रविवार, 31 जनवरी 2010

झलकियां




गण्तंत्र दिवस के अवसर पर मेरे विद्यालय के नन्हे-मुन्ने विद्यार्थियों ने भी रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत

किये. उसी अवसर की कुछ झलकियां आपके लिये लाई हूं , देखें और कार्यक्रम में शामिल हो जायें.

खुले आकाश में लहराता तिरंगा ...... हर वक्त हमें आज़ाद होने का अहसास कराता....नमन.



अपने मेक-अप से बेखबर नन्हीं नर्तकियां....... अपने नृत्य के आरम्भ होने का इन्तज़ार करतीं छात्राएं

सजे-धजे नर्तक दल अपनी बारी के इन्तज़ार में................ ये है पंजाब का लोक-नृत्य भांगडा.


सीनियर और जूनियर छात्र नृत्य प्रस्तुत करते हुए......


विद्यालय की पूर्व छात्रा विधु ने कार्यक्रम का संचालन किया जबकि शिउली सिंहरॉय ने हारमोनियम पर संगत की.
केयर पब्लिक स्कूल परिवार.



सोमवार, 25 जनवरी 2010

सारे जहाँ से अच्छा....


गणतंत्र दिवस

आज गणतंत्र दिवस है. इधर विद्यालय में बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रिहर्सल चल रही थी, और उधर मेरा मन एक बार फिर बचपन की यादों को टटोल रहा था. याद आ रहे थे वे तमाम गणतंत्र दिवस- स्वतंत्रता दिवस जो हमने बचपन में जिए थे...............
कैसी उमंग होती थी हमारे मन में ! कितना जोश, कितना उत्साह.... लगता था, शहीद भगत सिंह या आज़ाद के बाद तो बस हमीं हैं देश के असली सपूत.
२६ जनवरी की तैयारी जितनी विद्यालय में चलतीं, उससे ज्यादा घर में दिखाई देतीं. कई दिन पहले से गुनगुनाये जाने वाले देशभक्ति के गीत , २६ तक आते-आते जोर-शोर से गाये जाने लगते.
आज़ादी के किस्से सुनते - सुनते लगता की काश! हम भी उस वक्त होते तो देश के लिए शहीद होते!!!
मेरे माँ-पापा दोनों ही शिक्षण कार्य से जुड़े रहे और बेहद सिद्धांतवादी माने गए , लिहाज़ा स्कूल और उससे जुड़े हर कार्य को हमें भी बड़ी ईमानदारी से निभाना पड़ता था. ये अलग बात है, की इन जिम्मेदारियों को हम भी बखूबी निभाते थे.
तो इधर २५ जनवरी आती , और उधर हमारी यूनिफ़ॉर्म तैयार होने लगती. खूब कड़क प्रेस किया जाता. प्रेस करने का काम मेरी छोटी दीदी करतीं, और मैं वहीँ खड़े हो , अपनी प्रेस हो रही शर्ट का कॉलर छू - छू के देखती की खूब कड़क हुआ या नहीं. स्कर्ट की एक-एक प्लेट सहेज के प्रेस की जाती.
इस काम से संतुष्ट होने के बाद मैं अपने जूते चमकाती. पॉलिश करने वालों की तर्ज़ पर खूब ब्रश रगडती.
पूरी यूनिफ़ॉर्म हैंगर पर लटकाती, और उसके ठीक नीचे जूते रख देती.
इस दिन सुबह चूंकि मम्मी, पापा दोनों दीदियों, मुझे सबको एक साथ स्कूल के लिए निकलना होता था , तो तैयार होने का टाइम भी एक ही होता. खासी बमचक मच जाती. उन दिनों हमारे घर में एक ही बाथरूम था, और स्कूल तो सबको नहा के ही जाना होता था , ख़ास तौर पर गणतंत्र या स्वतंत्रता दिवस के दिन . ये दिन तो सबसे पावन त्यौहार की तरह होते थे. लिहाजा इन दिवसों पर बिना नहाए कैसे चलेगा? ध्वज-वंदन कैसे होगा? सो भले ही कडाके की सर्दी में पांच बजे उठना पड़े, नहाना तो है ही. खैर फटाफट नहा के हम यूनिफ़ॉर्म में सज धज के ठीक साढे छह बजे स्कूल के लिए निकल जाते.
हमारे शहर के मुख्य चौराहे से स्कूल की "प्रभात-फेरी" शुरू होती थी. जो मेरे समकालीन हैं , वे इस प्रभात-फेरी को समझ रहे होंगे. यहाँ से आरम्भ होने वाली इस प्रभात-फेरी में , क्रमशः शहर के सभी स्कूल जुड़ते जाते. विद्यार्थी अपने-अपने स्कूल का बैनर लिए नारे लगाते आगे बढ़ते जाते. लगभग पूरे शहर का चक्कर लगाने के बाद सब अपने-अपने स्कूल पहुँच जाते., जहाँ बाद में सांस्कृतिक कायर्क्रम संपन्न होते.

गणतंत्र दिवस
कमोबेश यही तरीका आज भी विद्यालयों में अपनाया जा रहा है, लेकिन त्यौहार मनाये जाने की मूल भावना नदारद सी लगती है. प्रभात-फेरी जैसी चीज़ मुझे तो लम्बे समय से, या कहूं की जबसे मेरा शहर छूटा तब से दिखाई नहीं दी. शायद ये परंपरा ख़त्म कर दी गई है. निजी विद्यालयों और अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों के चलन के बाद बहुत सी विद्यालयीन प्रथाएं समाप्तप्राय हैं. बच्चों के दिलों से देशप्रेम का जज्बा नदारद है. शायद उन्हें कुछ ज्यादा ही आज़ाद हिंदुस्तान मिल गया............हमारे बचपन में तो फिर भी बहुत सी देशप्रेम की कथाएं सुनाई जाती थीं, लेकिन आज बच्चे केवल उन्हीं शहीदों को जानते हैं, जिन पर फिल्में बन चुकीं हैं . अधिकाँश बच्चे आज़ादी के आन्दोलनों या उससे जुड़े शहीदों के बारे में, इतिहास में एक पाठ के रूप में ही पढ़ते हैं. शहादत की कहानियां सुनाने वाला कोई नहीं रहा. हमारे समय में माँ, नानी या दादी से कहानियां सुनने का चलन था, जिनमें हमें देश से जुडी अनेक कहानियां मिल जातीं थीं. लेकिन आज? आज आज न वे कहानी सुनाने वाले रहे न सुनने वाले. जहाँ एक ओर बच्चे टीवी या कम्प्यूटर में व्यस्त हो गए हैं, तो वहीँ दादी-नानियाँ भी टीवी के धारावाहिकों में व्यस्त हैं. अब यदि कोई बच्चा कहानी सुनाने को कहता भी है, तो बड़े उसे -" बहुत कहानियां आती थीं बेटा, लेकिन अब सब भूल गए" कह के टरका देते हैं.
समझ में ही नहीं आता की गलती बच्चों की है या बड़ों की? कोई भी भावना तब तक घर नहीं कर सकती, जब तक की उसका सम्प्रेषण सही तरीके से न किया गया हो. हमारे अभिभावक न केवल खुद देश के प्रति समर्पित रहे बल्कि हम में भी बचपन से ही देश प्रेम की भावना जागृत की. लेकिन क्या आज की इस नई पीढ़ी में हम देश-प्रेम का वास्तविक जज़्बा देख पा रहे हैं? अगर नहीं तो दोष किसका है? आज के जिस हिंदुस्तान को बच्चे देख रहे हैं उसे वे कैसे प्यार करें? गले तक भ्रष्टाचार में डूबा.....रोज़ व्यभिचार की तमाम खबरें.....हम खुद ही अपने देश को धिक्कारते नहीं रहते क्या? वो भी बच्चों के ही सामने? " क्या देश है ये" " विदेशों में देखो......" जैसे वाक्य या तुलनाएं हम अक्सर ही नहीं किया करते क्या? तब बच्चे भी बिना ये जाने की ऐसे वाक्य हम देश की चिंता में बोल रहे हैं, दोहराते हैं, और देशप्रेम तिरोहित होता जाता है.
खैर............आज ज़रुरत है नई पीढ़ी में नए सिरे से देश प्रेम और देश चिंता के बीज बोने की, ताकि आने वाली नई पौध आजीवन स्वतन्त्र और सम्मानित रह सके.
जय हिंद.
गणतंत्र दिवस की अनेकानेक शुभकामनाएं.

...

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

वसंतपंचमी पर विशेष-



वैसे तो महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" का जन्म 21 फरवरी को 1896 में पश्चिमी बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल नामक देशी राज्य में हुआ था, लेकिन उस दिन वसंतपंचमी थी. माँ सरस्वती ने प्रकृति का कैसा अनुपम उपहार दिया साहित्य-जगत को. वसंत पंचमी के अवसर पर निराला जी की एक प्रसिद्ध रचना के साथ हाज़िर हुई हूँ-

रविवार, 10 जनवरी 2010

होई है सोई, जो राम रचि राखा..

मैं शेफ़ाली के साथ
छुट्टियाँ बाद में आती हैं , उनके इस्तेमाल का प्लान पहले बनने लगता है. कुछ ऐसा ही इस बार भी क्रिसमस की छुट्टियों के पहले हुआ.

शैली ने हैदराबाद बुलाया था, तो मंजू दीदी और वर्षा ने इंदौर. तारा आंटी इलाहाबाद बुला रही थीं तो राजा और शिवेंद्र मुंबई. शमा दीदी ने पुणे आने का आत्मीय आग्रह किया तो हमने भी पुणे जाने का मन बना लिया. रिज़र्वेशन करवाने के पहले सोचा इस्मत को भी खबर कर दें. क्योंकि जब पुणे जा ही रहें हैं तो वहीँ से गोवा भी हो आयेंगे, ताकि इस्मत की सात साल पुरानी शिकायत दूर हो सके. लेकिन ये क्या? हमने जैसे ही इस्मत को बताया, उसने पूरा कार्यक्रम ही रद्द कर दिया. बोली- चौबीस दिसंबर को हम मोहर्रम के सिलसिले में जौनपुर जा रहे हैं. इस बीच तुम्हें इस तरफ की यात्रा करने की कोई ज़रुरत नहीं है. खबरदार जो तुम मेरी ग़ैरमौजूदगी में इस तरफ आईं. तुम गर्मियों की छुट्टियों में यहाँ आ रही हो.

लो भैया!! यहाँ तो पूरा कार्यक्रम भी बता दिया गया है, आने का.

हम अभी ऊहापोह में ही थे, की कानपुर से बब्बी . मेरी छोटी बहन का फोन आया कि सत्ताईस दिसम्बर को उसका एक ऑपरेशन किया जाना है. हमने कहा- निश्चिन्त रहो, हम आ रहे हैं ( जैसे हम कोई सिद्धहस्त डॉक्टर हों).
और जहाँ सोचा भी न था, जहाँ का कोई न्यौता भी न था, वहां का रिज़र्वेशन हो गया.

कानपुर यात्रा के पहले एक ओर मन में बहन के स्वास्थ्य को लेकर चिंता थी, तो दूसरी ओर अनूप जी से मुलाकात का उत्साह. अपने कानपुर आने के बारे में अनूप जी को बताया, तो मालूम हुआ कि वे सपरिवार राजस्थान-यात्रा पर जा रहे हैं :(. लेकिन अनूप जी ने विश्वास जताया था कि मुलाकात होगी ही.

कानपुर पहुंचे, और बहन का सफल ऑपरेशन भी हो गया. अब चिंतामुक्त थी. आठ दिन कब बीत गए पता ही नहीं चला. कानपुर अमर-उजाला में मेरे देशबंधु के सहयोगी और मित्र संजय शर्मा भी हैं. हमने कानपुर में होने कि बात बताई तो अड़ गए कि जब तक उनके घर नहीं जाउंगी, तब तक वे बात भी न करेंगे ( कितनी खुशकिस्मत हूँ, कितने स्नेही दोस्त मिलें हैं.)

साल का आखिरी दिन और मोबाइल रूठा हुआ... न जाने क्या गड़बड़ हुई, कि कोई फोन ही नहीं लग रहा, न आ रहा न जा रहा. विधु के मोबाइल पर मेरे पतिदेव , उमेश जी ने खबर की तब समझ आया की मेरा फोन तो स्विच्ड ऑफ़ बता रहा है. ठीक करने की कोशिश या अतिरिक्त होशियारी में मैंने मोबाइल रिसेट कर दिया और ये लो!!! फोन में सेव तीन सौ नंबर डिलीट !!!!!! हाथ पैर कट गए हो जैसे...निहत्था सैनिक मैदान में........किसी को शुभकामनाएं भी न दे सकी.

एक जनवरी यानि कानपुर-प्रवास का आखिरी दिन. अनूप जी से मुलाकात अभी तक नहीं हो सकी थी. दो की सुबह साढे छह बजे हमारी ट्रेन थी. सुबह घने कोहरे के बीच हनुमान चालीसा पढ़ते हुए सुनील गाडी चलाते रहे. रास्ते में एक तेज़ रफ़्तार ऑटो निकला तो सुनील ने पूछा- " जानती हैं दीदी , ये ऑटो वाला इतना तेज़ ऑटो क्यों चला रहा है? "
मैंने इंकार में सर हिलाया तो बोले- " क्योंकि वो दूसरों को बिठाए है."
वाह!!! क्या जवाब था!!
सुनील,अनूप, विधु, वंदना,शेफ़ाली और नव्या
स्टेशन आने पर पता चला की ट्रेन तीन घंटे लेट है. इस बीच अनूप जी का फोन आया तो हमने कहा की हमारी ट्रेन आने ही वाली है. अब अगली यात्रा में मुलाकात होगी. नौ बजे पता चला की दिल्ली रूट पर ट्रेन- एक्सीडेंट हो गया है प्रयागराज का इसीलिए उस रूट की सभी ट्रेनें लेट हैं. बारह बजे पता चला की ट्रेन ग्यारह घंटे लेट है ( ये अलग बात है की बाद में सत्रह घंटे लेट हो गई). अनूप जी का फोन आया-" घर का एड्रेस बताओ हम आ रहे हैं." वाह!! हमने कहा की हम लोग नर्सिंग होम के लिए निकल चुके हैं आप भी वहीँ आ जाइए.

आधे घंटे के अन्दर अनूप जी अपने साढ़ू भाई अजय दीक्षित जी के साथ हाज़िर! अनूप जी के विश्वास की जीत हुई. अनूप जी और अजय जी जुगलबंदी ने स्तरीय हास्य की जो सृष्टि की, उसमें देर तक हम डूबते-उतराते रहे. इसी बीच अनूप जी ने बताया की शेफाली पाण्डेय भी कानपुर आई हुईं हैं. उन्हें फोन किया तो पता चला की वे नर्सिंग होम के पास स्थित मॉल रेव-मोती में हैं. हमने उन्हें वहां से उठाया और फिर वापस नर्सिंग होम. यहाँ जम के गपशप और चाय के दौर भी चले. शेफाली जी की प्यारी सी बिटिया नव्या और मेरी बिटिया विधु ने भी हम लोगों की गपशप का लुत्फ़ उठाया. अनूप जी के लाये मोतीचूर के लड्डू खाए .

महफ़िल बर्खास्त करने का मन तो नहीं था, लेकिन हमारी ट्रेन का एक बार फिर टाइम हो रहा था सो हमने सबसे विदा ली और किसी प्रकार तीन तारीख की सुबह सतना पहुँच गए.

कानपुर में अनूप जी और शेफाली से मिलना एक उपलब्धि की तरह रहा. यह संयोग ही था की हमारी ट्रेन लेट हुई और हम अनूप जी और शेफाली से मिल सके. दोनों ही हंसमुख, खुशमिजाज़. मन खुश हो गया. सुबह से जितनी तकलीफें भारतीय रेल ने दीं थीं, सब दूर हो गईं, इन दोनों ब्लॉगर बंधुओं से मिल कर. ईश्वर आगे भी ऐसी ही सफल यात्राएं करवाए.

वैसे अनूप जी ने अपने ब्लॉग पर भी इस मुलाकात का बढ़िया वर्णन किया है.

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

एक साल बीत गया.....

एक साल
आज पिछली पोस्टों को देखते हुए अचानक ही पहली पोस्ट पर गई तो चौंक पड़ी. २ दिसंबर २००८. यानी मुझे ब्लॉग जगत से जुड़े एक साल से भी ज्यादा हो गया!!!!

लगता ही नहीं कि एक साल हो गया. नई पोस्ट लिखने, पोस्ट करने और फिर प्रतिक्रियाएं जानने कि चाह में कब दिन महीनों, और महीने साल में तब्दील हो गए, पता ही नहीं चला. इस दौरान आप सबका जो स्नेह मिला, उसे बताने की ज़रुरत ही नहीं है. केवल और केवल आप सबके स्नेह के कारण ही मुझे कुछ नया लिखने कि प्रेरणा मिलती रही.

जानते हैं, मुझे ब्लॉग लिखने को किसने प्रेरित किया?

तब नेट मेरे लिए केवल जानकारियां एकत्रित करने का साधन मात्र हुआ करता था. एक दिन मैं नेट पर राजकमल प्रकाशन की पुस्तक सूची सर्च कर रही थी. तभी मेरी निगाह राजकमल के एक अन्य कॉलम "पुस्तक मित्र बनेंगे?" पर पड़ी. मैं तो हमेशा से ही पुस्तकों की मित्र रही हूँ. सोचा देखूं, कौन पुस्तक मित्र बना रहा है? इस पेज पर गई तो देखा की कोई फुरसतिया जी हैं, जिन्होंने राजकमल की पुस्तक-मित्र योजना की विस्तृत जानकारी दी है. तब ब्लॉगिंग मेरे लिए केवल सितारों के द्वारा किया जाने वाला कार्य होता था. मैं नहीं जानती थी की ये जानकारी मैं जहाँ पढ़ रही हूँ, उसे ब्लॉग कहते हैं.

खैर, मैंने भी वहां एक जिज्ञासा पोस्ट कर दी. लगे हाथों फुरसतिया जी का जवाब भी आ गया. बाद में अनूप जी ने मुझसे ब्लॉग बनाने को कहा. मैं अचकचाई. कैसे? क्या? कब? लेकिन अनूप जी ने राह सुझाई और मेरा ब्लॉग बन गया. बाद में मैंने ब्लॉग सजाने के बारे में कुछ जानकारियां चाहीं तो अनूप जी ने टका सा जवाब दे दिया- "हम खुद नहीं जानते." लेकिन तब से अब तक मेरी हर समस्या को अनूप जी सुलझाते रहे हैं, लिहाजा मेरे लिए गुरु तुल्य हैं

इसके बाद सिलसिला चल पड़ा.

कल जबकि मैं कानपूर जा रही हूँ, तो मेरे मन मैं अपनी बहन प्रियदर्शिनी, उसके पति सुनील, बच्चे अनमोल और यश से मिलने की उत्कंठा से कहीं ज्यादा ख़ुशी इस बात की हो रही थी की मैं फुरसतिया जी से, सुमन जी से मिल सकूंगी. लेकिन हाय री किस्मत!!! इधर २५ दिसंबर की शाम पांच बजे हम ट्रेन में बैठेंगे, और उधर फुरसतिया जी कानपुर से सपरिवार छुट्टियाँ बिताने यात्रा पर निकल पड़ेंगे!! यानी मुलाकात की कोई गुंजाइश नहीं. खैर, महफूज भाई ने लखनऊ आने का और मिलने का न्यौता दिया है अपनी इस दीदी को, सो हम कोशिश करेंगे की लखनऊ जा सकें और महफूज से मिल सकें.
जब ब्लॉग बना, तो मैंने मात्र एक सन्देश पोस्ट किया, जिस पर जिन मित्रों की टिप्पणियां आईं, उन्हें मैं कभी नहीं भूलूंगी -आप भी देखें-

प्रिय दोस्तो; इस ब्लोग के ज़रिये हो सकता है मेरे बहुत से पुराने साथी मिल जायें........हो सकता है बहुत से नये साथी बन जायें....वरना मुझ जैसे अदना से इन्सान को ब्लौग की क्या ज़रूरत थी......ज़रूरत महसूस हुई, केवल इसलिये कि मेरे लिखने-लिखाने वाले साथी जो अब पता नहीं कहां हैं, शायद टकरा जायें...... कुछ को तो मैं नियमित प्रकाशित होते देख रही हूं; लेकिन जो नहीं छप रहे, उन्होंने भी लिखना तो बन्द नहीं ही किया होगा....ऐसा विश्वास है मेरा......बस उन्हीं की तलाश में हूँ..........

"दोस्तों के नाम........."

8 टिप्पणियाँ - ब्लॉगर अनूप शुक्ल ने कहा…

वाह, बधाई! लिखना शुरू करने की बधाई!

९ दिसम्बर २००८ ६:५३ PM

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ब्लॉगर Bahadur Patel ने कहा…

bahut badhiya hai.likhate raho.

१७ फरवरी २००९ १२:१५ AM

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ब्लॉगर nai dunia ने कहा…

आप की सोच वाकई काबिले तारीफ है....

५ मार्च २००९ १:०५ AM

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ब्लॉगर manojkumarsingh ने कहा…

दोस्‍तो की तरफ से बधाई

१६ मार्च २००९ १२:१५ AM

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बेनामी उन्मुक्त ने कहा

स्वागत है चिट्ठजगत में, बहुत मित्र मिलेंगे।

३ अप्रैल २००९ ७:३६ PM

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ब्लॉगर गौरव मिश्रा ने कहा…

Aur aaj se hm bhi aapke follower ho gaye, aise hi apni achchi achchi rachnaayein laati rahiye...

११ अप्रैल २००९ १२:३१ PM

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ब्लॉगर Mai Aur Mera Saya ने कहा…

namashkar
mai yaha naya hu . likhta bhi naya hu .shayd apke bare me kisi dost se suna hu .. alok prakash putul ya richa se suna hu lagta hai..jo bhi ho app meri rachnao par kabhi tiapanni karengi ye socha na tha .. achha laga bahut achha laga.. apka bolg dekhkar kuch aur naya karne ko man hua .. karunga . mai photogrepher hu .. kaya yaha photo bhi lagaye ja sakte hai ...

२४ अप्रैल २००९ ६:४८ PM

हटाएँ

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

याद न जाये, बीते दिनों की...

भाग- दौड़
कैसी भाग-दौड़ की ज़िन्दगी हो गई है.....|घड़ी के साथ उठना, घड़ी के साथ सोना, घड़ी के साथ आना- घड़ी के साथ जाना........|

इंसान न हुआ, घड़ी हो गया। घूमता रहता है, काँटों की तरह। हर वक्त " समय ही नहीं मिलता...", "फुरसत ही नहीं है...." जैसे जुमले मुंह पर सवार रहते हैं। और ये सच भी है। आज बड़े हों या बच्चे, सब इस कदर व्यस्त हो गए हैं की किसी को किसी की बात सुनने तक का टाइम नहीं।

मेरे घर में चार सदस्य हैं, और हम चारों अतिव्यस्त। बिटिया सुबह से लेकर रात तक पढ़ाई, स्कूल, ट्यूशन होमवर्क, मैं व्यस्त, पतिदेव अपनी फैक्ट्री में इतने व्यस्त की सुबह निकलते हैं और रात में आते हैं। मैं अपने काम पर सुबह सात बजे से जुटती हूँ, तो रात नौ बजे फुरसत होती हूँ। केवल अम्मा जी ( सास जी) फुरसत में होतीं हैं, तो उन्हें टीवी व्यस्त रखता है।

कमोबेश यही हाल हर परिवार का है। हमारी तरह सब अपने परिजनों का चेहरा रात में ही देख पाते हैं। अच्छा हुआ जो प्रकृति ने रात का विधान किया!!

आज के बच्चों को जब देखती हूँ, तो मुझे मेरा बचपन बहुत शिद्दत से याद आने लगता है।

कितना निश्चिन्त ..... कितना मासूम.... न पढ़ाई का ऐसा कमरतोड़ बोझ, न ट्यूशन की चिंता। स्कूल से आये तो बैग एक तरफ़ उछाला और जूते दूसरी तरफ....."मम्मे.....खाना......" का आदेश प्रसारित करती आवाज़ घर में गुंजाती।

इधर खाना अभी शुरू ही होता , कि उधर परदे के दोनों ओर से साथियों के चेहरे झांकने लगते। इशारे होने लगते कि जल्दी-जल्दी खाओ। मैं भी हबड़-तबड़ खाती। दौड़ के आधे-अधूरे हाथ धोती, और "मम्मे.....खेलने जा रहे हैं...." का एलान करती भाग जाती। पीछे से मम्मी आवाज़ देती रह जातीं।

हमारे खेल भी निराले थ॥ आज की तरह इलेक्ट्रोनिक का ज़माना तो था नहीं सो जो भी खिलौने थे अधिकतर खुद के तैयार किये उत्पाद होते थे। घर के आँगन में गुड्डे-गुड़ियों के बाकायदा घर बने हुए थे, जिन पर मेरी बड़ी दीदियों और उनकी सहेलियों का कब्ज़ा था, लेकिन दीदी की छुट्टी शाम को होती थी, सो तब तक उनकी गुड़ियों से हम खेलते। लेकिन गुड़ियों से हम बहुत देर तक नहीं खेलते थे , कारण मेरी मित्र -मंडली में लड़के भी थे, जो गुड़ियों से खेलना पसंद नहीं करते थे। किसी प्रकार मन मार के घर के गुड्डे से काम कराते रहते थे।
भाग-दौड़
दूसरा और हमारा बहुत प्रिय खेल था- "घर-घर"। तब हर घर में निबाड़ से बुने पलंग ज़रूर होते थे, जिन्हें गर्मियों में आँगन में बिछाया जाता था, इन्हीं पलंगों को खड़ा करके इनके घर बनाए जाते। मम्मी की साड़ियाँ पहनी जातीं। बाकायदा मम्मी, पापा, बच्चे, चाचा-चाची, पडोसी, बाई, सब्जी वाला, और टीचर जैसे रोल बांटे जाते। दीदियों की मौजूदगी में जब भी ये खेल खेला जाता तो मेरी बड़ी दीदी हमेशा टीचर बनतीं और हम सब को खूब मारतीं। मैं हमेशा सब्जी वाली बनती, और ढक्कनों से बनाई गई तराजू में कंकड़, पत्थर और पत्तों की सब्जी बेचती।

इसके अलावा हम बच्चे दोपहर में अपने घर की बाउंड्री में कंचे खेलते, गुल्ली-डंडा खेलते, और शाम होते ही "नमक-पाला" जैसा भारी दौड़ भाग वाला खेल खेलते। अँधेरा होते ही "आइस-पाइस" (आई-स्पाई) खेल जमता जो मम्मी की आवाज़ पर ही ख़त्म होता।

घर आते बैग उठाते, होमवर्क करते, कुछ थोडा बहुत याद भी करते और बस हो गई पढ़ाई।

रविवार को मम्मी-पापा दोनों घर पर होते , लिहाज़ा हमें कंचे या गुल्ली-डंडा खेलने का मौका नहीं मिलता, इस दिन हम सभ्य बच्चों की तरह कायदे में रहते और केवल लूडो, सांप-सीढ़ी या कैरम जैसे खेल खेलते। कैरम तो हमारे पापा भी साथ में खेलते थे और क्या खूब खेलते थे। आज भी वे बहुत बढ़िया खेलते हैं।
भाग-दौड़
शैतानियाँ भी हमारी काम न थीं. ये अलग बात है की घर में हम हमेशा सबसे शांत और कोमल बच्ची के रूप में गिने गए, लेकिन गुपचुप शैतानियाँ हमने भी खूब कीं। वैसे हम बहनों में मेरी बड़ी दीदी सबसे ज्यादा शैतान थीं। अपने ग्रुप की लीडर। जो बच्चा उनकी बात न माने उसकी खैर नहीं। दूसरे मोहल्ले की लड़कियों को ललकारती की दम है तो शाम को मंदिर में मिलना। और फिर अपनी फौज के साथ उस टोली की जो दुर्गत करतीं , उसके हम चश्मदीद गवाह है। चूंकि हम छोटे थे, सो हमें मंदिर के अन्दर बंद कर दिया जाता और खुद मंदिर के चबूतरे पर घमासान में जुट जातीं।

ऊंचे-ऊंचे इमली के पेड़ों पर सरपट चढ़ जातीं , साइकिल पर करतब दिखातीं। सर्कस देख के आने के बाद घर में बाकायदा सर्कस होता। अस्थाई झूला बाँधा जाता और उस पर उल्टा लटकाया जाता।

मेरी दीदी कहीं भी जातीं, साथ में मुझे ले जाना अनिवार्य था। मैं मन मारके जाती। दीदी भी कहाँ ले जाना चाहती थीं, लेकिन क्या करें? उस समय माँ के आदेश को टाला नहीं जाता था।

बड़ी दीदी के बाल बेहद लम्बे और खूबसूरत थे। कहीं जातीं तो मम्मी उनकी छोटी बना देतीं। लेकिन दीदी घर से ज़रा आगे पहुँचते ही अपनी चोटी खोल देतीं। मेरी उपस्थिति का भान होते ही मुझे मम्मी से न बताने के एवज में दस पैसे की रिश्वत दी जाती।

ऐसी ही रिश्वत तब भी दी जाती जब दोनों दीदियाँ अपनी सहेलियों के साथ फिल्म देखने का प्रोग्राम बनातीं । मुझे पुछल्ले की तरह फिर लटकाया जाता, फिर रिश्वत दी जाती, लेकिन इस बार फिल्म न जाने के लिए रिश्वत दी जाती। मेरा मन वैसे भी फिल्म देखने में तब लगता नहीं था। शायद ज्यादा छोटी थी। कुछ समझ में तो आता नहीं था, सो टॉकीज़ के प्रोजेक्टर रूम के बाहर की बालकनी में फिल्म के कटे हुए टुकड़े बीनती रहती। ऐसे में रिश्वत लेकर फिल्म जाने से मुकर जाना फायदे का सौदा होता था।
भाग-दौड़
एक रिश्वत और कभी नहीं भूलती............दीदी और उनकी सहेलियां "सूरज" फिल्म देख के लौटी। मेरी दीदी और उनकी मंडली के बीच बहुत लोकप्रिय खेल था, "गुलाम-चोर-डंडा। ये खेल उसी ऐतिहासिक मंदिर के मैदान में उगे विशालकाय बरगद के पेड़ के इर्द-गिर्द होता, जहाँ घमासान हुआ करते थे। वहीँ दीदी की मित्र उषा जोशी रहतीं थीं। वे भी अपने भाइयों समेत इस खेल में शामिल होतीं थीं। उस वक्त की सबसे अच्छी बात यही थी की लड़के-लड़कियों के बीच विभाजन रेखा नहीं थी। सब मिलजुल के खेलते थे। बराबरी से लड़ते थे। तो उषा दीदी के बड़े भैया भी गुलाम चोर डंडा खेलते थे। जिस रोज़ ये सब सूरज फिल्म देख के आये, उसके अगले दिन जब खेल जमा, तो हमने देखा की प्रकाश भैया मेरी खूबसूरत दीदी को देख के गा रहे हैं-" चेहरे पे गिरी जुल्फें, कह दो तो हटा दूँ मैं, गुस्ताखी माफ़.........." हालाँकि मैं कुछ नहीं समझी, लेकिन इस गीत और दीदी के बीच मैं फिर मौजूद थी। मूसरचंद की तरह। बहुत बाद में समझ आया, जब दीदी ने खुद मज़े ले लेकर ये किस्सा सुनाया। आज भी इस किस्से को और भी कई किस्सों को वे बड़ा रस ले के सुनातीं हैं।

कहाँ से कहाँ पहुँच गई। बात कर रही थी आज के बच्चों और उनकी व्यस्तताओं की। आज की शिक्षा-प्रणाली ने बच्चों को कोल्हू का बैल बना दिया है। पढाई हमारे समय में भी होती थी, लेकिन पाठ्यक्रम का अनावश्यक बोझ नहीं होता था। तब के पढ़े हुए हम आज के बच्चों को पढ़ा रहे हैं, मतलब हमारी शिक्षा में कोई कमी नहीं है। वर्ना आजके बच्चों को पढ़ा ही न पाते। समय के साथ-साथ बदलाव होगा ही, लेकिन अनावश्यक बदलाव की क्या ज़रुरत है? आज पता नहीं कितनी अतिरिक्त किताबें कोर्स में लगा दी जातीं हैं, जिन्हें पूरी तरह पढाया भी नहीं जाता, लेकिन पेपर होता है। बच्चे के लिए तनाव पर्याप्त।

पहले रिज़ल्ट फर्स्ट डिवीज़न, गुड सेकण्ड , सेकंड डिवीज़न, थर्ड डिवीज़न जैसा बोला जाता था। लेकिन अब? अब तो पर्सेंटेज बोला जाता है. पहले ६०-६५ बहुत था, अब ८० भी कम गिना जाता है। बच्चा दिन-रात ९० -९५ की दौड़ में जुटा रहता है। पढ़ाई का तनाव, होम वर्क का तनाव, परीक्षाओं का तनाव, क्लास में रैंक बनाए रखने का तनाव ऊपर से माँ- बाप की इच्छाओं का तनाव। "बेटा, फलाना प्रतिशत आना ही चाहिए. " और " हम तुम्हारे लिए पानी की तरह पैसा बहाते हैं, और तुम पढ़ तक नहीं सकते?"
भाग-दौड़
आजके बच्चे जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें उन्हें तनाव के अलावा और कुछ नहीं मिल रहा। मनोरंजन के नाम पर टीवी या फिर नेट की दुनिया। लड़के तो फिर भी बाहर कुछ खेल-कूद ही लेते हैं, लेकिन लडकियां? अब मिलजुल के खेलने का समय नहीं रहा। इनडोर गेम्स के लिए ही अकेले लड़कियों को भेजते माँ-बाप डरते हैं। मेरी बिटिया खुद कत्थक सीखती है। दो अन्य बच्चियों के साथ शाम को डांस-क्लास जाती है. लेकिन जब तक लौट नहीं आती, मेरे प्राण उसी में अटके रहते हैं। समय बदला है, बदलाव ज़रूरी भी हैं, लेकिन ये बदलाव सुखद हैं? क्या इन्हें सुखद नही बनाया जा सकता? बच्चों का बोझ कुछ काम नहीं किया जा सकता? वे भी खुली सांस ले सकें? अपना बचपन जी सकें?

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

बांधवगढ की सैर और शेर के दर्शन

दीपावली
मई में अचानक ही राजा (डॉ.सुजीत शुक्ल ) का फोन आया, बांधवगढ़ चलना है. मैंने कहा की मई में तो मेरे "ग्रीष्मकालीन भ्रमण कार्यक्रम" तय हैं. रिज़र्वेशन भी हो चुके हैं. राजा बोला " चलो, जून में चलते हैं. लेकिन इसके आगे नहीं. अपने कार्यक्रम १० जून तक समेट लो, भैया से भी बोलो छुट्टियां तैयार रखें. कोई बहाना नहीं. "

अधिकार सहित दिए गए इस आदेश की अवहेलना संभव थी क्या? अपने डेढ़ महीने के कार्यक्रम को एक महीने में समेटा और १० जून को वापस आ गए, सतना. ११ जून को राजा ,और मेरी बुआ सास (राजा की मम्मी) मुंबई से सतना पहुँच गए. अगले दिन हमें यानी मुझे, उमेश जी को, राजा, विधु और मेरी भांजी अनमोल को, बांधवगढ़ के लिए बड़े सबेरे निकलना था.

बांधवगढ़ पहुँचने के लिए विन्ध्य पर्वत श्रृंखला को पार करना होता है. इतने घने और हरे जंगल पूरी पर्वत श्रृंखला पर हैं, कि मन खुश हो जाता है.
बांधवगढ़ पहुँचने के लिए विन्ध्य पर्वत श्रृंखला को पार करना होता है. इतने घने और हरे जंगल पूरी पर्वत श्रृंखला पर हैं, कि मन खुश हो जाता है. हमारी गाडी पहाडियों पर सर्पिल रास्तों से होती हुई आगे बढ़ रही थी. इतना सुन्दर दृश्य!! वर्णनातीत ! इसी पर्वत श्रृंखला में है मोहनिया घटी, जहाँ पहली बार सफ़ेद शेर मिला, इसीलिए उसका नाम मोहन रखा गया.


सुबह १० बजे हम बांधव गढ़ पहुंचे. राजा ने पहले ही सत्येन्द्र जी के रिसोर्ट में बुकिंग करा ली थी. हम सीधे वहीं पहुंचे, जहाँ सत्येन्द्र जी और उनकी ब्रिटिश पत्नी "के" ने हमारा आत्मीय स्वागत किया.

ये रिसोर्ट इतनी खूबसूरत जगह पर है कि यहाँ से बाहरी दुनिया का अहसास ही नहीं होता. लगता है कि हम बीच जंगल में हैं. अलग-अलग बने खूबसूरत कॉटेज घना बगीचा, आम्रपाली के अनगिनत पेड़, और उन पर लटके बड़े-बड़े असंख्य आम...अनारों से लदे वृक्ष...बहुत सुन्दर स्थान. मन खुश हो गया. देर तक सत्येन्द्र जी और के दोनों ही हमारे साथ गप्पें करते रहे. लंच के बाद सत्येन्द्र जी ही हमें नेशनल पार्क कि पहली सफ़ारी पर ले गए. और जंगल के बारे में अन्य जानकारियां दीं. अद्भुत ज्ञान है उन्हें जंगल और जंगली जीवों का. पहले दिन तो हम जंगल की खूबसूरती ही देखते रह गए...हिरन और चीतल जैसे जानवर भी मिले. शेर के पंजों के निशान भी मिले...... इतने घने जंगल............क्या कहें...

दूसरे दिन सुबह चार बजे हम उठ गए और साढे चार बजे जंगल की तरफ अपनी सफारी में निकल लिए. किस्मत अच्छी थी............दो राउंड के बाद ही शेर के दर्शन हो गए.
हमने तय किया यहां खडे-खडे मौत का इंतज़ार करने से अच्छा है, अपने काटेज़ की तरफ़ जाना. हमारे कौटेज़ डाइनिंग स्पेस से कम से कम सौ कदम दूर......जंगल का मज़ा देने वाले इस रिसोर्ट पर कोफ़्त हो आई
आराम फरमाता शेर......हम बांधवगढ में थे और अलस्सुबह ही हमें शेर के दर्शन हुए थे। उसकी गुर्राहट कानों में अभी भी गूंज रही थी। शाम की सफ़ारी के बाद हमने कुछ शॉपिंग की और रात दस बजे के आस-पास अपने रिसोर्ट पहुंचे। साढे दस बजे वेटर ने डिनर लगा दिये जाने की सूचना दी। हम सब डाइनिंग स्पेस की तरफ बढे। डाइनिंग स्पेस.... पर्यटकों को जंगल का अहसास दिलाने के लिये पूरा रिसोर्ट ही घने जंगल जैसा था , लेकिन ये स्पेस तो केवल आधी-आधी दीवारों से ही घिरा था. खैर... हम डिनर के लिये पहुंचे.अभी हम खाना प्लेटों में निकाल ही रहे थे, कि कुछ गहरी सी, गुर्राहट सी सुनाई दी. सब ने सुनी, मगर किसी ने कुछ नहीं कहा.एक बार...दो बार...तीन बार.... अब बर्दाश्त से बाहर था.... आवाज़ एकदम पास आ गई थी। मेरी बेटी विधु ने पहल की- बोली ये कैसी आवाज़ है? अब सब बोलने लगे- हां हमने भी सुनी... हमने भी.... खाना सर्व कर रहे वेटर ने बेतकल्लुफ़ी से कहा-अरे ये तो बिल्ली की आवाज़ है. अयं...!! ऐसी आवाज़ में बिल्ली कब से बोलने लगी!!!
दीपावली
नहीं.....ये बिल्ली नहीं है.....गुर्राहट और तेज़ हो गई.... इस आवाज़ को बिल्ली की आवाज़ बताने वाले वेटर के चेहरे पर भी हवाइयां उड़ने लगी थीं. हकलाता सा बोला-’शेर है शायद....’ हम सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम! अब दीवार के उस पार शेर और इस पार हम....जंगल से लगा हुआ रिसोर्ट...हदबंदी के लिये बाड़ तक नहीं.....हम सब तो थे ही, मेरी भांजी अनमोल भी साथ में....हे ईश्वर!!! दौड के दोनों बच्चों को किचन में बंद किया. अब सारे वेटर भी डरे हुए....बोले- हां शेर आ तो जाता है यहां...... पिछले दिनों एक लड़के को खा गया था.... काटो तो खून नहीं.......टेबल पर जस का तस पडा खाना..... हमने तय किया यहां खडे-खडे मौत का इंतज़ार करने से अच्छा है, अपने कॉटेज़ की तरफ़ जाना. हमारे कॉटेज़ डाइनिंग स्पेस से कम से कम सौ कदम दूर......जंगल का मज़ा देने वाले इस रिसोर्ट पर कोफ़्त हो आई. कल तक जिसकी तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे, आज वही मौत का घर दिखाई दे रहा था. खैर....धीरे-धीरे उतरे.... एक-दूसरे का हाथ पकडे किसी प्रकार कॉटेज तक पहुंचे. आह.... सुकून की लम्बी सांस...... पूरी रात आंखों में कटी. सबेरे जब हम फिर सफ़ारी के लिये पहुंचे- लोगों को कहते सुना- रात बोखा( मेल टाइगर का नाम) शहर की तरफ़ आया था!!!!!!!!!!