मंगलवार, 30 नवंबर 2021
उपन्यास हरदौल: शिखा वार्ष्णेय की नज़र में
बुधवार, 16 सितंबर 2020
अटकन-चटकन: प्रतिक्रियाएं
अटकन- चटकन : कुछ प्रतिक्रियाएं
शनिवार, 5 सितंबर 2020
अटकन चटकन : प्रतिक्रियाएं
सोमवार, 24 अगस्त 2020
अटकन-चटकन: कुछ प्रतिक्रियाएं
अटकन-चटकन: कुछ प्रतिक्रियाएं
"अटकन चटकन"
किताबें पढ़ना पसंद है मुझे, पर अपने पसंद के विषय पढ़ते पढ़ते हिन्दी की किताबें कम ही हाथ में आती हैं। बहुत दिनों बाद एक किताब हाथ में आयी। पहली चीज़ जिसने आकर्षित किया वह है इसका नाम 😊 पढ़ना शुरू किया तो बस रुक ना पायी। हर चित्र जैसे आंखों के सामने से गुज़र रहा हो। चरित्र चित्रण तो ऐसा कमाल का, कि आप अपने जीवन से जोड़ लेंगे उन्हें जाने अनजाने। इंसान का स्वभाव ही उसका सबसे बड़ा मित्र और सबसे बड़ा शत्रु है इस बात को लेखिका ने बड़ी खूबसूरती, सरलता और प्यार से दर्शाया है। वंदना अवस्थी दुबे जी को इस कथा के लिए बहुत बधाई।
डॉ शीला नायक ( Sheela Nayak ) महाराजा महाविद्यालय छतरपुर में संस्कृत विभाग की विभागाध्यक्ष हैं। अटकन चटकन मंगवाना, फिर उसे पढ़ना ... फिर उस पर अपनी टिप्पणी देना....!
अब और क्या चाहिए हमें?
अटकन-चटकन
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सबसे पहले तो उपन्यास का शीर्षक ही आकर्षक है | पाठक को जिज्ञासा बनी रहती है कि अटकन-चटकन से क्या तात्पर्य है | मैंने बचपन में खेलते खेलते ये बात सुनी थी कि अटक न-चटकन चार चपेटन....इस प्रकार यह शीर्षक बहुत ही प्यारा है |
उपन्यास की प्रमुख पात्र सुमित्रा जी बड़े घर की बेटी हैं और उन्होंने ये संस्कार बखूबी अपनी ससुराल में निर्वहन किये | सुमित्रा जी धैर्य की मूर्ती हैं , उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है | वहीँ कुंती का चरित्र पढ़कर बड़ी नाराज़गी उभरती है कि सगी बहन किस स्तर तक गिर सकती है, कुंती जैसी स्त्रियां ही कुल का संहार करने वाली होती हैं | उपन्यास का पढ़ना पाठक को निरंतर बाँध कर रखता है | एक चलचित्र की तरह पाठक उसी में खो जाता है | उपन्यास के माध्यम से लेखिका जी ने उस समाज का चित्रण किया है जहां स्त्रियों की शिक्षा उनकी दशा पर ध्यान नहीं दिया जाता था | उपन्यास का अंत सुखद है जो की पाठक को आनंद की अनुभूति कराता है | लेखिका को यथार्थ चित्रण के लिए बहुत बहुत बधाई |💐💐💐
हमारी छोटी दीदी यानी Archana Awasthi ने सम्भवतः सबसे पहले "अटकन-चटकन" पढ़ा, लेकिन टिप्पणी आज आई। उनकी व्यस्तताएं जानते हैं हम, सो कोई शिक़ायत नहीं। 😊 बहुत धन्यवाद छोटी, इतनी प्यारी टिप्पणी के लिए। 💐💐
अटकन-चटकन
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सर्वप्रथम उपन्यास का शीर्षक और पुस्तक का आवरण अपनी तरफ़ आकर्षित करता है. उपन्यास की मुख्य-पात्र सुमित्रा की सरलता और कुन्ती की कुटिलता, कुन्ती का हृदय परिवर्तन होना तथा इस बीच का घटना-क्रम बराबर पाठक की उत्सुकता को बनाये रखता है. ग्रामीण-परिवेश और बुन्देली-भाषा का प्रयोग उस अंचल को चलचित्र की भाँति हमारे सम्मुख ले आते हैं. लेखिका वन्दना अवस्थी दुबे का उपन्यास यथार्थ-चित्रण-सा बन पड़ा है, उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं और अमित बधाइयां...
--अर्चना
#अटकनचटकन
Dev Shrivastava, यानी संजय श्रीवास्तव के बचपन के कुछ साल नौगाँव में बीते। पापाजी के शिष्य हैं। बेहद शिष्ट और नम्र स्वभाव के देव उतने ही सरल भी हैं। आज किताब मिली और आज ही पढ़ डाली। इस स्नेह पर धन्यवाद कह के पानी नहीं फेरेंगे हम।
अटकन-चटकन
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दीदी,आज जैसे ही ,"अटकन चटकन " कोरियर से आई , मन खुश हो गया , पूरे समय उपन्यास को पढ़ते समय कभी सुमित्रा का चरित्र आंखो के सामने आता तो कभी कुंती का,दोनों ही चरित्र अपने आस पास ही घूम रहे थे।तिवारी जी के इतने बड़े परिवार में एक एक पात्र जाना पहचाना लग रहा था। बहुत ही खूबसूरती से सारे पात्रों को आपने गढ़ा है।शुरू किया तो छोड़ने का मन ही नहीं किया।बीच में पारंपरिक बुन्देली भी पढ़ने को मिली । इतना सुंदर और सरल उपन्यास लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई आपको ।😊👏👏🙏👍👍👍🙏
#अटकनचटकन
बुधवार, 29 अप्रैल 2020
तमाम मिथक तोड़ता है: फाग लोक के ईसुरी
तमाम मिथक तोड़ता है उपन्यास “फाग लोक के ईसुरी”
लॉक डाउन का ये समय तमाम लम्बित किताबों को पढ़ते हुए गुज़ार रही हूं. इसी बीच चार दिन पहले, मुझे मेरी बाल सखी, लब्ध प्रतिष्ठ कथाकार/साहित्यकार, डीएवी कॉलेज कानपुर में एसोसियेट प्रोफ़ेसर डॉ. दया दीक्षित का नया उपन्यास “ फाग लोक के ईसुरी” स्पीड पोस्ट से मिला. मार्च में जब यह उपन्यास लोकार्पित हुआ, तो मैने दया से पूछा, कि मुझे कैसे और कहां से मिलेगा? छूटते ही दया ने कहा कि वो भेजेगी मुझे. पूरे देश की सेवाएं ठप्प हैं, तो मुझे उम्मीद थी कि अब दो-तीन महीने बाद ही ये उपन्यास मुझे मिल पायेगा. लेकिन मेरी तमाम उम्मीदों को नाकाम करता ये उपन्यास मुझे चार दिन पहले मिला, तो मैं सुखद आश्चर्य में डूब गयी. डाकिया बाबू सुबह ग्यारह बजे के आस-पास आये थे. तब मैने उपन्यास खोल के दया की ’अपनी बात’ पढ़ डाली. अपनी बात पढ़ते-पढ़ते ही मेरी उत्सुकता जागने लगी थी. एक तो उपन्यास बुन्देली लोककवि ईसुरी पर था, दूसरे ईसुरी को लेकर इतने मिथक गढ़े गये, कि मुझे उत्सुकता थी, कि दया ने क्या लिखा होगा, उस पर उपन्यास की रचना प्रक्रिया ने ही इसे तुरन्त पढ़ने को प्रेरित किया. उस पर, उपन्यास मेरी उस दोस्त का था, जिसके साथ मेरा बचपन बीता. स्नान ध्यान के बाद, जब पुस्तक हाथ में उठाई, तब ऐसा सोच के नहीं उठाई थी, कि इसे आज ही पूरा करना है. लेकिन इसे हाथ में पकड़ा, तो थोड़ी देर बाद ही इस पुस्तक ने मुझे पकड़ लिया. अब मुझे खाना खाने का भी होश नहीं था. किताब को दस मिनट के लिये भी आंखों से हटाना भारी पड़ रहा था. मैं हमेशा कहती हूं, कि कुछ उपन्यास, कहानी संग्रह ऐसे होते हैं, जो खुद को पढ़वा ले जाते हैं. ये उपन्यास भी ऐसा ही है.
बुन्देलखंड के नैसर्गिक सौंदर्य का वणन करते हुए उपन्यास जैसे ही ईसुरी के पैतृक गांव ’मेंड़की’ पहुंचा, मन प्राण वहीं अटक गये..... अचानक ही कानों में ईसुरी की सुपरिचित फाग-
मोरी रजऊ से नौनों को है
डगर चलत मन मोहै
अंग अंग में कोल कोल कें ईसुर रंग भरौ है ।
गूंजने लगी..... उनके जन्म की कथा पढ़ने के लिये मन बेताव होने लगा. लेखिका दया दीक्षित ने इतनी खूबसूरती से उनके जन्म का ब्यौरा दिया है , उनके परिवार की जानकारियां दी हैं, कि मन, आंखें अपने अप भीगने लगीं...! ईसुरी के जन्म के एक साल बाद ही उनकी मां और फिर दूसरे साल में ही पिता का देहांत, नन्हे ईसुरी का अपने मामा-मामी के साथ उनके गांव लुहर गांव आना, फिर धीरे-धीरे मामी के स्वभाव में परिवर्तन होना. अब तक निस्संतान नायक दम्पत्ति अब उम्मीद से था, और यही वजह हो गयी, ईसुरी से विलगाव की. चंद स्थानों पर ईसुरी के बाल मन के स्वगत कथन, जो उस वक़्त की उनकी पीड़ा को व्यक्त करते हैं, इतने मार्मिक बन पड़े हैं, कि पाठक के आंसू कब बहने लगते हैं, पता ही नहीं चलता. मुझे बालक ईसुरी के रुदन के बीच तीन बार चश्मा उतार के आंखें पोंछनी पड़ीं. थोड़ी देर आंखें बन्द करके बैठना पड़ा....! पिता ने ईसुरी का नाम ’हरलाल’ रखा था. लेकिन उनके मामा ने उन्हें ईसुरी नाम दिया. ईसुरी के व्यक्तित्व में तमाम गुणों के साथ-साथ एक और गुण विद्यमान था, ईश्वरीय साक्षात्कार का. उनकी अनेक समस्यायें, अर्धचेतन अवस्था में प्रकट होने वाली ’माई’ ने सुलझाईं. ये दैवीय शक्ति उन्हें सपने या बेहोशी में उनकी मां के रूप में दर्शन देती थी और राह सुझाती थी.
मामा ने १३ वर्षीय ईसुरी का विवाह सीगौन नामक गांव की कन्या श्यामबाई के साथ तय कर दिया था. जो बाद में उनके अपने ददिहाल लौटने के पश्चात सम्पन्न हुआ. ईसुरी किस तरह अपनी ब्याहता श्यामबाई दोस्त, सखा, साथी थे, बहुत प्यारा वर्णन लेखिका ने किया है. आपसी सम्वाद मन को बांधे रहते हैं. काम के सिलसिले में ईसुरी का उनकी ससुराल जाना, वहां साधुओं की टोली का आना, और उन्हीं के सवाल पर जवाब के रूप में पहली बार काव्य पंक्तियां नि:सृत हुईं-
“कां लौ सोचौं, कां लों जानों
मैं आपड़ा अज्ञानी
तुमई बता दो, का कै रएते
ईसुर तुम हौ ज्ञानी”
इसके बाद ईसुरी के लेखन का सफ़र जो शुरु हुआ, वो रुका नहीं. उनका मित्र धीरे पंडा उनका सबसे सगा साथी साबित हुआ. ईसुरी की लगभग सभी रचनाओं को कलमबन्द करने का श्रेय उन्हीं को है. बाद में काम के ही सिलसिले में ईसुरी धौर्रा आ गये और फिर उनका अधिकान्श समय धौर्रा में ही बीता. उनकी लेखनी का स्वर्णिम दौर इसी धौर्रा गांव में फला-फूला. बुन्देलखंड में एक समय फड़बाज़ी की प्रथा खूब प्रचलित थी. ग्राम्य जीवन अपने मनोरंजन का साधन इन्हीं फड़ों को मानता था. फड़ भी एक से बढ़कर एक कवियों के ठिकाने थे. फड़बाज़ी के इसी चस्के में ईसुरी की चौकड़ियां, ईसुरी की फागें, सब लिखी गयीं. नौगांव छावनी में पदस्थ, अंग्रेज़ों के मुसाहिब जंगजीत सिंह का पात्र भी बखूबी उभर के आया है. जंगजीत सिंह इस उपन्यास और ईसुरी के जीवन के एक बेहद अहम किरदार हैं. सम्भवत: उन्हीं के आरोपों के चलते ईसुरी अपने जीवन्काल, और जीवनोपरांत भी तमाम विवादों में घिरे रहे. असल में ईसुरी की पत्नी श्यामबाई का घर का नाम था ’राजाबेटी’. ईसुरी ने जितनी भी फागें लिखीं, उन सब में ’रजऊ’ का उल्लेख है. ये रजऊ ईसुरी की पत्नी श्यामबाई ही हैं. ईसुरी का अपनी पत्नी के प्रति अगाध प्रेम था, उनके बिना वे निष्प्राण से हो जाते थे. तो उनका नाम, ईसुरी की रचनाओं में आना स्वाभाविक है. लेकिन चूंकि मुसाहिब जंगजीत सिंह की बेटी का नाम ’रज्जूराजा’ था. ईसुरी की चौकड़ियां हों या फागें, रजऊ के बिना पूरी ही न होती थीं. तो कुटिल जनमानस ने अनुमान लगाना शुरु कर दिया, कि ये रजऊ रज्जूराजा ही हैं. जंगजीत सिंह ने एक बार ईसुरी को बुला के ताक़ीद भी किया, लेकिन ईसुरी ने जब उन्हें असलियत बताई तो वे थोड़ा मुतमईन हुए. लेकिन कान भरने वाले कहीं ज़्यादा होशियार निकले.इस पूरे मामले में ईसुरी को कितना अपमान झेलना पड़ा, बेहद मार्मिक और सजीव चित्रण किया है लेखिका ने.
ईसुरी की कर्मभूमि बगौरा और धौर्रा गांव रहे हैं. कुशाग्र बुद्धि के ईसुरी अपने काम काज में बहुत होशियार थे. चूंकि वे इन दो स्थानों पर सबसे लम्बे समय तक रहे तो उनकी रचना स्थली भी ये ही दो स्थान बने. पत्नी श्यामबाई की अचानक हुई मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया. वे बीमार हो गये तब उनकी बेटी गुरन उन्हें अपने साथ, अपनी ससुराल ले आई. उनके अन्तिम दिन बेटी के पास ही गुज़रे. एक संत की भांति उन्होंने अन्तिम सांस भी बेटी के पास ही ली, समाधि अवस्था में.
136 पृष्ठों के उपन्यास को मैने मात्र दो पृष्ठों में सहेज दिया है. जब आप इस उपन्यास को पढ़ेंगे तो जानेंगे कि मेरी इन चंद पंक्तियों के मध्य कितनी-कितनी रोचक घटनाएं बिखरी हुई हैं. उपन्यास का अधिकांश भाग विशुद्ध बुन्देली में है. होना भी चाहिये था. खड़ी बोली में हमारे बुंदेली ईसुरी को यदि व्यक्त किया जाता, तो ये उनके साथ अन्याय हो जाता. असल में, खड़ी बोली में उन की आत्मा तक पहुंचा ही नहीं जा सकता था. दया दीक्षित ने इतनी मीठी बुन्देली का इस्तेमाल किया है कि मेरे पास शब्द नहीं उनकी तारीफ़ के लिये. सम्वाद इतने सहज और बुन्देली रस से भरे हुए हैं, कि लगता ही नहीं हम पढ़ रहे हैं. सजीव पात्र जैसे बोलने लगते हैं. इतने सजीव सम्वाद बहुत कम मिलते हैं, किसी की भी लेखनी के ज़रिये. बुन्देली कहावतों, उलाहनों का खूबसूरत इस्तेमाल किया है लेखिका ने.
किसी भी इतिहास पुरुष पर लेखनी चलाना आसान काम नहीं है. एक तो ऐसे चरित्र पर लिखने से पहले बहुत शोध की आवश्यकता होती है. उन पर लिखे गये ग्रंथ, उनको चाहने/मानने वाले लोग और न मानने वाले लोगों से भी मेल-मुलाक़ात बहुत ज़रूरी हो जाता है. फिर चरित्र यदि ईसुरी जैसा हो, तो लिखना और भी मुश्किल. ईसुरी ने जितना नाम कमाया, उतने ही विवाद भी कमाये. लेकिन ये उपन्यास “ फाग लोक के ईसुरी” इन तमाम विवादों को ध्वस्त करता है. उन पर लगे इल्ज़ामों से उन्हें बरी करता है और रजऊ को केवल प्रेमिका की छवि से मुक्त करता है. रजऊ से प्रेम में जिन फागों को अनैतिक और अश्लील करार दिया था, पत्नी राजाबेटी के रूप में तब्दील होते ही ये प्रेम अलौकिक हो गया. फागें सुहानी हो गयीं. लेखिका ने तमाम मिथक तोड़े हैं, ईसुरी से जुड़े.
बुन्देली समझने वाले, नहीं समझने वाले हर साहित्यप्रेमी को ये उपन्यास पढ़ना ही चाहिये. अमन प्रकाशन-कानपुर से प्रकाशित ये उपन्यास भविष्य में नये प्रतिमान स्थापित करेगा, ये मेरा दावा है. हां प्रकाशक की ज़िम्मेदारी है कि वो इस अद्भुत उपन्यास के महत्व को समझते हुए इसका भरपूर प्रचार-प्रसार करे. बढ़िया छपाई के लिये और उससे भी ज़्यादा बेहतरीन प्रूफ़ रीडिंग के लिये प्रकाशक बधाई के पात्र हैं. पुस्तक का कवर पेज़ बहुत शानदार है. मेरी शिक़ायत इस उपन्यास के शीर्षक से ज़रूर है. पहली नज़र में ये शीर्षक किसी उपन्यास का शीर्षक नहीं लगता, बल्कि निबन्धात्मक/शोधपरक पुस्तक का आभास देता है. लेकिन उपन्यास इतना रोचक और भाषा इतनी कसी हुई है, कि फिर उपन्यास का शीर्षक गौण हो जाता है. लेखिका को दिल से बधाई, इस कालजयी सृजन के लिये.
उपन्यास : फाग लोक के ईसुरी लेखिका : डॉ. दया दीक्षित प्रकाशक : अमन प्रकाशन- कानपुर ISBN : 978-93-89220-87-2 पृष्ठ संख्या : 136 मूल्य : 175/ |
बुधवार, 11 सितंबर 2019
दिमाग़ के दरवाज़े खोलता है- बन्द दरवाज़ों का शहर
मंगलवार, 6 अगस्त 2019
लन्दन की सैर कराती है-’देशी चश्मे से लन्दन डायरी
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पुस्तक: देशी चश्मे से लन्दन डायरी
लेखिका: शिखा वार्ष्णेय
प्रकाशक: समय साक्ष्य प्रकाशन
15 फ़ालतू लाइन, देहरादून-248001
ISBN
:978-93-88165-18-1
मूल्य- 200 रुपये मात्र
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रविवार, 2 जून 2019
आम जीवन का आइना है-क़र्ज़ा वसूली
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पुस्तक: कर्ज़ा वसूली
लेखिका: गिरिजा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर
ISBN: 978-93-87078-96-3
मूल्य: १७५ रुपये मात्र
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मंगलवार, 5 जून 2018
केरल यात्रा: खट्टी-मीठी यादें
कोच्चि जाने की चार महीने पुरानी प्लानिंग पर उस समय पानी फिरता नज़र आया, जब हमारी ट्रेन लेट पर लेट होती गयी। लगा, कहीं कैंसिल ही न हो जाये! ख़ैर! राम-राम करते, सुबह चार बजे आने वाली ट्रेन शाम साढ़े चार बजे आई। बोगी में घुसे तो शाम को ही रात जैसा नज़ारा दिखाई दिया। हर तरफ़ सफ़ेद चादरें तनी हुईं। हमारी लोअर बर्थ पर एक बहन जी सो रहीं थीं। उन्हें जगाया तो वे अपनी मिडिल बर्थ खोल के फिर सो गयीं। ट्रेन में ऐसा भीषण सन्नाटा मैंने पहली बार देखा। अब चूंकि सब सो रहे थे तो हम अकेले गर्दन टेढ़ी करे, कब तक बैठे रहते? हम भी लेट गए। 6 बजे के आस पास कुछ हलचल हुई। दूसरी बोगी से कुछ लोग आए, और सामने, बगल, ऊपर की बर्थ वालों को जगा के बतियाने लगे। बातचीत तेलुगू में हो रही थी, सो हम उनके मुंह ताकने के सिवाय और कर भी क्या सकते थे? ये ज़रूर समझ में आया कि कोई बड़ा परिवार है जो सफ़र कर रहा।
रात आठ बजे हमारे सिर के ऊपर तनी मिडिल बर्थ से बहन जी नीचे उतरीं। बर्थ अब भी तनी थी क्योंकि उस पर उन्होंने अपनी गृहस्थी सजा ली थी। यानी अब तीन दिन तक हमें गर्दन टेढ़ी कर, इसी छतरी की छत्रछाया में रहना था। सामने की बर्थ पर एक। भीमकाय महिला लगातार खर्राटे लेकर सो रही थीं। इतनी नींद!! हम चकित थे। ख़ैर! हमारे ऊपर वाली बहिन जी भी भारी शरीर की थीं, लेकिन थीं खूबसूरत। उतना ही सरल उनका व्यवहार भी था। ट्रेन पटना से आ रही थी तो हमें लगा ये सब हिंदी तो जानते ही होंगे। लेकिन जब हमने उनके बारे में जानना चाहा तो समझ में आया कि वे तो हिंदी का एक भी शब्द नहीं समझ पा रहे!! अंग्रेज़ी भी टूटी-फूटी। इसी टूटे-फूटेपन में ही उन्होंने बताया-"ऑल एल आई सी फ़ैमिली। 90 मेम्बर्स। विज़िट काशी, बोधगया, पटना। नेल्लोर गोइंग।"
उनके यहां दफ़्तरी काम भी तेलुगू में ही होता है। तीन-चार बच्चे थे जो अंग्रेज़ी पढ़ते थे स्कूल में लेकिन सेकेंडरी लैंग्वेज़, सो फिर भी ठीक ठाक बात कर पा रहे थे। हमेशा सफ़र में मैं सहयात्री की बातों से बचने के लिए अपना सिर जबरन क़िताब में घुसाए रहती हूँ, इधर तरस रही थी कि कोई तो बात कर ले!! 48 घण्टों का सफ़र और ये नेल्लोरी!! या अल्लाह!! कहाँ फँस गई!! मेरी दुविधा वे भी समझ रहे थे, या शायद मेरे चेहरे से ज़ाहिर हुआ होगा, सो मुझसे इशारों में ही बात करने की कोशिश करते। गूंगे लोगों की पीड़ा समझ में आई!!
इन दो दिनों में लगा, कि यदि आप भाव समझ लेते हैं तो भाषा माने नहीं रखती। मेरे दोनों दिन इन सारे परिवारों और ख़ास तौर से मेरी छत्रछाया वाली बर्थ की मालकिन जिनका नाम भारती था, के स्नेह को मैं भूल नहीं पाउंगी। नेल्लोर आने पर सब उतरने लगे। मैंने भी भारती के दो बैग उठा लिए, उतरवाने के लिहाज से। सब जब उतर गए, तो हर व्यक्ति मुझसे मिलने की होड़ में था। बच्चे लिपट गए और भारती!! भारती ने तो हाथ ही नहीं छोड़ा। जब तक ट्रेन चल न पड़ी, पूरे 90 लोग हाथ हिलाते खड़े रहे। विदा प्यारे दोस्तो...कभी न कभी फिर मिलेंगे।
नेल्लोरी साथियों के उतरते ही पूरी बोगी ख़ाली हो गयी। उधर पहले क्यूबिक में चार-पांच लोग और इधर आख़िरी क्यूबिक में छह-सात लोग! मेरी बर्थ का नम्बर 35 था, यानी बीच मंझधार का नम्बर
नेल्लोर प्लेटफॉर्म और मेरे साथी जैसे ही दिखना बन्द हुए, मैं अपनी बर्थ पर आ गयी। अब आज़ाद थी। मिडिल बर्थ गिरा के बैठूँ, चाहे पचासों बर्थ पर उछल-कूद मचाऊँ। कोई नहीं था रोकने वाला। लेकिन मैंने मिडिल बर्थ नीचे नहीं गिराई। पता नहीं क्यों लग रहा था जैसे भारती लेटी है अभी। खिड़की के शीशे से सिर टिकाये जबरन बाहर देखती मैं अब निपट अकेली थी। तभी बुरका ओढ़े एक महिला , आगे वाले क्यूबिक से उठ के मेरे सामने वाली बर्थ पर आ गईं। उनके साथ उनका 15-16 साल का बेटा और 12 साल की बेटी थी। बिटिया भी हिज़ाब लगाए थी। आते ही शुरू हो गईं-" हाय-हाय..कैसा मुश्क़िल सफर बीता होगा बाजी आपका? मैं तो उधर बैठी आपकी ही फ़िकर कर रही थी। अकेली फंस गयीं थीं आप । मैं मुस्कुरा दी उनकी फ़िकर पर। उन नेल्लोरियों के विरुद्ध बोलने का मेरा कतई मन नहीं था। लेकिन उनकी फ़िकर देख के मुझे लगा, कौन कहता है इंसानियत ख़त्म हो गयी? आगे वाले क्यूबिक में वे साइड लोअर बर्थ पर बैठीं थीं, बेटी सहित, सो जितनी बार भी वहां से निकलना हुआ, उतनी ही बार हमारी मुस्कुराहटों का आदान प्रदान हुआ था और ये मुस्कुराहटें ही अब अजनबियत ख़त्म कर चुकी थीं।
"जानती हैं बाजी, मेरे दो टिकट वेटिंग में ही हैं अब तक। तीन में से केवल एक कन्फ़र्म हुआ। और अल्लाह की मर्ज़ी देखिए, कि अब बर्थ ही बर्थ। मैंने सोचा आप अकेली हैं, तो यहीं आ जाये जाए ।" मैं फिर मुस्कुरा दी। बोली -"आपने बहुत अच्छा किया जो यहां आ गईं।" ये अलग बात है कि अकेलापन कभी मुझे डराता नहीं। डराती तो भीड़ भी नहीं है
स्कूल का नाम उन्हें याद नहीं था और मुझे जानने की बहुत उत्सुकता भी नहीं थी। मैं तो खुश थी, कि हिज़ाब में लिपटी इस बच्ची को पढ़ाने, इतनी दूर भेज रहे इसके मां-बाप। ये अलग बात है कि हाफिज़ी की पढ़ाई का ताल्लुक़ शायद उस धार्मिक पढ़ाई से है जिसके बाद सम्भवतः वो बच्ची मदरसे में नौकरी करे। अभी फ़ातिमा की अम्मी कुछ और बतातीं, उसके पहले ही उनके बेटे का फोन घनघनाया। फोन पर ज़रा तल्ख़ बातचीत हो रही थी। फोन रखते ही बेटा बोला-"अम्मी, ठहरने का कोई इंतजाम नहीं हो पाया वहां।" अम्मी बदहवास सी कभी मुझे और कभी बेटे को देख रही थीं। बोलीं- बाजी, तिरुपति तो आने ही वाला है। वहां से हमें तुरत ही लौटने की ट्रेन मिल जाएगी क्या? अब जब अजनबी शहर में रहने का ही ठिकाना नहीं तो हम इस बच्ची को ले के कहाँ जाएंगे? पता नहीं कैसे लोग होते होंगे! इन सबकी बोली सुन के तो लगता है न कोई हमें समझेगा, न हम किसी को समझ पाएंगे। इसकी परीक्षा तो 13 मई को है और आज तो 10 तारीख ही है! या ख़ुदा! कैसा इम्तिहान है ये? बाजी अपने मोबाइल में देख के बताइये न हम लौट जाएंगे। पटना होता तो कोई डर नहीं था लेकिन यहां...!!"
उनका बोलना जारी था तब तक बेटे से मैंने पूछा कि माज़रा क्या है? उसने बताया कि जिन्होंने स्कूल हॉस्टल में ही हम लोगों को चार दिन रुकवाने का वादा किया था, वे खुद तिरुपति से बाहर हैं। उन्होंने कहा है कि फिलहाल किसी होटल में रुक जाए।
अब मैंने फ़ातिमा की अम्मी को समझाना शुरू किया कि जब चार दिन का सफर करके अपनी मंज़िल तक पहुंची हैं तो अब वापसी की बात न करें। बच्ची को टेस्ट ज़रूर दिलवाएं। और फिलहाल वे 12 घण्टों के लिए रेलवे के रिटायरिंग रूम में रुक जाएं। दिन भर उनके पास होगा, तब वे स्कूल प्रबंधन से बात कर होस्टल में रुकने का इंतज़ाम करवा लें। बात उनकी समझ में आ गयी। मैंने तुरन्त नेट पर सर्च किया तो रात बारह बजे तक बुकिंग की जा सकती थी यदि रूम खाली है तो।
अब फ़ातिमा की अम्मी फिर रुआंसी हो आयीं-" बाजी, आप तो इतनी अच्छी मददगार मिलीं हमें लेकिन ऑनलाइन बुकिंग के लिये हमारे पास कार्ड नहीं है
मेरे पास वेस्ट करने के लिए टाइम नहीं था, क्योंकि पौने बारह बज चुके थे, सो उनका फॉर्म भरते हुए ही मैंने कहा-मैं अपने कार्ड से जमा कर दूंगी, आप हमें नक़द दे देना। आनन फानन उनकी 24 घण्टे की बुकिंग कराई कुल 950 रुपये में। जो इन्हें हॉस्टल में रुकवाने की बात कह के मुकर गयीं थीं उन्हें भी फोन लगा के फटकारा कि वे वादाख़िलाफ़ी न करें, और हर हालत में कल इनके रुकने का इंतज़ाम हॉस्टल में करके मुझे सूचित करें। फ़ातिमा की अम्मी का चेहरा देख के मुझे लग रहा था कि मैं इनके ही साथ उतर जाऊं। ख़ैर... इंतज़ाम हो गया।
इस पूरी व्यवस्था में जुटी मैं,अब तक फ़ातिमा की ओर देख ही नहीं पाई थी। अब उसकी तरफ़ देखा, तो उसे एकटक अपनी तरफ़ देखते पाया, बेहद कृतज्ञ निगाहों से, जो प्यार से भरी थीं। मैंने उसकी तरफ
और मेरे दिमाग़ में उनका वही वाक्य घूम रहा था-' पटना होता तो कोई डर की बात न थी...!" अपना शहर सबको कितना निरापद लगता है।
अगला स्टॉपेज तिरुपति ही था।


