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रविवार, 8 जुलाई 2012

मैं कब का जा चुका हूँ सदाएं मुझे न दो .....

१३ जून २०१२
१४ जून २०१२ को मेरी भांजी की शादी थी. ये शादी सतना से हुई, सो तमाम ज़िम्मेदारियां मेरे और उमेश जी के कंधों पर थीं ( उमेश जी के कंधे तो काफ़ी मजबूत हैं, लेकिन मेरे....? ) ख़ैर, शादी बड़ी धूम-धाम और बिना किसी व्यवधान के सम्पन्न हुई. १३ जून को हमारे यहां संगीत-सभा थी. आम तौर पर शादियों में महिला-संगीत का रिवाज़ है, लेकिन हमारे यहां यह संगीत-सभा की तरह होती है जिसमें महिला, पुरुष या बच्चों को वर्गीकृत नहीं किया जाता बल्कि सभी लोग इसमें भाग लेते हैं लिहाजा माहौल बहुत खुशनुमा हो जाता है.
शादी के लिये अपने सभी मेहमानों के रुकने का इंतज़ाम सदगुरु रिज़ॉर्ट में किया गया था, जो शहर से १० कि.मी. दूर था. काम, मेहमान और भागदौड़ के चलते देश-दुनिया की खबरों से लगभग दूर ही थी. संगीत वाले दिन बच्चों-बड़ों के नाच-गाने के बाद साढे दस बजे जब ग़ज़ल- संध्या (संध्या..??? ) आरम्भ हुई तो हमारे मामा जी ने सूचना देते हुए अनाउंसमेंट किया-
" आज ग़ज़ल सम्राट मेंहदी हसन साहब नहीं रहे, तो ये शाम उन्हीं के नाम...."
मैं स्तब्ध!
बहुत छोटी थी, तब से लेकर आज तक केवल एक ही गायक मेरा पसंदीदा था, और वो थे मेंहदी हसन साहब. लम्बे समय से बीमार चल रहे मेंहदी साहब के बारे में कभी भी ऐसी खबर आ सकती है, ये अंदाज़ा तो मुझे भी था, लेकिन सच मानिये, उनकी बीमारी की खबर जब भी पढती थी, मैं मन ही मन उनके कभी न जाने की दुआएं करने लगती थी. बहुत मन था उनसे मिलने का लेकिन नहीं मिल सकी .
सोचा था कि इस बार अगर वे इलाज़ के सिलसिले में हिन्दुस्तान आये, तो मैं उनसे मिलने ज़रूर जाउंगी, लेकिन वे आये ही नहीं.
मेंहदी साहब को मैने तब से जाना, जब मैं छह साल की रही होउंगी. मेरी बड़ी
दीदी रेडियो की ऐसी दीवानी कि खाना बनाते, खाते, सफ़ाई करते, यहां तक कि पढते हुए भी रेडियो सुनती रहतीं. दुनियां भर के स्टेशन उन्हें मालूम थे. रात को जब उर्दू सर्विस का फ़रमाइशी कार्यक्रम खत्म होता तो रेडियो पाकिस्तान शुरु हो जाता. उद्घोषक की दानेदार आवाज़ कानों में पड़ती-
" हम रेडियो पाकिस्तान/मुल्तान/करांची से बोल रहे हैं ..... पेशेखिदमत है फ़िल्मी
नग़मों का फ़रमायशी कार्यक्रम.. ग़ुलदस्ता....
"...अब जिस खूबसूरत नग़में को हम पेश कर रहे हैं उसे आवाज़ दी है मेंहदी हसन ने..."
बस. तभी से मेंहदी हसन साहब का नाम मेरी ज़ुबान पर और आवाज़ कानों में घर कर गयी. उस वक़्त वे पाकिस्तानी फ़िल्मों के लिये गाया करते थे. " देख तू दिल कि जां से उठता है, ये धुआं सा कहां से उठता है..."
" रफ़्ता-रफ़्ता वो मेरे हस्ती के सामां हो गये....." और "प्यार भरे दो शर्मीले नैन....." लगभग रोज़ ही रेडियो पर आते थे. पाकिस्तानी ग़ायको में मुझे बस तीन चार नाम ही सुनाई देते थे जिनमें से याद
केवल दो रह गये - मेंहदी हसन, और नाहिद अख्तर.
छह साल की उम्र में जो दीवानगी मेंहदी साहब की आवाज़ के लिये मेरे दिल में थी वही आज भी है. मेरे कानों को कोई और जंचता ही नहीं.
सोचती थी कि मेंहदी साहब के निधन की खबर का दिन कितना भारी गुज़रेगा ..............
लेकिन उनके जाने के दिन हमारे यहां उत्सव का माहौल था ...... फिर भी मन में ये तसल्ली थी, कि हम उस महान गायक को उसके ही लायक, सुरसिक्त , सच्ची श्रद्धान्जलि दे रहे है.
लम्बे समय से बीमार मेंहदी साहब को जाना तो था ही १२ साल से तक़लीफ़ झेल रहे हसन साहब को भी शायद तक़लीफ़ों से मुक्ति मिली. लेकिन कितना अटपटा लगता है ये सुनना कि दो साल से उस गायक की आवाज़ बन्द थी, जिसने कभी काम के दौरान भी अपने सुर बन्द नहीं किये.....?
१३ जून की रात हमने भी उन्हें श्रद्धान्जलि स्वरूप अपने घर की संगीत-निशा समर्पित की.
उनके निधन की खबर के बाद ऐसा एक दिन भी नहीं था, जब मैने उन्हें याद न किया हो, आज उनकी याद को यहां बांटने का मौका मिल ही गया. इस महान गायक को विनम्र श्रद्धान्जलि.
( नीचे तस्वीर में मेरी छोटी दीदी अर्चना और मेरा भाई धनन्जय, ये दोनों शास्त्रीय और सुगम संगीत के बहुत अच्छे गायक है.)

मंगलवार, 17 मई 2011

ठंडा मीठा बरियफ़.......

कल उमेश जी का ऑफ़िस से लौटते समय विधु के पास फोन आया-
"बेटू, कौन सी आइसक्रीम लानी है?"
" ऑरेंज बार"
"बस?"
"हां बस"
उमेश जी घर आये तो उनके हाथ में ऑरेंज बार का बड़ा सा डिब्बा था. आम महिलाओं की तरह मैने भी तुरन्त विपरीत प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर
दी-
"अरे!!! इतनी सारी??"
"तो क्या हुआ? केवल साठ रुपये की ही तो हैं." उमेश जी मेरी चिन्ता भांप
गये थे, सो कीमत बता दी . आइसक्रीम खिलाने की ज़िम्मेदारी उमेश जी की है, इसलिये मुझे किसी भी तरह की आइसक्रीम की कीमत नहीं मालूम. जानने की कोशिश भी नहीं की . लेकिन आज हिसाब लगाया- साठ रुपये की बारह, मतलब पांच रुपये की एक!!! वाह! क्या बात है!! मुझे लगा एक मात्र यही आइसक्रीम है जो इतने कम दामों पर मिलती है.
आइसक्रीम से होते हुए फिर मेरा बचपन मेरे इर्द-गिर्द झांकने लगा.....
मुझे ठीक-ठीक याद
नहीं, लेकिन तब मैं बहुत छोटी थी और तीन पहिये वाली साइकिल चलाती थी. उस समय साइकिल पर बड़ा सा लकड़ी का बॉक्स बांधे, उसमें लाल-गुलाबी रंग के आइसक्रीम बार भरे आइस्क्रीम वाला आता था. दोपहर हुई नहीं, कि उसकी आवाज़ मोहल्ले में गूंजने लगती-
"ठंडा मीठा बरियफ़... मलाई वाला बरियफ़...(बरियफ़=बर्फ)"
हर घर की खिड़कियों के खुलने की आहट मिलने लगती. बच्चे चोरी-छिपे बाहर निकलते, अपनी पसंद की बरफ खरीदते, और दबे पाँव अन्दर. मुझे भी बहुत अच्छी लगती थी ये रंगीन बर्फ, कीमत भी केवल पांच पैसे. पंद्रह पैसे में मलाई वाली बरफ आती थी, जिसमें केवल ऊपर की तरफ थोड़ी सी मलाई लगी होती थी. एक और आइसक्रीम वाला आता था, जो कुल्फी बेचता था. ये भी जब पत्ते पर रख के कुल्फी काटता तो सब्र करना मुश्किल हो जाता . लगता, कितनी देर लगा रहा है, यहाँ लार टपकी जा रही...
स्कूल में जब हम थोड़ी बड़ी क्लास में आ गए, तो खर्चे के लिए रोज़ पच्चीस पैसे मिलने लगे. पच्चीस पैसे का मतलब समझ रहे हैं न आप? उस वक्त इतने पैसों में मैं बरफ, मूंगफली, बेर, गटागट, तिल-पापडी सब खरीद लेती थी. कई बार तो पैसे बच भी जाते थे . किसी दिन यदि पचास पैसे मिल गए, तब तो समझो राजा हो गए. समझ में ही नहीं आता था कि कहाँ खर्च करें इतना पैसा?
हाँ तो बात बरफ की हो रही थी...विषयांतर बहुत करती हूँ मैं, है न?
मेरी मम्मी को हम बहनों का बरफ खाना बिलकुल पसंद नहीं था. कुल्फी खाने पर आपत्ति नहीं थी उन्हें लेकिन उस बक्से वाले से बरफ लेकर खाना..... बरफ खाते हुए फंसती मैं ही थी. दीदियाँ तो फटाफट खा के ख़त्म कर देतीं थीं, मैं देर तक उस गुलाबी बरफ को चूस-चूस के सफ़ेद निकालने के चक्कर में धर ली जाती . मेरी मम्मी के समझाने
के तरीके बड़े अनोखे थे. एक दिन जब मैं चुपचाप बरफ खा रही थी, मम्मी ने देख लिया. कुछ बोलीं नहीं बस अन्दर गईं, थोडा सा नमक हाथ में लाईं और बोलीं-
" बेटा अपनी बरफ देना तो , देखो हम दिखाएँ कि इसके अन्दर कितने कीड़े होते हैं"
मैंने चुपचाप बरफ मम्मी को पकड़ा दी. उन्होंने बरफ ली, और उस पर नमक डाल दिया. थोड़ी ही देर में नमक ने बर्फ में तमाम छेद बना दिए. मुसकुरात हुए मम्मी ने मुझे देखा. मेरे मंह का पूरा जायका बिगड़ चुका था. लग रहा था जैसे तमाम कीड़े मेरे मुंह में बिलबिला रहे हैं...बड़ी देर तक कुल्ला करती रही.
उस दिन से लेकर आज तक मैंने फिर चूसने वाली बार टाइप आइसक्रीम नहीं खाई .
अब खाने की इच्छा भी नहीं होती. अभी देख रही हूँ, विधु बड़े स्वाद ले ले के ऑरेंज बार खा रही है..... नमक डाल दूँ क्या?

रविवार, 14 जून 2009

दूरदर्शन के दिन

तब दूरदर्शन के शुरूआती दिन थे। कुछ बड़े शहरों में ही टी.वी.टॉवर थे, लेकिन दूरदर्शन की ललक सब के मन में.... तब बहुत कम घर थे जहाँ टेलिविज़न था। हमारे घर भी तभी टैक्सला का बड़ा श्वेत-श्याम टीवी आया। कुछ दिखने के नाम पर केवल झिलमिलाहट और बीच-बीच में कभी अस्पष्ट तो कभी स्पष्ट चित्र दिखाई दे जाता। इस चित्र को भी देखने के लिए छत पर हवाई जहाज सरीखा एंटीना लगाना पड़ता।
हमारे घर जब टीवी आया तब मैं छोटी ही थी। हाथ ठेले पर रखा टीवी जब हमारे घर आया तो उसका किसी मेहमान की तरह स्वागत हुआ। स्वागत करने हम बच्चा पार्टी पहले ही गेट पर खड़े थे। जैसे ही ठेला आया, मैंने सबसे पहले मोहल्ले के अन्य घरों पर एक विहंगम दृष्टि डाली ये देखने के लिए की लोगों ने हमारे घर टीवी आते देखा या नहीं?

उस वक्त जिन घरों में टीवी था वे कुछ विशिष्ट हो गए थे।
हाँतो छत पर बड़ा सा एंटीना लगना पड़ता, और यदि फिर भी तस्वीर न दिखाई पड़े तो एक आदमी को ऊपर चढ़ कर एंटीना घुमाना भी पड़ता था। ऐसा में ऊपर चढा व्यक्ति बार बार पूछ्ता 'आया?' और नीचे बताने के लिए तैनात व्यक्ति बताता की अभी नहीं, और थोड़ा घुमाओ, या बस-बस अब आने लगा। दूरदर्शन की सभाएँ आकाशवाणी की तरह तय थीं, सो सभा आरम्भ होने के पाँच मिनट पहले से ही टीवी खोल दिया जाता। पहले स्क्रीन पर खड़ी धारियां दिखाई देती रहती, फिर दूरदर्शन का मोनो सिग्नेचर ट्यून के साथ घूमता हुआ प्रकट होता। कितना रोमांचक था ये।
सिलसिलेवार कार्यक्रम, गिनती के सीरियल,वो भी पूरे बारह एपिसोड में ख़त्म हो जाने वाले।
मुशायरा, कवि सम्मलेन , बेहतरीन टेलीफिल्म्स ,चित्रहार , पत्रों का कार्यक्रम सुरभि, समाचार, खेती-किसानी क्या नहीं था! फिर शुरू हुआ पहला सोप ऑपेरा हमलोग कोई भूल सकता है क्या? उसके बाद तो एक से बढ़ कर एक सीरियल दूरदर्शन ने दिए। वो बुनियाद हो या प्रथम-प्रतिश्रुति, मालगुडी डेज़ हो या ये जो है ज़िन्दगी, रामायण हो या महाभारत......कितने नाम!!! आज इतने चैनल्स हैं जो दिन-रात केवल सीरियल ही दिखा रहे हैं लेकिन कर पाये रामायण-महाभारत या हम लोग जैसा कमाल? भारत एक खोज या चाणक्य जैसा धारावाहिक दिखने का माद्दा है इनमें? फूहड़ और बेसिर पैर की कहानियों के अलावा और कुछ भी नहीं है अब। ऐसी कहानियाँ जो वास्तविकता से कोसों दूर होती हैं। ऐसा एक भी चैनल आज नहीं है, जो अपने किसी भी धारावाहिक के ज़रिये कर्फ्यू जैसा सनाका खींच सके। याद है न रामायण और महाभारत के प्रसारण का समय? जिन घरों में टीवी नहीं था वे पड़ोसियों के यहाँ जाकर ये धारावाहिक देखते थे। रविवार के दिन हमें भी ड्राइंगरूम में अतिरिक्त व्यवस्था करनी होती थी। उस पर भी दर्शकों की संख्या इतनी अधिक होती थी, की हम लोगों को ही बैठने की जगह नहीं मिलती थी।

आज चैनलों की इतनी भीड़ है, की टीवी देखने की इच्छा ही ख़त्म हो गई। आधुनिकता के नाम पर फूहड़ता परोसते धारावाहिक...........ऐसे में दूरदर्शन की बहुत याद आती है।