१३ जून २०१२१४ जून २०१२ को मेरी भांजी की शादी थी. ये शादी सतना से हुई, सो तमाम ज़िम्मेदारियां मेरे और उमेश जी के कंधों पर थीं ( उमेश जी के कंधे तो काफ़ी मजबूत हैं, लेकिन मेरे....?
) ख़ैर, शादी बड़ी धूम-धाम और बिना किसी व्यवधान के सम्पन्न हुई. १३ जून को हमारे यहां संगीत-सभा थी. आम तौर पर शादियों में महिला-संगीत का रिवाज़ है, लेकिन हमारे यहां यह संगीत-सभा की तरह होती है जिसमें महिला, पुरुष या बच्चों को वर्गीकृत नहीं किया जाता बल्कि सभी लोग इसमें भाग लेते हैं लिहाजा माहौल बहुत खुशनुमा हो जाता है.
शादी के लिये अपने सभी मेहमानों के रुकने का इंतज़ाम सदगुरु रिज़ॉर्ट में किया गया था, जो शहर से १० कि.मी. दूर था. काम, मेहमान और भागदौड़ के चलते देश-दुनिया की खबरों से लगभग दूर ही थी. संगीत वाले दिन बच्चों-बड़ों के नाच-गाने के बाद साढे दस बजे जब ग़ज़ल- संध्या (संध्या..??? ) आरम्भ हुई तो हमारे मामा जी ने सूचना देते हुए अनाउंसमेंट किया-
" आज ग़ज़ल सम्राट मेंहदी हसन साहब नहीं रहे, तो ये शाम उन्हीं के नाम...."
मैं स्तब्ध!
बहुत छोटी थी, तब से लेकर आज तक केवल एक ही गायक मेरा पसंदीदा था, और वो थे मेंहदी हसन साहब. लम्बे समय से बीमार चल रहे मेंहदी साहब के बारे में कभी भी ऐसी खबर आ सकती है, ये अंदाज़ा तो मुझे भी था, लेकिन सच मानिये, उनकी बीमारी की खबर जब भी पढती थी, मैं मन ही मन उनके कभी न जाने की दुआएं करने लगती थी. बहुत मन था उनसे मिलने का लेकिन नहीं मिल सकी
.
सोचा था कि इस बार अगर वे इलाज़ के सिलसिले में हिन्दुस्तान आये, तो मैं उनसे मिलने ज़रूर जाउंगी, लेकिन वे आये ही नहीं.
मेंहदी साहब को मैने तब से जाना, जब मैं छह साल की रही होउंगी. मेरी बड़ी
दीदी रेडियो की ऐसी दीवानी कि खाना बनाते, खाते, सफ़ाई करते, यहां तक कि पढते हुए भी रेडियो सुनती रहतीं. दुनियां भर के स्टेशन उन्हें मालूम थे. रात को जब उर्दू सर्विस का फ़रमाइशी कार्यक्रम खत्म होता तो रेडियो पाकिस्तान शुरु हो जाता. उद्घोषक की दानेदार आवाज़ कानों में पड़ती-
" हम रेडियो पाकिस्तान/मुल्तान/करांची से बोल रहे हैं ..... पेशेखिदमत है फ़िल्मी

नग़मों का फ़रमायशी कार्यक्रम.. ग़ुलदस्ता....
"...अब जिस खूबसूरत नग़में को हम पेश कर रहे हैं उसे आवाज़ दी है मेंहदी हसन ने..."
बस. तभी से मेंहदी हसन साहब का नाम मेरी ज़ुबान पर और आवाज़ कानों में घर कर गयी. उस वक़्त वे पाकिस्तानी फ़िल्मों के लिये गाया करते थे. " देख तू दिल कि जां से उठता है, ये धुआं सा कहां से उठता है..."
" रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरे हस्ती के सामां हो गये....." और "प्यार भरे दो शर्मीले नैन....." लगभग रोज़ ही रेडियो पर आते थे. पाकिस्तानी ग़ायको में मुझे बस तीन चार नाम ही सुनाई देते थे जिनमें से याद
केवल दो रह गये - मेंहदी हसन, और नाहिद अख्तर.
छह साल की उम्र में जो दीवानगी मेंहदी साहब की आवाज़ के लिये मेरे दिल में थी वही आज भी है. मेरे कानों को कोई और जंचता ही नहीं.
सोचती थी कि मेंहदी साहब के निधन की खबर का दिन कितना भारी गुज़रेगा ..............
लेकिन उनके जाने के दिन हमारे यहां उत्सव का माहौल था ......
फिर भी मन में ये तसल्ली थी, कि हम उस महान गायक को उसके ही लायक, सुरसिक्त , सच्ची श्रद्धान्जलि दे रहे है.
लम्बे समय से बीमार मेंहदी साहब को जाना तो था ही १२ साल से तक़लीफ़ झेल रहे हसन साहब को भी शायद तक़लीफ़ों से मुक्ति मिली. लेकिन कितना अटपटा लगता है ये सुनना कि दो साल से उस गायक की आवाज़ बन्द थी, जिसने कभी काम के दौरान भी अपने सुर बन्द नहीं किये.....?
१३ जून की रात हमने भी उन्हें श्रद्धान्जलि स्वरूप अपने घर की संगीत-निशा समर्पित की.
उनके निधन की खबर के बाद ऐसा एक दिन भी नहीं था, जब मैने उन्हें याद न किया हो, आज उनकी याद को यहां बांटने का मौका मिल ही गया. इस महान गायक को विनम्र श्रद्धान्जलि.
( नीचे तस्वीर में मेरी छोटी दीदी अर्चना और मेरा भाई धनन्जय, ये दोनों शास्त्रीय और सुगम संगीत के बहुत अच्छे गायक है.) 
नहीं, लेकिन तब मैं बहुत छोटी थी और तीन पहिये वाली साइकिल चलाती थी. उस समय साइकिल पर बड़ा सा लकड़ी का बॉक्स बांधे, उसमें लाल-गुलाबी रंग के आइसक्रीम बार भरे आइस्क्रीम वाला आता था. दोपहर हुई नहीं, कि उसकी आवाज़ मोहल्ले में गूंजने लगती-
मेरी मम्मी को हम बहनों का बरफ खाना बिलकुल पसंद नहीं था. कुल्फी खाने पर आपत्ति नहीं थी उन्हें लेकिन उस बक्से वाले से बरफ लेकर खाना..... बरफ खाते हुए फंसती मैं ही थी. दीदियाँ तो फटाफट खा के ख़त्म कर देतीं थीं, मैं देर तक उस गुलाबी बरफ को चूस-चूस के सफ़ेद निकालने के चक्कर में धर ली जाती