रंग टेसू पलाश फूलों से लेकर ,
हम पहुँच गए सपत्नीक मोहल्ले में
फिर रंग जमाया भांग के हो हल्ले में ।
गुप्ता , शर्मा, वर्मा जी को रंगों में नहलाए
रसगुल्ले , गुलाबजामुन , गुज्जियाँ खूब उडाए ।
रंग बिरंगी भीड़ में फिर , पत्नी को टटोला
वो पत्नी सी लगी तो , हाथ पकड़कर बोला ।
अज़ी अब चलिए भी , बहुत हो गई होली
वो भी मारे ख़ुशी ख़ुशी , संग हमारे होली।
घर जाकर प्रेमपूर्वक , जब उनका रंग छुड़ाया
बिन भांग चढ़ाये फिर, सर अपना चकराया ।
हम ये कैसा गड़बड़ घोटाला कर आए थे
पत्नी की बदले पड़ोसन को पकड़ लाए थे ।
अपनी तो मद-मस्त थी , मर्दों की टोली
पर समझ न आया , वो क्यों संग होली ।
मांफी मांग हमने फिर , भाभी जी की चाय बनाई
तभी द्वार पर धर्मपत्नी की , कड़क आवाज़ दी सुनाई ।
हमने कहा भाग्यवान , एक अनहोनी हो गई है ।
वो बोली पता है जी , शर्मा जी की पत्नी खो गई है ।
पत्नी वियोग में शर्मा जी, बहुत घबराए हैं
१०० नंबर पर रिपोर्ट लिखाने , यहीं आए हैं ।
यह सुनकर अपने हाथ पैर, पत्थर से जकड़े गए
रंग उतारकर भी हम तो , रंगे हाथ पकडे गए ।
अब बाहर पडोसी संग खड़ी, पत्नी भड़क रही है
अन्दर पड़ोसन मज़े से बैठी , चाय सुड़क रही है ।
अब आप ही बतायें, हम क्या करें?
"जब पतिदेव को बन्द कर दिया..... "शमा - हम उन दिनों मुंबई में थे . मार्च का महीना था. होली अब के शुक्रवार को थी,इस कारण लम्बा वीक एंड मिल गया था. मेरी चार सहेलियाँ नाशिक से बृहस्पतवार की शाम को ही आ पहुँचीं थीं. खूब गपशप का माहौल बना हुआ था. मैंने काफी सारे व्यंजन,होली के मद्देनज़र बना के रखे थे. शुक्रवार की सुबह मालपुए बनाने का इरादा था. सोचा सबको नाश्तेमे यही परोसा जाये. उसी की तैय्यारी में मै रसोई में लगी हुई थी.रसोई को लग के बैठक थी,सो साथ,साथ गप भी जारी थी. होली पे फिल्माए गए गीत सभी चल रहा था.इतने में दरवाज़े पे घंटी बजी. मै पहुँची तब तक अर्दली ने दरवाज़ा खोल दिया था. बता दूँ की मेरे पती तब ऊंचे ओह्देपे (CID )में सरकारी मुलाजिम थे. दरवाज़े पे आयी हुई टोली हमारी सोसायटी के लोगों की ही थी.उस में अधिकतर भारतीय प्रशासनिक सेवामे कार्य रत थे."कहाँ हैं तुम्हारे साहब ?" किसीने अर्दली को सवाल किया. "जी, वो तो बाथरूम में हैं!" अर्दली ने बताया!मै झट इनके छुटकारे के लिए आगे बड़ी और कहा," आप सब को होली मुबारक हो! दरअसल,ये अर्दली अभी,अभी पहुँचा है....इसे नहीं पता की,ये तो सुबह साढ़े छ: बजे ही अपनी गोल्फ किट लिए गोल्फ कोर्स पे गायब हो चुके हैं!" "अरे, ये जनाब कहीं बाथरूम में छुप के तो नहीं बैठे?"किसी ने अपनी शंका व्यक्त की! "नहीं,नहीं...ये तो वाकई सुबह गोल्फ खेलने चले जाते हैं...मै रोज़ ही देखता हूँ....चलो,चलो...इन्हें फिर कभी धर लेंगे...",हमारे एकदम सामने रहनेवाले और बेहद करीबी पड़ोसी,रमेश जी ने कहा. सब ने मान लिया ! "लेकिन,आपके हाथ के व्यंजन खाने तो हम ज़रूर आयेंगे!" उनमे से एक ने कहा! "जी...जी...ज़रूर!!"मैंने कहा...मेरी जान छूटी. पतिदेव को होली खेलना क़तई भाता नहीं! ये तो सचमे बाथरूम में थे! दरवाज़ा बंद होते ही मै बाथरूम के दरवाज़ेपे पहुची,तथा खट खटा के कहा," मै जब तक कहूँ ना,आप बाहर मत आना!" कहके मैंने बाहर से कूंडी लगा दी! अब हम सहेलियों का गपशप का दौर दोबारा जोर पकड़ गया! मै गरमागरम मालपुए बना बना के मेज़ पे भेजती जा रही थी....हंसी मजाक चल रहा था...फ्लैट सड़क के काफी करीब था,सो सड़क परकी सारी पी,पी,पों,पों सुनायी देती जा रही थी! कुछ डेढ़ घंटा या शायद उससे अधिक बीत गया. जमादारनी आयी. सीधे मेरे कमरे में गयी और फिर घबराई-सी बाहर आके मुझ से मुखातिब हुई," बाई साहब...! आपने कहना तो था,की साहब अन्दर हैं...मै तो कूंडी खोल सीधे अन्दर पहुँच गयी!" इतने में पसीने में तरबतर हुए,ये भी सामने आये! मैंने चकराके सवाल किया," अरे! आप गोल्फ खेलने नहीं गए?" "हद करती हो! गोल्फ खेलने नहीं गया! मुझे बाथरूम में बंद कर के तुम निकल आयीं....ये तक नहीं बताया की,किसलिए बाहर आने से रोक रही हो...pot पे बैठे, बैठे दोनों अखबार तीन,तीन बार पढ़ लिए...मुम्बई की गर्मी अलग! बताओ,गोल्फ खेलने कैसे जाता? तुम्हें इतने भी होश नहीं? दरवाज़ा भी खडकाने से डर रहा था,की,पता नहीं तुमने क्यों टोक दिया है!" पतिदेव उबल पड़े! और मेरे कुछ देर के लिए होश उड़ गए! मै अपनी रसोई और अपनी गपशप में इन्हें बंद कर के भूलही गयी थी! मेरी शक्ल पे हवाईयाँ उडती देख,मेरी सहेलियाँ ज़ोर ज़ोरसे हँसने लगीं! एक इनसे मुखातिब होके बोली," चलये ये होली भी खूब याद रहेगी! लोग रंगों से भीगते हैं,आप पसीने से भीग रहे थे!" ना जाने कितने साल बीत गए,पर ये बेवकूफी भुलाये नहीं भूलती! बल्कि हर होली पे याद आही जाती है! "वो शरमा के भागना मेरा......" रेखा श्रीवास्तव
अरे वंदना ये क्या पूछ डाला ? वैसे होली का मौका भी ऐसा ही है कि कुछ न कुछ घटित होता ही रहता है. चलो ये बात आज तक किसी से शेयर की ही नहीं है तुम्हें बताते हैं और ये बात उनको पता है जो उस समय वहाँ मौजूद थे. मेरी शादी का मौका था और मेरे भाई साहब के फास्ट फ्रेंड मुंबई में रहते थे और उसी समय उनकी बहन की भी शादी थी. सब लोग इकट्ठे थे और ढोलक बज रही थी कि मेरी चाची बोली - आज आदित्य का फ़ोन आया था कि वह शादी में नहीं आ पाएंगे.मैंने कहा - हाँ निशि की शादी है न इस लिए कोई बात नहीं. चाची - कोई बात कैसे नहीं ? शादी फिर कैसे होगी? मैंने कहा - अरे उनके न आने से शादी होने के क्या सम्बन्ध है? अब अपनी बहन की शादी छोड़ कर तो आ नहीं सकते .चाची - फिर तुम्हारी शादी कैसे होगी? मैंने ने बगैर सोचे समझे कह दिया - क्यों मेरी शादी और आदित्य के न आने से क्या मतलब है? चाची बोली - सोच लो, तुम्हारी शादी भी नहीं हो सकती है आदित्य के बगैर. मैंने कहा - अच्छा देखते हैं कैसे नहीं होगी? ये तो कोई बात नहीं हुई. सब लोग हँसे जा रहे थे और मैं थी कि अपनी धुन में बहस किये जा रही थी. मेरी सहेली बोली - अरे जरा गौर तो करो चाची कह क्या रही हैं? आदित्य नहीं आयेंगे तो तुम्हारी शादी कैसे होगी? तब मेरे समझ में आया कि मेरे पतिदेव का नाम भी आदित्य ही है. उसके बाद तो मुझको वहाँ से भागते ही बना.
मेरी यादगार हसीन बेवकूफ़ी .........हा हा हा हा होली है जी होली है- अजय झा आपने पूछा था कि होली पर की गई कोई ऐसी गलती बताऊं जो फ़ागुन के हसीन गुनाहों में से एक की तरह याद हो मुझे । होली यूं तो शहरों में भी रहते और मनाते हुए ही आए थे और हर जगह की खासियत के साथ एक देसी भदेसपन और अपनी हुडदंगई तो साथ रहता ही था । इस होली के दौर में एक और जबरद्स्त दौर तब आया जब हम अपने लडकपने से युवापन की ओर बढ रहे थे और खुशकिस्मती ये कि कुदरत ने उस वक्त में हमारे लिए ग्राम्य जीवन को मुकर्रर कर दिया था । यकीन जानिए आज भी मुझे लगता है कि गांवों में रहे वो दिन मेरे जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिनों में से एक थे जबकि वो दौर कठिनाईयों और चुनौतियों भरा था फ़िर भी । गांव में होली का दिन तो बस कहने भर को ही तय होता था ..वर्ना शुरू तो हम शायद बसंत पंचमी से ही हो जाते थे । गांव की होली में जो चीज़ें मुझे अनमोल मिलीं वो थी जोगीरा और मंडली होली ..ओह क्या दिन थे वो भी । गांव में आम की बौरों की खुशबू हवाओं में घुलने लगती थी और हर तरफ़ उत्सव का माहौल होता था । और हां उन दिनों में शादियां खूब हुआ करती थीं मिथिलांचल में सो उस समय जिंदगी के सावन का फ़ागुन से जो मिलन होता था वो तो बस उन दिनों को यादगार बना देता था जैसे हर आंगन में या जीजा नया आया होता था या फ़िर नई नवेली भौजी ही शो स्टॉप्पर होती थीं । हम तो जाने कितने दिनों पहले से ही शुरू हो जाते थे । अरे नही नहीं जी होली खेलने के लिए नहीं बल्कि भौजी को इस बात के लिए कि ..ए भौजी तनिक नुतुनिया को भी बुलाईए न अबके होली में ...तब बताते हैं दुनो कोई को । भाभी भी जैसे चैलेंज स्वीकार करने को ही तैयार बैठी थीं ....हां हां बौआ जी हम सब समझते हैं ....आईए रही है ऊ ..ई गुंडा मंडली बच के रहिएगा होली में धुलिया देगी आप लोग का भडकुस्स उडा देगी ......देखेंगे देखेंगे ...हमने भी टनक के कह दिया था ।
बस पूरी मंडली को तो जैसे होली में एक अतिरिक्त तोहफ़ा मिलने जा रहा था ..आखिर भौजी की बहिनिया आ रही है होली खेलने ई कोई आम बात थोडी था । हमारे सर्किल से अलग लडकों को जब ये पता चला होगा तो वे बेचारे जरूर जले भुने होंगे ..अरे हम भी अईसी खबरों पर खूब भुन जाते थे । होली से एक दिन पहले का दिन था । भौजी से पिछली शाम को ही बता दिया था कि कि पहले भईया नुतुनिया को ले के आएंगे बाईक पे ..फ़िर उसके बाद बुआ जी को लेने जाएंगे उनके ससुराल से । हमने भी बस कर ली तैयारी । दालान से आंगन तक जाने के बीच की जगह को चुना गया ऑपरेशन नुतुनिया रंगाई के लिए । भईया के मोटर सायकिल की आवाज़ सुनते ही सब पोजीसन में बैठ गए । हमें पता था कि भईया नुतुनिया जी को दालान पे उतार के फ़िर वापस निकल लेंगे बुआ जी को लेने के लिए । ..बस जैसे ही खंबे की ओट से एक परछाई आती दिखी ...जय हो ...एक जोर का शोर और कम से कम तीन बाल्टी लोटा पानी ...फ़चाक से ...। जब तक देखें देखें ...ओह ये तो लक्ष्मी बुआ थीं ..." कौन है रे मुंहझौंसा सब ..ई कौन होली से पहले ही बौराया हुआ है कौन घर का है रे ...सब ये जा वो जा ..। सत्यानाश ...भईया नुतुनिया के जगह पर पहले लक्षमी बुआ को ही लाद लाए थे । वो शाम तो बस कैसे कटी पूछिए मत । लेकिन नुतुनिया आज भी हमें खूब चिढाती है ...हाय रे बौराहा मंडली .......अपनी ही बुआ जी को ..हर हर गंगे कर दिया
बहुत बहुत शुक्रिया वंदना बहन आपका और ढेर शुभकामनाएं आपको
(अरेरेरेरेरेरे........ बात यहीं खत्म नहीं हुए भाई. तकनीकी खराबी के कारण बेवकूफ़ी की श्रृंखला का दूसरा भाग |
आपके ब्लॉग-रोल पर दिखाई नहीं दे रहा. शाम को रश्मि ने मुझे बताया और फिर रात में ज्योति ने. जब दो लोगों ने एक सी शिकायत की, तो मेरा माथा ठनका. अब दिक्कत नहीं होगी, सीधे इस लिंक पर जाइये न, हां भाई, इसे पढने के बाद ही तो :)