तमाम दिवसों को मनाने की परम्परा के तहत आज विश्व परिवार दिवस है। हालांकि भारत में इस प्रकार के दिवसों की उपयोगिता मेरी समझ में नहीं आती क्योंकि हमारे यहाँ परिवार, माँ ,पिता या दोस्तों को भूलने की परम्परा नहीं है। फिर भी जब हम ये दिवस मना ही रहे हैं, तो फिर इन पर चर्चा भी ज़रूरी है।
परिवार दिवस....यानि ये याद दिलाने का दिन हमारा परिवार भी है। परिवार की बात चली तो याद आया की हमारे यहाँ संयुक्त परिवार की कितनी पुरानी परम्परा है, जो अब कई कारणों से छिन्न-भिन्न हो रही है।संयुक्त परिवार यानि दादी -दादा , चाचा-चाची (कई चाचा- चाचियाँ) और ख़ुद के माँ-पिता । घर में बड़े की बात की सुनवाई और किसी को आपत्ति नहीं। धीरे-धीरे समय बदला , लोग बाहर नौकरी पर जाने लगे , जाते पहले भी थे पर अधिकाँश परिवार पीछे ही छोड़ जाते थे, अब अपना-अपना व्यक्तिगत परिवार साथ ले जाने लगे। बाहर रहते परिवार घर के बड़ों की बंदिशों से दूर हो गए। उन्हें आज़ादी अच्छी लगने लगी। सबको अच्छी लगती है। लेकिन इस आज़ादी ने संयुक्त परिवार की गरिमा पर ग्रहण लगाना शुरू किया। अब तो महानगरों में नाम मात्र के संयुक्त परिवार होंगे, जो हैं भी वे मियां - बीबी अपनी नौकरी के स्वार्थ के चलते किसी बड़े को साथ में रखते हैं।
अब एकल परिवार। ये तो माशाल्लाह ही हैं। मियां-बीबी दोनों अपने आप को तुर्रम खां समझते हैं इसी ईगो के चलता रोज़ की बहसें बड़ी लडाइयों का रूप ले लेतीं हैं। पुरूष-प्रधान समाज में महिला घर के लिए आर्थिक , शारीरिक और मानसिक रूप से कितना भी करे, उसे कभी भी ये तारीफ नहीं मिल सकती की उसने घर के लिए कुछ किया। बल्कि उसके हर काम को शक की निगाह से देखने की पुरुषों ने आदत ही बना ली है। हो सकता है, की मेरे कुछ ब्लौगर बंधू मेरी बात से सहमत न हों, लेकिन ये इतना बड़ा सच है, जिसे हर महिला ने झेला है, या झेल रही है। बाहर कितने भी बड़े पद पर रहने के बावजूद घर में उसे निश्चित रूप से अपमानित होना ही पड़ता है। इसके पीछे पुरूष का अपना आहत स्वाभिमान ही है, जो पत्नी की योग्यताओं को स्वीकार नही करना चाहता। लिहाज़ा असर बच्चों पर पड़ता है, और एकल परिवार की अवधारणा यहाँ ध्वस्त होती दिखाई देती है। ऐसे में कहाँ का परिवार और कहाँ का परिवार-दिवस!
गुरुवार, 14 मई 2009
रविवार, 10 मई 2009
"माँ" तेरे कितने नाम....

शिशु के शुरूआती शब्द म, या मा जैसे होते हैं, इसीलिए अधिकांश भाषाओँ में "माँ" के लिए प्रयुक्त शब्दों में म की ध्वनि निकलती है। आइये जाने तमाम भाषाओँ में "माँ" को किस-किस तरह से पुकारा जाता है-
- अफ्रीका- मोइदर, माँ
- अरब - अम
- अल्बेनिया- मेमे, नेने, बरिम
- आयरिश- मदेर
- बुल्गारिया- माज्का
- जर्मन- मदर
- मंगोलियन-इह
- उर्दू - अम्मी
- इटली - माद्रे, मम्मा
- ब्राजील, पुर्तगाल- माई
- बेलारूस - मैत्का
- ग्रीक - माना
- हंगरी - अन्य, फु
- इंडोनेशिया - इन्दक, इबु
- जापान - ओकासन , हाहा
- रोमानिया - मामा , माइका
- रूस - मेट
- स्वीडन - ममा , मोर मोरसा
- युक्रेन - माती
- भारत- माँ , माता, अम्मा, मैया
सोमवार, 4 मई 2009
क्या कूप-मंडूक हैं हम?
नवम्बर माह की बात है, मेरी परिचित एक सुदर्शना युवती, जो हमेशा ही अपने हर मसलों को मेरे पास लाती रही है, और यथासंभव उसके मसलों को मैंने सुलझाया भी है, लिहाज़ा उसका प्रेम मेरे प्रति कुछ ज़्यादा ही था। एक दिन उसने बताया की वह एक लड़के को पसंद करती है, और उसी से शादी भी करना चाहती है। उसने बताया की लड़के का पहले से उसके घर में आना-जाना है, और उसके ( लड़की के) घर वाले लड़के को खूब पसंद करते हैं। लड़का उन्ही की जाति का भी है। मैंने कहा फिर क्या दिक्कत है? हमारे यहाँ अभी भी तयशुदा विवाहों में अंतरजातीय विवाह का चलन नहीं हो पाया है, खास तौर पर सतना जैसे मध्यमवर्गीय मानसिकता वाले शहर में तो बिल्कुल भी नहीं। प्रेम विवाह अब घरेलू स्वीकृति पा जाते हैं, यदि दोनों की जाति समान है तो। लिहाज़ा इस रिश्ते में मुझे कोई अड़चन दिखाई नहीं दी। लेकिन लड़की खासी परेशान थी। उसका कहना था की उसके पापा एक गोत्र विशेष के ब्राहमणों में ही शादी करते हैं, और ये लड़का उस गोत्र का नहीं है।
अब मैं यहाँ लड़के का उल्लेख करना ज़रूरी समझती हूँ, यह लड़का उच्च शिक्षा प्राप्त एक बेहद कुलीन परिवार का बेटा है, जिसके पिता शहर के श्रेष्ठ वकीलों में शामिल हैं। ख़ुद भी अपने व्यसाय में संलग्न है, और अच्छा-खासा कमाता है। यानी एक धनाड्य और सुसंस्कृत परिवार से ताल्लुक रखता है। इस मसले पर पहले तो मैंने लड़के की राय ली बाद में लड़की के पिता को समझाइश देने की सोची । इस बीच लड़के ने अपने घर में बात करली और माँ -पिता को राजी भी कर लिया। लेकिन जब लड़की के पिता से मैं मिली तो उनका रूप देखने लायक था। किसी भी कीमत पर वे इस शादी के लिए तैयार नहीं थे। उनका कहना था की वे भले ही एक बेरोजगार और अनपढ़ से शादी कर देंगे, लेकिन अपने गोत्र से बाहर नहीं जायेंगे। लाख समझाने पर भी बात उनकी समझ में नहीं आई और आनन फानन उन्होंने एक लड़का ढूँढा शादी निपटा दी।
समझ में नहीं आता की इस प्रकार अपनी जिद पूरी करके वे क्या साबित करना चाहते हैं? आज दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई और हम अभी तक गोत्र के जाल में ही उलझे हुए हैं!! जातियों का यह वर्गीकरण और उनका बड़प्पन नापने का ये पैमाना मुझे कभी समझ में ही नहीं आया। इतना कुलीन घर-वर छोड़ उनहोंने एक अत्यन्त साधारण परिवार , जो अभी भी सतना जिले के सुदूरवर्ती देहाती इलाके में रहता है, में कर दी। अपनी बेटी को होने वाली तमाम दिक्कतों को भी नज़रंदाज़ कर दिया।
आज भी ऐसे अनेक परिवार हैं, जो पुरानी और ऐसी परम्पराओं में जकडे हुए हैं जिन्हें तोड़ने की पहल होनी ही चाहिए। समान जाति में विवाह करना भले ही अनिवार्यता हो, मगर उसमें भी जाति का गोत्र आदि की अनिवार्यता अवश्य ख़त्म की जानी चाहिए। परिवार संस्कारी और कुलीन है, तो वह बड़ा है। केवल पैसे या जाति विशेष का होने से बड़े होने की पदवी नहीं मिल जाती। बड़ा तो इंसान अपने कर्मों से होता है। क्या इस प्रकार के बंधन कभी टूट पायेंगे?
अब मैं यहाँ लड़के का उल्लेख करना ज़रूरी समझती हूँ, यह लड़का उच्च शिक्षा प्राप्त एक बेहद कुलीन परिवार का बेटा है, जिसके पिता शहर के श्रेष्ठ वकीलों में शामिल हैं। ख़ुद भी अपने व्यसाय में संलग्न है, और अच्छा-खासा कमाता है। यानी एक धनाड्य और सुसंस्कृत परिवार से ताल्लुक रखता है। इस मसले पर पहले तो मैंने लड़के की राय ली बाद में लड़की के पिता को समझाइश देने की सोची । इस बीच लड़के ने अपने घर में बात करली और माँ -पिता को राजी भी कर लिया। लेकिन जब लड़की के पिता से मैं मिली तो उनका रूप देखने लायक था। किसी भी कीमत पर वे इस शादी के लिए तैयार नहीं थे। उनका कहना था की वे भले ही एक बेरोजगार और अनपढ़ से शादी कर देंगे, लेकिन अपने गोत्र से बाहर नहीं जायेंगे। लाख समझाने पर भी बात उनकी समझ में नहीं आई और आनन फानन उन्होंने एक लड़का ढूँढा शादी निपटा दी।
समझ में नहीं आता की इस प्रकार अपनी जिद पूरी करके वे क्या साबित करना चाहते हैं? आज दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई और हम अभी तक गोत्र के जाल में ही उलझे हुए हैं!! जातियों का यह वर्गीकरण और उनका बड़प्पन नापने का ये पैमाना मुझे कभी समझ में ही नहीं आया। इतना कुलीन घर-वर छोड़ उनहोंने एक अत्यन्त साधारण परिवार , जो अभी भी सतना जिले के सुदूरवर्ती देहाती इलाके में रहता है, में कर दी। अपनी बेटी को होने वाली तमाम दिक्कतों को भी नज़रंदाज़ कर दिया।
आज भी ऐसे अनेक परिवार हैं, जो पुरानी और ऐसी परम्पराओं में जकडे हुए हैं जिन्हें तोड़ने की पहल होनी ही चाहिए। समान जाति में विवाह करना भले ही अनिवार्यता हो, मगर उसमें भी जाति का गोत्र आदि की अनिवार्यता अवश्य ख़त्म की जानी चाहिए। परिवार संस्कारी और कुलीन है, तो वह बड़ा है। केवल पैसे या जाति विशेष का होने से बड़े होने की पदवी नहीं मिल जाती। बड़ा तो इंसान अपने कर्मों से होता है। क्या इस प्रकार के बंधन कभी टूट पायेंगे?
रविवार, 26 अप्रैल 2009
कैसे-कैसे अंध-विश्वास....
मेरे विद्यालय में बच्चों की छुट्टियाँ शुरू हो गई है, लिहाज़ा स्टाफ को यहाँ-वहां की बातें करने का पर्याप्त समय मिलता है। इसी बतरस के दौरान कल एक बड़ी विचित्र सी बात सामने आई । मेरे विद्यालय की ही एक शिक्षिका ने मुझसे एक व्रत ले लेने की बात कही मेरे पूछने पर उन्होंने बताया की मुझे इस गणेश-व्रत में पन्द्रह दिनों तक उनके द्वारा दी गई व्रत सम्बन्धी दो कहानियाँ और जप करना होगा,पन्द्रह दिनों के बाद मैं जब इस व्रत का प्रसाद जिस भी महिला को दूँगी,उसे भी अगले पन्द्रह दिनों तक यह क्रम दोहराना होगा। और प्रसाद भी किसी एक को नहीं बल्कि चार महिलाओं को देना होगा। फिर इसी प्रकार सिलसिला चलता रहेगा। सुन के मैं सकते में आ गई। इस प्रकार जबरिया व्रत करवाने का मतलब? चूंकि मैं मूर्ति-पूजा करती नहीं सो मैंने न केवल उनसे क्षमा मांग ली,बल्कि इस व्रत के सिलसिले को यहीं समाप्त कर देने की सलाह भी दे डाली।
लेकिन इस किस्से के बाद मेरा मन बहुत दुखी हो गया। उन शिक्षिका महोदया का कहना था की यदि हमने इस व्रत को नहीं किया तो हमारे परिवार पर संकट आ जाएगा। उनकी मंद-बुद्धि में ये बात नहीं आई की संकट तो व्रत करने के बाद भी आ सकता है। हर हिंदू परिवार में पूजा-पाठ होता ही है, तो क्या हम संकटों से बचे रहते हैं?जिन महिलाओं को हम पढ़ा-लिखा समझते हैं, कम से कम उन्हें तो ऐसी अंध-विश्वास से जुड़ी बातों का विरोध करना ही चाहिए। शिक्षित होने के बाद भी यदि हम ऐसी थोथी मान्यताओं में उलझे रहेंगे तो जो सचमुच अशिक्षित महिलाऐं हैं, उन्हें सही रास्ता कौन दिखायेगा? क्या ये महिलाऐं सचमुच शिक्षित हैं? मुझे तो नहीं लगता.....और आपको???
लेकिन इस किस्से के बाद मेरा मन बहुत दुखी हो गया। उन शिक्षिका महोदया का कहना था की यदि हमने इस व्रत को नहीं किया तो हमारे परिवार पर संकट आ जाएगा। उनकी मंद-बुद्धि में ये बात नहीं आई की संकट तो व्रत करने के बाद भी आ सकता है। हर हिंदू परिवार में पूजा-पाठ होता ही है, तो क्या हम संकटों से बचे रहते हैं?जिन महिलाओं को हम पढ़ा-लिखा समझते हैं, कम से कम उन्हें तो ऐसी अंध-विश्वास से जुड़ी बातों का विरोध करना ही चाहिए। शिक्षित होने के बाद भी यदि हम ऐसी थोथी मान्यताओं में उलझे रहेंगे तो जो सचमुच अशिक्षित महिलाऐं हैं, उन्हें सही रास्ता कौन दिखायेगा? क्या ये महिलाऐं सचमुच शिक्षित हैं? मुझे तो नहीं लगता.....और आपको???
बुधवार, 22 अप्रैल 2009
ऐसा भी हो रहा है....
मतदान के ठीक एक दिन पहले ही विन्ध्य के एक लोकसभा क्षेत्र में एक प्रत्याशी द्वारा नकली नोट बांटे जाने का सनसनीखेज़ मामला प्रकाश में आया है। एक स्थानीय दैनिक समाचार-पत्र में छपी इस घटना ने उन लोगों के कान खड़े कर दिए हैं, जो पहले ही नकली नोटों की चपेट में आकर चूना लगवा चुके है।
विन्ध्य के रैगांव रामनगर क्षेत्र में घटी इस घटना की जानकारी तब हुई जब एक मजदूर पाँच सौ का नोट लेकर बाज़ार पहुँचा। सतना बाज़ार पहले से ही नकली नोटों की मार झेल रहा है, सो दुकानदार ने उक्त मजदूर से पूछा की उसे ये नोट कहाँ मिला ? मजदूर के अनुसार दो दिन पहले प्रत्याशी महोदय अपने लाव-लश्कर के साथ रात में दलितों की बस्ती में पहुंचे,फिर वहाँ पहले तो जमकर शराब की दावत दी गई,फिर जब लोग नशे में चूर हो गए तो उन्हें पाँच-पाँच सौ के ये नकली नोट बांटे गए। साथ ही ताकीद की गई की इन नोटों को चुनाव के बाद ही खर्च किया जाए। वो तो उक्त श्रमक को सामन की ज़रूरत थी सो वह वही नोट लेकर आ गया।
इस तरह के मामले होते रहते हैं, लेकिन इस मामले में ख़ास बात ये है की यदि जिला पुलिस अधीक्षक ने तत्परता से काम लिया तो सम्भव है की नकली नोट बनाने वालों की गैंग ही पकड़ जाए। ध्यान देने वाली बात है, कि उक्त प्रत्याशी के पास य नकली नोट कहाँ से आए? क्या उसका ताल्लुक भी इस गैंग या उसके सदस्यों से?
हालांकि जानती हूँ, कल मतदान है, पुलिस-प्रमुख के पास अभी इस मुद्दे पर ध्यान देने का समय ही कहाँ है? और फिर तो हम सब जानते हैं, कि रात गई सो बात गई। फिर कैसा प्रत्याशी कैसे नोट!
विन्ध्य के रैगांव रामनगर क्षेत्र में घटी इस घटना की जानकारी तब हुई जब एक मजदूर पाँच सौ का नोट लेकर बाज़ार पहुँचा। सतना बाज़ार पहले से ही नकली नोटों की मार झेल रहा है, सो दुकानदार ने उक्त मजदूर से पूछा की उसे ये नोट कहाँ मिला ? मजदूर के अनुसार दो दिन पहले प्रत्याशी महोदय अपने लाव-लश्कर के साथ रात में दलितों की बस्ती में पहुंचे,फिर वहाँ पहले तो जमकर शराब की दावत दी गई,फिर जब लोग नशे में चूर हो गए तो उन्हें पाँच-पाँच सौ के ये नकली नोट बांटे गए। साथ ही ताकीद की गई की इन नोटों को चुनाव के बाद ही खर्च किया जाए। वो तो उक्त श्रमक को सामन की ज़रूरत थी सो वह वही नोट लेकर आ गया।
इस तरह के मामले होते रहते हैं, लेकिन इस मामले में ख़ास बात ये है की यदि जिला पुलिस अधीक्षक ने तत्परता से काम लिया तो सम्भव है की नकली नोट बनाने वालों की गैंग ही पकड़ जाए। ध्यान देने वाली बात है, कि उक्त प्रत्याशी के पास य नकली नोट कहाँ से आए? क्या उसका ताल्लुक भी इस गैंग या उसके सदस्यों से?
हालांकि जानती हूँ, कल मतदान है, पुलिस-प्रमुख के पास अभी इस मुद्दे पर ध्यान देने का समय ही कहाँ है? और फिर तो हम सब जानते हैं, कि रात गई सो बात गई। फिर कैसा प्रत्याशी कैसे नोट!
मंगलवार, 14 अप्रैल 2009
कि उनका देखना देखा न जाए........
चुनाव के रंग अब अपने शबाब पर हैं। आचार संहिता के चलते चुनाव-प्रचार पर तो लगाम है, लेकिन कुछ ऐसे परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं कि उनका ज़िक्र किए बिना चैन कहाँ....
फरवरी माह में नगरनिगम सतना ने आम जनता को चेताया था, कि एनिकट में केवल एक हफ्ते का पानी शेष है, इसलिए अब पानी कि सप्लाई सप्ताह में दो दिन ही की जायेगी। चलो ठीक है, पानी मिले यही क्या कम है! मार्च में चुनाव की तारीखें घोषित होने के पहले तक लोगों को हफ्ते में दो दिन ही पानी मिल रहा था। लेकिन इधर प्रत्याशियों की घोषणा हुई और उधर व्यवस्थाओं में परिवर्तन दिखाई देने लगे। इधर पन्द्रह दिनों से रोज़ पानी सप्लाई हो रहा है।
पानी रोज़ मिल रहा है ये तो अच्छा है, लेकिन सवाल ये उठता है, की जब एनिकट में पानी था ही नहीं तो ये पानी जो अब सप्लाई हो रहा है कहाँ से आ रहा है? इसके पहले जनता को जल- संकट का सामना क्यों करना पड़ रहा था? क्या जल-प्रदाय व्यवस्था इसी प्रकार सुचारू नही की जा सकती?
अब दूसरा संकट बिजली का है। साल भर से यहाँ पाँच घंटे की विद्युत् कटौती हो रही है। बीच-बीच में अघोषित कटौती अलग से। पूछने पर जवाब मिलता है, कि अधिक खपत के कारण लाईट अपने आप 'ट्रिप' हो जाती है, जनता लाचार ,क्या कहे जब अपने आप ट्रिप होती है...........लेकिन इधर चुनाव घोषित होते ही देख रही हूँ कि लाईट सुबह दो घंटे फिर दोपहर में केवल एक घंटे ही काटी जा रही है। अघोषित कटौती बंद। लाईट अब 'ट्रिप' क्यों नहीं हो रही??? खपत कम हो गई क्या?? वैसे भी किसी मंत्री को आना होता था तो लाईट कभी भी ट्रिप नही होती थी। ये सारे मुगालते तो केवल जनता के लिए हैं।
अब देखना ये है, कि चुनाव के बाद क्या होता है?
फरवरी माह में नगरनिगम सतना ने आम जनता को चेताया था, कि एनिकट में केवल एक हफ्ते का पानी शेष है, इसलिए अब पानी कि सप्लाई सप्ताह में दो दिन ही की जायेगी। चलो ठीक है, पानी मिले यही क्या कम है! मार्च में चुनाव की तारीखें घोषित होने के पहले तक लोगों को हफ्ते में दो दिन ही पानी मिल रहा था। लेकिन इधर प्रत्याशियों की घोषणा हुई और उधर व्यवस्थाओं में परिवर्तन दिखाई देने लगे। इधर पन्द्रह दिनों से रोज़ पानी सप्लाई हो रहा है।
पानी रोज़ मिल रहा है ये तो अच्छा है, लेकिन सवाल ये उठता है, की जब एनिकट में पानी था ही नहीं तो ये पानी जो अब सप्लाई हो रहा है कहाँ से आ रहा है? इसके पहले जनता को जल- संकट का सामना क्यों करना पड़ रहा था? क्या जल-प्रदाय व्यवस्था इसी प्रकार सुचारू नही की जा सकती?
अब दूसरा संकट बिजली का है। साल भर से यहाँ पाँच घंटे की विद्युत् कटौती हो रही है। बीच-बीच में अघोषित कटौती अलग से। पूछने पर जवाब मिलता है, कि अधिक खपत के कारण लाईट अपने आप 'ट्रिप' हो जाती है, जनता लाचार ,क्या कहे जब अपने आप ट्रिप होती है...........लेकिन इधर चुनाव घोषित होते ही देख रही हूँ कि लाईट सुबह दो घंटे फिर दोपहर में केवल एक घंटे ही काटी जा रही है। अघोषित कटौती बंद। लाईट अब 'ट्रिप' क्यों नहीं हो रही??? खपत कम हो गई क्या?? वैसे भी किसी मंत्री को आना होता था तो लाईट कभी भी ट्रिप नही होती थी। ये सारे मुगालते तो केवल जनता के लिए हैं।
अब देखना ये है, कि चुनाव के बाद क्या होता है?
रविवार, 12 अप्रैल 2009
लाचार हैं,शहंशाहे-ग़ज़ल...
शहंशाहे -गज़ल मेंहदी हसन साहब पिछले चार सालों से लकवा ग्रस्त हैं, और अपने बेटों पर आश्रित हैं। चार साल पहले ही वे मुम्बई आए थे इलाज़ के सिलसिले में। अपने पसंदीदा गायक को इस हाल में देख उनके चाहने वालों ने दिल खोल कर मदद की। हसन साहब के बेटों का कहना था कि पैसों के अभाव में उनका समुचित इलाज नहीं हो पा रहा। हिंदुस्तान में मेंहदी हसन साहब को चाहने वालों की लम्बी फेहरिस्त है, और वे अपने शहंशाह को अभावग्रस्त कैसे देख सकते थे।
आज चार साल बाद भी मेहँदी हसन साहब बिस्तर पर पड़े रहने को मजबूर हैं, क्यों? जबकि देश विदेश से उनके चाहने वाले आर्थिक मदद कर रहे हैं? उनके बेटे लाखों रुपयों में भी उनका इलाज क्यों नहीं करवा पा रहे?
उन रुपयों का क्या कर रहे जो इलाज के लिए आ रहे हैं? क्यों अपने उस पिता के नाम का ग़लत फायदा उठा रहे हैं, जिन्होंने पैसे को कभी महत्त्व ही नहीं दिया? क्यों नहीं उनका ठीक से इलाज करवाते? क्या शहंशाहे -ग़ज़ल , जिसने सब के दिलों पर राज किया को सुकून भरी अन्तिम सांसे नसीब नहीं होंगी ??
आज चार साल बाद भी मेहँदी हसन साहब बिस्तर पर पड़े रहने को मजबूर हैं, क्यों? जबकि देश विदेश से उनके चाहने वाले आर्थिक मदद कर रहे हैं? उनके बेटे लाखों रुपयों में भी उनका इलाज क्यों नहीं करवा पा रहे?
उन रुपयों का क्या कर रहे जो इलाज के लिए आ रहे हैं? क्यों अपने उस पिता के नाम का ग़लत फायदा उठा रहे हैं, जिन्होंने पैसे को कभी महत्त्व ही नहीं दिया? क्यों नहीं उनका ठीक से इलाज करवाते? क्या शहंशाहे -ग़ज़ल , जिसने सब के दिलों पर राज किया को सुकून भरी अन्तिम सांसे नसीब नहीं होंगी ??
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