हैं. अलग-अलग रंग और डिज़ाइन बन रही हैं… अद्भुत… अजय ने बताया कि थोड़ी देर में कारखाने खुल जायेंगे तब हम आपको अन्दर कारीगरों से मिलवा देंगे. हम भी वापस चल दिये, हमारी टैक्सी आ गयी थी. असल में यह एक ऑटो था   बनारस में बुक किये गये ऑटो को टैक्सी कहते हैं

बुद्ध के तमाम स्थान भी मुझे बहुत आकर्षित करते हैं. ये अलग बात है कि यशोधरा और राहुल को छोड़ के जाना मुझे उतना ही नागवार गुज़रता है जितना राम का सीता को वनवास पर भेजना. लेकिन गौतम इस मायने में अच्छे लगते हैं कि उन्होंने यशोधरा को निर्वासित नहीं किया था…लांछित नहीं किया था, सो उनका जीवन अपने बच्चे के साथ राजमहल में ही कट गया. लेकिन सीता?? अरेरेरेरे…… मैं भी कहां-कहां भटकती हूं…
स्टेशन से होटल बहुत दूर नहीं था, और सुबह कोहरा भी बहुत था, सो ऑटो के अगल-बगल कुछ देख न पाये थे. लेकिन अब सूरज निकल आया था, और सारे रास्ते, पूरा अगल-बगल साफ़ नज़र आ रहा था. हमारी ’टैक्सी’ तंग गलियों से होती हुई एक संकरी रोड पर आ गयी थी. पूरे शहर की रोड़ें इतनी संकरी, कि हर पांच मिनट पर जाम लग जाता है. यानि दस मिनट का रास्ता आप ४० मिनट में पूरा कर पायेंगे. रोड के  दोनों ओर से फुटपाथ गायब है. वाहनों के कारण पैदल चलने वालों का चलना मुहाल…

 तंग गलियों, संकरी सड़कों ,  निरंतरता बनाये हुए कचरे के ढेर, आवारा जानवरों के जत्थे के जत्थे..इस सब के वाबजूद बनारस की गलियों में कुछ बहुत अपना सा लग रहा था… गलियां इतनी तंग, कि आप अपना दरवाज़ा खोल के सामने की ओर दो कदम बढायें, तो तीसरे कदम में ही सामने वाले के घर में खड़े दिखाई देंगे  लेकिन तब भी ये गलियां खीझ पैदा नहीं कर रही थीं.

सारनाथ के बारे में सब जानते हैं सो बहुत विवरण की जरूरत मुझे नहीं लगती.  दोपहर तीन बजे हम सारनाथ के मुख्य मन्दिर से बाहर आये. आते ही चाय पीने की इच्छा हुई, उमेश जी की. मुझे भूख लग रही थी. लेकिन दूर-दूर तक खाने-पीने का मामला दिखाई न दे रहा था. बायें हाथ पर चाय के कुछ ढाबे थे, उन्हीं में से एक पर हम भी पहुंचे. स्वादिष्ट गरमागरम चाय, बड़े-बड़े कुल्हड़ों में ली. दो पाव लिये और चाय के साथ खा गये. चाय इतनी अच्छी थी कि मेरे जैसे चाय के प्रति उदासीन भाव रखने वाले व्यक्ति को भी दोबारा चाय पीने की इच्छा हो आई. चाय वाला जैतराम और उसकी पत्नी इतने प्यार से चाय पिला रहे थे कि हम थोड़ी देर उन्हीं से बतियाते बैठे रहे. जैतराम ने ज़िद करके बनारसी पान खिलाया  हम पान नहीं खाते, ये कहने पर भी उसने मीठा पान लगा कर दिया, ये कहते हुए कि बनारस आई हैं और पान न खायें, ऐसा कैसे हो सकता है?

चाय-पान निपटा के हम ऑटो की ओर लपके. ऑटो वाले भैयाजी, जिनका नाम धर्मेन्द्र था, बोले कि आप लोग थोड़ी देर होटल जा के हाथ-मुंह धो के वापस चले चलें ताकि घाट पर समय से पहुंच सकें. हमने अच्छे बच्चों की तरह सिर हिलाया और होटल पहुंच के ठीक दस मिनट बाद ही वापस ऑटो में लद गये. साढे चार बजे हम घाट पर पहुंच गये थे. धर्मेन्द्र भाई हमारे साथ केदार घाट तक आये और नाव तय करवाई. हमारे नाविक थे, पन्द्रह वर्षीय शशि केवट. इतने से बच्चे को देख के उमेश बोले- “ये बच्चा ले जायेगा क्या?” नन्हे नाविक को खुद को बच्चा कहा जाना पसन्द नहीं आया शायद. थोड़ा सा उतरे मुंह से बोला- “ अरे साहब, हम पन्द्रह बरस के हैं. जब ग्यारह बरस के थे तब से नाव चलाना सीखे हैं. एकदम से नाव न खेने लगे हैं. पहले तैरना सिखाया गया, फिर नाव को डूबने/पलटने से बचाना सिखाया गया. और अगर नाव पलट ही जाये, तो सवारियों को बचाना सिखाया गया.” माने हम कच्चे नाविक न हैं    मैने तुरन्त उसका पक्ष लिया और उमेश को समझाइश दी- अरे बहुत होशियार है ये. बड़े अच्छे से घुमायेगा हमें. तुम चिन्ता न करो. “

बैठ गये हम दोनों नाव में. शुरु हुई हमारी घाट-यात्रा……………तीन सौ चालीस घाट…ढाई घंटा….. इसी नाव से हम काशी विश्वनाथ जी के दर्शन और शाम की गंगा आरती के भी दर्शन करने वाले थे.  छह बजे शशि हमें ललिता घाट पर ले आया और बोला- साब, अभी विश्वनाथ जी के दर्शन करना सबसे बढिया है. फिर आरती शुरु हो जायेगी. हम फटाफट नाव से उतरे और शशि के पीछे लग लिये. पता नहीं कितनी सीढियां चढते, उतरते, सुरंगों में घुसते हम एक गली में पहुंचे. 

यहां प्रसाद की एक दुकान पर हमारे मोबाइल/कैमरे/ जूते / पर्स सब लॉक करवाया गया और हमें आगे की गली तक यानि विश्वनाथ जी के दर तक शशि छोड़ आया.  यहां पहुंचने की गलियां इतनी तंग हैं कि एक बार में दो लोगों का भी एक साथ चलना मुश्किल होता है. पानी और दूध जैसे पदार्थों ने इस गली को ज़बर्दस्त चिकना कर दिया है. कहीं-कहीं मैट बिछा हुआ मिला लेकिन अधिकतर जगह चिकनी ज़मीन या मिट्टी में समाया हुआ मैट ही मिला. मंदिर के मुख्य द्वार से भीड़ का रेला धंसा चला जा रहा था. मैने उमेश को कहा था कि अगर दम घोंटू भीड़ हुई तो मैं अन्दर  नहीं जाऊंगी. ऐसी अंध भक्ति मुझे कभी उद्वेलित नहीं कर पाई है कि भीड़ में कुचलते हुये मैं भगवान के दर्शन के लिये पहुंचूं. खैर हम अन्दर पहुंचे. हमारे आगे-आगे जाने वाली भीड़ थोड़ी देर में छंट गयी. हम जब मंदिर के अन्दर पहुंचे तो लगा जैसे शिव जी मुस्कराते हुये हमारे ही इंतजार में बैठे थे.
हमने  पूरे श्रद्धा भाव और मनोयोग से बेल-पत्र, फूल और प्रसाद चढाया. मैने अपना मन भक्ति भाव से भरने की कोशिश की, लेकिन बेकार. फूल चढाते हुए भी मेरा मन शिव जी से कह रहा था- “कहां बैठे हो महाराज? “चारों तरफ़ भारी अव्यवस्था है. बाहर पहुंच मार्ग गन्दगी से अटा पड़ा है और लोगों को नंगे पांव यहां तक आना पड़ता है. पैर मिट्टी में सन जाते हैं और मन्दिर में बह रहे पानी के साथ कीचड़ बनाते हैं. मन्दिर तक पहुंचने वाली गलियों को तो किसी भी प्रकार चौड़ा नहीं किया जा सकता, पर इन गलियों में पेबर ब्लॉक्स लगा कर इन्हें साफ़-सुथरा तो बनाया जा सकता है न? मन्दिर के अन्दर भी दर्शनार्थियों को लाइन में लगे रहने के लिये रेलिंग्स क्यों नहीं लगायी गयीं?  अन्दर सब दर्शन के लिये ऐसे टूटे पड़ रहे थे कि अगर इसी घड़ी सबने दर्शन न किये तो फिर कभी न कर पायेंगे  मन्दिर के अन्दर घुसते ही गुरुद्वारों की तर्ज़ पर पैर धोने की व्यवस्था होनी चाहिये ताकि लम्बा पहुंच मार्ग तय कर कीचड़ से सने पैर भगवान तक न पहुंचें. काशी विश्वनाथ विश्व प्रसिद्ध और अत्यंत सिद्ध स्थल माना जाता है. व्यवस्थायें बहुत जरूरी हैं यहां.



मन्दिर से निकल कर जब हम वापस ललिता घाट पहुंचे तो आरती की तैयारियां शुरु हो गयी थीं. ललिता घाट से सटा हुआ है मणिकर्णिका घाट…बहुत सुना था इस घाट के बारे में. लेकिन सुनने और देखने में कितना फ़र्क़ होता है ये देख के जाना. जब हम शिव जी के दर्शन कर ललिता घाट पर लौटे तो वहां सैकड़ों गरीब बैठे खाना खा रहे थे. एक साथ बहुत सारे लोग खिला रहे थे. लग रहा था जैसे कई परिवार मिल के खिला रहे हो. पूछा तो पता चला ये मृत्यु भोज चल रहा है. मत्यु भोज!! क्यों? “क्यों क्या? ये बगल का मणिकर्णिका घाट नहीं देखा क्या? यहां 108 लाशें एक साथ जलती हैं.


 उन्ही के परिवार वाले दाह कर्म करने के बाद यहीं मृत्यु भोज दे कर फ़ुर्सत हो जाते हैं. घाट की सीढियों पर खड़े हो के बायीं तरफ़ देखा, नीचे से लेकर तिमंजिले तक लाशें जल रहीं थीं... ऊंची-ऊंची लपटें ऊपर तक पहुंचने की कोशिश में हों.. अब दायीं तरफ़ सिर घुमाया तो पानी में बने ऊंचे से मंच पर सात युवा पुजारी पीली धोती पहने, हाथ में शंख लिये जीवन का विजय घोष करने को तैयार थे.. लोबाल का धुंआ चारों तरफ़ अपनी पहुंच बना रहा था. चिताओं की लपटों से उठता धुंआ और लोबान का धुंआ आसमान के जाकर एकाकार हो गया था... लाशों की चिरायंध अब लोबान की गंध में तब्दील हो गयी थी.


हम नाव पर सवार हो गये थे. सामने ललिता घाट पर और उससे जरा आगे दशश्वमेध घाट पर भव्य आरती शुरु हो गयी थी.  मंच पर एक साथ दस-दस पुजारी पीतम्बर पहने नंगे बदन  ऊंची-ऊंची लौ उठाती आरतियों से गंगा की आरती कर रहे थे. मेरा ध्यान आरती पर कम, चिताओं की लपट पर ज़्यादा था… मन कैसा-कैसा तो हो रहा था. आरतियों की लौ…चिताओं की लपट और दोनों की गंगा में बनती समान आकृतियां…  मणिकर्णिका घाट के अगल-बगल, पीछे सब तरफ़ ऊंची अट्टालिकाएं. सबके खिड़की दरवाजे घाट की तरफ़.  शशि केवट से पूछा- यहां जो लोग रहते हैं उन्हें तो रोज़ इतने अन्तिम संस्कार देखने पड़ते होंगे…बुरा लगता होगा न…” अरे काहे का बुरा? तर गये ये सब, जो यहां जले. और जो लोग रहते हैं इस घाट पे उन्हें तो आदत  हो गयी है. अगर कुछ कम लाशें जलें तो शायद उन्हें अटपटा लगे. और जानती हैं, कभी-कभी तो दिन भर में पांच सौ से लेकर सात सौ तक लाशें भी जली हैं. मान लीजिये कि 108  से कम तो जलाने का नियम ही नई है. "मैंने फ़ोटो खींची तो शशि ने मना किया-’ न मैडम जी, यहां की फोटो नहीं खींची जाती. अब खींच ली तो कोई बात नहीं.



नाव मणिकर्णिका घाट के सामने से जा रही है…. .. लम्बा-चौड़ा घाट..पूरे घाट पर जगह-जगह बनी चिताएं..जलती चिताएं. कुछ चिताएं अकेली ही जल रही हैं… कोई अपना न बचा उनके पास…कुछ अकेली लाशों को घाट के भिखारी ताप रहे हैं. लाशों की आग उनके लिये अलाव का काम करती है. एक चिता से चिटख के जलती हुई लकड़ी थोड़ी दूर जा गिरी, तो भिखारी बच्चों/गरीब बच्चों की टोली ने उससे खेलना शुरु कर दिया है….. घाट पर होती भव्य आरती..आरती के स्वर सब विस्मृत से हो गये हैं मुझे.. कुछ नहीं दिखाई दे रहा..कुछ नहीं सुनाई दे रहा…सिवाय जलती चिताओं के..चिताओं की आग से खेलते बच्चों के … जीवन और मृत्यु के उत्सव का शहर है बनारस…   मौत अब यहां  किसी को झकझोरती नहीं. गंगा में झिलमिलाती चिताओं की लपटें जैसे बहुत कुछ छीने ले रही थीं… बहुत कुछ छूट रहा था लहरों के साथ-साथ… पानी पर बनती आकृतियां जैसे आमंत्रित सा कर रही थीं खुद में समा जाने को….
अब और नहीं लिख पाउंगी. अद्भुत है बनारस……. याद रहेगा हमेशा.


रविवार, 30 नवंबर 2014

कैसे मोक्ष हो यहां....


कई सालों  से अम्मा का मन था कि हम दोनों “गया” जायें और पापा का पिंडदान करके आयें. हर साल प्रोग्राम बनता, और फिर किसी न किसी कारण से टल जाता. इस बार मैने  एक दिन बस यूं ही रेल्वे की साइट खोली और गया के रिज़र्वेशन देखने शुरु किये. सारी ट्रेनें  फुल थीं. इलाहाबाद होके देखा तो मिल गया रिज़र्वेशन. आने-जाने दोनों का. रात में बैठ के बोध गया के होटल सर्च किये, और एक बढिया होटल में कमरा भी बुक हो गया.नियत समय पर हम सतना से इलाहाबाद पहुंच गये. आने वाली ट्रेन भी एक दम सही समय पर आ रही थी, उसका अनाउंसमेंट सुनते ही हम प्लेटफ़ॉर्म नम्बर  छह की ओर लपके.
हमारे लपकते-झपकते ट्रेन भी आ गयी लम्बे-लम्बे डग भरती. भारतीय रेल की असली तस्वीर देखनी है तो स्लीपर क्लास में सफ़र जरूर करें. आनन फानन में हमें  आरक्षण मिला था स्लीपर क्लास में . किसी प्रकार अपने डिब्बे में चढे . बर्थ पर पहुंच के देखा, कोई और महानुभाव गहरी नींद में सो रहे हैं वहां. बड़ी मुश्किल  से  जागे भाईसाब.   जागने के बाद उतरने को तैयार नहीं बर्थ से. खैर तमाम समझाइश, डांट-डपट के बाद उतरे. हमने चैन की सांस ली कि अब सुबह तक यात्रा भली प्रकार होगी. लेकिन कहां?  बर्थ पर अभी पैर सीधे किये ही थे कि अगला स्टेशन आ गया और यहां से भीड़ का जो रेला चढा, उसे शायद हमारी बोगी ही पसन्द आ रही थी. किसी के भी पास रिज़र्व टिकट नहीं, लेकिन सब के सब सपरिवार  तमाम तरह के सामान सहित डब्बे में ऐसे अट गये जैसे ये बोगी तो उन्हें विरासत में मिली थी L
खैर, हम ऊपर वाली बर्थ पर थे सो सुरक्षित थे.       
पूरी ट्रेन के किसी भी टॉयलेट में लाइट और पानी न था. मैं चार बोगी इधर और चार बोगी उधर तक घूम आई. लेकिन हर बोगी के टॉयलेट से बिजली नदारद. पानी भी. क्षमता से तीन गुना ज़्यादा सवारियां और टॉयलेट के ये हाल… समझ रहे हैं न??  L  खैर जैसे-तैसे सुबह हुई, साढे छह की जगह सात बजे गया स्टेशन आया. हम ऐसे उतर के भागे जैसे किसी ने गले से पट्टा खोल दिया हो. होटल फोन किया कि हमारा चैक इन दस बजे है जबकि हमारी ट्रेन ने अभी ही पहुंचा दिया है तो होटल के मैनेजर ने सहृदयता दिखाई और कहा कि वो हमारा रूम अभी ही तैयार करवा देगा हम होटल पहुंच जायें J
 होटल पहुंच के नहाया-धोया और तत्काल ही हम वापस गया के पिंडदान स्थल की ओर रवाना हो गये. पिंडदान..यानि  पूर्वजों की  मुक्ति प्रक्रिया…. लेकिन इस जगह पर  पहुंच के लगा हम अपने पूर्वजों को किस गन्दगी में ढकेलने आये हैं??
सुना था कि यहां के पंडे बहुत परेशान करते हैं. पीछे पड़ जाते हैं. लेकिन हमें ऐसा कोई अनुभव नहीं हुआ. पंडे मिले, लेकिन पीछे कोई नहीं पड़ा. पिंड दान स्थल पर ही बंगाली समाज के एक युवा पंडा महाशय हमें मिले और हमने उनसे ही पूजा करवाने का मन बनाया. उन्होंने भी पूजा के लिये तयशुदा रकम ही ली, अनावश्यक कुछ भी नहीं. तो कम से कम पंडों के लिये जो भयानय टाइप धारणा हमारे मन में बनी थी, खत्म हुई.
पूजा के लिये पंडे जी हमें एक मंदिर में ले गये. पूजा भी विधिवत करायी. आगे की पूजा के लिये विष्णु पद मन्दिर जाना था. यहां  चारों तरफ़ गन्दगी के ढेर. जगह-जगह पिंडदान के बाद बची हुई पत्तलों के ढेर, बड़े-बड़े टोकरों में भरे हुए जौ के आटे के पिंडॆ जो गीले होने के कारण जानलेवा संड़ाध मार रहे थे. लेकिन अफ़सोस कि पितृ मोक्ष की पूजा के बाद पिंडदान के लिये हम भी पत्तल में ढेर सारे पिंडे ले के विष्णु पद मन्दिर की ओर चल दिये. हज़ारों की भीड़ में धक्के खाते , फिसलन से कई बार  बचते-बचाते हम विष्णु पद के मुख्य स्थल पर पहुंचे. यहां एक बड़ा सा कुंड था, जिसमें पानी भरा था और सभी लोग पत्तलों में लाये गये पिंडे यहां विसर्जित कर रहे थे, जिन्हें वहां बैठे पंडे निकाल-निकाल के टोकरों में भरते जा रहे थे. टोकरों से आटा मिश्रित पानी पूरे फ़र्श को भिगो रहा था. अब फिसलन का राज समझ में आया. हम  पूरा मन मनाये थे कि यहां केवल अपने पित्रों को याद करते हुए विसर्जन करेंगे, लेकिन पता चला कि हमारा पूरा ध्यान तो खुद को फिसलने से बचाने पर लगा है!!
बाहर लाइन से रखे, सड़ांध मारते जो टोकरे हमने देखे थे, वे यहीं से भर-भर के बाहर भेजे जा रहे थे. आटे का ऐसा दुरुपयोग!! क्या हमारे पितृ भी इससे खुश होते होंगे? कितना अच्छा होता अगर इस आटे से तत्काल रोटियां सेंक के जानवरों को खिलाने की व्यवस्था होती! और अगर जानवर इस आटे को नहीं खाते हों, तो बेहतर हो कि एक बड़ी सी भट्टी हो, जिसमें विसर्जन के बाद तत्काल पिंडों की आहुति दे दी जाये. पिंड जल जायेंगे तो न सड़ांध फ़ैलेगी न ही पिंडों का अपमान होगा तमाम पैरों के नीचे…
अब बारी थी फल्गु नदी में नारियल के विसर्जन की. पंडे ने बताया कि उसकी ड्यूटी अब यहां खत्म हुई सो नारियल ले के आप शमशान के बगल से जायें, वहीं नदी है. हम उसके बताये रास्ते पे चल दिये. शमशान तो मिला लेकिन नदी न दिखी. थोड़ा और आगे बढे तो सिवाय गन्दगी के कुछ नज़र न आया. दूर-दूर तक मल-मूत्र, रंग बिरंगी  पॉलिथिन, प्लेट, कप गिलास जैसा प्लास्टिक कचरा और  जानलेवा बदबू….. थोड़ा और आगे बढने पर  उथले नाले जैसा कुछ दिखा. हम समझ गये कि यही नदी है क्योंकि यहां कुछ और लोग भी नारियल लिये दिखाई दिये. उस अथाह गन्दगी के बीच कुछ परिवार खाना पकाते भी दिखे!! खैर उमेश जी ने यहां नारियल विसर्जित किया जिसे तत्काल एक लड़का ले के भाग गया…
यहां से वापस लौटते हुए लगा जैसे कितने खाली हो गये हैं…. पित्रों को मोक्ष दिलाने का भाव ले के घर से चले थे सो इस अन्तिम क्रिया के बाद लगा जैसे हमने अपने पित्रों को दूर कर दिया हमेशा के लिये… भाव तो तक़लीफ़ का भी था कि हमने इस जगह पर उन्हें मोक्ष दिलाया या गन्दगी में ढकेल दिया?
कुछ भी हो, हिन्दु आस्था और अन्तिम  कर्मकाण्ड का एकमात्र स्थल है गया. यह कभी खत्म न होने वाली परम्परा है, सो बिहार सरकार और भारत सरकार दोनों को चाहिये कि यहां बेहतर व्यवस्थाएं उपलब्ध करायी जायें. कुम्भ मेले की तरह ही यहां भी रुकने के इंतज़ाम होने चाहिये. सभी लोग होटलों में रुकने वाले नहीं होते वे लूटमार का शिकार होते हुए पितृ ऋण से उऋण होते हैं.  और इससे भी अधिक इंतज़ाम उन्हें पिण्डों के दहन का  करना चाहिये ताकि पिंड के रूप में धरती पर मोक्ष के लिये बुलाये गये पित्रों की आत्मा यहीं सड़ने-गलने और पैरों के नीचे आने को विवश न हो.
  

रविवार, 17 अगस्त 2014

जै सियाराम जिया......

बहुत दिन से लिखना चाह रही थी उन पर...
शायद जून से ही, जब से मिली तब से ही....
छोटा क़द, गोल-मटोल शरीर, गोरा रंग, चमकदार चेहरा, बड़ी-बड़ी मुस्कुराती आंखें,  माथे पर गोल बड़ी सी सिन्दूरी बिंदी, गले में एक रुद्राक्ष की  और एक स्फ़टिक की माला. सीधे पल्ले की साड़ी. उम्र यही कोई पचपन या छप्पन साल. लेकिन मानती खुद को बड़ा-बुज़ुर्ग हैं. ये है उनकी धज.
उनके आने से पहले उनकी आवाज़ सुनाई देने लगती-
" जै सियाराम भौजी.... बैठीं हौ? बैठौ-बैठो. "
"जै राम जी की बेटा.. खूब पढो, खूब बढो...."
हम जान जाते कि पाठक चाची आ गयीं. कुछ मिनटों में ही वे दरवाज़े पर दिखाई देतीं.
"जिया, जै सियाराम. कैसी तबियत है आज? मौं तौ कुल्ल चमक रऔ..."
जवाब का इन्तज़ार किये बिना ही नल की तरफ़ बढ़ जातीं और हाथ-पैर धो के भीतर आतीं.
" चलौ बताऔ बेटा का बननै  है. अच्छा चलो रान्दो. हम देख लैहें. काय जिया, जे लौकी काय हां सूख रई? ऐई हां काट लंय का? हम तौ काटै लै रय. और कछू खानै होय, सो वौ सोई बता दियो बेटा हरौ. "
मम्मी शायद कोई और सब्जी बताने वाली थीं, लेकिन लौकी के बारे में उनका फ़ैसला सुन के चुप हो गयीं. तक़लीफ़ में भी मुस्कुरा दीं .
" काय बेटा हरौ, बताऔ नैंयां तुम औरन ने. फिर कैहो का बना दऔ चाची ने. अच्छा रान्दो. हम बना लैहैं तुम औरन की पसन्द कौ  कछू."
खुद सवाल करतीं और खुद ही उसका हल भी खोज लेतीं. हम बस हां में  सिर हिलाते रह जाते.
रसोई में मैं श्री के लिये दूध लेने पहुंची, प्रेमा बर्तन रखने और पाठक चाची तो पहलेई से आटा गूंध रही थीं, तो प्रेमा ने कहा-
" चौका ( किचन) में जगह कम सी है. है नई जिज्जी? "
" काय? कितै कम है? को कै रऔ ? इत्ती बिलात जांगा पड़ी है, तुमै नईं दिखात का? काय की कमी? सबरौ काम हो रऔ  न? खाना बन रऔ न? फिर काय की कमी?  ऐन है खूब बड़ौ है. वौ नैयां छोटो. "
बगल में खड़ी मैं सोचने लगी... यही फ़र्क़ है दो लोगों की सोच का..एक ही जगह के बारे में. एक को कम जगह दिख रही, एक को जगह ही जगह दिखाई दे रही!!
साढे नौ बजे खाना बन के तैयार हो गया.
मम्मी ने कहा- खाना खा के जाना आप
उन्होंने कहा- " अरे आंहां जिया. आज न खैहैं . अबै भागवत सुनवे जाने है. उतै नींद न आहै फिर?  खाना कौ का है, काल खा लैहैं, परौं खा लैहैं..  तुम चिन्ता जिन करौ जिया. चलो जै सिया राम...."
उस दिन दोपहर का खाना बनाने के बाद थोड़ा समय था उनके पास. बैठ गयीं हम सबके बीच. मैने पूछा-
"चाची,  जब शादियों का सीजन होता है, तब तो आप शादी वाले घर में भी जाती हैं, खाना बनाने, तब घर का खाना कौन बनाता है? कोई है घर में या आप ही जा के बनाती हैं?"
तपाक से बोलीं-" अरे बेटा. जे हमाय पंडित जी पैलां मिठयागिरि करत हतै. इतईं बस अड्डे पे उनकी दुकान हती. सो वे तो सब कछू बना लेत :) अबै खुदई वे रोजई रात कौ खाना बना के धरत हैं ."
 फिर भी हमारी जिज्ञासा शांत नहीं हुई. पूछा-
" घर में बहुएं हैं चाची?"
"हओ . काय नैंयां? चार मौड़ा हैं हमाय. लेकिन बेटा भगवान कौ दऔ सब कछू है हमाय पास. जे खाना तौ हम अपने हाथ-गोड़ चलत रंय, ईसैं आ बनाउत. हमने लड़कन की शादी कर-कर कैं तीनन खौं दो-दो कमरा दै दय.  कि अपनौ बनाऔ -खाऔ . समारो अपन-अपनी गिरस्ती. अब हमाय पास सोई दो कमरा बचे. सो हम दोई जनन के लाने खूब हैं. दो गैंयां हैं. खेती से दो ट्रॉली गल्ला आउत है. सो भर देत हैं कोठा में. खेती अबै बांटी नैंयां. जिये जित्तो अनाज चाने, लै जाओ भाई. भर लो बोरी अब बस छोटो पढ रऔ पालीटेक्नीक में."
चकित हो गयी उनकी समझदारी पर.
फिर छेड़ा- " कभी आपको नहीं लगता कि बहुएं आपकी सेवा करें?"
" आंहां बेटा. काय हां लगने? और हां, करती हैं वे सेवा. खूब करती हैं. अपनौ अपनौ घर संभार रही न? जेई तो सेवा आय. और का करवानै हमें? सोचो, जब हम बहू हतै, तो हमें कैसो लगत तो? वैसई तो आय इन औरन कौ हाल .सब अच्छे हैं बेटा बहुत अच्छे "
कभी उनके मुंह से कोई नकारात्मक बात निकलती ही नहीं...हर हाल में खुश. किसी चीज़ की कमी उन्हें लगती नहीं. थकान उनके पास फटकती नहीं. लालच किसी चीज़ का है नहीं. हम कहते पच्चीस रोटियां सेंकियेगा ( हम सब बहनें और बच्चे इकट्ठे होते हैं न) तो वे कहतीं- " न. पच्चीस नहीं हम तीस रोटी सेंकेगें. बच्चन कौ घर है. का जाने कब किये भूख लग आये" . रात दस बज जाते तो हम कहते, आपको अकेले जाना है चाची इत्ती दूर, चलिये हम छोड़ आयें घर तक. तो कहतीं-
 " आंहा बेटा. हमें तो जाने कितेक साल हो गये ऐसई आत-जात. हमाय संगै तो वे भगवान चलत आंगे-आंगे."
 एक दिन हमने पूछा- " चाची आप की उम्र तो ज्यादा नहीं लगती" तो उनका गोरा चेहरा  लाल गया. बोलीं- " बेटा अब हमें अपनी उमर तौ पता नैयां,लेकिन पंडित जी सैं हम पन्द्रा साल के छोटे हैं. जब हमाओ ब्याऔ भऔ तौ तो हम दस साल के हतै और पंडित जी पच्चीस साल के.औ अब पंडित जी तो सत्तर के ऊपर गिर गये... सो तुमई लगा लो हमाई उमर..."
जै सियाराम जिया....... वो चली गयीं और हम आज तक पंडित जी के सत्तर के ऊपर गिरने का मज़ा ले रहे...