शनिवार, 29 मई 2010

जहां शराब है, नशा नहीं...


दस तारीख को हम नहा-धो के ओल्ड-गोआ की सैर के लिये निकल पड़े. ओल्ड गोआ पुरानी इमारतों से समृड्ध इलाका है. यहां सेंट ज़ेवियर चर्च के नाम से मशहूर
बेसिलिका ऑफ़ बॉम जीसस चर्च गये. यह कैथोलिक चर्च भारत में बारोक-वास्तुकला का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है. बेसिलिका में सेंट फ़्रान्सिस ज़ेवियर के पवित्र अवशेष रखे हैं जो गोवा के संरक्षक संत थे.
मैज़ोर्डा बीच

सेंट ज़ेवियर चर्च, सेंट कैथेड्रल चर्च, और " क्रूस-चौरा"( ये नाम मैने दिया है...:)
इसके बाद हम सेंट कैथेड्रल चर्च गये. यह एशिया का सबसे बड़ा गिरजाघर है, जिसे अलेग्ज़ेन्ड्रिया के सेंट कैथोरिन को समर्पित किया गया है, लिहाजा इसे सेंट कैथेरिन चर्च भी कहते हैं. चर्च में स्थित संग्रहालय तो इतना बड़ा है, कि हम चलते-चलते थक ही गये. इस चर्च के बाहर इतना सुन्दर लॉन और बगीचा है, कि हम थोड़ी देर वहां बैठने का लोभ संवरण नहीं कर सके.

सेंट कैथेड्रल चर्च के पास ही वैक्स म्यूज़ियम है, जिसे लंदन के मैडम तुसाद संग्रहालय की तर्ज़ पर बनाया गया है.
ओल्ड गोआ-दर्शन के बाद उसी दिन हमने पन्जिम-चर्च भी देखा. चर्च घूमने के बाद हमारे ड्राइवर की सलाह् पर हम मंगेशी मंदिर भी उसी दिन घूम आये. सुन्दर और साफ़-सुथरा मंदिर है ये.

अगले दिन हम गोआ के समुद्री तटों पर घूमने गये. सबसे पहले हम मीरामार बीच गये जो घर के पास ही है. उसके बाद मैज़ोर्डा बीच गये. इस बीच की खासियत है कि यहां की बालू सुनहरे-सफ़ेद रंग की है. ऊंची उठती लहरें, यहां-वहां घूमते सैलानी, विदेशी पर्यटक , स्थानीय जन, लेकिन कचरे का एक तिनका भी नहीं. बहुत सुन्दर बीच है ये. बाद में हमने कोल्वा , कालन्गुट, बागाटोर, बागा और अन्जुना बीच भी देखा. ये सभी बीच बेहद सुन्दर हैं. गोआ के समुद्री तटों की खासियत है वहां की सफ़ाई. बीच पर खाने-पीने का कोई स्टॉल नज़र नहीं आयेगा, किसी एक बीच पर रशियन स्टॉल था भी, लेकिन ये केवल "पीने" का स्टॉल था :) .
वैसे पीने की भली चलाई. जिस तरह हमारे यहां पान की दुकानें हैं, उसी प्रकार गोआ में शराब की दुकानें हैं. खुले आम शराब बिकती है, लेकिन मज़े की बात ये , कि कोई भी नशे में झूमता नहीं मिलता.
एक बात और, अपने छोटे-छोटे मन्दिरों की तरह गोआ में हर बीस कदम पर एक छोटा सा चर्च मिल जायेगा, जहां क्रूस स्थापित होता है, या जीसस की छोटी सी प्रतिमा. हमारे घरों में जैसे तुलसी-चौरे होते हैं, ठीक उसी तरह गोआ के हर घर के बाहर ’क्रूस-चौरा’ मिल जायेगा. शाम को इन छोटे-छोटे चर्चों के बाहर लोग जमा होते हैं और मोमबत्तियां जला के प्रेयर करते हैं.
कोल्वा बीच पर विधु , छोटा चित्र मंगेशी-मंदिर का.
हम जब कालन्गुट बीच जा रहे थे तब रास्ते में हमने अगौडा-फ़ोर्ट भी देखा. कोल्वा बीच जाते हुए जब हमें रास्ते में कोल्वा गांव मिला तो उस गांव के घर देख के हम चकित थे. इतने शानदार और आधुनिक डिज़ाइन के घर! हमारे यहां तो इसे बंगला कहते हैं. गोआ में कहीं भी गरीबी दिखाई ही नहीं देती. दिल्ली या मुम्बई की तरह झुग्गियां तो बिल्कुल भी नहीं.
गोआ की एक और खास पहचान है, वहां की मांडवी नदी. इस नदी के चौड़े पाट पर ढेर सारे छोटे-बड़े जहाजनुमा कैसिनो हैं. जो दिन-रात लाखों की कमाई करते रहते हैं. बड़े-बड़े क्रूज़ हैं, जो आपको सैर कराते हैं.
चौदह मई को हमें गोआ से निकलना था, और तेरह मई को उमेश जी के हाथ में फ़्रैक्चर हो गया, अन्जुना बीच पर. लेकिन यात्रा सुखद और यादगार रही. भविष्य में मौका मिला तो एक बार फिर ज़रूर जाना चाहूंगी गोआ के खूबसूरत समुद्री-तटों पर.
गोआ के गांवों के घर, यहां मैं एक ही चित्र लगा रही हूं, गांव का हर घर इतना ही सुन्दर और अलग-अलग रंगों से पुता हुआ था. छोटा चित्र मांडवी नदी पर कैसिनो का है.
तस्वीरें: उमेश दुबे

सोमवार, 24 मई 2010

परीकथा सा सुन्दर, गंगाजल सा निर्मल....

गोवा की अधूरी पोस्ट पर इतनी झिड़कियां (स्नेहसिक्त) मिलीं, कि तुरन्त आगे का वृतांत लिखने बैठ गई.
तो शुरु करूं? :)

पिछले कई सालों से इस्मत( ज़ैदी "शेफ़ा कजगांववी" ) गोवा आने का आग्रह कर रही थीं और हम हर बार आने का आश्वासन दे रहे थे. लेकिन इस बार उन्होंने धमकाते हुए पूछा-
" गोआ पहुंचने की तारीख बताओ"
हम डर गये. कहा-
" कल ही रिज़र्वेशन करवाते हैं और तुम्हें तारीख बताते हैं."
आनन-फानन रिज़र्वेशन हुआ और इस्मत को खबर की गई कि हम आठ मई को सतना से रवाना होंगे और दस मई को गोआ पहुंच जायेंगे.
इस्मत, ज़हूर भाई, आश्ती और मुशीर सब प्रसन्न. यहां हम अपनी खरीदारी में व्यस्त हो गये. तैयारियां अपने शबाव पर थीं कि एक रात इस्मत का फोन आया-
" अत्यंत आवश्यक कार्यवश मुझे बाहर जाना पड़ रहा है, कम से कम एक महीने के लिये."
खबर सुनते ही अपनी गोआ-यात्रा रद्द होने के शोक में हमारे चेहरे लटक गये. लेकिन उधर इस्मत और ज़हूर भाई दोनों का आग्रह था कि किसी प्रकार हमारा कार्यक्रम बना है, लिहाजा इसे रद्द न करें और नियत समय पर गोआ पहुंचे. खैर हमने उनके आग्रह का मान रखा और आठ मई को अपनी यात्रा पटना-वास्कोडिगामा सुपर फ़ास्ट ट्रेन से रात ग्यारह बजे शुरु की.
सतना से लेकर खंडवा तक केवल वीरान, सूखे जंगल और बंजर ज़मीन के दर्शन हुए. लेकिन भुसावल के बाद मन प्रसन्न हो गया. चारों ओर हरियाली का साम्राज्य. ट्रेन जब कोंकण क्षेत्र में पहुंची तब तो हम विस्मित हो गये. लगा इसे ही तो स्वर्ग कहते हैं!
पानी से लबालब भरी नदियां, नारियल, आम और भी कई तरह के वृक्षों से अटे पड़े जंगल.!! केवल हरियाली और पानी. ऊंची-ऊंची पहड़ियां, लेकिन घने पेड़ों से आच्छादित. दूर से हरे-हरे पहाड़ दिखाई दिखाई दे रहे थे, जैसे कोई चित्र देख रहे हों.

अंगूर के खेत और कोंकण की लबालब भरी नदियां.

मध्य-प्रदेश के सूखे से त्रस्त मैं, जब भी कोई हरी-भरी सीनरी देखती थी, तो सोचती थी , कि पक्का कलाकार ने मनगढंत चित्र बनाया होगा, लेकिन यहां प्रकृति की चित्रकारी देख विस्मित थी.
दस मई की सुबह हमारी ट्रेन अपने निर्धारित समय से पहले ही गोआ के "करमली" स्टेशन पहुंच गई. इस स्टेशन पर बने बांस के खूबसूरत यात्री पैदल पुल को देख कर तो हम आश्चर्य में पड़ गये. पुल को पार कर के जब हम एक नम्बर प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंचे तो तय नहीं कर पा रहे थे, कि हम स्टेशन पर हैं या किसी पार्क में? हमें तो कचरे से अटे, पान की पीक से रंगे स्टेशन की आदत है, सो कदम-कदम पर चकित हो रहे थे.
पणजी का मुख्य चौराहा,------ करमली स्टेशन का भीतरी दृश्य.
दस मिनट के अन्दर ही ज़हूर भाई हमें लेने स्टेशन पर आ गये. सामान गाड़ी में लादा और हम भी साथ में लद लिये. गाड़ी ओल्ड-गोआ से होती हुई पणजी में प्रविष्ठ हुई , जहां से हमारा घर दस मिनट की दूरी पर था, तभी हमें याद आया कि हम अपना पर्स, जिसमें पांच हज़ार रुपये, मेरे सारे एटीएम कार्ड्स, पैन-कार्ड, पत्रकार संघ का आई कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र, घर की सारी चाबियां, पूरे लगेज की चाबियां साथ में वापसी के टिकट और मेरे सोने के दो कंगन थे, स्टेशन के बगीचे की फ़ेंस पर ही छोड़ आये हैं :(
ज़हूर भाई ने बिना कुछ कहे, गाड़ी मोड़ी और हम वापस स्टेशन चल दिये.
हमारी गाड़ी ने जैसे ही स्टेशन में प्रवेश किया, हमारे उतरने के पहले ही, वहां टैक्सी स्टैंड पर खड़े टैक्सी ड्राइवर आवाज़ दे के कहने लगे,
" मैम आपका पर्स यहां छूट गया था, हमने अन्दर जमा करवा दिया है."
दो-तीन टैक्सी-ड्राइवर हमारे साथ अन्दर गये, और स्टेशन मास्टर व्यंक्टेश को बताया कि हमारा ही पर्स उन्होंने जमा करवाया है, तब एक एप्लीकेशन लेने के बाद पर्स हमें दे दिया गया, हमने देखा, पूरा सामान ज्यों का त्यों था. विकी नाम के जिस टैक्सी ड्राइवर को पर्स मिला, उसने कहा कि
"मैने पहले पर्स खोल के देखा, कि यदि कोई फोन नम्बर मिल जाये तो हम खबर कर दें, लेकिन जब नम्बर नहीं मिला तो हमने जमा कर दिया"
एक बार फिर हमारे चकित होने की बारी थी. यदि कोई और जगह होती तो क्या पर्स मिलता? छूटा हुआ रूमाल तो मिलता नहीं......
नतमस्तक थी गोआवासियों की ईमानदारी पर. तो ये थी मेरी पहली मुलाकात गोआ से. इस पहली मुलाकात ने ही अभिभूत कर दिया.
करमली स्टेशन का विहंगम दृश्य.

तस्वीरें: उमेश दुबे
(क्रमश:)

गुरुवार, 20 मई 2010

स्वर्ग सा सुन्दर: गोवा

सोलह मई को अपनी गोवा यात्रा सम्पन्न कर सतना लौटी. लौट तो आई, लेकिन मन वहीं कहीं हरियाली के बीच छूट गया. इतना सुन्दर राज्य. हालांकि मुझे बताने की ज़रूरत नहीं है, सब जानते हैं, गोवा के बारे में. फिर भी कुछ तस्वीरें तो दिखा ही सकती हूं, ज़्यादा बोर नहीं करूंगी लम्बा सा वृतांत लिख के.

गोवा

ब्यौरेविवरण
क्षेत्रफल3,702 वर्ग कि.मी.
जनसंख्‍या1,343,998
राजधानीपणजी
मुख्‍य भाषाएंकोंकणी तथा मराठी




सतना से गोवा की ओर जाने पर मध्य-प्रदेश की सीमा खंड्वा से समाप्त हो जाती है, और समाप्त हो जाता है तमाम वृक्ष-विहीन इलाका. महाराष्ट्र राज्य के शुरु होते ही हरियाली भी शुरु हो जाती है. भुसावल में केले के बड़े-बड़े बगीचे, तो नासिक में अंगूर के बगीचे!!! नारियल के पेड़ तो हैं ही.
पनवेल से ट्रेन गोवा की ओर मुखातिब हो जाती है, और शुरु होता है कोंकण का खूबसूरत हरा-भरा इलाका. पानी से लबालब भरी नदियां और फलों से लदे वृक्ष. सड़क-मार्ग पर दोनों ओर आम, इमली और नीम जैसे बड़े वृक्ष मुसाफ़िरों को भरपूर छाया देते हैं. पर्यावरण को प्रदूषित होने से तो बचाते ही हैं. चंद तस्वीरें देखें और तुलना करें, बतायें कि क्या मध्य-प्रदेश शासन सड़क-मार्ग को भी वृक्षों से आच्छादित नहीं कर सकता? ज़मीन इतनी बंजर पड़ी है कि देख के तकलीफ़ होती है.

मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के जंगल
गोवा की एक आम सड़क और
मुम्बई का एक खास स्था
ऊपर मरीन ड्राइव मुम्बई, और नीचे गोवा का तट जहां आप आंख मूंद के चल सकते हैं

मुम्बई की कुछ जगहों के चित्र देने के पीछे मेरा मकसद मुम्बई को शर्मिन्दा करना नहीं है, वरन केवल आगाह करने की कोशिश है. आम लोग , जिनमें मैं भी शामिल हूं, जब गोवा जैसी अनुशासित जगहों पर जाते हैं, तो वहां एक कागज़ भी सड़क पर फ़ेंकने से पहले सोचते हैं, और हमीं लोग दूसरी जगहों पर जाकर गन्दगी फैलाते हैं.
नियम तो हर जगह बने होते हैं लेकिन उनका पालन सख्ती से नहीं करवाया जाता ( ’करवाया जाता’....हमारे यहां आज भी लोगों को करवाये जाने की आदत है. अपने आप कुछ करना ही नहीं चाहते) लिहाजा लोग मनमानी करते हैं. डस्टबिन तक जाने की ज़हमत नहीं उठाते और जहां खड़े होते हैं वहीं कचरा फेंक देते हैं, लेकिन गोवा या पॉन्डिचेरी जैसी जगहों पर जाते हैं तो सभी नियमों का पालन करते हैं.
यानी ज़रूरत है नियम बनाने की और उन्हें कड़ाई से लागू करने की, तभी हमारा प्रदेश या अन्य दूसरे प्रदेश गोवा की तरह साफ़-सुथरे बन पायेंगे.

सभी तस्वीरें: उमेश दुबे


रविवार, 18 अप्रैल 2010

....गांव की कुछ यादें

आज अजय कुमार झा जी की पोस्ट पढ़ रही थी, पढ़ते-पढ़ते अपना गाँव बहुत-बहुत याद आने लगा.

हमारा गाँव इसलिए क्योंकि वहां हमारे दादा-परदादा रहे. पुश्तैनी मकान, ज़मीन सब वहीं है. ये अलग बात है, कि हमें गाँव में रहने का मौका केवल छुट्टियों में मिलता था, वो भी तब तक जब तक हमारे ताऊ जी( श्री मोतीलाल अवस्थी) जीवित थे.

गाँव की याद मुझे तब से है, जब मैं पांच या छह साल की रही होउंगी. जब मैं दस साल की थी, तब मेरे ताऊ जी का निधन हो गया, और उसके बाद गाँव छूट गया.

उत्तर-प्रदेश के ललितपुर जिले में है मेरा पुश्तैनी गाँव- "गुढ़ा" अब ये गाँव , गाँव जैसा नहीं रहा लेकिन जिस समय मैंने देखा, उस समय एकदम किस्से-कहानियों जैसा सुन्दर गाँव था...... गाँव में मेरे दादा बहुत रसूख वाले थे. सो वही पुश्तैनी दबदबा ताऊ जी का भी क़ायम था. हालाँकि वे थे भी बहुत विशाल ह्रदय, परोपकारी. बहुत प्यार करने वाले. तो बड़ों के रसूख के चलते हम बच्चे भी सिर कुछ ज्यादा ही ऊंचा उठा के चलते थे.

गाँव में हमारा घर हवेलीनुमा है. इस घर के अन्दर चार आँगन और एक बड़ा सा बगीचा है. पूरा घर दोमंजिला और कहीं-कहीं तीनमंजिला है. घर के बाहर मुख्यद्वार के दोनों तरफ दो बड़े-बड़े चबूतरे, और एक शिवमंदिर. पीतल की नक्काशी वाले भारी दरवाज़े, जिन्हें खोलना हमारी ताकत के बाहर की बात थी. कमरों में झरोखे सरीखी ऐसी खिड़कियाँ , जिनमें एक आदमी के लायक बिस्तर बिछाने की गुंजाइश थी.

धीरे-धीरे इस घर के सारे लड़के नौकरी और पढाई के चक्कर में बाहर चले गए. वहां रह गए हमारे ताऊ जी और कुछ अन्य बुजुर्गजन. उस ज़माने में सगे और चचेरे जैसा भेद नहीं किया जाता था, सो हमें मालूम था, कि मेरे पापा ग्यारह भाई और एक बहन हैं. यानि मेरे दस चाचा और एक बुआ!!!!! अनन्य सुंदरी बुआ.

पूरे साल ताऊ जी अकेले गाँव में रहते, लेकिन गर्मी की छुट्टियां होते ही सबके गाँव पहुँचने सम्बन्धी , उनका फरमान जारी हो जाता. और क्या मजाल कि कोई एक भाई भी न पहुँचने की हिमाकत करे. अब सोचिये, दस चाचा, दस चाचियाँ मेरे मम्मी पापा और उन सबके ३३ बच्चे!!!!! कैसी बमचक मचती होगी? भला हो उस बड़े घर का, वर्ना कहाँ टिकते सारे लोग?

गरमी की दोपहर हम बच्चों के लिए वरदान की तरह होती थी. बड़े दीदी-भैया लोग हम छोटों के कर्णधार थे. दिन में उधर बड़े लोग सोये, इधर बच्चा पार्टी दबे पाँव घर से बाहर. कोई न कोई बैलगाड़ी खेत की तरफ जा ही रही होती , तो सारे बच्चे उस गाडी में लद जाते. बेचारा गाड़ीवान डरता-घबराता बार-बार बच्चों को न जाने के लिए मनाता आखिरकार खेतों तक ले ही जाता. और खेत............ कोई आम के पेड़ पर चढ़ के आम तोड़ रहा है, तो कोई बोरिंग के मोटे पाइप से झर - झर गिरते पानी में नहाने ही लगता . धूप और लू से बेखबर..... खेत पर काम करने वाले सारे मजदूर परेशान कि यदि दद्दा (ताऊ जी) को पता चल गया कि हम खेत पर गए थे, तो उनकी खैर नहीं. शाम को बड़े लोग जागें, उसके पहले ही सारे बच्चे घर में व्यवस्थित हो जाते.
शाम को ताऊ जी साए बच्चों को घेरे में बिठा के गीत गवाते-
हे भगवान्, हे भगवान्
हमको दो ऐसा वरदान
विद्या और कला हम सीखें,
करें जगत में कार्य महान.

पकाने की लिए तैयार आम जब घर में लाये जाते , तो देखने लायक माहौल होता. गाड़ियाँ भर-भर के आम....... नीचे वाला एक लम्बा सा कमरा , जो खासतौर से आम के लिए ही था, बढ़िया से तैयार किया जाता. नीचे पत्ते बिछाए जाते, आम पूरे कमरे में भर दिए जाते और उन्हें बढ़िया से पत्तों से ढँक दिया जाता. आम के शौक़ीन मेरे दादा ने आम की कई किस्में अपने बगीचे में लगवाईं थीं.

उधर आम कमरे में भरे जाते, इधर हम बच्चे उनके पकने का इंतज़ार करने लगते. रोज़ कमरे के दरवाज़े पर लटकते ताले को देखते.....पकते हुए आमों की खुशबू लेते. और जब आम पक जाते तब तो क्या कहने....रोज़ आम की दावत होती.
तरह- तरह के खेल खेले जाते, जिनमें बड़े भी शामिल होते. रात को छत पर सबके बिस्तर लगते, और ताऊ जी कहानियाँ सुनाते........ सात बहन चंपा, सोनजुही, और भी पता नहीं कितनी कहानियां...................

गाँव अब पहले से गाँव नहीं हैं. हमारे गाँव की ही तस्वीर बदल गई है. वहां सड़कें, बिजली, अस्पताल, स्कूल, इंटर कॉलेज, बसें, बाज़ार सबकुछ है. खेत सिमट गए हैं. बस्तियां बढ़ गईं हैं. कमोवेश यही तस्वीर अधिकांश गाँवों की है अब.

ये अलग बात है कि अभी भी बहुत से गाँव , जो जिला मुख्यालय से दूर हैं, मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. उनका विकास होना ही चाहिए, लेकिन मेरा स्वार्थी मन तो देखिये, बीस साल पहले गाँव गई थी, और वहां शहरी संस्कृति का प्रवेश देख खुश नहीं हो सकी थी, मेरी आँखें उसी पुराने गाँव को ढूंढ रहीं थीं, जहां दूर तक फैले खेत, हरियाली , पेड़ों की घनी छाँव, और उन लोगों को , जो दूर से पहचान के दौड़े चले आते थे, ये कहते हुए कि "अरे नन्हें दद्दा ( मेरे पापा) आ गए....... "

रविवार, 28 मार्च 2010

चित्रकूट के घाट पे भई संतन की भीर.....



-चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ।
आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।


चित्रकूट धाम भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में एक है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के लम्बे- चौड़े भू-भाग में फैला शांत और सुन्दर चित्रकूट प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन है। चारों ओर से विन्ध्य पर्वत श्रृंखलाओं और वनों से घिरे चित्रकूट को अनेक आश्चर्यो की पहाड़ी कहा जाता है। मंदाकिनी नदी के किनारे बने अनेक घाट और मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है।

माना जाता है कि भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ अपने वनवास के चौदह वर्षो में से ग्यारह वर्ष चित्रकूट में ही बिताए थे। इसी स्थान पर ऋषि अत्री और सती अनसुइया ने ध्यान लगाया था। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने चित्रकूट में ही सती अनसुइया के घर जन्म लिया था.

पिछले दिनों अचानक ही चित्रकूट -दर्शन का कार्यक्रम बना, और हम १६ मार्च को मुंह-अंधेरे चित्रकूट के लिये रवाना हो गये. २५ वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद मैं चित्रकूट जा रही थी, मन में उत्सुकता थी, परिवर्तित चित्रकूट को देखने की, क्योंकि इन सालों में सुना कि चित्रकूट बहुत सुन्दर हो गया है, बहुत परिवर्तन हुए हैं वहां आदि-आदि.

सात बजे हम चित्रकूट पहुंचे और सीधे कामतानाथ जी के द्वार पर हाजिरी लगाई. यहीं से कामदगिरि-परिक्रमा शुरु होती है. यह स्थान पहले जितना खुला-खुला था, अब उतना ही बन्द-बन्द हो गया है. मन्दिर के बाहर अनगिनत दुकानें लग गईं हैं, जिन्होंने दोनों तरफ़ से सड़क का काफ़ी हिस्सा घेर लिया है, लिहाजा सड़क संकरी हो गई है. मन्दिर के अन्दर भी दर्शनार्थियों के लिये कोई नियम नहीं है, सो सब एक-दूसरे को धक्का देते हुए आगे बढते हैं. हां, पर्वत का पांच कि.मी. लम्बा परिक्रमा-मार्ग जो पहले कंक्रीट का था, अब पूरे मार्ग पर मार्बल लगवा दिया गया है, जिसे बडी सुविधाओं में गिना जाना चाहिये. वरना पहले नंगे पांव परिक्रमा करते समय पैरों की जो दशा होती थी, उसे वही महसूस कर सकता है, जो पहले कभी उस मार्ग पर चला हो. इस परिक्रमा-मार्ग के दोनों ओर भी कतारबद्ध दुकानें सज गईं हैं, जो पहले नहीं थीं. पहले आभास होता था कि हम पर्वत पर हैं, अब लगता है, जैसे बाज़ार में घूम रहे हों.

परिक्रमा के बाद हम रामघाट पहुंचे. मंदाकिनी के तट पर. पच्चीस साल पहले जिस मंदाकिनी को मैने देखा था, उस के चौड़े पाट अब सिमट गये हैं. उस वक्त की निर्मल नदी ने आज गन्दे नाले का रूप ले लिया है. नदी की सतह इस कदर कचरे से ढंक गई है, कि कहीं आचमन के लिये भी जल न मिले. नदी पर नौका विहार की सुविधा है. नदी के किनारे स्थित मन्दिरों के सफ़ाईकर्मी पूरा कचरा जिसमें फूल-पत्तों के साथ-साथ पॉलीथिन भी होते हैं, बड़े प्रेम से नदी मे विसर्जित कर देते हैं. प्रतिदिन निकलने वाला यह चढ़ावा कई बोरे होता है. नौका-विहार करने वाले लोग भी नदी को फूल तो चढायेंगे न? फिर वे जो कुछ भी खा रहे हैं, उसके छिलके, पॉलीथिन आदि कहां फेकेंगे? नदी में ही न? वहीं नदी किनारे रहने वाले प्रतिदिन इसी में स्नान करते हैं, खूब साबुन रगड़-रगड़ के.

हम भी नदी की दुर्दशा पर आंसू बहाते हुए, नौका-विहार करते रहे.


चित्रकूट में जो परिवर्तन हुए हैं, उनमें ग्रामोदय विश्वविद्यालय, आरोग्यधाम, और रामदर्शन जैसे स्थान हैं, जिन्होंने चित्रकूट को नया आयाम दिया. रामघाट के बाद हम आरोग्यधाम गये. उफ़!!! कितना खूबसूरत. दीनदयाल शोध संस्थान ने चित्रकूट में आरोग्यधाम नाम से आजीवन स्वास्थ्य अनुसंधान केंद्र स्थापित किया है। यहां आयुर्वेद, योगोपचार,उचित खानपान एवं प्राकृतिक चिकित्सा के समन्वित प्रयोगों द्वारा आजीवन स्वास्थ्य प्राप्त करने का कार्य किया जा रहा है. यह स्थान टाटा समूह द्वारा निर्मित करवाया गया है. सैकड़ों जड़ी-बूटियां , हज़ारों फूलों और तरणताल से घिरा, कई एकड़ में फैला आरोग्यधाम सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र है.

इसी प्रकार मुम्बई के उद्योगपति द्वार चित्रकूट में निर्मित ’रामदर्शन" अपनी व्यवस्थाओं के लिये दिल्ली के लोटस टेम्पल की याद दिलाता है. खूबसूरत भित्तिचित्रों और सजीव झांकियों से सुसज्जित यह स्थान दर्शनीय है.

लेकिन यदि हम इन दो-तीन स्थलों को छोड़ दें, तो चित्रकूट में नकारात्मक परिवर्तन ही ज़्यादा हुए हैं. शहर आज भी विकास का मोहताज है. सड़कें दुर्दशा को प्राप्त हैं. जबकि चित्रकूट के विकास के नाम पर करोड़ों में राशि स्वीकृत होती रही है, होती है.

कल यानी २७ मार्च को प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने मंदाकिनी स्वच्छता अभियान का श्री गणेश किया है, इस अभियान के लिये फिर करोड़ों की राशि स्वीकृत की गई है.

काश! सफल हो जाये ये स्वच्छता-अभियान....

रविवार, 14 मार्च 2010

वो छुप-छुप के लिखना..........


आज अपने बुक-शेल्फ की सफाई कर रही थी, तो एक पुरानी डायरी हाथ आ गई. सन १९८० की डायरी. यानि तीस साल पुरानी डायरी................. पन्ने पलटने लगी तो मेरा बचपन डायरी में से कूद कर बाहर भागा...

याद आने लगे लेखन के शुरूआती दिन....

हमारे घर में हमेशा से शुद्ध साहित्यिक माहौल रहा है. मेरे पापा ( श्री रामरतन अवस्थी) खुद भी बहुत अच्छे कवि और लिखने पढ़ने के बेहद शौक़ीन व्यक्ति हैं. लिहाजा बचपन से ही घर में पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों का अम्बार देखती आई हूँ. घर की सारी अलमारियां किताबों से सजी हुईं, रैक पर करीने से तमाम पत्रिकाएं सिलसलेवार रखी हुईं. पठन सामग्री को मैंने कभी घर में बिखरा हुआ नहीं देखा. उस वक्त हमारे घर में साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका , कादम्बिनी, और ज्ञानोदय हॉकर लाता था, जबकि सोवियत भूमि, सोवियत नारी, और बाल स्पुतनिक डाक से आती थीं. हम तीन बहनों के लिए नंदन, चंदामामा, और पराग ये तीनों पत्रिकाएं नियमित आती थीं.
महीने में तीस दिन, और ग्यारह पत्रिकाएं!!!!

मेरी मम्मी अक्सर कहतीं, कि "अव्वल तो इस घर में चोर आयेगा ही नहीं, और यदि आया तो सिर पीट लेगा क्योंकि उसे किताबों के अलावा कुछ मिलेगा ही नहीं."

किताबों से मुझे हमेशा से बहुत प्रेम रहा. जब मुझे पढना नहीं आता था, तब भी मैं घंटों किताबें हाथ में लिए , पढने का नाटक करती बैठी रहती थी. फिर जब मेरा स्कूल में दाखिला होना था, उसके एक साल पहले से मेरी छोटी दीदी ने मुझे पढ़ाना शुरू किया. जानते हैं, लिखना-पढ़ाना सीखने के बाद मैंने सबसे पहला काम क्या किया?

पुरानी कॉपियों के पन्ने निकाल-निकाल के उन्हें दोहरा मोड़ के एक डायरी बनाई. उस के ऊपर बाक़ायदा लिखा- "गांधी-डायरी" (तब घर में मैंने केवल गांधी डायरियां ही देखीं थीं.)

अब इस डायरी में मैंने लिखना शुरू किया. शुरुआत मम्मी की सुनाई कहानी से की.... चार लाइनें ही लिखीं थीं, कि खुद को झिड़का- धत! कोई सुनी सुनाई कहानी भी लिखता है? खुद से सोच-सोच के लिखना चाहिए..........

....फिर कुछ कहानी टाइप लिखा. इसके बाद दूसरी और फिर तीसरी तो सचमुच ही कहानी जैसी बन पड़ी.

दोपहर में जब मम्मी सो रही होतीं, दीदियाँ स्कूल गईं होतीं, तब मैं खिड़की में बैठ के अपनी उस हस्त-निर्मित डायरी में चोरी से कहानियां लिखती. ( मेरा उस वक्त तक स्कूल जाना शुरू नहीं हुआ था, तब दाखिला छह साल कि उम्र में होता था और मेरे छह साल पूरे नहीं हुए थे.) साल भर में मैंने पता नहीं कितनी डायरियां बना डालीं, और पता नहीं कितनी कहानियां लिख डालीं..........

तब स्कूल के शुरूआती दिन थे....... घर में दिल्ली के नवभारत टाइम्स के अलावा दैनिक जागरण भी आता था. दैनिक जागरण के रविवारीय पृष्ठ के "बाल-जगत " को मैं हमेशा पढ़ती थी. धीरे-धीरे उसमें छपने की इच्छा जागने लगी. एक दिन चुपचाप एक कहानी फुल स्केप कागज़ पर उतारी गई. पापाजी की फ़ाइल में से एक लिफाफा चुराया गया, उस पर नौसिखिया अक्षरों में दैनिक जागरण-बालजगत का पता लिखा गया. कहानी भेजी गई.....शीर्षक था " जब बच्चों ने नाटक खेला".

भेजने के बाद इंतज़ार शुरू. छपने से ज्यादा डर कहानी के वापस आ जाने का था....पोस्टमैन के आने के समय बाहर घूमती रहती, ताकि कहानी का लिफाफा वापस लाये, तो मुझे ही मिले. किसी और को मिल गया तो कितनी हंसी उड़ेगी. डांट अलग से पड़ेगी , कि पढाई छोड़ के क्या-क्या के तमाशे करती रहती हूँ.

एक हफ्ता बीता.....दूसरा भी.....किसी अंक में मेरी कहानी नहीं छपी थी.......अब तो पक्का भरोसा हो गया कि लिफाफा वापस आने वाला है. रविवार को देर तक सोने वाली मैं, बड़े सबेरे उठ जाती थी..... तीसरा हफ्ता.........नींद देर से खुली. कुछ आवाजें आ रहीं थीं....ध्यान लगाया , मेरे बारे में ही बात हो रही थी....कान खड़े हो गए मेरे.
ओह्ह्ह्ह.....ये तो कहानी के बारे में बात हो रही है......उठ के भागी. पापाजी अखबार हाथ में लिए मम्मी को दिखा रहे थे. उसके बाद तो पूरे मोहल्ले में अखबार घूमा, कुछ लोगों ने खुद आ के बताया. चूंकि नाम के साथ पूरा पता भी छपा था, इसलिए सब पहचान पा रहे थे. अगले दिन स्कूल में भी खूब तारीफ़ पाई, इस हिदायत के साथ कि पढ़ाई पहले है.
इसके बाद छपने का सिलसिला जो शुरू हुआ तो आज तक जारी है, लेकिन वो ख़ुशी दोबारा नहीं मिली जो उस दिन मिली थी.

आज जब लोगों में पढने की  आदत लगभग ख़त्म होते देखती हूँ, तो बहुत तक़लीफ़ होती है. बच्चों में तो ये आदत अब न के बराबर रह गई है. अधिक से अधिक कॉमिक्स, बस. हांलांकि दोष बच्चों का नहीं है. उन के सिर पर पढ़ाई का इतना बोझ है, कि उसे पूरा करने के बाद कुछ और पढने कि इच्छा ही नहीं रह जाती होगी. ये अलग बात है कि बच्चे छुट्टियों में भी कुछ पढ़ने का मन नहीं बनाते.

बड़े ही कितना मन बनाते हैं!!


सोमवार, 8 मार्च 2010

आभार....

होली के अवसर पर आयोजित रंग-बिरंगी परिचर्चा "होली के रंग- किस अपने के संग" में आप सब ने जिस उत्साह से भाग लिया उससे न केवल परिचर्चा सफल रही, वरन आपने मेरा भी मान बढाया है। आभारी हूँ, आपके स्नेह और सौजन्य की, उम्मीद करती हूँ, कि भविष्य में भी इसी प्रकार स्नेह बनाए रखेंगे। आभारी हूँ, उन पाठक- मित्रों की, जिन्होंने इसे पढ़ा , सराहा और परिचर्चा को सफल कहलाने का हक प्रदान किया।
आप सबने शिकायत की कि मैंने अपनी होली का विवरण क्यों नहीं दिया? तो मेरी होली तो इस परिचर्चा का आमंत्रण भेजने के दूसरे दिन से ही शुरू हो गई थी.....आप सबके रंग-बिरंगे विचारों के ज़रिये मैंने तो इतनी होली खेली, जितनी कभी नहीं खेली थी।
तो अब आप ही बताएं, कि इतने रंगों के बाद भी मुझे होली खेलने कि ज़रुरत थी क्या?

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की संध्या पर शुभकामनायें आप सबको.......
मैं उसे घर की देवी कहता था
हालाँकि कहते वक्त भी मुझे लगता था
कि अपनी बच्ची को
कहे गए ये शब्द
उसे जबरन एक भार से लाद देते हैं
कि वो बोलने वाले
माँ-बाप भी
बच्ची को जितना स्नेह करते हैं
उससे कहीं ज्यादा उम्मीद भी
लेकिन क्या करें
कि उसे पहली बार
जब माँ की गोद में देखा
और उसके बाद तब से लेकर
अब तक
जब जब भी देखा
जैसे एक उजास सा उतर आया
आकाश से दिल में
कि जैसे बज गई हो
सरस्वती के हाथों में वीणा
मेरे घर के कमरों, आंगन और
बगीचों में
लेकिन क्या ऐसा लगना ठीक है?
या थोडा जगना ठीक है
कि इस उजास को भी
अपना एक वृत्त चाहिये
अपनी परिधि
और अपना केन्द्र
कि इस वीणा का भी
अपना कमरा होना चाहिए
अपना आंगन
अपना बगीचा
कि जिसमें उसके स्वर
उतनी ही सहजता से
उतनी ही आज़ादी से
खिलते हों
जितने कि देवी के यहां
जितने कि उस ईश्वरीय दुनिया में
जहां से उसे यहां भेजा गया
न सिर्फ़ पापा-मम्मी की उम्मीद पूरी करने
बल्कि
ईश्वर की भी
( आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मध्य-प्रदेश जनसम्पर्क विभाग द्वारा जारी ये रचना मुझे इतनी अच्छी लगी कि आप सब को इसे पढाने का लोभ संवरण न कर सकी।)
चित्र: गूगल से साभार