इंसान न हुआ, घड़ी हो गया। घूमता रहता है, काँटों की तरह। हर वक्त " समय ही नहीं मिलता...", "फुरसत ही नहीं है...." जैसे जुमले मुंह पर सवार रहते हैं। और ये सच भी है। आज बड़े हों या बच्चे, सब इस कदर व्यस्त हो गए हैं की किसी को किसी की बात सुनने तक का टाइम नहीं।
मेरे घर में चार सदस्य हैं, और हम चारों अतिव्यस्त। बिटिया सुबह से लेकर रात तक पढ़ाई, स्कूल, ट्यूशन होमवर्क, मैं व्यस्त, पतिदेव अपनी फैक्ट्री में इतने व्यस्त की सुबह निकलते हैं और रात में आते हैं। मैं अपने काम पर सुबह सात बजे से जुटती हूँ, तो रात नौ बजे फुरसत होती हूँ। केवल अम्मा जी ( सास जी) फुरसत में होतीं हैं, तो उन्हें टीवी व्यस्त रखता है।
कमोबेश यही हाल हर परिवार का है। हमारी तरह सब अपने परिजनों का चेहरा रात में ही देख पाते हैं। अच्छा हुआ जो प्रकृति ने रात का विधान किया!!
आज के बच्चों को जब देखती हूँ, तो मुझे मेरा बचपन बहुत शिद्दत से याद आने लगता है।
कितना निश्चिन्त ..... कितना मासूम.... न पढ़ाई का ऐसा कमरतोड़ बोझ, न ट्यूशन की चिंता। स्कूल से आये तो बैग एक तरफ़ उछाला और जूते दूसरी तरफ....."मम्मे.....खाना......" का आदेश प्रसारित करती आवाज़ घर में गुंजाती।
इधर खाना अभी शुरू ही होता , कि उधर परदे के दोनों ओर से साथियों के चेहरे झांकने लगते। इशारे होने लगते कि जल्दी-जल्दी खाओ। मैं भी हबड़-तबड़ खाती। दौड़ के आधे-अधूरे हाथ धोती, और "मम्मे.....खेलने जा रहे हैं...." का एलान करती भाग जाती। पीछे से मम्मी आवाज़ देती रह जातीं।
हमारे खेल भी निराले थ॥ आज की तरह इलेक्ट्रोनिक का ज़माना तो था नहीं सो जो भी खिलौने थे अधिकतर खुद के तैयार किये उत्पाद होते थे। घर के आँगन में गुड्डे-गुड़ियों के बाकायदा घर बने हुए थे, जिन पर मेरी बड़ी दीदियों और उनकी सहेलियों का कब्ज़ा था, लेकिन दीदी की छुट्टी शाम को होती थी, सो तब तक उनकी गुड़ियों से हम खेलते। लेकिन गुड़ियों से हम बहुत देर तक नहीं खेलते थे , कारण मेरी मित्र -मंडली में लड़के भी थे, जो गुड़ियों से खेलना पसंद नहीं करते थे। किसी प्रकार मन मार के घर के गुड्डे से काम कराते रहते थे।
इसके अलावा हम बच्चे दोपहर में अपने घर की बाउंड्री में कंचे खेलते, गुल्ली-डंडा खेलते, और शाम होते ही "नमक-पाला" जैसा भारी दौड़ भाग वाला खेल खेलते। अँधेरा होते ही "आइस-पाइस" (आई-स्पाई) खेल जमता जो मम्मी की आवाज़ पर ही ख़त्म होता।
घर आते बैग उठाते, होमवर्क करते, कुछ थोडा बहुत याद भी करते और बस हो गई पढ़ाई।
रविवार को मम्मी-पापा दोनों घर पर होते , लिहाज़ा हमें कंचे या गुल्ली-डंडा खेलने का मौका नहीं मिलता, इस दिन हम सभ्य बच्चों की तरह कायदे में रहते और केवल लूडो, सांप-सीढ़ी या कैरम जैसे खेल खेलते। कैरम तो हमारे पापा भी साथ में खेलते थे और क्या खूब खेलते थे। आज भी वे बहुत बढ़िया खेलते हैं।
ऊंचे-ऊंचे इमली के पेड़ों पर सरपट चढ़ जातीं , साइकिल पर करतब दिखातीं। सर्कस देख के आने के बाद घर में बाकायदा सर्कस होता। अस्थाई झूला बाँधा जाता और उस पर उल्टा लटकाया जाता।
मेरी दीदी कहीं भी जातीं, साथ में मुझे ले जाना अनिवार्य था। मैं मन मारके जाती। दीदी भी कहाँ ले जाना चाहती थीं, लेकिन क्या करें? उस समय माँ के आदेश को टाला नहीं जाता था।
बड़ी दीदी के बाल बेहद लम्बे और खूबसूरत थे। कहीं जातीं तो मम्मी उनकी छोटी बना देतीं। लेकिन दीदी घर से ज़रा आगे पहुँचते ही अपनी चोटी खोल देतीं। मेरी उपस्थिति का भान होते ही मुझे मम्मी से न बताने के एवज में दस पैसे की रिश्वत दी जाती।
ऐसी ही रिश्वत तब भी दी जाती जब दोनों दीदियाँ अपनी सहेलियों के साथ फिल्म देखने का प्रोग्राम बनातीं । मुझे पुछल्ले की तरह फिर लटकाया जाता, फिर रिश्वत दी जाती, लेकिन इस बार फिल्म न जाने के लिए रिश्वत दी जाती। मेरा मन वैसे भी फिल्म देखने में तब लगता नहीं था। शायद ज्यादा छोटी थी। कुछ समझ में तो आता नहीं था, सो टॉकीज़ के प्रोजेक्टर रूम के बाहर की बालकनी में फिल्म के कटे हुए टुकड़े बीनती रहती। ऐसे में रिश्वत लेकर फिल्म जाने से मुकर जाना फायदे का सौदा होता था।
कहाँ से कहाँ पहुँच गई। बात कर रही थी आज के बच्चों और उनकी व्यस्तताओं की। आज की शिक्षा-प्रणाली ने बच्चों को कोल्हू का बैल बना दिया है। पढाई हमारे समय में भी होती थी, लेकिन पाठ्यक्रम का अनावश्यक बोझ नहीं होता था। तब के पढ़े हुए हम आज के बच्चों को पढ़ा रहे हैं, मतलब हमारी शिक्षा में कोई कमी नहीं है। वर्ना आजके बच्चों को पढ़ा ही न पाते। समय के साथ-साथ बदलाव होगा ही, लेकिन अनावश्यक बदलाव की क्या ज़रुरत है? आज पता नहीं कितनी अतिरिक्त किताबें कोर्स में लगा दी जातीं हैं, जिन्हें पूरी तरह पढाया भी नहीं जाता, लेकिन पेपर होता है। बच्चे के लिए तनाव पर्याप्त।
पहले रिज़ल्ट फर्स्ट डिवीज़न, गुड सेकण्ड , सेकंड डिवीज़न, थर्ड डिवीज़न जैसा बोला जाता था। लेकिन अब? अब तो पर्सेंटेज बोला जाता है. पहले ६०-६५ बहुत था, अब ८० भी कम गिना जाता है। बच्चा दिन-रात ९० -९५ की दौड़ में जुटा रहता है। पढ़ाई का तनाव, होम वर्क का तनाव, परीक्षाओं का तनाव, क्लास में रैंक बनाए रखने का तनाव ऊपर से माँ- बाप की इच्छाओं का तनाव। "बेटा, फलाना प्रतिशत आना ही चाहिए. " और " हम तुम्हारे लिए पानी की तरह पैसा बहाते हैं, और तुम पढ़ तक नहीं सकते?"